Friday, 31 July 2015

बिलार मारे खोईचा...सियार सीकर मंसा...

खाँटी भाई कोंग्रेसी लोग सियारपुर्सी पर उतारू हो चुके हैं। दिग्गी रज्जा और शशि थरूर तो कुछ ज्यादा ही खोईचा की उम्मीद पाले बैठे हैं। लेकिन खोईचा में पड़ चुके घुन को भी वो चटखारा ले कर चट कर जाने पर उतारू हैं। संसद ठप है गुरुदासपुर के आतंकवादी हमले पर भी दिग्गी थरूर समेत सारे खाँटी सिक-उल्लूरिस्टवे सियारपुर्सी करते हुए ठुमका लगते दिख रहे हैं। हमारे एक आत्मघोषित मीडिया विशेषज्ञ से मैंने पूछा तो वो उल्टा मुझे ही डांटते कमीडिया नाच करते हुए बोले "...बकवास करने से पहले सौ बार सोचा करो ये सियारपुर्सी नहीं ..." मैंने उनसे विनम्रता से पूछा "...तो क्या है ...?" स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...मानसून सत्र के हंगामेदार होने की पूरी आशा थी ..." मुझे बहुत आश्चर्य हुआ तो मैंने पूछा "...आपको आशा थी ऐसा क्यों...?" स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...हम तो हमेशा से इसी आशा मे रहते हैं ..." मैंने कहा "...ये तो ठीक नहीं वो सियारपुर्सी पर उतारू हैं और आप लोग श्वानपुर्सी पर ..." स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ को लगा जैसे उनकी तारीफ हो रही है तो उसी खुशी से मुसकुराते हुए उन्होने मुझे उत्तर दिया "...हाँ वो तो है..." मैंने उनको झटका देते हुए कहा "...लगता है आप खुद को श्वान टेली का मालिक समझ बैठे ..." स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...कुछ हो रहा है वो अच्छा नहीं है ..." मैंने कमेडिया विशेषज्ञ से पूछा "...क्या आतंकवादी को फांसी नहीं होनी चाहिए ..." कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हमे किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है ..." मैंने उनपर टांट कसते हुए उनसे पूछा "...कपार पर उधार का सेकेंडहैंड जाँघिया बांध कर कबसे आप दार्शनिक हो गए...?"  कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हम दार्शनिक नहीं विशेषज्ञ हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...तो अपनी विशेज्ञता का उपयोग सियारों को शाकाहारी बानने मे कर रहे हैं ...?" मेरा प्रश्न सुन कर कमीडिया विशेषज्ञ सकपका गए बोले "...लोगों की अपनी पसंद है ..." मैंने तपाक से पूछा "...तो फिर न्याय की अपनी पसंद पर आपको आपत्ति क्यों ...?" कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...न्याय वो नहीं जो  मिला है न्याय वो है जो नहीं मिला ..." मैंने दुखद आश्चर्य जताते हुए कहा "...हद है महराज अब समझ मे आया कि दाऊद इतना सफल क्यों और कैसे है ..." कमीडिया विशेषज्ञ ने पूछा "...कैसे ...?" मैंने कहा "...जब उसके एक गुर्गे के न्यायिक परिणति पर इतना सियारपुर्सी मचा है तो सोचये खुद दाऊद के हश्र पर सिक-उल्लू-रिस्टवे और कमीडिया कितना मातम मचाएंगे ...जैसे उनका माई बाप ही ..." कमीडिया विशेषज्ञ कुछ बोले नहीं ...बहुत देर तक कुछ नहीं बोले ... 

