Tuesday, 20 October 2015

जोकर जंग अज़ब हैरानी ...

बड़े ज़ोर-शोर से तमंचा लहरा-लहरा कर पुरस्कार विसर्जन न करने का दावा करते हुए अवसाद रस और अवसादी लफ्जों के शायर चिल्ला रहे थे कि जो लोग एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन कर रहे हैं वो थक चुके हैं उनके कलाम मे वो ताकत नहीं बची। ट्विट्टर पर भी उन्होने बहुत तमंचा लहराए जा थे। आलम तो ये भी था जोकरों के उच्च मनोरंजक हाइ भोल्टेज ड्रामे के खिलाफ शायर महोदय एक साक्षात्कार (चीत्कार नहीं) ठीक एक दिन पहले नामी अन-सोशल मीडिया अमर उजाला मे छपा भी था जिसका साफ मतलब था वो पुरस्कार विसर्जन नहीं करेंगे, लेकिन 16 तारीख को जैसे ही मेरा लेख आया जिसका बहुत दिनो लोगो को इन्तजार था,(वैसेभी  देश भर में हजारों लोगों को मेरे लेखों बेसब्री से इंतजार रहता ही है )  ठंडे बस्ते की ओर लौटते इस मजेदार मज़ाकिया विषय मे फिर से गर्माहट आ गई जिसका नतीजा ये हुआ कि ठीक उसी दिन "काशी के अस्सी" ने अपने एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन का दिया फिर दो दिन ही बाद शायर महोदय भी पल्टी मारने पर मजबूर हो गए और उन्होने भी पुरस्कार विसर्जन कर दिया।

बड़े ज़ोर-शोर से चीख रहे उस दिन "सत्ता रायबरेली की नालियों मे बहता है" लेकिन एक-आदमी पुरस्कार उनको 2014 में तब मिला जब कोंग्रेसी ईटल्ली राजमा-ता की चरण वंदना करते हुए उसी नाली की पवित्रता से खुद ही अपना अभिषेक किया था। आज फिर उसी सत्ता से पुरस्कार वापस लेना चाहते हैं जो उनके शहर के नालियों मे बहता है। बात यहीं खत्म नहीं होती उन महोदय को एखलाक के बराबर पैसा भी चाहिए कम से कम 50 लाख हाँ भाई पुरस्कार राशि के रूप मे जिसका उन्होने ब्याज नहीं लौटाया,  उसी नालियों में बहने वाले सत्ता से वो जुड़ना भी चाहते भी हैं ठीक किसी सचिव की तरह। सत्ता रायबरेली के नालियों मे बहता है। शायर महोदय आप "सत्ता का खेल" नहीं खेल रहे आप आप तो "सट्टा" लगा रहे हैं अपने  अवसादी अ-लेखन की क्षमता का। जब सिर्फ गाली-गलौज करने वाले तक एक दो नहीं दर्जनो "साहित्य एक-आदमी पुरस्कार" हथिया सकते हैं तो आपने भी हथियाया तो इसमे क्या आश्चर्य।

शायर महोदय को आतंकवाद की भी परिभाषा चाहिए ठीक यूएनओ के संदर्भ में आजम खाँ की तर्ज पर जबकि मेरे ही वाल पर आतंकवाद की परिभाषा स्पष्ट रूप से दे गई थी 30 सितंबर को ही जो अभी  भी है, देख लें उक्त तिथि में। ये परिभाषा सत्ता अधिष्ठान में विचाराधीन भी है लिहाजा इसे भी उसी रौशनी में देखना चाहिए जिस अवसाद से वो जिन्न-जिन्नातों को भगा कर उजाला करने का दावा करते हैं। वो अच्छा हुआ उस जमाने में ISIS नहीं था इसीलिए शायर महोदय नक्सली बनने बंगाल चले गए थे अपना गाल बजाते हुए पुलिस ने पकड़ लिया और थाने में इनके पिता जब जी ने शपथ पत्र दाखिल किया तब इनको मुक्ति मिली। इन लोगों का हाई भोल्टेज ड्रामें को भी इसी आतंकवाद की रोशनी में देखना चाहिए।

ये तय है मेरा लेख 16 अक्तूबर को नहीं आया होता ये शायर महोदय भी पल्टी मारते हुए एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन नहीं करते। कुछ मित्र राष्ट्रवादी साहित्यकार तो यहा तक कह रहे हैं काशी का अस्सी का भेद भी खुलने के बाद एक-आदमी के साहित्यकारों का असली रूप तो लोगों के सामने आ ही गया है उनकी बास मारती बजबजाती प्रतिभा भी लोगों के सामने आ गई ठीक रायबरेली की नालियों की तरह ...शायर महोदय को इसे ढ़कने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई ...लेकिन वो पासा भी उल्टा पड़ गया .... 

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