Wednesday, 25 November 2015

सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँडुता ...असही-साँडुता

जैसे-जैसे दाऊद पर शिकंजा कसता जा रहा है काँग्रेस और उसके चमचे सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ का लबादा ओढ़ कर बिल से निकल कर उतने ही ज़ोर से असही-साँडुता - असही-साँडुता चिल्ला कर खुद को सही-साँड़ साबित करने में पूरा ज़ोर लगा रहे हैं। मैंने ऐसे ही एक सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से पूछा तो चीखते हुए चिल्लाने लगा, बोला "...आपको दिखाता नहीं देश में असहिष्णुता का माहौल है ..." मैंने उस सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से पूछा  "...मामला तो दाऊद का फिर उसके लिए आप लोग खुद को सही-साँड़ साबित करने पर क्यों उतारू है ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोला "...देखिये आपकी हिन्दी सही नहीं है पहले उसे ठीक कीजिये ..." मैंने सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से कहा "...हो सकता है लेकिन आप ये बताईए कि खुद को सही-साँड़ और दूसरों को असही-साँड़ साबित करने पर क्यों उतारू हैं ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ मुझे नसीहत देते हुए बोले "...देखिये हम सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ नहीं सहिष्णु हैं ..." मैंने कहा "...जिस प्रकार से गौमाता के मुद्दे पर आप सक्रिय हुए है वो सही-साँड़ का ही धर्म है ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ फिर मुझे नसीहत देते हुए बोला "...आप हमे हमारा धर्म न सिखाएँ ..." मैंने कहा "...अरे हम ऐसा कैसे कर सकते हैं सही-साँडों को कोई असही-साँड़ धर्म सिखाने की हिमाकत कैसे कर सकता है वो उनकी श्रीमती जी हैं...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ गुस्से में बोला "...देखिये आप किसी के व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते ..." मैंने कहा "...सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ जी मामले को निजी से सरकारी आपने सही-साँड़ खाँ ने ही बनाया ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोला "...खाँ की पत्नी ने उसे बताया ..." मैंने सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से कहा "...वही खाँ की पत्नी अपने खाँ से भी ज्यादा बेहद करीबी लोगो से कह रही है कि खाँ ने उसके वक्तव्य को तोड़ - मरोड़ कर पेश किया है ..." इस पर सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ भड़क गया पूछा "...क्या आपकी उससे बात हुई है ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...ये मेरा निजी मामला है..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाऊरा कर मुझे धमकी देते हुए कहा "...आपको इसकी पुष्टि करनी होगी ..." मैंने भी तपाक से जवाब दिया "...सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब से उसके वक्तव्य की पुष्टि हुई क्या वास्तव में उसकी पत्नी ऐसा कहा है या नहीं ? क्योंकि मामला निजी से सरकारी हो चुका है ..." ये सुन कर सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ सहम गया बोला "...आप किसी पर ऐसे झूठ बोल कर कीचड़ नहीं उछाल सकते ..." मैंने कहा "...अपने ऊपर कीचड़ तो सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब उछाल रहे हैं जितनी सच्चाई उनकी बातों में है ठीक उतनी सच्चाई इस बात में भी है कि उसके पत्नी ने अपने बेहद करीबी लोगो कहा है कि सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं ..."   सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ की बहुत देर तक कुछ बोले नहीं तो मैंने कहा "...अभी सही-साँड़ अय्यर और खुर्शीद साहब भी पाकिस्तान हो कर आए हैं दाऊद पर शिकंजा कस रहा है ...ठीक उसके बाद सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ की श्रीमती जी ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोले "...देखिये ऐसा कुछ नहीं है ..." मैंने कहा "...कैसे कुछ नहीं है फिल्म में दाऊद का पैसा नहीं लगता क्या ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ चुप गया ,,, 

