Saturday, 31 October 2015

भारत से ज्ञान की लूट की एक बानगी ...

क्या ये मात्र संयोग है कि जब म्लेच्छों (अंगरेजों) ने भारत गुलाम बनाना शुरू किया तभी यूरोप में पुनर्जागरण हुआ औद्योगिक क्रांति के साथ - साथ आधुनिक विज्ञान क्रांति का भी सूत्रपात हुआ। भारत में इतना धन और ज्ञान था कि भारत में लूट से समूचा यूरोप और अमेरिका न सिर्फ दरिद्र और जंगली से अमीर बन गए बल्कि भारत के ज्ञान को लूट कर ढोंगी ज्ञानी भी बन बैठे। भारत में सबसे पहले पुर्तगाली 1502 में भारत आए फिर डच 1602 में यूनाइटेड ईस्ट इंडियन कंपनी के माध्यम से आए और ठीक दस साल के बाद 1612 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मादयम से भारत आए और यहाँ के लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया धन तो लूटा ही ज्ञान की लूट मच गई।

ठीक  75 साल के बाद एक चोर जिसका नाम आईसैक न्यूटन था, ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त भारत से चुरा कर अपने नाम से प्रतिपादित करता है। ये सिद्धान्त हूबहू भास्कराचार्य के सिद्धान्त की नकल है जिसे उसने  500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य द्वारा रचित ग्रंथ प्रथम "सिद्धान्त शिरोमणि" से चुराया था। हद तो तब हो गई जब उसने अपनी पुस्तक का नाम तक चुराया और अपनी पुस्तक नाम भी "प्रिंसिपिया" ही रखा यानी ठीक म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में अनुवाद। भास्कराचार्य का ग्रंथ "सिद्धान्त शिरोमणि" बेहद गूढ ग्रंथ है जो चार भागों ('पारी गणित', बीज गणित', 'गणिताध्याय' तथा 'गोलाध्याय') में है  जिसमे भौतिकी, गणित, खगोलविज्ञान गूढ रहस्यों का खजाना है।  म्लेच्छों द्वारा ये ज्ञान की ये पहली लूट थी जिसके बाद ही यूरोप में आधुनिक विज्ञान की शुरू होती है। भास्कराचार्य के अन्य ग्रन्थों "लीलवती" (गणित और खगोलविज्ञान), "करण कौतूहल" (खगोल विज्ञान) आदि भी हैं जिसको चुरा कर यूरोप के चोरों ने अपने नाम के आगे वैज्ञानिक होने का ठप्पा लगवा लिया।

उसी दौरान विलियम हार्वे नाम का एक व्यक्ति हुआ जिसने 1628 में रक्त संचरण पर अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे मूर्खों द्वारा तथाकथित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नीव माना जाता है, ने आचार्य भाव मिश्र के लघुत्रयी ग्रन्थ जिसमे तीन ग्रंथ (भाव प्रकाश, माधावनिदान और शंईगधरसंहिता ) हैं की  नकल करके चोरी की जिसमे शरीर क्रिया विज्ञान रक्त संचरण सहित और औषधि विज्ञान का भी विस्तृत वर्णन है। एंड्रियास विसैलियस भी उसी समय हुआ जिसने सुश्रुतसंहिता से शव विच्छेदन की पूरी प्रक्रिया चुराई और अपनी पुस्तक लिखी वो ठीक उसी प्रकार है जैसा सुश्रुत संहिता में बताया गया है। बात यही पर खत्म नहीं होती शल्य चिकित्सा भी पूरी तरह हूबहू चुराया गया और आज भी वही पद्धति और उपकरण हैं जैसा संहिता में बताया गया है।

"योग्यतम की उत्तर जीविता" का सिद्धान्त देने वाले चार्ल्स डार्विन भी कम नहीं थे। वेदों (ऋग्वेद ) से चुरा कर उसने "ऑरिजिन ऑफ स्पिशीज़" लिख डाली। यही नहीं उसने ठीक गीता के एक वाक्य "वीर भोग्या वसुधरा" को चुरा कर अपना सिद्धान्त दिया जिसे "प्रकृतिक चयन" या "योग्यतम की उत्तर जीविता" का नाम दे दिया। जैव विकास का क्रमिक सिद्धान्त हमारे ऋग्वेद में पहले से ही है जिसे पाँच महाकल्पों में विभाजित किया गया जिसमे धरती की कहानी 5 कल्पों में कही गई है- महत कल्प, हिरण्यगर्भ कल्प, ब्रह्मा कल्प, पद्मकल्प और वराह कल्प जिसमे विस्तार आए। तो क्या जैव विकास के पाँच कल्प आर्किओजोइक, प्रोटिरोजोइक, पैलियोजोइक, मेसोंजोइक और सीनोजोइक इन्हीं वेदों से नहीं चुराए गए हैं?

