Monday, 21 September 2015

हीनभावना बहुत बड़ी गंभीर समस्या...

2013 के पहले कुछ स्तर पर हिन्दी पखवाड़े पर जनता से दुहाई देते हुए यही याचना की जाती थी कि कृपया हिन्दी अपनाईए हिन्दी हमारी मातृभाषा है। इसी याचना के साथ अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती थी।  पहली बार मैंने पूरे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मैंने म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के खिलाफ 23 अप्रैल 2013 सबसे पहले आवाज उठाई थी। फिर उसके बाद कई बार मैंने इस गंभीर विषय पर अनुगामी लेख लिखे उसके बाद उस समय के तत्कालीन भाजपाध्यक्ष और आज के गृहमंत्री ने आधिकारिक बयान दे कर कहा "...अंगरेजी ने देश का कबाड़ा कर दिया ..." भौतिकी के प्रकाण्ड विद्वान द्वारा दिया गया अपने आप मे बहुत बड़ा और अतिगंभीर बयान था क्योंकि विज्ञान वर्ग द्वारा ही म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का सबसे अधिक समर्थन किया जाता है। कारण स्पष्ट है इस बोली के कारण नष्ट हो चुकी बुद्धिमत्ता के कारण  नकल मारने के लिए विदेश यात्रा, अमेरिका जैसे देश में भागने और भ्रष्टाचार का भयावह लोभ ये लोग प्रमुखता से पालते हैं, वहीं विज्ञान के सहारे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी विकसित कर उसका उपयोग करने वाली विश्व की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं मे से एक "इसरो" तेजी से मातृभाषा अपनाने की ओर बढ़ रही है जिन्हें विश्वास न हो वो कृपया "इसरो" के जनमाध्यम विशेषज्ञ शुकदेव प्रसाद से पुष्टि कर सकते हैं।

मैंने उसी समय अपने अध्ययन में म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को एक बेहद गंभीर समस्या के रूप में पाया तब उस समय इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप मे पेश किया तब जाकर अब दो साल बाद आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की समस्या मुद्दा बन सकी और अब ये कहा जा रहा है कि जबतक हिन्दी विज्ञान की भाषा नहीं बनेगी ताबतक न देश का उत्थान संभव है न ही मातृभाषा का। साहित्य से भाषा उत्थान संभव ही नहीं ये तय है यदि साहित्य से उत्तान संभव होता तो निश्चित रूप से आज हिन्दी और मातृभाषाओं की ये दुर्गति नहीं होती जो आज है। मातृभाषा के माध्यम से ही हम ग्रामीण क्षेत्र को देश के विकास में सीधे भागीदार बना सकते हैं क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति आग्रह के कारण वो गंभीर रूप से हीन भावना से ग्रस्त है जिससे उन्हें लगता है कि किसी लायक नहीं है और वो कुछ नहीं कर सकते।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के विरुद्ध मेरे अभियान छेड़ने के पीछे  मेरे दो महत्वपूर्ण उद्देश्य थे एक तो इसके कारण लोगों की बुद्धिमत्ता सममाप्त हो रही है जिसके भयावह परिणाम अनेक मानसिक रोग, शारीरिक रोग, व्यावहारिक परेशानिया, समंजस्य की समस्या, संस्कारों का विलोप आदि आदि के रूप मे सामने तो आ ही रहे हैं साथ ही ये बहुत बड़ी राष्ट्रीय आर्थिक क्षति भी है मानव संसाधन के रूप मे मसलन अभी तक आजादी के 70 साल बाद भी आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं और अरबों डालर सिर्फ यूं ही खर्च कर हो जाते हैं और तो और जिनका उत्पादन और निर्माण हम बड़ी आसानी से कर सकते थे जैसे बुलेट ट्रेन, दक्ष (समार्ट) नगर आधुनिक हथियार तोप, बंदूक आदि,उनका बाहर से आयात करना पड़ता है जो बहुत बड़ा नुकसान है।

दूसरे बहुत गंभीर समस्या इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण ये है कि जो लोग इसे नहीं जानते वो  इसके प्रति आग्रह से  "हीन भावना" से गंभीर रूप से ग्रस्त हो जाते है जिसका परिणाम ये होता है कि व्यक्ति योग्य होते हुए भी अपने आप को अयोग्य मानने लगता है। ऐसे लोगों की संख्या भारत में बहुत ज्यादा है जो सीधे व्यक्ति की प्रवीणता को नकरातमक रूपसे प्रभावित तो करती ही है उसे कुछ सोचने तक तक नहीं देती नतीजा वो  इस उम्मीद में उस नकारात्मक धारा में चलता है कि उसे भी महत्व मिल सके। मतलब उसे शून्य पर भी आने के लिए गंभीर प्रयास करना पड़ता है। उसकी सारी प्रतिभा सिर्फ शून्य पर आने में ही खर्च हो रही है यही कारण है कि अभी तक भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ भी नहीं कर सका है। इसलिए म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को हटा कर जामवंत जी को हमारे अंदर के बजरंग बली को जगाना होगा।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) हमारे ऊपर दोहरी मार कर रही है एक तो हमे बुद्धिहीन, मानसिक रोगी, शारीरिक रोगी बना रही है दूसरे जो लोग इसे नहीं जानते उन्हें ये हीन भावना से ग्रस्त कर रही है। मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपराध एक मूल कारण हीन भावना का होंना भी है। इसलिए कुछ गैर म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले भी बड़ी संख्या में अपराधी हो जाते हैं इसके पीछे दोहरे मार करने वाले कारक हैं एक तो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) वालों संस्कारहीन और अपराध को उकसाने वाला बेहूदा प्रदर्शन है दूसरा शून्य के लिए जद्दोजहद करता हीनभावना से ग्रस्त वो व्यक्ति जो अपराध से अपने अह को तुष्ट करता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि भारत को म्लेच्छपना से जल्द से जल्द मुक्त किया जाए एक परम विकसित भारत के निर्माण के निमित्त ।  

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