Friday, 18 September 2015

इन्सेफिलाइटिस - डेंगू का ईलाज डॉ चड्ढा नहीं ...

याद है मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "मंत्र" जितनी बार पढ़ो नई लगती और हर बार उतनी ही भावुकता से आँखें भर आती हैं जितनी पहली बार पढ़ने में अनुभव होता है। डॉ चड्ढा के गोल्फ खेलने जाने के समय पर पर वो बूढ़ा अपने बीमार बच्चे को लेकर डॉ चड्ढा के क्लीनिक पर लेकर आता है लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले डॉ चड्ढा ने बड़ी निर्ममता से उसे अगले दिन देखने के कहते हैं और वो बच्चा जो बूढ़े माँ-बाप का इकलौता सहारा था, उसी रात दुनिया से विदा हो जाता है। कुछ वर्ष बार डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को साँप काट लेता है और वही बुड्ढा रात के दो बजे उसी डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को अपनी विधा से नई जिंदगी देता है। हालांकि उस बुड्ढे की बुढ़िया इसके लिए तैयार न थी लेकिन उसकी गज़ब की संवेदनशीलता उसे सोने तक नहीं देती वो बेचैन हो उठता है कभी बाहर कभी अंदर होता है लेकिन पत्नी के घोर विरोध के बावजूद अंत मे चल पड़ता है उस घोर अंधेरी रात में डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने। क्यों चल पड़ता है क्योंकि उसकी माँ ( मातृभाषा ) ने जमीर से समझौता करना नहीं सिखाया ही नहीं भले ही सामने वाला दुश्मन ही क्यों न हो ।

हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वालो के पास जमीर नाम की चीज होती ही नहीं उन्हें अपने गोल्फ के आगे किसी की जान की भी कोई कीमत नहीं। हमारा प्यारा पूर्वाञ्चल हर वर्ष मस्तिष्क ज्वर से खून की होली खेलता है, दिल्ली डेंगू से मर रही है लेकिन म्लेच्छ बोली बोलने वाले डॉ चड्ढों को क्या चाहिए ? यही गरीब दुखियारे हैं जो अपनी जान पर खेल कर इस डॉ चड्ढों को करोड़पति बनाते हैं उनकी हर सुख सुविधा का ख्याल रखते हैं लेकिन बदले मे इन दुखियारों को क्या मिलता है कोई अपना बुढ़ापे का सहारा खो देता है, कोई माँ कोई बहन अपना सुहाग इन डॉ चड्ढों के छोटी-छोटी खुशियों के आगे न्योछवार कर देती है मामला यहीं खत्म नहीं होता उनका घर द्वार भी गिरवी हो जाता है बिक जाता है।

मैंने अपनी पिछली 1 सितंबर की पोस्ट मे उदधृत किया है मातृभाषा में व्यक्ति का मस्तिष्क पूरे 100% काम करता है, जबकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में 2% भी नहीं। जमीर भी दिमाग के एक कोने में ही होता है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण उपयोग मे न आने के कारण मर ही जाता है वहीं मातृभाषा अपने परिवेश से सम्बद्ध होने का मंच तैयार करती है और पूरी तरह सक्रिय रहती है लिहाजा व्यक्ति का जमीर भी उसी मात्रा में सक्रिय रहता है जिसके कारण वो बुड्ढा अपनी पत्नी का विरोध करके डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने उस घोर अंधेरी रात में निकल पड़ता है और तो और नई जिंदगी देने के बदले पैसे भी नहीं लेता है चुपचाप निकल लेता है।

डेंगू सहित लगभग सभी बीमारियाँ एलोपैथी के लिए लाइलाज है लेकिन कोई डॉ चड्ढा ये नहीं बताता ही नहीं। कोई दुखिया यदि इन चड्ढों के पास पहुँच गया तो क्या होता है सभी को पता है। एण्डोक्रईनोंलोजी मे पहले पन्ने पर लिखा है कि यदि आपको लगता है कि दवाई के बगैर आप जिंदा नहीं रह सकते तो ये "हार्मोनल डिसऑर्डर" है। मतलब दवाई खाना भी अपने आप में खतरनाक बीमारी है लेकिन कोई भी डॉ चड्ढा ये कभी नहीं कहता। वो जिंदगी भर दवा खाने को मजबूर करते हैं।

 डॉ स्वामी रामदेव चाहते तो डेंगू से करोड़ों बना सकते थे लेकिन उन्होने सार्वजनिक मंच पर मुफ्त में डेंगू की अचूक रामबाण दावा बताई। क्यों ? क्योंकि डॉ स्वामी रामदेव म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोलते ।     

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