महर्षि भारद्वाज विलक्षण विमान और यंत्र शास्त्री थे। उन्होने दो ग्रंथ लिखे "आशुबोधिनी" जिसमे अनेक विद्याओं का उल्लेख है और दूसरी "यंत्र-सर्वस्व" जिसमें हवाई जहाज बनाने के 500 विधियों का वर्णन है जिसके आधार पर विश्व का सबसे पहला जहाज भारत में 1895 में महाराष्ट्र के "शिवकर बापूजी तलपड़े" द्वारा बनाया और उड़ाया गया था जो 1500 फीट तक बिना किसी पायलट के उड़ा था। इन्हीं के डिजाईंन की चोरी राईट बंधुओं ने की और अपने नाम पेटेंट कराया। आखिर साईकिल बनाने वाला जहाज के बारें में कैसे सोच सकता है जो कि उसका यही मुख्य धंधा ही हो। लुई पाश्चर ने "पश्चराईजेशन" का पेटेंट कराया जिससे दूध लंबे समय तक खराब नहीं होता ये भारत प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा का ही चोरी है जिसे "औटाना" कहते हैं। ये इतना बड़ा चोर था कि चीन से टीकाकारण (वैक्सीनेशन) की विधि का भी चोरी करके अपने नाम पेटेंट करा लिया। जगदीश चंद्र बोस के रेडियो की खोज को भी मार्कोनी ने चुरा कर अपने नाम कर लिया।

अल्बर्ट आईन्स्टिन ने लिखा है "मैं भारत के ज्ञान का कायल हूँ जिसने गणना करना सिखाया" और तो और सापेक्षता के सिद्धान्त का आधार श्रीमद भागवत गीता से ही लिया गया जिसमे ब्रम्हलोक में रेवती के पिता रैवतक और ब्रम्हा जी के संवाद में मिलता है जहां से इसे लिया गया। लेकिन वो अहंकार के कारण कभी अपने से भी कहीं ज्यादा बुद्धिमान आधुनिक भारत के महान गणितज्ञ "श्रीनिवास रामानुजम" को कभी भी जानबूझ कर महत्व नहीं दिया आखीर तक रामानुजम के बहुत से सूत्र तो आईन्स्टीन के समझ से परे था। 

भारत से धन और वैभव की लूट से सभी परिचित हैं और ज्ञान की चोरी का ये महज एक बानगी भर है। आखिर भारत के गुलाम होते ही अचानक ये जंगली सभ्य, ज्ञानी और वैभवशाली कैसे हो गए? हम भारतियों को मात्र अपना स्वाभिमान जगाने भर की जरूरत है फिर भारत को पुनः विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता हर क्षेत्र में वो भी बहुत जल्दी।


Tuesday, 27 October 2015

ईनाम दियावे कुर्सी..जोकर भंईस पगुराय ..