Tuesday, 24 November 2015

बड़कू त बड़कू ...छोटकू काहें बड़कू ....?
अभी भी मीडिया के कमेडिया राजनीतिक सूरमा ये महसूसे नहीं कर पाए हैं कि लालू ने छोटकू को डिप्टी सीएम और बड़कू को केवल केबिनेट मंत्री ही क्यों बनाया ? बड़े - बड़े मीडिया घरानो मे राजनीतिक सूरमाओं के लिए विश्लेषण करना बड़े दूर की बात है। ये राजनीतिक सूरमा ऐसे हैं कि इनके आँख पर सर्च लाईट का फोकस मारो तब भी इनके लिए घुप्प अंधेरा ही होता है। लालू यादव तो सर्च लाईट मर रहे हैं लेकिन अभी तक किसी अखबार या टीवी में किसी कमेडिया राजनीतिक सूरमा के कान पर किसी जूँ ने रेंगने की जहमत नहीं उठाई है।
इसका सीधा और सरल अर्थ ये है कि लालू यादव को किसी अपने से अपना विरोध बर्दाश्त नहीं होता, वो उसे आस्तीन का साँप समझते हैं कहने की जरूरत नहीं जब लालू यादव सक्षम होते हैं तो "आस्तीन के साँपों" से कैसे निबटा जाता है बखूबी जानते हैं। साधू यादव, पप्पू यादव, राम कृपाल यादव जैसे ने तो कभी भी "लालू यादव मुर्दाबाद" जैसे आत्मा को छलनी कर देने वाले नारे कभी नहीं नहीं लगवाए फिर भी भनक तक लगते ही लालू यादव उन्हें ठिकाने लगाने में देर नहीं की जबकि ये लोग लालू यादव के बेहद खास हुआ करते थे। राम कृपाल यादव तो लालू यादव के दाहिने हाथ तक थे किसी जमाने में।
नितीश बाबू ने तो वो जघन्य अपराध किया है कि यकीन मानिए लालू यादव नितीश कुमार को माफ कर देंगे ऐसा संभव इसलिए नहीं कि मामला तंत्र - मंत्र का भी है जिस पर लालू यादव अगाध आस्था भी है और उस आस्था द्वारा "लालू मुर्दाबाद" का नारा लगना वो भी नितीश के इशारे पर और नितीश कुमार का मंद - मंद मुसकाना। आप सोच सकते हैं कितना मर्म भेदी दृश्य है ये लालू यादव के लिए और फिर अपराधी लालू चुंगल में हो तो आप कल्पना कर सकते हैं कि दृश्य कितना भयावह होगा।
लालू यादव ने छोटकू को डिप्टी सीएम बना कर ये सीधा और चीखने वाला संकेत दे दिया है नितीश बाबू आपकी औकात तो मेरे छोटू जितनी ही है और फिर बड़कू को केबिनेट मंत्री तक ही सीमित करना अजीब सा नहीं लगता ? जी बिलकुल अजीब है कयदे से तो बड़कू को तो सीएम होना चाहिए छोटकू को डिप्टीसीएम... क्यों होना चाहिए न ...जी आप बिलकुल ठीक समझे लालू यादव का स्पष्ट संकेत नितीश कुमार को है और नितीश कुमार इसे बखूबी समझते भी हैं लेकिन वो अपमानित महसूस कर रहे हैं या नहीं मुझे नहीं पता।
तो इंतजार कीजिये बड़कू के CM बनने का और छोटकू के DCM बने रहने का ..विश्वास रखिए इंतजार की घड़िया उम्मीद से बहुत जल्द खत्म होने वाली है ...खास समीकरण पर सारी तैयारी हो चुकी है ...

Tuesday, 17 November 2015

तमंचे पर डिस्को ...

