Wednesday, 19 December 2018

साढ़े डेढ़ बटा अढ़ाई...
आखिर तकिया पर कोंहड़ा धरा ही गया...तो मैंने एक खाँटी भाई कांग्रेसी से पूछ ही लिया "...अब तो चारो ओर खुशी ही खुशी है..." खाँटी भाई उसी प्रसन्नता से चाटुकारिता वाले अंदाज में मुसकुराते हुए बोले "...ये सब आला कमान की मेहरबानी से..." मैंने भी सांत्वना देते हुए कहा "...हलक सुखा कर हाला से कोंहड़ा गीला करना भी एक कला है..." ये सुनते ही खाँटी भाई कांग्रेसी थोड़ा खिसिया गए लेकिन जीत की खुशी भारी रही लिहाजा उसी अंदाज़ में बोले "...पंडीजी ने 15 साल का आशीर्वाद दिया है..." मैंने कहा "...इसके पहले भी 10 वर्षों के वनवास का संकल्प दोहराया जा चुका है...लेकिन वो 15 साल में सिर्फ एक काम किए...शायद बढ़िया..." खाँटी भाई जिज्ञासा बढ़ी लिहाजा पूछ बैठे "...गया जी जा कर पितृ सांत्वना देने के बजाय गोवा जाकर अपनी लुटिया-दहान कर आए..." खाँटी भाई ये सुनते ही उखड़ गए बोले "...आपको पता है वो लोकतन्त्र की हत्या थी..." मैंने बड़े आराम से कहा "...उसके बाद लोकतन्त्र जिंदा भी हो गया..." मैंने आगे जोड़ते हुए चुटकी लेते हुए पूछा "...वैसी तीन साल हो गए बियाह हुए लोकतन्त्र का जन्म कब तक हो रहा है...?" खाँटी भाई ये सुनते ही बगले झाँकने लगे बोले "... लगता है आप दीन-दुनियाँ से परिचित नहीं हैं..." मैंने कहा "...ओसामा जी तो खैर नहीं लेकिन हाफिज़ साहब अगर घराती होते तो शायद अब तक लोकतन्त्र पैदा हो चुका होता...." खाँटी भाई कनफ्यूज हो गए बोले "...मैं समझा नहीं..." मैंने उन्हें उत्तर देते हुए कहा "...इसमें न समझने वाली बात क्या है...हनीमून तीन साल थोड़े न चलता है..." खाँटी भाई खऊराने लगे बोले "....आपको क्या लगता है सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है...?" मैंने कहा "...मैं तो पहली बार देख रहा हूँ जब हनीमून के पैसे से खटिया चमकाया जा रहा है वो भी बियाह के बाद..." ये सुनते ही खाँटी भाई की त्योरी चढ़ गई और गुस्से से धमकी देने वाले अंदाज़ में बोले "...आप समझते क्या हैं...?" मुझे हंसी आ गई और हँसते हुए बोला "...तकिया पर कोंहड़ा सूख रहा है माहौल बनता है तो साढ़े डेढ़ घात अढ़ाई से साढ़े डेढ़ बटा अढ़ाई होने में देर नही...अब तो कोंहड़ा अपनी औकात में... " खाँटी भाई को कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने कहा नमस्कार...

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