नितीश बाबू को आप लोग बकलोल बूझते हैं। दिमाग ठिकाने लगा देने वाले नेता हैं। एक जद्दू नेता उनका कच्चा चिट्ठा खोलते हुए तारीफ कर रहे थे "...वो जब इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते थे तब्बे से शेरो-शायरी और अंत्याक्षरी खेलते थे ..." मैंने कहा "...मने वो पुराने खिलाड़ी हैं फिर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला ...?" जद्दू नेता बोले "...नितीश जी किसी पुरस्कार के भूखे नहीं हैं ..." मैंने तपाक से पूछा "...तब काहें आज कविता बाँच रहे थे ...?" जद्दू नेता बोले "...आपको तो समझ मे आ ही गया होगा ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...हाँ भाई समझ में आ गया ..." जद्दू नेता से नहीं रहा गया मारे उत्साह में उछल कर पूछे "...क्या ...?" मैंने कहा "...नितीश बाबू बहुत दूर की सोचते हैं और उसी हिसाब से योजना नाते हैं ..." जद्दू नेता तो मानो फूले नहीं समा रहा था मारे आनंद से पूछा "...आपके हिसाब से क्या योजना ..." मैंने कहा "....जैसे लेखन के दुर्भिक्षों को साहित्य अकादमी पुरस्कार थमा दिया गया बात वही है ..." जादू नेता को लगा जैसे मैंने उनके नेता की तारीफ की है बोले "...हाँ वो तो है ही ..." मैंने उनसे पूछा "...उनके थ्री ईडियट वाली कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलेगा ...?" जाद्दू नेता बोले "...हाँ हाँ क्यों नहीं जरूर मिलेगा मिलना भी चाहिए ..." मैंने उनको संतुष्ट करते हुए कहा "...फिर नितीश बाबू उसी पुरस्कार को वापस करके मोदी का विरोध करेंगे ..." अब सिरे से उखड़ने के बारी थी जद्दू नेता की "...देखिये आप ऐसा कह के नितीश बाबू का अपमान कर रहे हैं ..." मैंने उनसे पुष्टि करने के अंदाज में पूछा "...आपको पूरा यकीन है कि कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल जाएगा ...?"  जद्दू नेता बोले "...जरूर मिलेगा आखिर नितीश बाबू भी ओबीसी मे आते हैं ..." मैंने कहा "...ठीक बिलकुल ठीक ...इस चुनाव में तो तो वो मोदी का प्रत्यक्ष विरोध कर नहीं पाएंगे तो पुरस्कार वापसी का ही एक रास्ता बचाता है सत्ता हथियाने का ..."  जद्दू नेता बोले "..नितीश बाबू इतने घटिया इंसान नहीं हैं जो मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने के लिए पुरस्कार वापस करेंगे ..." मैंने उनको चुनौती देते कहा "...फिलहाल तो नितीश बाबू अपनी कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार हथिया कर दिखाएँ ..." जद्दू नेता अपना सीना फुलाते हुए बोले "...देखिये केजरीवाल की तरह नितीश कुमार भी ईमानदार नेता हैं ..." मैंने कहा "..हाँ केजरीवाल अभी -अभी आदमी का चारा प्याज और चीनी फाँके हैं नितीश बाबू लालू को फांक रहे हैं ..." जद्दू नेता जैसे उखाड़ गए गुस्से में मुझसे पूछे "...आपके कहने क्या मतलब है ...?" मैंने उत्तरा देते हुए कहा "...विपक्ष में बैठे-बैठे कविता लिख कर साहित्य अकादमी पुरस्कार हथियाने की योजना बना रहे हैं ये उसी का पूर्वाभ्यास था ..." जद्दू नेता चुप हो गए ... 

Tuesday, 20 October 2015

जोकर जंग अज़ब हैरानी ...

बड़े ज़ोर-शोर से तमंचा लहरा-लहरा कर पुरस्कार विसर्जन न करने का दावा करते हुए अवसाद रस और अवसादी लफ्जों के शायर चिल्ला रहे थे कि जो लोग एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन कर रहे हैं वो थक चुके हैं उनके कलाम मे वो ताकत नहीं बची। ट्विट्टर पर भी उन्होने बहुत तमंचा लहराए जा थे। आलम तो ये भी था जोकरों के उच्च मनोरंजक हाइ भोल्टेज ड्रामे के खिलाफ शायर महोदय एक साक्षात्कार (चीत्कार नहीं) ठीक एक दिन पहले नामी अन-सोशल मीडिया अमर उजाला मे छपा भी था जिसका साफ मतलब था वो पुरस्कार विसर्जन नहीं करेंगे, लेकिन 16 तारीख को जैसे ही मेरा लेख आया जिसका बहुत दिनो लोगो को इन्तजार था,(वैसेभी  देश भर में हजारों लोगों को मेरे लेखों बेसब्री से इंतजार रहता ही है )  ठंडे बस्ते की ओर लौटते इस मजेदार मज़ाकिया विषय मे फिर से गर्माहट आ गई जिसका नतीजा ये हुआ कि ठीक उसी दिन "काशी के अस्सी" ने अपने एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन का दिया फिर दो दिन ही बाद शायर महोदय भी पल्टी मारने पर मजबूर हो गए और उन्होने भी पुरस्कार विसर्जन कर दिया।

