Tuesday, 23 May 2017

धन-धोबडों ने ले लीन्हा....

दिल्ली का तूफान एक, दो दिन, दो-तीन हफ्ते या कुछ महीनो का नहीं है ये तूफान आकार उसी समय लेना शुरू कर दिया जब केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी को केवल और केवल अपनी हवाला कंपनी बनाने लगे थे और बराबर का हिस्सा मांगने वालों को बागी घोषित करके हलाल करने में थोड़ा भी न तो पहले हिचकते नहीं थे और न ही अब हिचकते हैं। मुझे एक दिल्ली के ही कमीडिया विशेषज्ञ (स्वघोषित और स्वयंभू) ने बताया था कि इन सबके पीछे कुमार विश्वास का हाथ है और कपिल मिश्रा उनके गुट के ही हैं। मुझे उस क-मीडिया विशेषज्ञ की बात सुन कर बहुत हंसी आई थी लेकिन मैंने कुछ कहा नही।

जिन लोगों को ये लगता है कि कुमार विशवास जैसा आदमी इतनी हिम्मत कर सकता है तो वो सिरे से गलत हैं। भाई साहब इस आदमी के कारों के काफिले में 2 करोड़ की भी कार है और यदि आप ये भी समझते हैं कि ये कारों के काफिले ईमानदारी के काव्यपाठ की कमाई से खरीदी गई हैं तो आप बहुत भोले हैं। ये ‘कौआ छाप कवि’ हरवंश राय बच्चन का चपरासी भी बनने की योग्यता नहीं रखता जो अपनी कविता से एक 40 हजार का फिएट कार भी नहीं खरीद पाए जबकि दर्जनों किताबे लिख कर भी, जिस मात्र तीन साल में इसने जितनी कमाई की है उतनी कमाई करने के लिए चेतन भगत से पूछिए और मजे की बात ये कि इस कौए की केवल एक किताब है ‘कोई दीवाना कहता है’। ये कौआ छाप कवि दावा करता है कि इसने केवल और केवाल काव्य पाठ से इतनी रकम कमाई है। दुष्यंत कुमार, मुनव्वर राणा (पुरस्कार फेंकू) आदि आदि लोग ...मने अब तो कवि और शायर लोग तो बकलोल हैं...यदि इसके काव्य-प्रदर्शनों जो ये दावा करता है कि इनके आयोजन विदेशों सहित भारत सहित कुछ विशेष प्रोफेशनल कालेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थाओं में किये गए। आश्चर्यजनक रूप इन संस्थाओं ने इसे कौए को इतना पैसा दे दिया कि 2 करोड़ की कार भी इसके काफिले में आ गई। यदि ये सब जांच के दायरे आ जाएँ तो आश्चर्य मत कीजियेगा... मामला धन-धुलाई (मनी-लांड्रिङ्ग) का हो सकता है...ये भी मामूली धन-धोबड (जो काला सफ़ेद करे) नहीं लगता...

परतें धीरे-धीरे खुलने लगीं हैं बस कुछ दिनो में ये स्पष्ट हो जाएगा कि इन सबके पीछे कोई और नहीं प्रशांत भूषण, योगेंदर यादव और आनंद कुमार का हाथ है। कपिल मिश्रा ने जिस ईमेल को letscleanaap@gmail.com किया था उसे दरअसल प्रशांत भूषण और यीगेंदर यादव ही ऑपरेट कर रहे हैं। कपिल मिश्रा का आत्मविशवास से गवाह बनना, सीधे CBI, ACB आदि से समय लेकर सुबूत पेश करना किसी सामान्य व्यक्ति या नेता के बस की बात छोड़िए छोटे-मोटे सेसना कचहरी के वकील के बस की भी बात नहीं। ये वही कर सकता है जिसे हर कानूनी पक्ष की पूरी और गहराई से जानकारी हो लिहाजा प्रशांत भूषण ही है वैसे भी प्रशांत भूषण ने ही केजरीवाल के खिलाफ सारे सुबूत जुटाने में गंभीर मदद किया इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद सबकुछ अपनाया गया। जिस दिन यीगेंदर यादव ने केजरीवाल का अप्रकृतिक बचाव करते हुए जब बयान दिया कि आर्थिक आरोप लगाने से पहले पुख्ता सुबूत होने चाहिए तभी शक यकीन में बदल गया था बस करो यही सब पर्दे के पीछे से खेल खेल रहे हैं। कपिल मिश्रा के पवार पॉइंट प्रस्तुति में जीतने तकनीकि शब्द हैं वो सभी कानूनी विशेषज्ञता की ओर इशारा करते है।

योगेंदर यादव, प्रशांत भूषण और कपिल मिश्रा की टीम केजरीवाल के करीबी आला दर्जे के हर तरीके से जघन्य भ्रष्ट कुमार विश्वास, मनीष सिसौदिया और अल्का लांबा सहित लगभग 3 दर्जन करीबियों को पार्टी में देखना ही नहीं चाहती क्योकि इन लोगों ने “आम आदमी पार्टी का दुपट्टा छीना है”, सरे आम वो सब किया जो अब तक का सबसे जघन्य और घोनौना था... दिक्कत ये भी है ये सभी बड़े शातिर हैं और इनके पास पैसा बहुत है जिसके बल पर ये सब कुछ भी कर सकते हैं इसीलिए ये सब इतनी सफाई से किया जा रहा है कि प्रथम दृष्ट्या मामला जघन्य अपराध दिखने लगे और केजरीवाल उसकी महाभ्रष्ट टीम सीधे कारागार में दिखे। मामला इतना गंभीर है केजरीवाल के कपिल मिश्रा के 2 करोड़ के घूस तक के बचाव तर्क और सुबूत नहीं लेकिन ये भी सही है बाहर सुबूत दे देने पर उसके साथ टेंपरिंग करना केजरीवाल और उसके छिछोरों के लिए कठिन नहीं।

ये पता होने के बावजूद कि कपिल मिश्रा प्रशांत भूषण के इशारे कूद रहे हैं, केजरीवाल या तो बेवजह भाजपा को बदनाम कर रहे हैं या फिर जानबूझ कर इसका हारे हुए युद्ध का श्रेय भाजपा दे रहे हैं जिसके पीछे सीधा सा तर्क है अहं के टकराव का। दिल्ली की कुर्सी पर भाजपा विराजमान हो जाए ये मंजूर कर सकते हैं लेकिन वो ये मंजूर कत्तई नहीं कर सकते कि उसपर प्रशांत भूषण या आनंद कुमार केजरीवाल को लात मार कर काबिज हो जाएँ।

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