Tuesday, 17 November 2015

तमंचे पर डिस्को ...

बिहार विधान सभा चुनाव में लालू पर हमला करना तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही संदर्भों में उचित था। तात्कालिकता के संदर्भ मे तो ठीक नहीं बैठा लेकिन दूरगामी परिणाम के संदर्भ मे लालू का नितीश से आगे निकल जाना भाजपा के लिए शुभ तो है ही लोकतन्त्र की विभीषिका को भी दर्शाती है जिसका "गंगाजल" से तर्पण किया जाना जरूरी है।
भाजपा की दुखद बुरी पराजय के बाद भी यदि कोई दल सबसे अधिक सकते में है तो वो है काँग्रेस। काँग्रेसी खेमे में अजीब सा सन्नटा पसरा है लालू यादव की जबरदस्त जीत के बाद भी। काँग्रेस क्या किसी भी दल या व्यक्ति के लिए कुछ भी करना संभव है सिवाय लालू प्रसाद यादव की फितरत को बदल देने के। वैसे राजनीति की बहुत कठोर और कटु सच्चाई ये भी है कि यदि आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं तो आप राजनीति कर ही नहीं सकते। ये किसी न किसी संदर्भ और रूप में होना ही चाहिए, यदि आप इससे समझौता करते हैं तो यकीन मानिए आप राजनीतिक आत्महत्या कर रहे हैं। लालू यादव, नितीश कुमार और काँग्रेस आत्महत्या करेंगे ये मानना अपने आप में बेहद निम्नकोटी का हस्य होगा। जब जीवित रहने के लिए महत्वकांक्षी होना अपरिहार्य है वो किसी को मार कर तो फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरे लालू प्रसाद यादव का अपना मुख्यमंत्री क्यों न हो ?
यकीन मानिए ये यक्ष प्रश्न नितीश कुमार के लिए भी है लिहाजा उनके लिए भी अपनी महत्वाकांक्षा से समझौता करना राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा ही है लिहाजा मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करने का सीधा अर्थ ये भी होगा कि उनके अंदर सरकार चलाने की काबलियत भाजपा से अलग होने के साथ ही समाप्त हो चुकी है। बहुत कठोर यथार्थ ये भी है कि सरकार चलाना उनका कर्तव्य तो है ही लालू यादव को कमजोर करते हुए खत्म कर देना उनका राजनीतिक धर्म भी है वरना उल्टे वो ही समाप्त हो जाएंगे। अब लालू प्रसाद यादव इसे सहजता से होने देंगे वो भी सबसे ताकतवर के रूप में उभरने के बाद भी ? ये मौजूं सवाल वैसा ही है जैसे कुएं पर खड़े किसी व्यक्ति से कोई ये कहे कि कुएं में छलांग लगाओ तुम कुएं में गिरोगे नहीं। काँग्रेस तो 27 सीटें जीतने के बाद भी राजनीतिक आत्महत्या कर चुकी है सिर्फ अंतिम संस्कार होना बाकी है देखते हैं किस घाट पर कांग्रेसी अपना अंतिम संस्कार करवाना पसंद करते है लालू घाट पर या नितीश घाट पर।
20 नवंबर को शपथ ग्रहण समारोह में लाललृष्ण आडवाणी को यूं ही नहीं निमंत्रण भेजा गया है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को नहीं। इसका सीधा सा अर्थ है न तो नितीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोडना चाहते हैं और न ही प्रधानमंत्री का सपना। लालू यादव द्वारा अपनी गोटी सेट करने से पहले नितीश खुद को सेट कर लेना चाहते हैं भले भाजपा का सहयोग लेना पड़े मोदी को बाई पास करते हुए। लालू और नितीश के लिए मामला इतना गंभीर है कि अपने सहयोगी द्वारा ही किसी एक की राजनीतिक हत्या निश्चित है।
