Sunday, 27 September 2015

दिल्ली में लालू, पियाज खाए अके...लू...

बक़राईद बीत जाने के बाद केजरीवाल से यही उम्मीद थी क्योंकि दिल्ली में भी नासिक के "चारा घोटाला" हो ही गया जो स्वाभाविक था ठीक लालू यादव के MY समीकरण की तर्ज पर। बावजूद इसके बेगानी आग से अपनी लुआठी लहका कर पहलवानी झाड़ना भी बहुत भाता है, लेकिन गाहे-बगाहे मुन्ना हज़ारे जैसे लोग अपनी टोपी की दुहाई देने पर उतारू हो जाते हैं तो केजरीवाल की इज्जत ही दांव पर लग जाती है। आज बड़े ताव मे आ कर मेरी ही पोस्ट के तीसरे पैरा की अंतिम चार पंक्तियों की  नकल मार कर "मेक इन इंडिया" की तर्ज पर "मेक इंडिया" कर दिया जो मूल रूप से पूरी तरह से मेरी अवधारणा है। वैसे नकल मारना केजरीवाल की पुरानी आदत है। पिछले सितंबर से ही "मेक इन इंडिया" चल रहा है और मोदी की ये 29 वीं विदेश यात्रा थी अबतक उनको "मेक इंडिया" का विचार नहीं आया था। विचार तब आया जब मेरी पोस्ट 22 सितंबर को "हीन भावना बहुत बड़ी गंभीर समस्या" शीर्षक से आती है।आखिर केजरीवाल का दिमाग बकाराईद के बाद ही सक्रिय क्यों होता है? वैसे इस बार कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल मेरी अवधारणा की चोरी नहीं कर सकते क्योकि मेरी हर पोस्ट सबसे पहले मोदी जी के पास जाती है फिर वो मेरे और अन्य समूहों के वाल पर प्रकाशित होती है।

वैसे मेरे पास आ कर केजरीवाल अवधारणा के लिए गिड़गिड़ाए होते तो निश्चित रूप से उस तरीके से निराश बिलकुल नहीं होना पड़ता जिस तरीके से दिल्ली वाले निराश हैं हताश हैं। डेंगू से प्लेटलेट्स कम जरूर होते हैं लेकिन दिल्ली वालों का हौसला कम नहीं होता 15 साल काँग्रेस जैसे महामुसीबत को झेल सकते हैं तो केजरीवाल जो भले ही डेंगू से भी खतरनाक क्यों न हो दिल्ली वाले हँसते हुए झेल ही जाएंगे। वैसे केजरीवाल स्वराज्य भूल ही चुके हैं कारण साफ है यदि वो इसे लागू करते हैं तो उन्हें अपनी जेब से उसे भारी भरकम रायल्टी देनी पड़ेगी जिसके स्वराज के अवधारणा की चोरी केजरीवाल ने की है। मामला वैसे भी न्यायालय में विचाराधीन है।

वैसे जिसके मित्र सोमनाथ भारती, तोमर, कुमार विषवास, आशुतोष आदि आदि जैसे लोग हों उससे उम्मीद भी क्या की जा सकती है। इसीलिए दिल्ली वालों को अपने महफूजियत से ज्यादा खतरा तब बहुत बढ़ जाता है जब से वो लालू यादव का खुल कर समर्थन करने लगे। लालू ने चौपायों का चारा खाया और केजरीवाल आदमी का चारा खा गए हाँ हाँ वही चारा जो नासिक से आया था 18 रुपये किलो बिका था 40 रुपये किलो फिर भी केजरीवाल का पेट नहीं भरा तो उसपर भी 10 रुपये सबसिडी देकर उसे भी निगल गए और डकार तक नहीं ली।    

    

Monday, 21 September 2015

हीनभावना बहुत बड़ी गंभीर समस्या...