Thursday, 30 July 2015

बिरयानी हैदराबादाँ...लहसुन चोखा मीस

हैदराबाद की अजीब फितरत है मुसलमान वहाँ मुसलमीन हो जाता है। सभी लोग इससे परिचित हैं और ठीक से परिचित हैं। एक मुसलमीन हैदराबादी बता रहे थे "...फाँसा जो याक़ूब मेमनी को हुआ हीं वो अच्छा नाईं जी ..." मैंने उनसे पूछा "....क्यों...?" मुसलमीन हैदराबादी उत्तर देते हुए बोले "...सबकी फाँसा होना जरूरी जीं... नाईं तो याक़ूब मेमनी को भी छोडना जरूरी जीं ..." मैंने उनसे कहा "...सबको फांसी से आपका क्या मतलब जीं...?" मुसलमीन हैदराबादी बोले "...वो सबको जीं जो दँगी में शामिल और कुछ नेताँ के हत्या का आरोपाँ जीं ..." मैंने उनसे पूछा "... जैसे ..." मुसलमीन हैदराबादी बोले "...जैसे राजीव गांधी, इन्दिरा गांधी के कातिलां, माले गाँव मक्का मस्जिद ब्लास्ट, गुजरात और दिल्ली दंगी के आरोपाँ को फासां भी होनी चाहियाँ जी ..." मैंने प्रतिउत्तर में कहा "...आप तो ऐसे कह रहे हैं कि कुक्कुर से पूंछ हिलाने से हाथी अपना सूंढ उठा ले ..." मुसलमीन हैदराबादी मेरे ऊपर खऊरा गए और गुस्से में मुझसे पूछे "...हम आपको क्या लगतां जी ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...वही जो आपको समझ में आताँ जी ..." मुसलमीन हैदराबादी का खऊराना कम होने के बजाय और भड़क गया बोले "...बबरा मस्जिद, गुजरात सहित सभी दंगी और कातिलां के आरोपाँ को फाँसाँ देना बहुत जरूरी नई तो ...." मैंने बीच में बात काटते हुए कहा "...नई तो क्या कर लेंगा जी ...?" मुसलमीन हैदराबादी सकपका गए और बोले "...हम कुछ नई करंगा जी वो हम चाहता हईं कि सबके साथ जस्टिस होना जरूरी जी ..." मैंने कहा "...जो आप चाहता हाईं केवल वही जस्टिस कैसे जी ...?" मुसलमीन हैदराबादी बोले "...हम जनता हाई जस्टिस क्या होताँ जी ..." मैंने कहा "...फिर तो सत्र न्यायालय, उच्चन्यालाय और उच्चतम नयायालय को खत्म करके मुसलमीन हैदराबादी को जस्टिस करने का अधिकार सौंप देना चाहिए जी ..." मुसलमीन हैदराबादी अब थोड़ा ठंडा पड़ने लगे थे लेकिन उन्होने मुझसे पूछा "...खलिस याक़ूब मेमनी को फाँसा देने जस्टिस कैसे होता जी ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा ".... ठीक तो है गोधरा कांड, मदनी, इब्राहीम मेमनी, दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील सहित अबू सलेम सहित सभी आरोपियों को भी जल्दी से जल्दी फांसी हो जानी चाहिए..." मुसलमीन हैदराबादी मुसकुराते हुए बोले "...पहले सबको अरेस्टा करना जरूरी तब तो फाँसाँ होङ्गा जी ..." मैंने कहा "...तो क्या आप चाहते हाइन कि सब पकड़े नहीं जाएँ ...?" मुसलमीन हैदराबादी मुसकुराते रहे कुछ नहीं बोले ...मैंने उनका मंतव्य समझ लिया था.... 