बड़े ज़ोर-शोर से चीख रहे उस दिन "सत्ता रायबरेली की नालियों मे बहता है" लेकिन एक-आदमी पुरस्कार उनको 2014 में तब मिला जब कोंग्रेसी ईटल्ली राजमा-ता की चरण वंदना करते हुए उसी नाली की पवित्रता से खुद ही अपना अभिषेक किया था। आज फिर उसी सत्ता से पुरस्कार वापस लेना चाहते हैं जो उनके शहर के नालियों मे बहता है। बात यहीं खत्म नहीं होती उन महोदय को एखलाक के बराबर पैसा भी चाहिए कम से कम 50 लाख हाँ भाई पुरस्कार राशि के रूप मे जिसका उन्होने ब्याज नहीं लौटाया,  उसी नालियों में बहने वाले सत्ता से वो जुड़ना भी चाहते भी हैं ठीक किसी सचिव की तरह। सत्ता रायबरेली के नालियों मे बहता है। शायर महोदय आप "सत्ता का खेल" नहीं खेल रहे आप आप तो "सट्टा" लगा रहे हैं अपने  अवसादी अ-लेखन की क्षमता का। जब सिर्फ गाली-गलौज करने वाले तक एक दो नहीं दर्जनो "साहित्य एक-आदमी पुरस्कार" हथिया सकते हैं तो आपने भी हथियाया तो इसमे क्या आश्चर्य।

शायर महोदय को आतंकवाद की भी परिभाषा चाहिए ठीक यूएनओ के संदर्भ में आजम खाँ की तर्ज पर जबकि मेरे ही वाल पर आतंकवाद की परिभाषा स्पष्ट रूप से दे गई थी 30 सितंबर को ही जो अभी  भी है, देख लें उक्त तिथि में। ये परिभाषा सत्ता अधिष्ठान में विचाराधीन भी है लिहाजा इसे भी उसी रौशनी में देखना चाहिए जिस अवसाद से वो जिन्न-जिन्नातों को भगा कर उजाला करने का दावा करते हैं। वो अच्छा हुआ उस जमाने में ISIS नहीं था इसीलिए शायर महोदय नक्सली बनने बंगाल चले गए थे अपना गाल बजाते हुए पुलिस ने पकड़ लिया और थाने में इनके पिता जब जी ने शपथ पत्र दाखिल किया तब इनको मुक्ति मिली। इन लोगों का हाई भोल्टेज ड्रामें को भी इसी आतंकवाद की रोशनी में देखना चाहिए।

ये तय है मेरा लेख 16 अक्तूबर को नहीं आया होता ये शायर महोदय भी पल्टी मारते हुए एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन नहीं करते। कुछ मित्र राष्ट्रवादी साहित्यकार तो यहा तक कह रहे हैं काशी का अस्सी का भेद भी खुलने के बाद एक-आदमी के साहित्यकारों का असली रूप तो लोगों के सामने आ ही गया है उनकी बास मारती बजबजाती प्रतिभा भी लोगों के सामने आ गई ठीक रायबरेली की नालियों की तरह ...शायर महोदय को इसे ढ़कने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई ...लेकिन वो पासा भी उल्टा पड़ गया .... 

Thursday, 15 October 2015

ओ ! एक-आदमी के साहित्यकारों इस लेख शीर्षक बताओ ....