2013 के पहले कुछ स्तर पर हिन्दी पखवाड़े पर जनता से दुहाई देते हुए यही याचना की जाती थी कि कृपया हिन्दी अपनाईए हिन्दी हमारी मातृभाषा है। इसी याचना के साथ अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती थी।  पहली बार मैंने पूरे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मैंने म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के खिलाफ 23 अप्रैल 2013 सबसे पहले आवाज उठाई थी। फिर उसके बाद कई बार मैंने इस गंभीर विषय पर अनुगामी लेख लिखे उसके बाद उस समय के तत्कालीन भाजपाध्यक्ष और आज के गृहमंत्री ने आधिकारिक बयान दे कर कहा "...अंगरेजी ने देश का कबाड़ा कर दिया ..." भौतिकी के प्रकाण्ड विद्वान द्वारा दिया गया अपने आप मे बहुत बड़ा और अतिगंभीर बयान था क्योंकि विज्ञान वर्ग द्वारा ही म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का सबसे अधिक समर्थन किया जाता है। कारण स्पष्ट है इस बोली के कारण नष्ट हो चुकी बुद्धिमत्ता के कारण  नकल मारने के लिए विदेश यात्रा, अमेरिका जैसे देश में भागने और भ्रष्टाचार का भयावह लोभ ये लोग प्रमुखता से पालते हैं, वहीं विज्ञान के सहारे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी विकसित कर उसका उपयोग करने वाली विश्व की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं मे से एक "इसरो" तेजी से मातृभाषा अपनाने की ओर बढ़ रही है जिन्हें विश्वास न हो वो कृपया "इसरो" के जनमाध्यम विशेषज्ञ शुकदेव प्रसाद से पुष्टि कर सकते हैं।

मैंने उसी समय अपने अध्ययन में म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को एक बेहद गंभीर समस्या के रूप में पाया तब उस समय इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप मे पेश किया तब जाकर अब दो साल बाद आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की समस्या मुद्दा बन सकी और अब ये कहा जा रहा है कि जबतक हिन्दी विज्ञान की भाषा नहीं बनेगी ताबतक न देश का उत्थान संभव है न ही मातृभाषा का। साहित्य से भाषा उत्थान संभव ही नहीं ये तय है यदि साहित्य से उत्तान संभव होता तो निश्चित रूप से आज हिन्दी और मातृभाषाओं की ये दुर्गति नहीं होती जो आज है। मातृभाषा के माध्यम से ही हम ग्रामीण क्षेत्र को देश के विकास में सीधे भागीदार बना सकते हैं क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति आग्रह के कारण वो गंभीर रूप से हीन भावना से ग्रस्त है जिससे उन्हें लगता है कि किसी लायक नहीं है और वो कुछ नहीं कर सकते।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के विरुद्ध मेरे अभियान छेड़ने के पीछे  मेरे दो महत्वपूर्ण उद्देश्य थे एक तो इसके कारण लोगों की बुद्धिमत्ता सममाप्त हो रही है जिसके भयावह परिणाम अनेक मानसिक रोग, शारीरिक रोग, व्यावहारिक परेशानिया, समंजस्य की समस्या, संस्कारों का विलोप आदि आदि के रूप मे सामने तो आ ही रहे हैं साथ ही ये बहुत बड़ी राष्ट्रीय आर्थिक क्षति भी है मानव संसाधन के रूप मे मसलन अभी तक आजादी के 70 साल बाद भी आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं और अरबों डालर सिर्फ यूं ही खर्च कर हो जाते हैं और तो और जिनका उत्पादन और निर्माण हम बड़ी आसानी से कर सकते थे जैसे बुलेट ट्रेन, दक्ष (समार्ट) नगर आधुनिक हथियार तोप, बंदूक आदि,उनका बाहर से आयात करना पड़ता है जो बहुत बड़ा नुकसान है।

