Sunday, 30 December 2018

पाकत कटहर बीच बजार...
अब फिर उन्हें डर लगने लगा और गुस्सा भी आने लगा जिन्हें बीबी और अपनी बीवी में फर्क नहीं पता..जब फर्क करने की मजबूरी हो तो ये लोग सर नीचे करके और कमर कुछ ज्यादा ही उठा कर अपने आका से पूछते हैं..ऐसे ही आकाई कुकुड़ूद्दीन शाह से पूछा "...असली मुंह से पूछने के बजाय आप नकली मुंह का उपयोग क्यों करते हैं..." मेरी आवाज सुनते ही कुकुड़ूद्दीन शाह चौंक गए फिर सीधा होते हुए सबकुछ ठीक ठाक करते हुए बोले "...हा आप भी क्या बात करते हैं जनाब हा...?" मैंने कहा "..अपनी शराफत के कपड़े उतार कर कमर ऊंची करने की क्या जरूरत थी .?" कुकुड़ूद्दीन शाह बड़े बदतमीजी से तमीज दिखाते हुए बोले "..आपको पता है अपनी बेहूदगी साबित करने के लिए ही शराफत के कपड़े ओढ़ते हैं..." मैंने मज़ाक करते हुए पूछा "...गनीमत है लेकिन फिर भी कमर उठा के मुंह खोलने की क्या जरूरत...?" कुकुड़ूद्दीन शाह बोले "...हा हा मियां आप भी समझदार मालूम होते हैं..." "...लेकिन आप की तरह नहीं..." मैंने तपाक से बात काटते हुए कहा। कुकुड़ूद्दीन शाह बोले "...ये मुल्क मेरा भी है और मुझे भी जीने का हक है समझे आप..!" मैंने उसे टोन में उससे पूछ "...लेकिन अभी से धूल फाँकने क्या जरूरत है...?कुकुड़ूद्दीन शाह असहज हो गए और पूछे "...आपको क्या लगता है हम आत्महत्या करने जा रहे थे क्या..." मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा "...धूल अपनी कब्र खोदने के लिए ही फांक रहे हैं आप...क्यों ? कुकुड़ूद्दीन शाह भड़क गए और भड़के अंदाज में पूछने लगे "...अरे आप चाहते हैं हम खत्म हो जाएँ और आप राज करें..." मैंने भी चुटकी लेते हुए कहा "...घबराईए मत आपका एक्सीडेंटल डेथ नहीं होगा..." कुकुड़ूद्दीन शाह को समझ में नहीं आया तो पूछ बैठे "...आपके कहने का मतलब मैं समझा नहीं..." मैंने उन्हें उत्तर देते हुए कहा "...कांग्रेस को हौले-हौले मारा जा रहा है..." ये सुनते ही कुकुड़ूद्दीन शाह फिर भड़क गए और उसी अंदाज में पूछे "...हम आपको कांग्रेसी लगते हैं क्या..." मैंने उसी टोन में जवाब दिया "...इसीलिए आपके बहुत जरूरी है बीबी और बीवी में फर्क करना..." कुकुड़ूद्दीन शाह का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ "...नहीं तो क्या कर लेंगे आप...?" मैंने फिस्स से हँसते हुए कहा "...एक्सीडेंट..अब वास्तव में आपको डरना होगा...." कहते हुए मैंने नमस्कार किया

Wednesday, 19 December 2018

साढ़े डेढ़ बटा अढ़ाई...
आखिर तकिया पर कोंहड़ा धरा ही गया...तो मैंने एक खाँटी भाई कांग्रेसी से पूछ ही लिया "...अब तो चारो ओर खुशी ही खुशी है..." खाँटी भाई उसी प्रसन्नता से चाटुकारिता वाले अंदाज में मुसकुराते हुए बोले "...ये सब आला कमान की मेहरबानी से..." मैंने भी सांत्वना देते हुए कहा "...हलक सुखा कर हाला से कोंहड़ा गीला करना भी एक कला है..." ये सुनते ही खाँटी भाई कांग्रेसी थोड़ा खिसिया गए लेकिन जीत की खुशी भारी रही लिहाजा उसी अंदाज़ में बोले "...पंडीजी ने 15 साल का आशीर्वाद दिया है..." मैंने कहा "...इसके पहले भी 10 वर्षों के वनवास का संकल्प दोहराया जा चुका है...लेकिन वो 15 साल में सिर्फ एक काम किए...शायद बढ़िया..." खाँटी भाई जिज्ञासा बढ़ी लिहाजा पूछ बैठे "...गया जी जा कर पितृ सांत्वना देने के बजाय गोवा जाकर अपनी लुटिया-दहान कर आए..." खाँटी भाई ये सुनते ही उखड़ गए बोले "...आपको पता है वो लोकतन्त्र की हत्या थी..." मैंने बड़े आराम से कहा "...उसके बाद लोकतन्त्र जिंदा भी हो गया..." मैंने आगे जोड़ते हुए चुटकी लेते हुए पूछा "...वैसी तीन साल हो गए बियाह हुए लोकतन्त्र का जन्म कब तक हो रहा है...?" खाँटी भाई ये सुनते ही बगले झाँकने लगे बोले "... लगता है आप दीन-दुनियाँ से परिचित नहीं हैं..." मैंने कहा "...ओसामा जी तो खैर नहीं लेकिन हाफिज़ साहब अगर घराती होते तो शायद अब तक लोकतन्त्र पैदा हो चुका होता...." खाँटी भाई कनफ्यूज हो गए बोले "...मैं समझा नहीं..." मैंने उन्हें उत्तर देते हुए कहा "...इसमें न समझने वाली बात क्या है...हनीमून तीन साल थोड़े न चलता है..." खाँटी भाई खऊराने लगे बोले "....आपको क्या लगता है सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है...?" मैंने कहा "...मैं तो पहली बार देख रहा हूँ जब हनीमून के पैसे से खटिया चमकाया जा रहा है वो भी बियाह के बाद..." ये सुनते ही खाँटी भाई की त्योरी चढ़ गई और गुस्से से धमकी देने वाले अंदाज़ में बोले "...आप समझते क्या हैं...?" मुझे हंसी आ गई और हँसते हुए बोला "...तकिया पर कोंहड़ा सूख रहा है माहौल बनता है तो साढ़े डेढ़ घात अढ़ाई से साढ़े डेढ़ बटा अढ़ाई होने में देर नही...अब तो कोंहड़ा अपनी औकात में... " खाँटी भाई को कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने कहा नमस्कार...