Thursday, 15 October 2015

ओ ! एक-आदमी के साहित्यकारों इस लेख शीर्षक बताओ ....

अपने आप को नामी कहलवाने के शौकीन नकली प्रगतिशील बिरादरी के दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी अपना पुरस्कार विसर्जन करने के लिए पूरे दल बल के साथ निकले ही थे कि बाहर घूम रहे साँड़ों ने दौड़ा लिया तो एक साहित्यकारों ने अपने जेब से जानवरों का वध करने वाला गंडासा निकाल लिया जिससे डर कर सांडों ने दौड़ाना बंद कर दिया। फिर वो दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के लिए निकल पड़े। ये तमाशा देखते हुए भीड़ के व्यक्ति से हमने पूछा "...भाई माजरा क्या है..?." वो सज्जन बताने लगे "...कुछ मूर्खवादी लोग मूर्ति विसर्जन के बजाय पुरस्कार विसर्जन करने निकले थे ..." तभी उस भीड़ के एक और सज्जन ने टोका "...मूर्खवादी नहीं मार्क्सवादी ..." उत्तर देने वाले व्यक्ति ने टोकने वाले  को लगभग डांटते हुए कहा "...एक ही बात है जैसे 'बुट को बट, जो को गो' कहा जाता है वैसे ही ' कार्ल मार्क्स' को  'काल मूर्ख'  कहा जाता है और बीच में टोका मत करो ..." उत्तर दाता बताने लगे "...उन लोगों को सांडों ने दौड़ा लिया था ..." मैंने कहा "...इससे पहले कभी गोवंशियों ने उन मूर्खवादियों को नहीं दौड़ाया..." सज्जन बोले "...इससे पहले वो सब काभी अपने कार से बाहर निकलते ही नहीं थे ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा "...लेकिन आज वो साथ में गोश्त काटने वाला गंडासा भी साथ लेकर निकले थे ...ऐसा क्यों ?" सज्जन कहने लगे "...वो तो हमेशा उनके पास ही रहता है जब चाहा जहां चाहा किसी को भी काट कर गोश्त बनाया और पार्टी दे दी ..." मेरा आश्चर्य और बढ़ गया मैंने पूछा "...फिर उनको ये पुरस्कार कैसे मिला ..?" सज्जन बोले "...ठीक उसी तरह जैसे एक कसाई दूसरे कसाई को सम्मानित करता है ..." सज्जन के उत्तर से मेरा मुंह और आँखें खुली की खुली रह गईं मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था ये देखते हुए सज्जन बोले "...पुरस्कार केवल और केवल साहित्यकारों को ही मिलना चाहिए था ..किसी भी कीमत पर...." मैंने फिर उसी आश्चर्य से पूछा "...मतलब ज़्यादातर पुरस्कार साहित्यकारों को नहीं मिले ...?" सज्जन बोले "...इसीलिए तो वो लोग गोश्त बनाने वाला गंडासा हमेशा अपने साथ रखते हैं ..." मैंने संतोष जताते हुए कहा "....मतलब उन्हें साँड़ों ने यूं ही नहीं दौड़ाया था ..असल बात यही है ." सज्जन सहमति जताते हुए बोले "...हाँ बात यही है... बहुत साल पहले एक बार मैंने इसी एक-आदमी वाली किताब खरीदी थी ..." मैंने पूछा "...फिर ...?" सज्जन बोले "...मुझे मनोचिकित्सक से अवसाद का ईलाज करना पड़ा जो अभी चल रहा है..." मैंने कहा "...एक बार अवसाद पकड़ ले तो ये डिस्को छाप अंगरेजी दवाई से ठीक नहीं होता ...खैर " सज्जन बोले "...ये लोग ऐसी ही अनेक बीमारियाँ समाज में फैला रहे हैं अपने अवसाद रस के लेखन और अपने गोश्त बनाने वाले गंडासे से ..." मैंने सज्जन से कहा "...एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के बाजाय कोई रास्ता नहीं है ..." सज्जन बोले "...बहुत बढ़िया होगा अगर ये लोग अपने असली पेशे में लौट जाएँ तो वैसे भी ये लोग गंडासा अपने साथ रखते ही हैं ..." मैंने पलट कर उनसे पूछा "....तो मतलब अब बेचारे निरीह पशु ही इसका खामियाजा भुगतें ...? सज्जन को अपनी गलती का एहसास हुआ बोले "...हाँ ये तो है ...बेचारे पशुओं का क्या दोष...?" मैंने सज्जन से पूछा "...धरती पर बोझ बन चुके इन एक-आदमी साहित्यकारों से मुक्ति का कोई रास्ता नहीं ..." सज्जन उत्तर देते हुए बोले "...अगर इनके पास स्वाभिमान नाम की चीज होती तो किसानो वाला रास्ता था जिसकी शुरुआत कॉंग्रेस ने 1993 मे की थी और तबसे फलते-फूलते आज भी जारी है ..."मैंने आहें भरते हुए कहा "...काश ! इन साहित्य एक-आदमियो के साहित्यकारों के पास थोड़ा भी स्वाभिमान होता तो ये धरती अवसाद सहित कई मानसिक बीमारियो से तो मुक्त तो होती ही साथ है धरती का बहुत बड़ा बोझ भी खत्म हो जाता ..."  

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