भारत के खिलाफ एक गहरी साजिश
अचानक ये क्या हो गया उधर नेपाल जो हिन्दू राष्ट्र की ओर फिर से बढ़ रहा है हिंसा की चपेट मे आ गया, इधर गुजरात जो सबसे अधिक शांत और प्रगतिशील है अचानक हिंसा की चपेट आ गया "पटेल आरक्षण" तो महज एक बहाना है। उधर नेपाल मे चीन और पाकिस्तान दोनों प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताया जा रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले ये खबर मिली थी कि चीन तिब्बत मे अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए कुछ ठोस उपाय कर रहा है मसलन अभी कुछ दिन पहले ICT के माध्यम से ख़बर आती है कि चीन ने तिब्बत मे सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। गुजरात मे अचानक तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटती है और दूसरे दिन ही हिंसा पर उतारू हो जाती है जिसे शांत करने के लिए सीआरपीएफ़ की तीस कंपनियाँ भेजी जाती हैं। ध्यान देने वाला तथ्य ये है कि ये सब प्रधानमंत्री के UAE की बेहद सफल यात्रा के बाद ये सब अचानक हो रहा है।
गुजरात हिंसा को प्रायोजित करने के लिए केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को आगे किया जाता जिसकी उम्र मात्र 22 साल बताई जा रही है। आखिर इतनी सफल रैली को हिंसा पर उतारू होना पड़ा ये अपने आप मे आश्चर्य का विषय है। वियसे मामला ये गुजरात का ही है पटेल इतने समृद्ध है कि ये 80% हीरे के कारोबार में हैं। अहमद पटेल और अरविंद केजरीवाल के अतिरिक्त किसी भी किसी पटेल ने आरक्षण की मांग कभी नहीं की यहाँ तक कि "सरदार वल्लभ भाई पटेल" ने भी नहीं। जो दूसरों के लिए बैसाखी है वो कूद बैसाखी पर चलेगा ये बात व्यवहारिक और तार्किक स्तर पर हजम नहीं होती।
आखिर ये पटेल आरक्षण का विषय तो गुजरात का था तो फिर जनता भी गुजरात की ही होनी चाहिए तार्किक रूप से और यदि जनता गुजरात की थी तो फिर हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण क्यों देना पड़ा? और फिर यदि उनके अपने समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करनी थी तो फिर नितीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू बीच मे कहाँ से आ गए ? मतलब जो तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटी थी वो गुजरात की स्थानीय भीड़ नहीं थी यही नहीं वो भीड़ ऐसी थी जो अधिकांशतः गुजरती भाषा नहीं जानती थी लिहाजा केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण देना पड़ा। एक स्थानीय नागरिक बता रहे थे कि भीड़ काफी हद तक तक अपरिचितों का समूह लग रहा था हालांकि ऐसे लोगों की भी कुछ संख्या थी जो जिज्ञासा वश रैली मे आए थे उनको आरक्षण से कोई लेना देना नहीं।
कुछ लोगो का मत है कि स्थानीय पटेल समुदाय अहमद पटेल, अरविंद केजरीवाल और उसके चेले हार्दिक पटेल का साथ देने को तैयार ही नहीं है लिहाजा उनको जबरदस्ती जोड़ने के लिए आज ही रैली के ठीक दूसरे दिन गुजरात बंद का आयोजन करना पड़ा। भाड़े की भीड़ से तोडफोड कारवाई गई जिससे पुलिस को स्थानीय लोगों पर कार्यवाही करनी पड़े और स्थानीय जनता मे सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा हो जिससे साथनीय पटेल समुदाय जबरदस्ती ही सही आंदोलन से जुड़े। पटेल समुदाय को भली भांति पता है कि उसे आरक्षण संभव नहीं लिहाजा उनके आंदोलन जुडने का सवाल ही नहीं उठता । जो कुछ भी अचानक हुआ वो निश्चित रूप से गहरी साजिश की ओर इशारा करती हैं।
नेपाल की हिंसात्मक अशांति, गुजरात नकली आरक्षण के मांग पर मे हिंसक आंदोलन, तिब्बत मे चीन की सक्रियता, जम्मू-कश्मीर पाकिस्तानी घुसपैठ के प्रयासों मे अचानक तेजी, पाकिस्तान की ओर से एलओसी पर युद्ध विराम का उल्लंघन, यूएई से 31 मामलों पर सहयोग और सहमति पर हस्ताक्षर के बाद अचानक ये सब। ये सब अचानक उस समय जब भारत तेजी से आर्थिक विकास की विकास की ओर अग्रसर है।
