Tuesday, 10 November 2015

लालू कुमार - नितीश प्रसाद यादव ....

बड़े बड़े राजनीतिक सूरमाओं के लेख आप अनसोशल मीडिया (टीवी प्रेस) में आने शुरू हो चुके हैं ये वही सब लेख हैं जिनको  मतगणना के समय से ही सुन - सुन के कान पक चुके हैं टीवी पर वही सब अखबार मे वही सब घिसी पिटी बातें कुछ भी ऐसा नहीं जिसे विश्लेषण कहा जा सके। हद तो तब हो जाती जब उसमे से भी 80% या उससे अधिक वो सब होता है जो हम सभी पिछले 4-5 महीने से पढ़ते देखते आ रहे हैं। जय-पराजय के भांति-भांति के लोग भांति के कारण गिना रहे हैं जिसको जो मिल रहा है वही लिख रहा है। हम वो सब फालतू के अर्थ - अनर्थमेटिक, फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री, बायोलोजी, आदि की चर्चा बिलकुल नहीं करेंगे क्योकि आप सभी वो सब मुझसे और सभी राजनीतिक सूरमाओं से काफी बेहतर जानते हैं। हम यहा केवल तथ्यों का विश्लेषण करेंगे।

जो लोग ये बता रहे हैं कि मोहन भगवत के बयान से चुनाव पलट गया, लालू यादव पर बहुत अधिक आक्रमण हो गया था, गाय, बाहरी - बिहारी, डीएनए-आरएनए, पाकिस्तान-अफगानिस्तान आदि आदि तो उन लोगों को ये जान लेना चाहिए कि चुनावों में इन सब बातों का बहुत ज्यादा असर नहीं होता। डीएनए-आरएनए की बात अस्र किया होता तो एनडीए को 5% वोट भी नहीं मिलते, मोहन भगवत की बात चुभी होती तो यकीन मानिए भाजपा 12% वोट कभी नहीं मिलते, गाय गोरू अपनी जगह हैं चूंकि ये सब बातें मनोरंजक होती हैं अतः जीतने पर शानदार लगती हैं हारने पर चुभती हैं बस इससे अधिक कुछ भी नहीं। यदि ऐसा होता तो लालू यादव का गऊ को भोज्य बताने पर उनको 10% से अधिक वोट नहीं मिलते स्टिंग की सीडी के आने पर नितीश की 95% सीटों पर जमानत जब्त हो जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जनता इतनी बेवकूफ़ नहीं है कि मोहन भागवत के बयान को नहीं समझती या फिर उस पर की जा रही भददगी को नहीं समझती।

बिहार चुनावों में सारा खेल  उड़न्तू-घुमंतू मतों (floating votes) का था जो हर चुनावों में लगभग 4 से 8%  के आस-पास होता हैं, बिहार में भी यही अंतर केवल 7.8% मतों का था। ये वोट किसी भी करवट बैठ सकते हैं कारण ये होता है इन मतों की कोई अवधारणा व आधार नहीं होता। चुनाव इनके लिए बस एक मनोरंजन के साथ थोड़ी सुरक्षा का भी विषय बन जाता है इससे अधिक कुछ भी नहीं। बिहार के संदर्भ में ऐसे उड़न्तू-घुमंतू मतों की संख्या (प्रतिशत में) और राज्यों की तुलना में थोड़ी अधिक है क्योंकि बहुत बड़ी संख्या पुरुष - परिवार प्रवासी हैं इसीलिए वहाँ मत प्रतिशत कभी 60% ऊपर नहीं जाता। प्रवासी कहीं के भी हो और कहीं भी हों वो अन्यों की तुलना में संवेदनशील ज्यादा होते हैं अपनी सुरक्षा को लेकर, लिहाजा तात्कालिकता उन्हें जोरदार तरीके से गहरे प्रभावित करती है। इस चुनाव से ये बिलकुल स्पष्ट है कि मोदी जी कितने भी पैकेज की बात क्यों कर लें, शानदार भविष्य की बातें कर लें तात्कालिकता की बात नहीं करेंगे तो बड़ी मुश्किल होगी। मेरे अनुमान से काँग्रेस को जो 6.5% वोट मिले हैं उसमे से आधे से अधिक उड़न्तू-घुमंतू मत ही हैं क्योकि काँग्रेस सिरे से संदर्भ से ही बाहर थी।