Friday, 17 July 2015

इस्केप वेलोसिटी तान के ...चूहा सूंढ उठाय

बकलोल बबुआ को इंतजार है अगले 6 महीने का क्योकि उसे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है 56 इंच की छाती 5.6 इंच में बदल जाएगी। बहुत दिन नहीं हुए जब चुनावों में इसने इस्केप वेलोसिटी का अद्भुत नायाब कान्सैप्ट दिया था। उसके खाँटी भाई चेले उस कान्सैप्ट को ऐसा पेश कर रहे थे जैसे मानो नासा से खुद एलियन का अवतार हुआ है और उस सिद्धान्त की बदौलत वाकई कॉंग्रेस का उसी इस्केप वेलोसिटी से चुनाव जीत जाएगी। वाकई उसका असर हुआ लेकिन क्या करें बकलोल बबुआ जब कॉंग्रेस की गाड़ी ही रिवर्स गेयर में थी 208 से घट कर 44 पर आ गए। वैसे एक खाँटी भाई कोंग्रेसी बता रहे थे "...देखियेगा ऐसा ही होगा जैसा राहुल जी कह रहे हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...अभी तक तो वो खगोल भौतिकी के रिसर्चर बने फिर रहे थे शायद उस समय वो अपनी राजमा-ता के साथ अमेरिका के नासा में विपशना करके आए थे लेकिन अब ...?" खाँटी भाई बोले "...उसका असर उल्टा हो गया था लिहाजा अबकी बार थाईलैंड गए थे ..." मैंने कहा "...शायद इसीलिए उनकी नजर कहीं और के बजाय छाती पर अभी तक टिकी हुई है ...!" खाँटी भाई को बड़ा अजीब सा लगा असहजता को छिपाते हुए बोले "...देखिये ऐसा नहीं है ..." मैंने कहा "...ऐसा नहीं है तो फिर छती पर से नजर अब तो कम से कम हट जानी चाहिए ..." खाँटी भाई बोले "...देखिये ये नीतिगत बात है हम आकलन करके बैठे हैं और उसी आधार पर राहुल जी ने ऐसा कहा है ..." मैंने मुसकुराते हुए तारीफ करने के अंदाज में कहा "...अच्छा ! भाई वाह हम तो भूल ही गए थे कि खगोल भौतिक शास्त्री एक बहुत बढ़िया गणितज्ञ भी होता है ..." खाँटी भी खुश हो गए बोले "...हाँ वो तो है ..." मैंने कहा "...208 से घट कर 44 मतलब आपके कोंग्रेसी रिवर्स इस्केप वेलोसिटी के फार्मूले के अनुसार 8/2 = 4 और इस्केप वेलोसिटी को जोड़ दें तो डबल 4 मतलब पूरे 44 ..." खाँटी भाई मुझे आश्चर्य से देखते रह गए कुछ बोल नहीं पाए तो मैंने पूछा "...तो बताईए 56 कैसे 5.6 में बदल जाएगा 6 महीने में ...?" खाँटी भाई बोले "...देखिये ये एक आकलन है और ठोस आकलन है ऐसा हो के रहेगा ..."  मैंने उनसे कहा "...देखिये सीधा गणित है मोदी जी ने इस्केप वेलोसिटी का फार्मूला नहीं लगाया तो 56 का अर्थ हुआ 5 x 6 = 300 और 2014 में मतलब 300 का एकांक 3 तो सीधे गणित के हिसाब से हुआ डबल 3 और 3+3 = 336 ... तो अब बताईए 5.6 कैसे आएगा ? " खाँटी भाई बकलोल बबुआ खिलाफ कुछ बुदबुदाने लगे तो मैंने कहा नमस्कार ...

Sunday, 5 July 2015

गतांक से आगे ....
केजरी कहाँ फिसड्डी, जब...... 

