Sunday, 3 April 2016

चवन्नी का दम बने एकन्नी में भुर्ता ...

एक हाथ में फटवा एक हाथ में फट्ठा लेकर घूमते थे...चीख - चीख कर बताते थे मुसलमीन सही है ,,,लेकिन किसी खैरमकदम वाले ने ज़ोर से कहा "...जनाब ये फतवा नहीं फटवा है ..." ये सुनते ही जनाबेआली जहां फट्ठा भाँजने के आदी हो चुके थी उसी से खोईच लगा गया तो बहते खून को रोकते हुए बोलने लगे "...मियां हर्ज ही क्या है ..." और ज़ोर से उसी खैरमकदम वाले ने पूछा "...जब हर्ज ही नहीं था तो ये फटवा लेकर क्यों अपनी फजीहत करवाए जा रहे हैं ...? आपका फट्ठा भी खुद्द आपकी ही फाहीहत किए जा रहा है ..." जनाबेआली कनफ़्यूजन में बोले "...समझ में नहीं आता वो मोहतरमा सही हैं या ये मोहतरम ...?" खैरमकदमी ने कहा "...तो अब क्या होगा जनाबेआली वो मोहतरमा तो इज्जत का कोरमा बना के खा गईं...?" जनाबेआली अफसोस जताते हुए पूछा "...किसी ने रोका क्यों नहीं ...?" खैरमकदमी बोले "...जिसे जितना रोकना था रोक चुका उनका बस चले तो कौम के लड़कों की शादी तक दुश्वार हो जाए ..." जनाबेआली आपे से बाहर हुए जा रहे थे "...आखिर सऊदी अरेबिया में तो सख्त कानून है कि कोई विदेशी जलसा नहीं कर सकता, किस ग्रुप को एड्रैस नहीं कर सकता फिर ये सब कैसे ...?" खैरमकदमी बोले "...जनाबेआली ओबामा तक जलसा नहीं कर पाए हैं लेकिन मोदी के लिए कानून बादल दिया गया अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं..." जनाबेआली के पेशानी पर बल पड़ने लगे थे और खुद को संभालते हुए बोले "...सवाल तो ये है फटवे अब चीख - चीख कर फड़वाए जा रहे हैं वो भी हजरते जमीन से ..." खैरमकदमी बोले "...ये तो सीधे आग लगने वाली बात हो गई बुर्के से ...?" जनाबेआली बोले "...सवाल ये है बरखुरदार अब तो टोपी से सियासत भी मुमकिन नहीं रही ..." खैरमकदम वाले बोले "...आग तो तारिक फतेह भी लगा रहे हैं मुंबई या दिल्ली में बसने की दिलचस्पी कल ही उन्होने जाहिर कर दी ..." जनाबेआली चिंता में दुखी हो कर बोले "...जब सियासत नहीं होगी तो हमारी सुनेगा कौन ...?" खैरमकदमी बोले "...सुनने वाले फिर भी बहुत से हैं लेकिन उसका क्या होगा जो पैसा हजरते जमीन से आता है सुना है अब तो वो भी शायद न आवे फिर तो ....?" जनाबेआली और खैरमकदमी गले मिल गए एक दूसरे को सांत्वना देने के लिए ...            

No comments:

Post a Comment