अचानक ये क्या हो गया उधर नेपाल जो हिन्दू राष्ट्र की ओर फिर से बढ़ रहा है हिंसा की चपेट मे आ गया, इधर गुजरात जो सबसे अधिक शांत और प्रगतिशील है अचानक हिंसा की चपेट आ गया "पटेल आरक्षण" तो महज एक बहाना है। उधर नेपाल मे चीन और पाकिस्तान दोनों प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताया जा रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले ये खबर मिली थी कि चीन तिब्बत मे अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए कुछ ठोस उपाय कर रहा है मसलन अभी कुछ दिन पहले ICT के माध्यम से ख़बर आती है कि चीन ने तिब्बत मे सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। गुजरात मे अचानक तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटती है और दूसरे दिन ही हिंसा पर उतारू हो जाती है जिसे शांत करने के लिए सीआरपीएफ़ की तीस कंपनियाँ भेजी जाती हैं। ध्यान देने वाला तथ्य ये है कि ये सब प्रधानमंत्री के UAE की बेहद सफल यात्रा के बाद ये सब अचानक हो रहा है।
गुजरात हिंसा को प्रायोजित करने के लिए केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को आगे किया जाता जिसकी उम्र मात्र 22 साल बताई जा रही है। आखिर इतनी सफल रैली को हिंसा पर उतारू होना पड़ा ये अपने आप मे आश्चर्य का विषय है। वियसे मामला ये गुजरात का ही है पटेल इतने समृद्ध है कि ये 80% हीरे के कारोबार में हैं। अहमद पटेल और अरविंद केजरीवाल के अतिरिक्त किसी भी किसी पटेल ने आरक्षण की मांग कभी नहीं की यहाँ तक कि "सरदार वल्लभ भाई पटेल" ने भी नहीं। जो दूसरों के लिए बैसाखी है वो कूद बैसाखी पर चलेगा ये बात व्यवहारिक और तार्किक स्तर पर हजम नहीं होती।
आखिर ये पटेल आरक्षण का विषय तो गुजरात का था तो फिर जनता भी गुजरात की ही होनी चाहिए तार्किक रूप से और यदि जनता गुजरात की थी तो फिर हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण क्यों देना पड़ा? और फिर यदि उनके अपने समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करनी थी तो फिर नितीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू बीच मे कहाँ से आ गए ? मतलब जो तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटी थी वो गुजरात की स्थानीय भीड़ नहीं थी यही नहीं वो भीड़ ऐसी थी जो अधिकांशतः गुजरती भाषा नहीं जानती थी लिहाजा केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण देना पड़ा। एक स्थानीय नागरिक बता रहे थे कि भीड़ काफी हद तक तक अपरिचितों का समूह लग रहा था हालांकि ऐसे लोगों की भी कुछ संख्या थी जो जिज्ञासा वश रैली मे आए थे उनको आरक्षण से कोई लेना देना नहीं।
कुछ लोगो का मत है कि स्थानीय पटेल समुदाय अहमद पटेल, अरविंद केजरीवाल और उसके चेले हार्दिक पटेल का साथ देने को तैयार ही नहीं है लिहाजा उनको जबरदस्ती जोड़ने के लिए आज ही रैली के ठीक दूसरे दिन गुजरात बंद का आयोजन करना पड़ा। भाड़े की भीड़ से तोडफोड कारवाई गई जिससे पुलिस को स्थानीय लोगों पर कार्यवाही करनी पड़े और स्थानीय जनता मे सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा हो जिससे साथनीय पटेल समुदाय जबरदस्ती ही सही आंदोलन से जुड़े। पटेल समुदाय को भली भांति पता है कि उसे आरक्षण संभव नहीं लिहाजा उनके आंदोलन जुडने का सवाल ही नहीं उठता । जो कुछ भी अचानक हुआ वो निश्चित रूप से गहरी साजिश की ओर इशारा करती हैं।
नेपाल की हिंसात्मक अशांति, गुजरात नकली आरक्षण के मांग पर मे हिंसक आंदोलन, तिब्बत मे चीन की सक्रियता, जम्मू-कश्मीर पाकिस्तानी घुसपैठ के प्रयासों मे अचानक तेजी, पाकिस्तान की ओर से एलओसी पर युद्ध विराम का उल्लंघन, यूएई से 31 मामलों पर सहयोग और सहमति पर हस्ताक्षर के बाद अचानक ये सब। ये सब अचानक उस समय जब भारत तेजी से आर्थिक विकास की विकास की ओर अग्रसर है।
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