बिहार विधान सभा चुनाव में लालू पर हमला करना तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही संदर्भों में उचित था। तात्कालिकता के संदर्भ मे तो ठीक नहीं बैठा लेकिन दूरगामी परिणाम के संदर्भ मे लालू का नितीश से आगे निकल जाना भाजपा के लिए शुभ तो है ही लोकतन्त्र की विभीषिका को भी दर्शाती है जिसका "गंगाजल" से तर्पण किया जाना जरूरी है।
भाजपा की दुखद बुरी पराजय के बाद भी यदि कोई दल सबसे अधिक सकते में है तो वो है काँग्रेस। काँग्रेसी खेमे में अजीब सा सन्नटा पसरा है लालू यादव की जबरदस्त जीत के बाद भी। काँग्रेस क्या किसी भी दल या व्यक्ति के लिए कुछ भी करना संभव है सिवाय लालू प्रसाद यादव की फितरत को बदल देने के। वैसे राजनीति की बहुत कठोर और कटु सच्चाई ये भी है कि यदि आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं तो आप राजनीति कर ही नहीं सकते। ये किसी न किसी संदर्भ और रूप में होना ही चाहिए, यदि आप इससे समझौता करते हैं तो यकीन मानिए आप राजनीतिक आत्महत्या कर रहे हैं। लालू यादव, नितीश कुमार और काँग्रेस आत्महत्या करेंगे ये मानना अपने आप में बेहद निम्नकोटी का हस्य होगा। जब जीवित रहने के लिए महत्वकांक्षी होना अपरिहार्य है वो किसी को मार कर तो फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरे लालू प्रसाद यादव का अपना मुख्यमंत्री क्यों न हो ?
यकीन मानिए ये यक्ष प्रश्न नितीश कुमार के लिए भी है लिहाजा उनके लिए भी अपनी महत्वाकांक्षा से समझौता करना राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा ही है लिहाजा मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करने का सीधा अर्थ ये भी होगा कि उनके अंदर सरकार चलाने की काबलियत भाजपा से अलग होने के साथ ही समाप्त हो चुकी है। बहुत कठोर यथार्थ ये भी है कि सरकार चलाना उनका कर्तव्य तो है ही लालू यादव को कमजोर करते हुए खत्म कर देना उनका राजनीतिक धर्म भी है वरना उल्टे वो ही समाप्त हो जाएंगे। अब लालू प्रसाद यादव इसे सहजता से होने देंगे वो भी सबसे ताकतवर के रूप में उभरने के बाद भी ? ये मौजूं सवाल वैसा ही है जैसे कुएं पर खड़े किसी व्यक्ति से कोई ये कहे कि कुएं में छलांग लगाओ तुम कुएं में गिरोगे नहीं। काँग्रेस तो 27 सीटें जीतने के बाद भी राजनीतिक आत्महत्या कर चुकी है सिर्फ अंतिम संस्कार होना बाकी है देखते हैं किस घाट पर कांग्रेसी अपना अंतिम संस्कार करवाना पसंद करते है लालू घाट पर या नितीश घाट पर।
20 नवंबर को शपथ ग्रहण समारोह में लाललृष्ण आडवाणी को यूं ही नहीं निमंत्रण भेजा गया है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को नहीं। इसका सीधा सा अर्थ है न तो नितीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोडना चाहते हैं और न ही प्रधानमंत्री का सपना। लालू यादव द्वारा अपनी गोटी सेट करने से पहले नितीश खुद को सेट कर लेना चाहते हैं भले भाजपा का सहयोग लेना पड़े मोदी को बाई पास करते हुए। लालू और नितीश के लिए मामला इतना गंभीर है कि अपने सहयोगी द्वारा ही किसी एक की राजनीतिक हत्या निश्चित है।