....मैंने बुद्धिमान से पूछा "...कुविष तो बिलकुल सफाचट्ट है न दाढ़ी न मूंछ...फिर भी ऐसा कैसे ..." बुद्धिमान जी ने उत्तर दिया  "....वो केजरी के मूंछों का महात्म्य है जो दिखता है वो होता नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मैंने जिज्ञासावश पूछा "...इसका मतलब ये है कि कुविष की मूंछों का उपयोग केजरी भी कर रहे हैं ...?" बुद्धिमान बड़ी सहजता से बोले "...नकली को असली, हंडा को तसली और गोईठा को मुस्ली बनाना केजरी के बाएँ हाथ खेल है तो कुविष का डंक और केजरी की कुटाई मिठास तो घोल ही सकती है ..." मैंने जिज्ञासा शांत नहीं हुई सो पूछा "...कुविष तो सफाचट्ट है ...? बुद्धिमान जी ने उत्तर दिया "...बच्चा तुम इतनी बुद्धिमान हो फिर भी छोटी सी बात तुम्हें समंझ में नहीं आ रही तो सुनो जंतर पर मंतर फूंकने 22 अप्रैल को जब सब जमा हुए थे तो गजेन्द्र की दाढ़ी मूंछ दोनों थी अर्थात वो संत प्रकृति का भोला भाला व्यक्ति था लेकिन उसने जो कुछ भी किया उसके लिए किसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी ...?" मुझे समझ आ गया साथ ही घोर आश्चर्य भी हुआ मैंने सहमति जताते हुए कहा "...मतलब यदि कुविष की मूंछे होती तो वो संत केजरी गिरोह के झांसे में फँसता ही नहीं ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "...मनी-श सुसाइडिया, केजरी और संसि तीनों की मूंछे हैं ...इसीलिए ये सब कुविष को विष का फुहार फेंकने के लिए आगे कर देते हैं ...आपने सही कहा बुद्धिमान जी ! जो दिखता है वो होता नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मैंने उनसे आगे पूछा "...मूंछों को लोग सम्मान से जोड़ लेते हैं ऐसा क्यों ...?" बुद्धिमान बोले "...लोग मूंछों को सम्मान से नहीं अपने अहंकार से जोड़ते हैं ...जैसे कुछ मांसाहारी पालतू जानवर सम्मान में पुंछ ऊपर करके चलते हैं लेकिन ठीक किसी अन्य क्षेत्र में अहंकार की लड़ाई में जब कमजोर पड़ता है तो उसकी पूंछ नीचे होकर पेट से चिपक जाती हैं ..." बुद्धिमान जी का उत्तर लाजवाब और गज़ब का तार्किक था मैंने कहा "...अब समझ में मुझे आया कि महिलाओं की दाढ़ी और मूंछ क्यों नहीं होती क्यों कि वो अहंकार के बेहूदे चक्कर में नहीं पड़तीं ...और इसीलिए महिलाओं के नाम के आगे अभी कुछ ही दिन पहले तक देवी स्वतः लगता था ...लेकिन अब तो राक्षसी आधुनिकतावाद है ..." मैंने बुद्धिमान जी से कहा "...मतलब पूंछ और मूंछ के भाव-भंगिमा में व्यक्ति की स्थिति का पूरी तरह अंदाजा लगाया जा सकता है ..." बुद्धिमान जी बोले "...बच्चा पूरी तरह सटीक अंदाजा लगाने के लिए उसके मंडली को भी देखना पड़ेगा क्योंकि पूंछ पर तो मस्तिष्क की स्थिति का नियंत्रण होता है लेकिन मूंछ पर व्यक्तित्व-मनोभाव के स्थाईकारक का प्रभाव होता है लिहाजा व्यक्ति के संगत का भी अध्ययन जरूरी है ..." मैंने उनसे कहा "...आपका शोध लाजवाब है तो आप जरा दिल्ली और अन्ना हज़ारे की मनः स्थिति पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे ...?" बुद्धिमान जी बोले "...एक के तो सीने पर तो मूंग दारा जा रहा है और दूसरे ने शान से अपनी **** ऊपर करके टोयोटा इनोवा उपहार में ले रहा है ..." मुझे उनकी बातों बहुत आनंद आ रहा था लेकिन समय की पाबंदी के कारण मैंने बुद्धिमान जी को कहा "...प्रणाम ..."   

Friday, 3 July 2015

केजरी कहाँ फिसड्डी, जब मारे मूंछ मुसद्दी...

