ISIS चोखा रंग, JNU-खाँटी अंग ...
खाँटी भाई गुलाम साहब ISIS के बारे में बहुत अच्छी तरह पता है। मैंने ऐसे ही अपना मत प्रस्तुत किया तो अधेड़ बकलोल युवराज को युवा आई-कान मनाने वाला खाँटी आजाद उछल कर पूछा "...कैसे...?" मैंने उसे उत्तर देते हुए कहा "...तभी वो नकली ISIS के जलसे में असली ISIS के बारे में कायदे से इतना बता रहे थे जितना ISIS का सदस्य भी नहीं जनता होगा..." आजाद खाँटी बोला "...लेकिन वो तो तुलना कर रहे थे ..." मैंने तगड़ा जवाब दिया "...बकलोल दास तुलनात्मक स्थिति तब आती है जब आदमी उसमे रच-बस कर अंधा हो जाता है ..." आजाद खाँटी फिर चौंका "...लेकिन गुलाम साहब तो अंधे नहीं हैं ..." मैंने कहा "...अपने बकलोल युवराज को ISIS विपसना कराने के लिए यही ले जाते हैं और पकड़ कर लाते भी हैं ..." आजाद खाँटी बोला "...लेकिन ISIS विपसना नहीं करता वो तो लोगों को तड़पा - तड़पा कर मारता है..." मैंने आजाद खाँटी को समझाया "...ISIS जो करता है पूरी कांग्रेस उसे विपसना ही मानती है ..." आजाद खाँटी को फिर आश्चर्य हुआ पूछा "...वो कैसे ..." मैंने उसे संतुष्ट करने वाला उत्तर दिया "...इसीलिए राजमा-ता ने उर्दू में हस्ताक्षर वाला चिट्ठी पढ़वाया अपने गुलाम से जैसे ISIS के झंडे पर हस्ताक्षर है..." आजाद खाँटी चौंक गया बोला "..लगता है आपका कहना सही है..." "...लेकिन हमको तो पूरी और पक्की जानकारी थी कि दिग्गी राजा उनके गुरु हैं ..." उसने आगे जोड़ते हुए कहा तो मैंने स्पष्ट किया "... दाग्गी रज्जा तो अपनी शादी को सही साबित करने पर उतारू हैं ISIS की तर्ज पर ..." आजाद खाँटी फिर चौंका "...वो कैसे ...?" मैंने कहा "...गूगल पर 'यजीदी गर्ल्स' की वर्ड से सर्च करो दाग्गी रज्जा की कहानी के साथ - साथ 'JNU सेंक्चुयरी' की असलियत का पता चल जाएगा तो हुआ न एक पंथ दो काज..." आजाद खाँटी ने मुझे स्पष्ट करते हुए कहा "...लेकिन सोनिया जी के हस्ताक्षर तो ISIS के झंडे पर नहीं है ..." मैंने उससे तार्किक सवाल किया "...तुझे उर्दू या अरबी-फारसी आती है ...?" आजाद खाँटी साफ़गोई से बोला "...नहीं मुझे नहीं आती ..." तो मैंने उससे कहा "...फिर तुम कैसे कह सकते ISIS के झंडे पर बकलोल अधेड़ की मम्मी का हस्ताक्षर नहीं है..." आजाद खाँटी ये सुनते ही सनपात कर चुपा गया तो फिर मैंने उसे समझाते हुए कहा "...जब वो चिट्ठी पर उर्दू में हस्ताक्षर कर सकती है तो अरबी-फारसी में ISIS के झंडे पर भी हस्ताक्षर कर सकती है ...समझे..." बकलोल आजाद खाँटी को समझ में आ गया तो सर हिला सहमति जाता दी लेकिन थोड़ी देर बाद फिर मुझसे पूछा "...कांग्रेसी गुलामो को ISIS की सदस्यता लेने की क्या जरूरत थी ...?" मैंने उसे अनुत्तरित करने के उद्देश्य से कहा "...क्योकि बटला हाऊस, अफजल, कसाब, यकूब, इशरतजहां, आदि पर आँसू बहाना जरूरी है और ये तभी संभव है जब ISIS की सदस्यता हो ...." आजाद खाँटी जवाब सुन कर भागने लगा उसने सामान्य सामाजिक शिष्टाचार भी नहीं निभाया ...
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