नितीश कुमार का स्पष्ट मानना था कि इस चुनाव में वो जीतने की स्थिति में कुछ नहीं तो भी 80 सीटें आ ही सकती है और लालू प्रसाद यादव बहुत जीतेंगे तब भी 40-50 सीट से अधिक नहीं जीतेंगे। महज सामान्य बहुमत की ही दरकार थी नितीश कुमार को लेकिन ये बिलकुल उल्टा हो गया। लालू यादव की सीटों में 400% की बढ़ोत्तरी के बहुत बड़े निहितार्थ हैं जिसके बहुत दूरगामी परिणाम के साथ प्रतिपरिणाम भी देखने को मिलेंगे ये तय है।
बिहार में जनरल मोटर्स और अलस्टोम के निवेश का रास्ता केंद्र प्रशस्त कर चुका है। अनुमान के मुताबिक इस निवेश से करीब डेढ़-दो लाख लोगों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है। व्यापारिक संदर्भ में निर्भर पारिस्थिकी की बात की जाए तो इसमे आप दस से गुणा कर दीजिये और भी निवेशों को मंजूरी मिलने प्रक्रिया जारी है। ये बहुत बड़ा आमूल-चूल सामाजिक बादलाव साबित होगा जिसका श्रेय लालू प्रसाद यादव नितीश कुमार को लेने देंगे या फिर नितीश कुमार लालू यादव को लेने देंगे, ये भी अपने आप में सर्वविदित खुला रहस्य है। लेकिन इतना तो तय है कि जो सत्ता में होगा उसे श्रेय लेने से कोई नहीं रोक सकता, बिहार की दिलचस्प राजनीति में ट्विस्ट यहाँ से भी आयेगा। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली है कि कैसे दिल्ली मेट्रो को भाजपा (तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना) ले के आई और प्याज से भाजपा-सरकार गिरने के बाद उसी मेट्रो के नाम पर 15 साल जम के शासन किया भ्रष्ट होने के बावजूद। लिहाजा बिहार में नजारा देखने लायक हो सकता है।
लालू और नितीश दोनों को ये अच्छी तरह पता है कि दोनों का मतप्रतिशत क्रांतिक मात्रा 20% से नीचे है। मजे की बात ये है कि नितीश घटे हैं लालू यादव बढ़े हैं। दोनों ने साथ-साथ चुनाव लड़ा है लिहाजा वो एक दूसरे को मार कर ही अपना मतप्रतिशत बढ़ा कर 20% से ऊपर कर सकते हैं दूसरा कोई चारा ही नहीं है, जिन्हें ये लगता है कि दोनों साथ रहें हमेशा के लिए तो और भी खतरनाक होगा दोनों की लिए क्योकि भाजपा अकेले 20% से ऊपर है और महाराष्ट्र का उदाहरण सबके सामने है कि 1999 के बाद भाजपा-शिवसेना सत्ता में नहीं लौट सकी साथ लड़ने के बावजूद, वो तब संभव हुआ जब केंद्र में मोदी आ चुके थे। यहाँ भाजपा एनडीए के साथ लगभग 35% ही ज्यादा दूर नहीं है और कुछ भी कभी भी हो सकता है जैसा कि महागठबंधन में अविश्वास का नजारा छाया हुआ है। अतः कभी भी भाजपा 45% से ऊपर आसानी से जा सकती है अतः संभानाओं से समझौता करने से लाख गुना बेहतर है खुद को मजबूत किया जाए। लालू यादव को इससे शानदार सकारात्मक अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।
लालू यादव को भलीभांति पता है कि नितीश की सरकार जितनी अधिक स्थाई होगी वो उत्तरोत्तर उतने ही कमजोर होते जाएंगे। लिहाजा नितीश सरकार को जितनी जल्दी अस्थिर करेंगे उनके वोट-बैंक की उन्नति के लिए उतना ही बेहतर होगा। अतः नितीश के वजूद के लिए खतरा बनाना लालू यादव के लिए मजबूरी ही नहीं महती जरूरत भी है इसके साथ-साथ ये भी कि जबतक लालू का अपना मुख्यमंत्री नहीं होगा जबतक सरकार की सफलता का लेशमात्र भी श्रेय लालू यादव को मिलने से रहा।