दूसरे बहुत गंभीर समस्या इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण ये है कि जो लोग इसे नहीं जानते वो  इसके प्रति आग्रह से  "हीन भावना" से गंभीर रूप से ग्रस्त हो जाते है जिसका परिणाम ये होता है कि व्यक्ति योग्य होते हुए भी अपने आप को अयोग्य मानने लगता है। ऐसे लोगों की संख्या भारत में बहुत ज्यादा है जो सीधे व्यक्ति की प्रवीणता को नकरातमक रूपसे प्रभावित तो करती ही है उसे कुछ सोचने तक तक नहीं देती नतीजा वो  इस उम्मीद में उस नकारात्मक धारा में चलता है कि उसे भी महत्व मिल सके। मतलब उसे शून्य पर भी आने के लिए गंभीर प्रयास करना पड़ता है। उसकी सारी प्रतिभा सिर्फ शून्य पर आने में ही खर्च हो रही है यही कारण है कि अभी तक भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ भी नहीं कर सका है। इसलिए म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को हटा कर जामवंत जी को हमारे अंदर के बजरंग बली को जगाना होगा।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) हमारे ऊपर दोहरी मार कर रही है एक तो हमे बुद्धिहीन, मानसिक रोगी, शारीरिक रोगी बना रही है दूसरे जो लोग इसे नहीं जानते उन्हें ये हीन भावना से ग्रस्त कर रही है। मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपराध एक मूल कारण हीन भावना का होंना भी है। इसलिए कुछ गैर म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले भी बड़ी संख्या में अपराधी हो जाते हैं इसके पीछे दोहरे मार करने वाले कारक हैं एक तो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) वालों संस्कारहीन और अपराध को उकसाने वाला बेहूदा प्रदर्शन है दूसरा शून्य के लिए जद्दोजहद करता हीनभावना से ग्रस्त वो व्यक्ति जो अपराध से अपने अह को तुष्ट करता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि भारत को म्लेच्छपना से जल्द से जल्द मुक्त किया जाए एक परम विकसित भारत के निर्माण के निमित्त ।  

Friday, 18 September 2015

इन्सेफिलाइटिस - डेंगू का ईलाज डॉ चड्ढा नहीं ...

याद है मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "मंत्र" जितनी बार पढ़ो नई लगती और हर बार उतनी ही भावुकता से आँखें भर आती हैं जितनी पहली बार पढ़ने में अनुभव होता है। डॉ चड्ढा के गोल्फ खेलने जाने के समय पर पर वो बूढ़ा अपने बीमार बच्चे को लेकर डॉ चड्ढा के क्लीनिक पर लेकर आता है लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले डॉ चड्ढा ने बड़ी निर्ममता से उसे अगले दिन देखने के कहते हैं और वो बच्चा जो बूढ़े माँ-बाप का इकलौता सहारा था, उसी रात दुनिया से विदा हो जाता है। कुछ वर्ष बार डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को साँप काट लेता है और वही बुड्ढा रात के दो बजे उसी डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को अपनी विधा से नई जिंदगी देता है। हालांकि उस बुड्ढे की बुढ़िया इसके लिए तैयार न थी लेकिन उसकी गज़ब की संवेदनशीलता उसे सोने तक नहीं देती वो बेचैन हो उठता है कभी बाहर कभी अंदर होता है लेकिन पत्नी के घोर विरोध के बावजूद अंत मे चल पड़ता है उस घोर अंधेरी रात में डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने। क्यों चल पड़ता है क्योंकि उसकी माँ ( मातृभाषा ) ने जमीर से समझौता करना नहीं सिखाया ही नहीं भले ही सामने वाला दुश्मन ही क्यों न हो ।

हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वालो के पास जमीर नाम की चीज होती ही नहीं उन्हें अपने गोल्फ के आगे किसी की जान की भी कोई कीमत नहीं। हमारा प्यारा पूर्वाञ्चल हर वर्ष मस्तिष्क ज्वर से खून की होली खेलता है, दिल्ली डेंगू से मर रही है लेकिन म्लेच्छ बोली बोलने वाले डॉ चड्ढों को क्या चाहिए ? यही गरीब दुखियारे हैं जो अपनी जान पर खेल कर इस डॉ चड्ढों को करोड़पति बनाते हैं उनकी हर सुख सुविधा का ख्याल रखते हैं लेकिन बदले मे इन दुखियारों को क्या मिलता है कोई अपना बुढ़ापे का सहारा खो देता है, कोई माँ कोई बहन अपना सुहाग इन डॉ चड्ढों के छोटी-छोटी खुशियों के आगे न्योछवार कर देती है मामला यहीं खत्म नहीं होता उनका घर द्वार भी गिरवी हो जाता है बिक जाता है।

