मायावती का मतावटी...
पता नहीं क्यों ये बात मायावती को समझ में नहीं आएगी जो बात कांसीराम मुलायम सिंह यादव से गठबंधन करने के कुछ ही महीनो बाद जान गए थे। ज्यादा पीछे नहीं बिहार में ही लालू और निरीश के अलग होने के पीछे भी यही कारण था। नतीजा नितीश ADA में वापस लौट आए। और तब काँसीराम को अपना स्टैंड बदलते हुए मशहूर घोषणा करनी पड़ी थी कि उन्हें स्थिर सरकार नहीं चाहिए।
काहे भाई काहे स्थिर सरकार नहीं चाहिए तो उत्तर इसका वही था जिससे नितीश लालू के अलग बार-बार अलग होते रहे और अब फिर हुए। दरअसल लालू यदव जैसे शातिर लोगो के लिए अपना कोई नहीं है राजनीति में तो और भी नहीं लिहाजा वो JDU को पूरा निगल जाने की वाले थे। ठीक इसी प्रवृत्ति के मुलायम सिंह यादव हैं वो पूरी बसपा को निगल लेंगे और डकार भी नहीं लेंगे।
मायावती का अभी तक अलग रहना और गठबंधन न करना गेस्ट हाउस कांड नहीं था बल्कि खुद को और बसपा को मजबूत करना और राष्ट्रीय परिदृश्य पर छा जाना था। ये अवधारणा काँसीराम की थी लेकिन काँसीराम से मायावती ये पूछ नहीं पायी कि ये होगा कैसे नतीजा मायावती ने पैसे से खुद और बसपा दोनों को कमजोर किया बहुत ज्यादा कमजोर कर दिया। इसीलिए सभी पुराने काँसीराम को समर्पित लोग आज बसपा छोड़ चुके हैं।
मायावाती यहाँ दूसरी गलती करती हैं जब पुराने लोग उनको छोड़ कर जा रहे थे तो उन्हें लग गया कि वो वाकई कमजोर होती जा रही हैं लिहाजा बहुजन के बजाय सर्वजन का कार्ड खेला जो केवर एक बार ही चला दुबारा नहीं बस यही से उनका बहुजन समाज पर पकड़ ढीली हुई और होती ही गई।
मतस्थानांतरण (वोट ट्रांसफर) बहुत खतरनाक खेल है विशेषकर लालू और मुलायम जैसे लोगों से इसके खतरे से मायावती भी भली प्रकार वाकिफ हैं जैसे काँसीराम वाकिफ 3 महीने में ही वाकिफ हो चुके थे ममला यहाँ ये फंस गया था कि मायावती को उम्मीदवार ही नहीं मिल रहे थे उसके लिए वो बहुत परेशान थीं इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान हो रहा है बल्कि बहुत बड़ा सांगठानिक नुकसान भी है।
बस अपना मार्केट बनाने और संगठन को खड़ा करने के लिए "भीमराव अंबेडकर" के नाम का सहारा मायावती ने लिए। इसमे चाल ये थी कि एक तो नाम दूसरे सोनियां गांधी की तर्ज पर खुद को त्यागी बताना कि देखिये मैं खुद खड़ी न हो कर भीमराव अंबेडकर को खड़ा किया। सपा से उनका गठबंधन दूर तक न तो जाता और न ही मायावती उसे ले जाती वो ठीक कह रही थीं अभी फिलहाल गठबंधन का कोई इरादा नहीं है। ये मामला था "एक हाथ ले दूसरे हाथ दे" बस। एक तीर से से कई निशाना साधने की फिराक में मायावती थीं लेकिन सब उलटा पड़ गया। भीमराव अंबेडकर की हार ने बहुत बड़ा नुकसान कर दिया ऐसा नुकसान जिसकी भरपाई शायद बहुत ज्यादा मुश्किल है।
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