Tuesday, 10 November 2015

लालू कुमार - नितीश प्रसाद यादव ....

बड़े बड़े राजनीतिक सूरमाओं के लेख आप अनसोशल मीडिया (टीवी प्रेस) में आने शुरू हो चुके हैं ये वही सब लेख हैं जिनको  मतगणना के समय से ही सुन - सुन के कान पक चुके हैं टीवी पर वही सब अखबार मे वही सब घिसी पिटी बातें कुछ भी ऐसा नहीं जिसे विश्लेषण कहा जा सके। हद तो तब हो जाती जब उसमे से भी 80% या उससे अधिक वो सब होता है जो हम सभी पिछले 4-5 महीने से पढ़ते देखते आ रहे हैं। जय-पराजय के भांति-भांति के लोग भांति के कारण गिना रहे हैं जिसको जो मिल रहा है वही लिख रहा है। हम वो सब फालतू के अर्थ - अनर्थमेटिक, फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री, बायोलोजी, आदि की चर्चा बिलकुल नहीं करेंगे क्योकि आप सभी वो सब मुझसे और सभी राजनीतिक सूरमाओं से काफी बेहतर जानते हैं। हम यहा केवल तथ्यों का विश्लेषण करेंगे।

जो लोग ये बता रहे हैं कि मोहन भगवत के बयान से चुनाव पलट गया, लालू यादव पर बहुत अधिक आक्रमण हो गया था, गाय, बाहरी - बिहारी, डीएनए-आरएनए, पाकिस्तान-अफगानिस्तान आदि आदि तो उन लोगों को ये जान लेना चाहिए कि चुनावों में इन सब बातों का बहुत ज्यादा असर नहीं होता। डीएनए-आरएनए की बात अस्र किया होता तो एनडीए को 5% वोट भी नहीं मिलते, मोहन भगवत की बात चुभी होती तो यकीन मानिए भाजपा 12% वोट कभी नहीं मिलते, गाय गोरू अपनी जगह हैं चूंकि ये सब बातें मनोरंजक होती हैं अतः जीतने पर शानदार लगती हैं हारने पर चुभती हैं बस इससे अधिक कुछ भी नहीं। यदि ऐसा होता तो लालू यादव का गऊ को भोज्य बताने पर उनको 10% से अधिक वोट नहीं मिलते स्टिंग की सीडी के आने पर नितीश की 95% सीटों पर जमानत जब्त हो जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जनता इतनी बेवकूफ़ नहीं है कि मोहन भागवत के बयान को नहीं समझती या फिर उस पर की जा रही भददगी को नहीं समझती।

बिहार चुनावों में सारा खेल  उड़न्तू-घुमंतू मतों (floating votes) का था जो हर चुनावों में लगभग 4 से 8%  के आस-पास होता हैं, बिहार में भी यही अंतर केवल 7.8% मतों का था। ये वोट किसी भी करवट बैठ सकते हैं कारण ये होता है इन मतों की कोई अवधारणा व आधार नहीं होता। चुनाव इनके लिए बस एक मनोरंजन के साथ थोड़ी सुरक्षा का भी विषय बन जाता है इससे अधिक कुछ भी नहीं। बिहार के संदर्भ में ऐसे उड़न्तू-घुमंतू मतों की संख्या (प्रतिशत में) और राज्यों की तुलना में थोड़ी अधिक है क्योंकि बहुत बड़ी संख्या पुरुष - परिवार प्रवासी हैं इसीलिए वहाँ मत प्रतिशत कभी 60% ऊपर नहीं जाता। प्रवासी कहीं के भी हो और कहीं भी हों वो अन्यों की तुलना में संवेदनशील ज्यादा होते हैं अपनी सुरक्षा को लेकर, लिहाजा तात्कालिकता उन्हें जोरदार तरीके से गहरे प्रभावित करती है। इस चुनाव से ये बिलकुल स्पष्ट है कि मोदी जी कितने भी पैकेज की बात क्यों कर लें, शानदार भविष्य की बातें कर लें तात्कालिकता की बात नहीं करेंगे तो बड़ी मुश्किल होगी। मेरे अनुमान से काँग्रेस को जो 6.5% वोट मिले हैं उसमे से आधे से अधिक उड़न्तू-घुमंतू मत ही हैं क्योकि काँग्रेस सिरे से संदर्भ से ही बाहर थी।

इन चुनावों मे सबसे मजेदार बात ये हुई कि दो बिलकुल नए व्यक्तित्वों का उदय हुआ एक "लालू कुमार" और दूसरे "नितीश प्रसाद यादव" । तांत्रिक वाली सीडी याद है जिसमे भाटपार रानी के तांत्रिक लालू मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं और नितीश मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। "लालू कुमार" का 80 सीटे ले आना "नितीश प्रसाद यादव" के लिए कितना बड़ा सिर दर्द है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि "लालू कुमार" ने "नितीश प्रसाद यादव" को फरमान जारी कर दिया "... नितीश सरकार चलाएँगे और वो उनकी छवि को अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय संदर्भ में वो भुनाएँगे जैसा इस चुनाव भुना लिए ..." और "नितीश प्रसाद यादव" बेचारे मन मसोसते हुए अपमान का घूंट पी कर रह गए कुछ बोलने की स्थिति में नहीं बचे है। मजे की बात ये है कि अभी पार्टी शुरू भी नहीं हुई है रंग रोगन शुरू हो गया है।

