एक शाश्वत परिवर्तन बिहार की अगुवाई मे
बिहार ने हमेशा से ही देश की राजनीति को नई दिशा दी है। जून 1975 को गांधी मैदान से लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने गैर काँग्रेसवाद की शुरुआत की। ये आंदोलन इतना प्रचंड था की काँग्रेस की चूले हिल गईं और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था। नतीजा आज काँग्रेस बिलकुल हाशिये पर है। राज्यों मे उसका क्या हश्र है सबके सामने है। मण्डल आंदोलन की पहली प्रयोगशाला भी बिहार बना, आडवाणी की रथयात्रा लालू प्रसाद यादव ने ही समस्तीपुर मे रोक लिया था नतीजा सेकुलरवाद आज सिक-उल्लूवाद नाम का एक घिनौना मज़ाक बन कर रह गया है और हिन्दुत्व एवं विकास भारतीय राजनीति मे अपनी पैठ करीब-करीब बना चुके हैं। आप यकीन मानिए लालू ने यदि आडवाणी जी की रथ यात्रा नहीं रोकी होती तो भाजपा को अभी बहुत मेहनत करनी पड़ती बहुमत की सरकार बनाने के लिए और आज की तारीख में कॉंग्रेस मात्र 44 सीटों पर तो कदापि नहीं सिमटती। आज जिस तरह से विकास और हिन्दुत्व साथ साथ चल रहे हैं उसमे बिहार विधान सभा का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण भूमिका मे आ चुका है।
ये पत्थर पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि बिहार में भाजपा नीत राजग की पूर्ण बहुमत सरकार बनने जा रही है। और भाजपा की ये जीत यकीन मानैये ये तय करने वाली है कि उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल में भी भाजपा को सरकार बनाने से कोई नहीं रोक पाएगा । तो क्या ये तीन विधान सभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और नितीश-लालू राजनीति से सन्यास ले लेंगे ? यदि आप ऐसा सोचते हैं तो बिलकुल गलत हैं वास्तव मे सन्यास मे कॉंग्रेस जाएगी लेकिन जनता परिवार के लोग हिन्दुत्व की ओर मुड़ जाएंगे। मुस्लिम परस्ती को हमेशा के लिए ये लोग त्याग देंगे। काँग्रेस का कोमल हिंदुत्ववादी होना राजनीतिक सन्यास से बचने का ही एक उपक्रम है जो कहीं से भी उसे फायदा पहुंचाता नहीं दिख रहा है।
इसीलिए बिहार विधान सभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए एक बार फिर सबसे महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। वैसे भी ममता बनर्जी, लालू-नितीश, मुलायम सिंह यादव सहित अन्य सिक-उल्लूरिस्टों के लिए मुस्लिम परस्त सेकुलरिज़्म कोई सैद्धान्तिक आधार न हो कर बस सत्ता हथियाने का एक हथकंडा मात्र है। यदि उनको इससे सत्ता मिलती दिखाई नहीं देगी तो मुस्लिम परस्त सेकुलरिज़्म का चोला एक झटके मे उतार कर कट्टर हिन्दुत्व का चोला पहनने में वो थोड़ी भी देरी नहीं करेंगे। वो इतने कट्टर हिन्दूवादी हो सकते सकते हैं कि संभवतः विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन को भी बहुत पीछे छोड़ दें।
नेपाल का पुनः हिन्दू राष्ट्र की ओर लौटना महज एक संयोग नहीं है। जरा सोचिए कितने गाजे-बाजे के साथ नेपाल ने अपने आप को सेकुलर देश घोषित किया था लेकिन अचानक क्या हो गया कि उसे पुनः हिन्दू राष्ट्र की ओर लौटना पड़ रहा है। ये भी कोई गूढ और बहुर गहरे अध्ययन का विषय नहीं बल्कि सामान्य बुद्धि के हल्के उपयोग से ही स्पष्ट होने वाला बेहद आसान सा विषय है। ऐसा विषय जिसका असर न सिर्फ बिहार विधान सभा चुनाव पड़ने वाला है बल्कि उस माध्यम से भारतीय राजनीति भी हमेशा के लिए बदलने भी जा रही है। तो स्वागत के लिए तैयार हो जाईए उस सुखद परिवर्तन का जिसकी अगुवाई बिहार करने के लिए बिलकुल तैयार है।
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