नितीश कुमार का स्पष्ट मानना था कि इस चुनाव में वो जीतने की स्थिति में कुछ नहीं तो भी 80 सीटें आ ही सकती है और लालू प्रसाद यादव बहुत जीतेंगे तब भी 40-50 सीट से अधिक नहीं जीतेंगे। महज सामान्य बहुमत की ही दरकार थी नितीश कुमार को लेकिन ये बिलकुल उल्टा हो गया। लालू यादव की सीटों में 400% की बढ़ोत्तरी के बहुत बड़े निहितार्थ हैं जिसके बहुत दूरगामी परिणाम के साथ प्रतिपरिणाम भी देखने को मिलेंगे ये तय है।
बिहार में जनरल मोटर्स और अलस्टोम के निवेश का रास्ता केंद्र प्रशस्त कर चुका है। अनुमान के मुताबिक इस निवेश से करीब डेढ़-दो लाख लोगों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है। व्यापारिक संदर्भ में निर्भर पारिस्थिकी की बात की जाए तो इसमे आप दस से गुणा कर दीजिये और भी निवेशों को मंजूरी मिलने प्रक्रिया जारी है। ये बहुत बड़ा आमूल-चूल सामाजिक बादलाव साबित होगा जिसका श्रेय लालू प्रसाद यादव नितीश कुमार को लेने देंगे या फिर नितीश कुमार लालू यादव को लेने देंगे, ये भी अपने आप में सर्वविदित खुला रहस्य है। लेकिन इतना तो तय है कि जो सत्ता में होगा उसे श्रेय लेने से कोई नहीं रोक सकता, बिहार की दिलचस्प राजनीति में ट्विस्ट यहाँ से भी आयेगा। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली है कि कैसे दिल्ली मेट्रो को भाजपा (तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना) ले के आई और प्याज से भाजपा-सरकार गिरने के बाद उसी मेट्रो के नाम पर 15 साल जम के शासन किया भ्रष्ट होने के बावजूद। लिहाजा बिहार में नजारा देखने लायक हो सकता है।
लालू और नितीश दोनों को ये अच्छी तरह पता है कि दोनों का मतप्रतिशत क्रांतिक मात्रा 20% से नीचे है। मजे की बात ये है कि नितीश घटे हैं लालू यादव बढ़े हैं। दोनों ने साथ-साथ चुनाव लड़ा है लिहाजा वो एक दूसरे को मार कर ही अपना मतप्रतिशत बढ़ा कर 20% से ऊपर कर सकते हैं दूसरा कोई चारा ही नहीं है, जिन्हें ये लगता है कि दोनों साथ रहें हमेशा के लिए तो और भी खतरनाक होगा दोनों की लिए क्योकि भाजपा अकेले 20% से ऊपर है और महाराष्ट्र का उदाहरण सबके सामने है कि 1999 के बाद भाजपा-शिवसेना सत्ता में नहीं लौट सकी साथ लड़ने के बावजूद, वो तब संभव हुआ जब केंद्र में मोदी आ चुके थे। यहाँ भाजपा एनडीए के साथ लगभग 35% ही ज्यादा दूर नहीं है और कुछ भी कभी भी हो सकता है जैसा कि महागठबंधन में अविश्वास का नजारा छाया हुआ है। अतः कभी भी भाजपा 45% से ऊपर आसानी से जा सकती है अतः संभानाओं से समझौता करने से लाख गुना बेहतर है खुद को मजबूत किया जाए। लालू यादव को इससे शानदार सकारात्मक अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।
लालू यादव को भलीभांति पता है कि नितीश की सरकार जितनी अधिक स्थाई होगी वो उत्तरोत्तर उतने ही कमजोर होते जाएंगे। लिहाजा नितीश सरकार को जितनी जल्दी अस्थिर करेंगे उनके वोट-बैंक की उन्नति के लिए उतना ही बेहतर होगा। अतः नितीश के वजूद के लिए खतरा बनाना लालू यादव के लिए मजबूरी ही नहीं महती जरूरत भी है इसके साथ-साथ ये भी कि जबतक लालू का अपना मुख्यमंत्री नहीं होगा जबतक सरकार की सफलता का लेशमात्र भी श्रेय लालू यादव को मिलने से रहा।

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