"लालू कुमार" के लिए ये चुनाव तो बोनस है लेकिन साथ में दिक्कत ये है कि मत-प्रतिशत केवल 18.4% ही है फिर भी वो इस अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठा लेना चाहते हैं लेकिन "नितीश प्रसाद यादव" के लिए मुसीबत का एक और पहाड़ यही मात्र 16.8% मत  है कहाँ एनडीए में बांका बास बन के थे यहाँ तो सब उल्टे हो गया जिसको गरियाए थे कभी अब उसी के मातहत काम करना है दोयम दर्जे का बन के और गोडधरिया करते हुए।

दोनों का मत प्रतिशत क्रांतिक मात्रा (20%) से नीचे है ये बहुत बड़ा सर दर्द है। ऐसा इसलिए कि जिस राज्य में किसी भी पार्टी का मत प्रतिशत 20% से नीचे गिरा है वो फिर खड़ी नहीं हो पाई। काँग्रेस, भाजपा और कई खत्म हो चुकी पार्टियां इसका जीता-जागता प्रमाण है। ये सरदर्द  ऐसा है दोनों को अलग करने को विवश करेगा नहीं तो किसी भी सूरत में एक दूसरे के आसरे अपना मत प्रतिशत नहीं बढ़ा सकते क्योंकि ये शीर्ष है और अपना शीर्ष विकसित करने के लिए अलग होना अति आवश्यक है। लेकिन जहां तक भाजपा के डर का सवाल है उससे मुक्त होने के लिए "लालू कुमार" के पास दो विकल्प हैं एक खुद "नितीश प्रसाद यादव" की अपनी सरकार और दूसरे यकीन मानिए केजरीवाल। लालू कुमार से चुंगल केजरीवाल भाग नहीं सकते ये तय है। पार्टी के हंगामेदार और काफी मजेदार होने वाली है।

भाजपा लगभग 25% मत लेकर सबसे ऊपर है उसके घटकों से उसे किसी प्रकार का डर नहीं है जैसा महागठबंधन को है। जैसे महागठबंधन के गठन के समय से ही उसके उल्टी गिनती शुरू हो गई थी इस सरकार के गठन से पहले ही सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है "लालू कुमार" ने इसके संकेत देने शुरू भी कर दिये हैं। सरकार गिरने की सूरत में भाजपा को किसी भी कीमत पर "नितीश प्रसाद यादव" को समर्थन नहीं देना चाहिए और तुरंत हो सके तो अकेले चुनाव में जाना चाहिए। नहीं तो भाजपा के लिए नितीश मायावती साबित होंगे उत्तर प्रदेश की तरह ।    