मैंने अपनी पिछली 1 सितंबर की पोस्ट मे उदधृत किया है मातृभाषा में व्यक्ति का मस्तिष्क पूरे 100% काम करता है, जबकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में 2% भी नहीं। जमीर भी दिमाग के एक कोने में ही होता है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण उपयोग मे न आने के कारण मर ही जाता है वहीं मातृभाषा अपने परिवेश से सम्बद्ध होने का मंच तैयार करती है और पूरी तरह सक्रिय रहती है लिहाजा व्यक्ति का जमीर भी उसी मात्रा में सक्रिय रहता है जिसके कारण वो बुड्ढा अपनी पत्नी का विरोध करके डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने उस घोर अंधेरी रात में निकल पड़ता है और तो और नई जिंदगी देने के बदले पैसे भी नहीं लेता है चुपचाप निकल लेता है।

डेंगू सहित लगभग सभी बीमारियाँ एलोपैथी के लिए लाइलाज है लेकिन कोई डॉ चड्ढा ये नहीं बताता ही नहीं। कोई दुखिया यदि इन चड्ढों के पास पहुँच गया तो क्या होता है सभी को पता है। एण्डोक्रईनोंलोजी मे पहले पन्ने पर लिखा है कि यदि आपको लगता है कि दवाई के बगैर आप जिंदा नहीं रह सकते तो ये "हार्मोनल डिसऑर्डर" है। मतलब दवाई खाना भी अपने आप में खतरनाक बीमारी है लेकिन कोई भी डॉ चड्ढा ये कभी नहीं कहता। वो जिंदगी भर दवा खाने को मजबूर करते हैं।

 डॉ स्वामी रामदेव चाहते तो डेंगू से करोड़ों बना सकते थे लेकिन उन्होने सार्वजनिक मंच पर मुफ्त में डेंगू की अचूक रामबाण दावा बताई। क्यों ? क्योंकि डॉ स्वामी रामदेव म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोलते ।     

Monday, 14 September 2015

मेरी मातृभाषा हिन्दी ने मुझे बहुत कुछ दिया है इतना कि मैं शोध कर सकूँ ...नई खोज कर सकूँ...दुनियाँ जीत सकूँ ...अपनी मानसिक क्षमता और दक्षता से हलचल उत्पन्न कर सकूँ ...उस हलचल को हजारों हजार लोगों ने प्रत्यक्ष अनुभव भी किया...मातृभाषाओं और हिन्दी के शत्रुओं का नाश कर सकूँ...शुभकामना नहीं... मेरा कोटि - कोटि नमन प्रिय मातृभाषा हिन्दी को...कोटिशः नमामि मातृभूमे, नमामि कोटिशः मातृभाषे..