इन चुनावों मे सबसे मजेदार बात ये हुई कि दो बिलकुल नए व्यक्तित्वों का उदय हुआ एक "लालू कुमार" और दूसरे "नितीश प्रसाद यादव" । तांत्रिक वाली सीडी याद है जिसमे भाटपार रानी के तांत्रिक लालू मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं और नितीश मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। "लालू कुमार" का 80 सीटे ले आना "नितीश प्रसाद यादव" के लिए कितना बड़ा सिर दर्द है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि "लालू कुमार" ने "नितीश प्रसाद यादव" को फरमान जारी कर दिया "... नितीश सरकार चलाएँगे और वो उनकी छवि को अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय संदर्भ में वो भुनाएँगे जैसा इस चुनाव भुना लिए ..." और "नितीश प्रसाद यादव" बेचारे मन मसोसते हुए अपमान का घूंट पी कर रह गए कुछ बोलने की स्थिति में नहीं बचे है। मजे की बात ये है कि अभी पार्टी शुरू भी नहीं हुई है रंग रोगन शुरू हो गया है।

"लालू कुमार" के लिए ये चुनाव तो बोनस है लेकिन साथ में दिक्कत ये है कि मत-प्रतिशत केवल 18.4% ही है फिर भी वो इस अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठा लेना चाहते हैं लेकिन "नितीश प्रसाद यादव" के लिए मुसीबत का एक और पहाड़ यही मात्र 16.8% मत  है कहाँ एनडीए में बांका बास बन के थे यहाँ तो सब उल्टे हो गया जिसको गरियाए थे कभी अब उसी के मातहत काम करना है दोयम दर्जे का बन के और गोडधरिया करते हुए।

दोनों का मत प्रतिशत क्रांतिक मात्रा (20%) से नीचे है ये बहुत बड़ा सर दर्द है। ऐसा इसलिए कि जिस राज्य में किसी भी पार्टी का मत प्रतिशत 20% से नीचे गिरा है वो फिर खड़ी नहीं हो पाई। काँग्रेस, भाजपा और कई खत्म हो चुकी पार्टियां इसका जीता-जागता प्रमाण है। ये सरदर्द  ऐसा है दोनों को अलग करने को विवश करेगा नहीं तो किसी भी सूरत में एक दूसरे के आसरे अपना मत प्रतिशत नहीं बढ़ा सकते क्योंकि ये शीर्ष है और अपना शीर्ष विकसित करने के लिए अलग होना अति आवश्यक है। लेकिन जहां तक भाजपा के डर का सवाल है उससे मुक्त होने के लिए "लालू कुमार" के पास दो विकल्प हैं एक खुद "नितीश प्रसाद यादव" की अपनी सरकार और दूसरे यकीन मानिए केजरीवाल। लालू कुमार से चुंगल केजरीवाल भाग नहीं सकते ये तय है। पार्टी के हंगामेदार और काफी मजेदार होने वाली है।

भाजपा लगभग 25% मत लेकर सबसे ऊपर है उसके घटकों से उसे किसी प्रकार का डर नहीं है जैसा महागठबंधन को है। जैसे महागठबंधन के गठन के समय से ही उसके उल्टी गिनती शुरू हो गई थी इस सरकार के गठन से पहले ही सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है "लालू कुमार" ने इसके संकेत देने शुरू भी कर दिये हैं। सरकार गिरने की सूरत में भाजपा को किसी भी कीमत पर "नितीश प्रसाद यादव" को समर्थन नहीं देना चाहिए और तुरंत हो सके तो अकेले चुनाव में जाना चाहिए। नहीं तो भाजपा के लिए नितीश मायावती साबित होंगे उत्तर प्रदेश की तरह ।    


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