Friday, 6 November 2015

चपरासी चोखा चौरासी रंग ....
सन्नी लियोन शाहरुख खान का मामा जहीर-उल-इस्लाम पाकिस्तानी इंटेलीजेन्स ISI का 2012 से 2014 तक मुखिया रह चुका है। ये सर्वविदित है कि पाकिस्तान में दाऊद इब्राहीम की सुरक्षा ISI के जिम्मे था और आज भी है। अभी 27 अक्टूबर को छोटा राजन की गिरफ्तारी के बाद एक तथ्य प्रमाणित हो गया कि बॉलीवुड मे बहुत बड़े पैमाने पर दाऊद का पैसा लगता है। 90 के दशक में ये चरम पर था जिस समय खान ने बालीवुड मे प्रवेश किया।
जिस दौर मे शाहरुख खान का बॉलीवुड में प्रवेश हुआ था उस दौरान दाऊद की मर्जी के बगैर वहाँ पत्ता भी नहीं हिलता था। जिसने पत्ता हिलाने की कोशिश की उसका पत्ता ही दुनिया से कट गया। टी-सीरीज़ के मालिक गुलशन कुमार की सारे आम नृशंस हत्या इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उस घटना के बाद बॉलीवुड हदस ही नहीं गया हमेशा के लिए सहम भी गया और दाऊद की तूती बोलने लगी। कहने की जरूरत नहीं हर फिल्म में दाऊद कैसे डाकादारी करता है। यहा हर फिल्म का मतलब हर फिल्म। ये महज संयोग नहीं है कि बालीवुड के जबरदस्त प्रोड्यूसर और विश्व के सर्वश्रेष्ट लाइज़ेनर माने जाने वाले अमर सिंह को बॉलीवुड छोडकर सक्रिय राजनीति में आना पड़ा। अद्भुत और विलक्षण अभिनय प्रतिभा के धनी ऋतिक रोशन को बॉलीवुड मे दूसरे प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर ही नहीं मिलते हैं लिहाजा उनके पिता राकेश रोशन को ही ऋतिक रोशन के लिए फील्म प्रोड्यूस और डाइरैक्ट करना पड़ता है। उसी दौरान अमिताभ बच्चन की कंपनी ABCL भी यूं ही बर्बाद नहीं हुई उसके पीछे भी कृत्रिम ठोस कारण हैं। और भी बहुत से रोंगटे खड़े कर देने वाले उदाहरण हैं जो दिये जा सकते हैं।
आज की तारीख में भी दाऊद की मर्जी बॉलीवुड में चलती है जो एक टॉप-सीक्रेट इसी साल जुलाई के पहले हफ्ते में तब उजागर हो गया जब ये पता चला कि दीपिका पादुकोण दाऊद से मिलकर बॉलीवुड छोड़िए हॉलीवुड फिल्म में पैसा लगाने का अनुरोध कर डाला है ये जानते हुए भी कि अमेरिका जैसे देश में किसी आतंकवादी का किसी भी माध्यम से कहीं भी पैसा लगना नामुमकिन है। इससे आप समझ सकते हैं दाऊद की पैठ किस हद तक बॉलीवुड में है।
शाहरुख खान इतना प्रतिभावान नहीं हैं कि इस मुकाम पर हो। अभिनय के निमित्त किसी स्टूडियो का चपरासी बनने की भी शायद ही योग्यता रखने वाला आज बालीवुड मे जिस स्थिति में है उसके पीछे पूरी तरह दाऊद का वरदहस्त है जो ISI मे उसके मामा जहीर-उल-इस्लाम के इशारे पर थोपा गया। आज खान की पूरी मार्केटिंग दाऊद के इशारे पर होती है और जानबूझ कर अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, ऋतिक रौशन आदि अन्यों से हमेशा ऊपर रखने की कोशिश की जाती है। इसने काई बार ये स्वीकार किया भी है उसे सिर्फ काम चाहिए था फिल्म चले या न चले इससे मतलब नहीं, इसीलिए जो भी फिल्म मिली साइन करता चला गया। यही कारण है इसकी कई फिल्मे बुरी तरह फ्लॉप होने के बावजूद इसका कैरियर-ग्राफ बढ़ता ही रहा और बदले में दाऊद को मोटी रकम भी मिलती रही पाकिस्तान जाने के बावजूद और उसमे से पाकिस्तान भी हिस्सेदारी करता हो तो आश्चर्य मत करिएगा। इसीलिए चचाजान हाफिज़ सईद के बुलावे को इसने अस्वीकार नहीं किया। जब भी ये खान अमेरिका जाते हैं हमेशा इन सब को अमेरिकी एयरपोर्ट पर ही पूरी तरह नंगा कर के हवाई अड्डे पर ही घंटों डिटेन किया जाता है ये ठीक वैसी ही कार्यवाही है जो किसी व्यक्ति के आतंकवादी होने के संदेह पर किया जाता है।
“आजतक” चैनल पर ‘अंजना ओम कश्यप’ जिस तरह से जानबूझ कर ये जानते हुए भी कि इसके खिलाफ ईडी से तीसरी बार सम्मन जारी हुआ है चीखते हुए बार – बार ये घोषणा कर रही थी “...शाहरुख खान अपने बलबूते आगे बढ़े हैं...” और “न्यूज़ 24” पर मानक गुप्ता द्वारा खान को देश की शान घोषित करता रहा चीख- चीख कर अपने आप में बहुत बड़ा संदह पैदा करता है। और भी बहुत से चैनलों पर इसे दोहराया गया हो तो क्या आश्चर्य। अभी ये महज ट्रेलर भर है पूरी फिल्म तो अभी बाकी है जो पूरी जांच के बाद चलेगी....
इसलिए शाहरुख खान का विषय अपने आप में बहुत बड़े और अतिगंभीर जांच का विषय है जिससे पता चल सके कि और कितने शाहरुख खान आज सक्रिय हैं।