अपने आप को नामी कहलवाने के शौकीन नकली प्रगतिशील बिरादरी के दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी अपना पुरस्कार विसर्जन करने के लिए पूरे दल बल के साथ निकले ही थे कि बाहर घूम रहे साँड़ों ने दौड़ा लिया तो एक साहित्यकारों ने अपने जेब से जानवरों का वध करने वाला गंडासा निकाल लिया जिससे डर कर सांडों ने दौड़ाना बंद कर दिया। फिर वो दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के लिए निकल पड़े। ये तमाशा देखते हुए भीड़ के व्यक्ति से हमने पूछा "...भाई माजरा क्या है..?." वो सज्जन बताने लगे "...कुछ मूर्खवादी लोग मूर्ति विसर्जन के बजाय पुरस्कार विसर्जन करने निकले थे ..." तभी उस भीड़ के एक और सज्जन ने टोका "...मूर्खवादी नहीं मार्क्सवादी ..." उत्तर देने वाले व्यक्ति ने टोकने वाले  को लगभग डांटते हुए कहा "...एक ही बात है जैसे 'बुट को बट, जो को गो' कहा जाता है वैसे ही ' कार्ल मार्क्स' को  'काल मूर्ख'  कहा जाता है और बीच में टोका मत करो ..." उत्तर दाता बताने लगे "...उन लोगों को सांडों ने दौड़ा लिया था ..." मैंने कहा "...इससे पहले कभी गोवंशियों ने उन मूर्खवादियों को नहीं दौड़ाया..." सज्जन बोले "...इससे पहले वो सब काभी अपने कार से बाहर निकलते ही नहीं थे ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा "...लेकिन आज वो साथ में गोश्त काटने वाला गंडासा भी साथ लेकर निकले थे ...ऐसा क्यों ?" सज्जन कहने लगे "...वो तो हमेशा उनके पास ही रहता है जब चाहा जहां चाहा किसी को भी काट कर गोश्त बनाया और पार्टी दे दी ..." मेरा आश्चर्य और बढ़ गया मैंने पूछा "...फिर उनको ये पुरस्कार कैसे मिला ..?" सज्जन बोले "...ठीक उसी तरह जैसे एक कसाई दूसरे कसाई को सम्मानित करता है ..." सज्जन के उत्तर से मेरा मुंह और आँखें खुली की खुली रह गईं मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था ये देखते हुए सज्जन बोले "...पुरस्कार केवल और केवल साहित्यकारों को ही मिलना चाहिए था ..किसी भी कीमत पर...." मैंने फिर उसी आश्चर्य से पूछा "...मतलब ज़्यादातर पुरस्कार साहित्यकारों को नहीं मिले ...?" सज्जन बोले "...इसीलिए तो वो लोग गोश्त बनाने वाला गंडासा हमेशा अपने साथ रखते हैं ..." मैंने संतोष जताते हुए कहा "....मतलब उन्हें साँड़ों ने यूं ही नहीं दौड़ाया था ..असल बात यही है ." सज्जन सहमति जताते हुए बोले "...हाँ बात यही है... बहुत साल पहले एक बार मैंने इसी एक-आदमी वाली किताब खरीदी थी ..." मैंने पूछा "...फिर ...?" सज्जन बोले "...मुझे मनोचिकित्सक से अवसाद का ईलाज करना पड़ा जो अभी चल रहा है..." मैंने कहा "...एक बार अवसाद पकड़ ले तो ये डिस्को छाप अंगरेजी दवाई से ठीक नहीं होता ...खैर " सज्जन बोले "...ये लोग ऐसी ही अनेक बीमारियाँ समाज में फैला रहे हैं अपने अवसाद रस के लेखन और अपने गोश्त बनाने वाले गंडासे से ..." मैंने सज्जन से कहा "...एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के बाजाय कोई रास्ता नहीं है ..." सज्जन बोले "...बहुत बढ़िया होगा अगर ये लोग अपने असली पेशे में लौट जाएँ तो वैसे भी ये लोग गंडासा अपने साथ रखते ही हैं ..." मैंने पलट कर उनसे पूछा "....तो मतलब अब बेचारे निरीह पशु ही इसका खामियाजा भुगतें ...? सज्जन को अपनी गलती का एहसास हुआ बोले "...हाँ ये तो है ...बेचारे पशुओं का क्या दोष...?" मैंने सज्जन से पूछा "...धरती पर बोझ बन चुके इन एक-आदमी साहित्यकारों से मुक्ति का कोई रास्ता नहीं ..." सज्जन उत्तर देते हुए बोले "...अगर इनके पास स्वाभिमान नाम की चीज होती तो किसानो वाला रास्ता था जिसकी शुरुआत कॉंग्रेस ने 1993 मे की थी और तबसे फलते-फूलते आज भी जारी है ..."मैंने आहें भरते हुए कहा "...काश ! इन साहित्य एक-आदमियो के साहित्यकारों के पास थोड़ा भी स्वाभिमान होता तो ये धरती अवसाद सहित कई मानसिक बीमारियो से तो मुक्त तो होती ही साथ है धरती का बहुत बड़ा बोझ भी खत्म हो जाता ..."