Friday, 3 July 2015

केजरी कहाँ फिसड्डी, जब मारे मूंछ मुसद्दी...

कोई गैरआपिया बता रहा थे मूछों और पूंछों का बड़ा महात्म्य है। जैसे जानवर पूंछों से पहचाने जाते हैं वैसे ही मानव मूंछों से जैसे जितने भी देवता और भगवान जी लोग हैं वो सभी या तो दाढ़ी मूंछ दोनों रखते हैं या फिर बिलकुल सफाचट्ट मर्यादा पुरुषोत्तम और परम वीर भगवान श्री राम न दाढ़ी रखते थे और न ही मूंछ, भगवान शिव से बड़ा कोई पुरुष हुआ ही नहीं उनकी बड़ी-बड़ी जटाएँ लेकिन न दाढ़ी न मूंछ लेकिन वहीं जितने राक्षसी प्रवृत्ति वाले हैं सबकी बड़ी-बड़ी मूँछें है बड़ी - बड़ी हमेशा अत्याचार करने को उद्यत मार-पीट पर उतारू। उनके इस जबरदस्त वर्गीकरण पर मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गई तो मैंने अनुरोध किया "...केजरी छाप मूंछों के महात्म्य पर कुछ प्रकाश डालिए ..." गैरआपिया बुद्धिमान बोले "...ये मूंछ ही है जो आदमी को क्या से क्या बना देती है ... केजरी छाप मूंछे तो ऐसी है कि साफ साफ बताती है जो दिखाता वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मेरे तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं था मुझे और मजा आने लगा जिज्ञासा भी बढ़ गई तो मैंने पूछा "...इसके और स्वरूपों का भी महात्म्य है क्या ...?" बुद्धिमान बोले "...हाँ है क्यों नहीं ...केजरी छाप मूछें जा आकार में नीचे बढ़ कर होठ ढकने लगती हैं तो मस्तिष्क बहुत सक्रिय हो कर व्यक्ति को समूहिक-स्वसंदर्भ आग्रही बना देता है ...लेकिन वहीं केजरी छाप मूंछों का आकार दोनों ओर से घटने लगता है तो समझ लो आफत आनी शुरू हो जाती और जैसे-जैसे आकार घटता है वैसे-वैसे मुसीबत बढ़ती जाती है आपातकाल के रूप में ठीक तानाशाही के तर्ज पर...." बुद्धिमान की बातों में दम था मुझे लगा कि इस विषय पर इनका गहन शोध है मैंने आगे पूछा "...विदेशों में ज़्यादातर लोग मूंछें नहीं रखते तो क्या वो लोग देवतुल्य हो जाते हैं ..." बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...बच्चा युद्ध संस्कृति है, वैभव का आधार है, विकास की कुंजी है युद्ध धर्म है गीता भी यही कहती है किन्तु जैसे जैसे पुरुष कायर होता गया अर्थात युद्ध न करने के बहाने बनाने लगा तो तलवार भी आकार में घटने लगा और घटते घटते छूरे के आकार में आ गया जिसका उपयोग दाढ़ी मूंछ की नक्काशी में होता है ..." उनका शोध देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था मैंने कहा "...लेकिन लोग युद्ध को मानवता के खिलाफ बताते हैं ..." बुद्धिमान बोले "...जब भगवान युद्ध, हिंसा और मृत्यु के विरुद्ध नहीं तो हमे क्या अधिकार है अहिंसक होने का ? जो प्रकृति के विरुद्ध है वो अधर्म है अतः जो युद्ध नहीं कर सकता उसे जीने का कोई अधिकार नहीं ...गीता कहती है 'वीर भोग्या वसुंधरा' ...अर्थात कायर कभी भी धारा का उपभोग नहीं कर सकता ...अतः कोई भी युद्ध पिपासु देश विकासशील और गरीब नहीं है ...युद्ध ही विकास का मार्ग दिखाता है ..." "...लेकिन मूंछे ..." मैंने उन्हें याद दिलाया तो बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...जितने साधू महात्मा और संत प्रकृति के लोग हुए उनहोंने दाढ़ी-मूंछें दोनों रखीं कारण संतुलित व्यक्तित्व ..." मैंने उनकी प्रशंसा में कहा "...वाह मान गए लेकिन एक बात बताईए कुविष और केजरी में कैसे निभता है ...?" बुद्धिमान ने शानदार और बहुत तार्किक उत्तर दिया बोले "...बच्चा कुविष केजरी को लगातार डंस रहा है और केजरी उसकी कुटाई ...ये दोस्ती ऐसी है स्वार्थ के शत्रुता पर आधारित है जो अतिमधुर दिखती है ..वैसे केजरी छाप मूंछों की ये खासियत है मक्कारी और धूर्तता से वो चारो ओर छणिक और अस्थाई तौर पर थोड़ा बहुत बढ़ सकता है लेकिन फिर वही लौट कर लोटने लगता है..."
क्रमशः  

No comments:

Post a Comment