Tuesday, 3 November 2015

लंगोटी पर लहसुन ...जीव मुआवे जुआं

कुछ जीव सूंघ कर भौंकते हैं जो स्वाभिक है होना भी यही चाहिए  यदि भौकने की ज्यादा इच्छा है तो, लेकिन कुछ सन्नी लिओन छाप जीव ऐसे होते हैं जो भौकने के बाद सूंघने की भी जहमत नहीं उठाते। दुनियाँ में तीन श्रेणियाँ हैं लोगों की, तीनों की पहचान के मुहावरे भी है जी पहली श्रेणी है "सोने पे सुहागा" बेहद लोकप्रिय, दूसरी है "चाँदी पे चावल" और तीसरी "लोहे पे लौकी"। लेकिन सन्नी लियोन के अवतरण के बाद चौथी श्रेणी ने भी अपना विराट स्वरूप धरण कर लिया जो पहले पर्दे में थी अब पर्दा गिर चुका है "लंगोटी पे लहसुन" श्रेणी वालों ने बास मारना शुरू कर दिया है। बड़ी खरतनाक है ये क्योकि जो दूर से भी इनकी संगत में आया उसका सन्नी लियोन की तरह सिवाय लोगों की लंगोटी लहराने के कुछ नहीं कर पाया। हवा के रुख के शौकीन और उसी पर अपना लाल पैजमा चमकाने ने वाले एक महाशय चीखते हुए मेरा विरोध रहे थे "...वो सुपर स्टार हैं जन्मदिन पर आप उनको सन्नी लियोन नहीं कह सकते ..."  मैंने जले पर नमक रगड़ते हुए पूछा "..क्यों क्या अंतर है सन्नी लियोन और आपके हवारुख में...?".लाल पैजामा मुझे समझाते हुए बोले "...देखिये खान साहब की भी इज्जत है ..." मैंने तपाक से कहा "... सन्नी लियोन की भी इज्जत आपके खान साहब से कम नहीं है ...जैसी सन्नी लियोन वैसे आपके खान साहब ..." लाल पैजामा को कुछ सूझ नहीं रहा था तो मैंने कहा "...अभी पाँच दिन पहले ईडी का सम्मन जारी हुआ आपके खान साहब के खिलाफ..." लाल पैजामा ज़ोर शोर से सवाल दागने लगे "...सन्नी लियोन के खिलाफ सम्मन नहीं हुआ क्यों ...?" मैंने कहा "...ये सवाल तो आप ईडी से करिए ..." लाल पैजामा बोले "...देखिये देश का माहौल खराब हो रहा है ..." मैंने कहा "...हाँ खराब तो हो रहा है दाऊद के घर पर पाकिस्तान ने सुरक्षा बढ़ा दी ...और आपके खान साहब की चिंता बढ़ गई..." लाल पैजामा खाऊरा कर मुझसे पूछे "...आपके कहने का क्या मतलब है ..." मैंने भी तपाक से कहा "...ठीक वही जो आपके समझ में आ रहा है ..." लाल पैजामा बोले "... खान साहब कभी दाऊद नहीं हो सकते ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा "...हे भगवान मैंने ऐसा कब कहा ...ऐसा कह के तो झूठ-मूठ में माहौल खराब कर रहे हैं पैजामा जी ..." लाल पैजामा चीखते हुए बोले "...बालीवुड का किंग खान कभी सन्नी लियोन नहीं हो सकता..." मैंने भी उसी तों में जवाब दिया "...सन्नी लियोन भी आपके किंग खान से बहुत इज्जतदार है..." लाल पैजामा खिसिया से गए तो मैंने फिर कहा "...सन्नी लियोन एक उपाधि भी है आपके खान साहब और उनके जैसों के लिए....संभाल के रखिए और ये ऐसी उपाधि है जिसे आपके खान साहब लोग चाह कर भी वापस नहीं कर सकते ..चौथी श्रेणी  'लंगोटी पर लहसुन'.." का नाम रौशन कीजिये..."  लाल पैजामा अपनी लम्बोर्गिनी चालू करने लगे ....