कोई गैरआपिया बता रहा थे मूछों और पूंछों का बड़ा महात्म्य है। जैसे जानवर पूंछों से पहचाने जाते हैं वैसे ही मानव मूंछों से जैसे जितने भी देवता और भगवान जी लोग हैं वो सभी या तो दाढ़ी मूंछ दोनों रखते हैं या फिर बिलकुल सफाचट्ट मर्यादा पुरुषोत्तम और परम वीर भगवान श्री राम न दाढ़ी रखते थे और न ही मूंछ, भगवान शिव से बड़ा कोई पुरुष हुआ ही नहीं उनकी बड़ी-बड़ी जटाएँ लेकिन न दाढ़ी न मूंछ लेकिन वहीं जितने राक्षसी प्रवृत्ति वाले हैं सबकी बड़ी-बड़ी मूँछें है बड़ी - बड़ी हमेशा अत्याचार करने को उद्यत मार-पीट पर उतारू। उनके इस जबरदस्त वर्गीकरण पर मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गई तो मैंने अनुरोध किया "...केजरी छाप मूंछों के महात्म्य पर कुछ प्रकाश डालिए ..." गैरआपिया बुद्धिमान बोले "...ये मूंछ ही है जो आदमी को क्या से क्या बना देती है ... केजरी छाप मूंछे तो ऐसी है कि साफ साफ बताती है जो दिखाता वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मेरे तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं था मुझे और मजा आने लगा जिज्ञासा भी बढ़ गई तो मैंने पूछा "...इसके और स्वरूपों का भी महात्म्य है क्या ...?" बुद्धिमान बोले "...हाँ है क्यों नहीं ...केजरी छाप मूछें जा आकार में नीचे बढ़ कर होठ ढकने लगती हैं तो मस्तिष्क बहुत सक्रिय हो कर व्यक्ति को समूहिक-स्वसंदर्भ आग्रही बना देता है ...लेकिन वहीं केजरी छाप मूंछों का आकार दोनों ओर से घटने लगता है तो समझ लो आफत आनी शुरू हो जाती और जैसे-जैसे आकार घटता है वैसे-वैसे मुसीबत बढ़ती जाती है आपातकाल के रूप में ठीक तानाशाही के तर्ज पर...." बुद्धिमान की बातों में दम था मुझे लगा कि इस विषय पर इनका गहन शोध है मैंने आगे पूछा "...विदेशों में ज़्यादातर लोग मूंछें नहीं रखते तो क्या वो लोग देवतुल्य हो जाते हैं ..." बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...बच्चा युद्ध संस्कृति है, वैभव का आधार है, विकास की कुंजी है युद्ध धर्म है गीता भी यही कहती है किन्तु जैसे जैसे पुरुष कायर होता गया अर्थात युद्ध न करने के बहाने बनाने लगा तो तलवार भी आकार में घटने लगा और घटते घटते छूरे के आकार में आ गया जिसका उपयोग दाढ़ी मूंछ की नक्काशी में होता है ..." उनका शोध देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था मैंने कहा "...लेकिन लोग युद्ध को मानवता के खिलाफ बताते हैं ..." बुद्धिमान बोले "...जब भगवान युद्ध, हिंसा और मृत्यु के विरुद्ध नहीं तो हमे क्या अधिकार है अहिंसक होने का ? जो प्रकृति के विरुद्ध है वो अधर्म है अतः जो युद्ध नहीं कर सकता उसे जीने का कोई अधिकार नहीं ...गीता कहती है 'वीर भोग्या वसुंधरा' ...अर्थात कायर कभी भी धारा का उपभोग नहीं कर सकता ...अतः कोई भी युद्ध पिपासु देश विकासशील और गरीब नहीं है ...युद्ध ही विकास का मार्ग दिखाता है ..." "...लेकिन मूंछे ..." मैंने उन्हें याद दिलाया तो बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...जितने साधू महात्मा और संत प्रकृति के लोग हुए उनहोंने दाढ़ी-मूंछें दोनों रखीं कारण संतुलित व्यक्तित्व ..." मैंने उनकी प्रशंसा में कहा "...वाह मान गए लेकिन एक बात बताईए कुविष और केजरी में कैसे निभता है ...?" बुद्धिमान ने शानदार और बहुत तार्किक उत्तर दिया बोले "...बच्चा कुविष केजरी को लगातार डंस रहा है और केजरी उसकी कुटाई ...ये दोस्ती ऐसी है स्वार्थ के शत्रुता पर आधारित है जो अतिमधुर दिखती है ..वैसे केजरी छाप मूंछों की ये खासियत है मक्कारी और धूर्तता से वो चारो ओर छणिक और अस्थाई तौर पर थोड़ा बहुत बढ़ सकता है लेकिन फिर वही लौट कर लोटने लगता है..."
क्रमशः