Wednesday, 2 September 2015

पावहिं देख गरज सौभागी...तर्क कलह वितर्क बैरागी

हमसे कह रहे थे प्लीज़ हामिद अंसारी को बीच में घसीटिए तो मैंने उनको सफाई देते हुए उनसे पूछा ",,,वैसे तो मैंने ऐसा किया नहीं लेकिन आप क्यों कह रहे हैं ...?" वो बोले "...वो औरंगजेब के खानदानी नहीं  हैं ..." मैंने उनसे कहा "...खानदानी नहीं हैं तो क्या देश अगड़ रहा है और सिर्फ मुसलमान की पिछड़ रहा है ...?" उन्होने उत्तर दिया "...वो इस देश के उपराष्ट्रपति हैं ..." मैंने इसपर उनसे कहा  "...तो फिर उनको साबित करना चाहिए कि वास्तव में वो हैं..." ये सुनते ही वो उखड़ गए और लगभग चीखते हुए  बोले "...देखिये वो हैं और उनकी चिंता लजामी है ..." मैंने इस पर उनसे पूछा "...उनकी चिंता का जस्टीफ़िकेशन  औरंगजेब से होगा या डॉ कलाम से ...वैसे उनकी चिंता उसी समय क्यों हुई जब सड़क काम बदला गया ...?"  वो तो जैसे निरुत्तर ही हो गए बहुत सोचने के बाद बोले "...औरंगजेब ने दिल्ली पर राज किया था लिहाजा उसकी  भी चिंता लजामी हैं ..." मैंने उनसे तर्क करते हुए कहा "...इसका मतलब ये हुआ कि जिस घर मे डकैती पड़े उस  घर के मालिक डकैतों की चिंता करे उनके नाम पर अपने घर का नाम रख ले...?" वो ये सुन के परेशान हो गए लिहाजा वो सफाई मे बोले "...औरंगजेब डकैत नहीं था ..." मैंने कहा "...हाँ मैंने थोड़ा लिहाज करते हुए  डकैत कहा वो लुटेरा था, हत्यारा था और न जाने क्या क्या था ..." ये सुन कर वो फिर सफाई मे बोले "...लेकिन  मुग़लों ने भारत को बहुत कुछ दिया है ..." मैंने कहा "...भारत को ही नहीं विश्व को दिया है और जो दिया है ठीक  वही नमूना ISIS वाले प्रस्तुत कर रहे हैं ..." वो बहुत मजबूत तर्क देने की कोशिश मे बोले "....मुग़लों ने भारत को  बहुत कुछ दिया लालकिला दिया, ताजमहल, कुतुबमीनार दिया बहुत कुछ दिया .." मैंने इसके प्रतिउत्तर मे कहा "...बड़ा अजीब लगता है एक लुटेरा जब किसी भवन में लूट-पाट करने जाता है तो उस भवन को सजाता है, सवांरता और विश्व प्रसिद्ध बनाने का प्रयास करता है और लूट-पाट भी करता है ..." ये सुनते ही वो उखड़ गए और तैश मे बोले "...आपका मतलब ये सब मुग़लों ने नहीं बनवाया ...इतिहास मे लिखा है कि ताजमहल बनाने के लिए बुखारा (उज्बेकिस्तान) से मिस्त्री और बलूचिस्तान से करीगर बुलाए गए थे ..." मैंने उनके जवाब मे कहा "...इतिहास को तार्किक और प्रामाणिक होना चाहिए मनगढ़ंत नहीं ..." ये सुन कर वो चौंक गए बोले "...ये कैसे दावा कर सकते हैं इतिहास मे लिखा है वो तार्किक और प्रामाणिक नहीं है ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...कायदे से एक्सपर्ट मिस्त्री वही से आते हैं जहां पर वो अपनी विशेषज्ञता साबित कर चुके होते हैं तो जरा हमको ये बताईए कि बुखारा या पूरे उज्बेकिस्तान मे ताजमहल या उसके जैसी कितनी इमारतें थीं उस समय ...जवाब है एक भी नहीं ....बलूचिस्तान से करीगर बुलाए गए थे तो बलूचिस्तान मे कितने स्मारक हैं इस प्रकार के ... उत्तर है एक भी नहीं ...तब बताईए जब वहाँ इस प्रकार का कुछ था ही नहीं तो ऐसी विलक्षण इमारतों के लिए विशेषज्ञ कहाँ से पैदा हो गए ...ताजमहल निर्माण बारे मे तार्किक बातें सभी इमारतों पर समान रूप से लागू होते जिन्हें मुग़ल कहा जाता है ..." मेरा तर्क सुन कर वो सन्न रह गए फिर भी बोले "...लेकिन हामिद अंसारी की चिंता तार्किक है ..." मैंने साफ साफ कहा "...हो सकता है लेकिन व्यावहारिक नहीं ...नमस्कार "