फागुन के भंग में भौजी समाजवादी उमंग मे...
एह जबर फागुन में समाजवादी भौजी आखिर घोड़ी चढ़ ही गई...बड़े-बड़े लोग उम्मीद लगाए थे...बनारस में धूनी जमाए वो इसे फागुनी नजारे को देखने के लिए कई दिनो से धूनी रमाए कचौड़ी-जलेबी चाभ रहे हैं...खैर अरमान तो पूरे हुए लेकिन मोदी बाबा ने सारा गुड गोबर कर दिया...एक खाँटी भाई खटमल पनेरी का मगही पान झटकते हुए चिल्ला रहे थे "...ये सब बिना परमीशन था..."
मैंने कहा "...आमा छोड़िए भी समाजवादी भौजी आज कुछ ज्यादा ही गुलाबी दिख रही थी घोड़ी पर..."
खाँटी भाई खटमल नहीं माने और आरोप लगते हुए बोले "...आप वोट दे आए न ...अब आपकी नियत खराब ही रहेगी..."
मैंने आराम से कहा "...हम तो आराम से फागुन का असली मजा लेंगे सब नियत का खेल है का करें..."
खाँटी भाई खटमल कहे "... वैसे वो घोड़ी नहीं चढ़ी थी ..."
मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...तो क्या घोडा था...?"
खाँटी भाई खटमल खुन्नस निकालते हुए मुझसे पूछे "...आपको रथ नहीं दिख रहा था क्या...?"
मैंने भी उसी अंदाज में पूछा "...तो बताओ रथ में घोडा जुता था, घोड़ी जुती थी या विलुप्त प्रजापति का गदहा ...?"
ये सुनते ही खाँटी भाई खटमल असहज हो गए और गुस्से में मुझसे पूछे "...आप लोगों को घोडा-घोड़ी और गदहा के सिवा और भी कुछ दिख रहा क्या...?"
मैंने रसीले अंदाज में कहा "...दिख रहा है...घोडा और गदहा के बीच एक खूबसूरत समाजवादी भौजी..."
खाँटी भाई खटमल बाल नोचते हुए बोले "...आप कुछ नहीं कर पाईएगा..."
मैंने कहा "...जब सारी कैबिनेट कर रही है तो फिर सवाले खतम..."
खाँटी भाई खटमल चमक उठे बोले '...यही तो हालत खराब है इसीलिए..."
मैंने कहा "...माँ गंगा ने बुलाया हो या न बुलाया हो लेकिन समाजवादी भौजी ने फागुन मे जरूर बुलाया है..."
खाँटी भाई खटमल बोले "...भौजी के लिए पूरी कैबिनेट झोंकने की क्या जरूरत थी..."
मैंने कहा "...मोदी बाबा ने कहा है पाई पाई का हिसाब खुद दे कर आओ जनता को तो समाजवादी भौजी खुश हो जाएगी..."
खाँटी भाई खटमल बोले "...वो दिल्ली में रह कर भी दे सकते थे..."
मैंने कहा "... तो भौजी के साथ फगुआ कौन खेलता..हिसाब भी देंगे फगुआ भी खेलेंगे..."
खाँटी भाई खटमल चुपा गए तो मैंने फिर कहा "...पहिले तो कांग्रेसिए और समाजवादिए कमवे नहीं करते तो जवाब क्या देंगे और फगुआ केकरा से खेलेंगे..." खाँटी भाई खटमल बोले "...वैसे ये तो नाइंसाफी है..."
मैंने जवाब देते हुए कहा "...काहे भाई शेर शेर की तरह न लड़कर गीदड़ की तरह लड़े...आपकी सुविधा के लिए..."
खाँटी भाई को जवाब नहीं सूझ रहा था तो मैंने अंतिम वाक्य कहा "...भाई हम कुछ भी हों समाजवादी भौजी के साथ तो फगुआ हम देवर बन कर ही खेलेंगे...युवराज केसरी को अच्छा लगे या बुरा...वैसे भांग वाली ठनडई पीने के बाद बाबा के दरबार में केसरी को नहीं जाना चाहिए था..."
बोलो भाई हम ठीक कहे कि नहीं ? वैसे भी बुरा न मानो होली है ...
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