क्षमा ! ये आलेख व्यंग नहीं है
मीडिया, महामूर्ख केजरीवाल और मूर्खापियों का ध्यान खींचना जरूरी क्यों है ? इसी आदमी से दिल्ली चुनाव से पहले ये पूछा गया कि दिल्ली में महगाई कैसे कम करेंगे तो उस आदमी का जवाब था "...जी हम वैट के छापे नहीं मारेंगे ..." ये उत्तर सुन के तो कितने ही हाई स्कूल के छत्र भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए थे ... अनसोशल मीडिया के मूर्धन्य रवीश ने महामूर्ख से पूछा "...दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुफ्त में पानी कैसे देंगे..." तो इस आदमी का जवाब जानते हैं क्या था ? इसने बोला "...हम दिल्ली के व्यापरियों को गले लगा लेंगे ..." दिल्ली की सल्तनत जिसके हाथों में है उससे तो ये अब विश्वास होने लगा है कि बंदर के हाथ में तलवार ही है जिससे आज एक सीधे-सादे आदमी और किसान की सरे आम की अकाल मृत्यु हो गई। इसने भरे मंच से पुलिस वालों को कोसते हुए बोला कि उनकी जो भी राजनीति है लेकिन इंसान तो हैं ... मतलब महमूर्ख केजरीवाल साबित कर दिया कि वो इंसान नहीं हैं क्योंकि महमूर्ख और मूर्ख लोमड़ी और भेड़िये की तरह सिर्फ और सिर्फ महाधूर्त और धूर्त ही हो सकते हैं। ये पता नहीं कैसे केजरीवाल ने और किस उधार के दिमाग से घोषित कर दिया कि इंसानियत पर केवल पुलिस वालों का ही कब्जा है। लोग बता रहे हैं वहाँ पर लगभग 2 हजार लोग थे जो केजरीवाल के सुपर इंसानियत का अनुसरण कर रहे थे।
गजेंद्र सिंह कल्यानावत किसी गरीब घर के नहीं थे। उनके घर की माली हालत इतनी खराब नहीं थी कि उनको आत्महत्या करनी पड़े। सवाल उठता है फिर ये सब कैसे हो गया वो भी अचानक। वैसे बेहद चौकाने वाले तथ्य इस लोंहर्षक घटना में है जैसे -
1 गजेंद्र सिंह कल्यानावत पूरे सजे धजे थे जो आत्महत्या करने की मानसिकता से कत्तई मेल नहीं खाती क्या कभी किसी ने सुना है कि आत्महत्या करने वाले किसी व्यक्ति ने पूरा श्रिंगार करके आत्महत्या की
2 गजेंद्र सिंह कल्यानावत के हाथों में आपियों का चुनाव चिन्ह झाड़ू था जो अपने आप में बहुत बड़े संदेह का कारण है। आत्महत्या करने वाले कभी सिंबल ले के आत्महत्या नहीं करते उन्हें सिर्फ अपनी मौत दिखाई देती है जो पूरी तरह उनके अपने जीवन से विरक्ति पर आधारित होता है।
3 किसी भी आत्महत्या की घटना को देखें सभी आत्महत्याएँ एकांत में होती हैं जहां भी भी समूह होता है वहाँ आत्महत्या करने वाले आत्महत्या नहीं करते। जो लोग नदी, छत या रेलवे लाईन पर छलांग लगते हैं वो हर संभव प्रयास करते हैं कि कोई देखे नहीं ... यहाँ तो 2 हजार लोगों का पूरा जनसमूह था लिहाजा ये पूरी तरह उकसाने वाली घटना की ओर स्पष्ट संकेत करती है।
4 केजरीवाल और उनके साथियों का मंच से टस से मस न होना भी अजीब और अस्वाभाविक स्थिति है।
5 एक टीवी रेपोर्टर का कहना है उसने गजेंद्र सिंह कल्यानावत से पेड़ पर चढ़ने से पहले पूछा था कि आप पेड़ पर क्यों चढ़ रहे हैं तो गजेंद्र सिंह का जवाब था "...मेरा दिमाग ठीक नहीं है मुझे परेशान मत करो..." फिर रिपोर्टर ने सोचा कि हो सकता गजेंद्र सिंह की पेड़ पर चढ़ के देखने की इच्छा हो जो स्वाभाविक बात है जो कोई भी आम दर्शक ये सोच सकता है वैसे भी बहुत सी रैलियों में लोग पेड़ों और अट्टालिकाओं पर चढ़ के देखते ही हैं। स्वाभाविक रूप से लगभग दो हजार लोगों ने ठीक वही महसूस किया जो रिपोर्टर ने महसूस किया।
6 सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल और उनके मंचासीन समूह को ये कैसे लगा कि गजेंद्र सिंह आत्महत्या करने वाले है और वो उन्हें बचाने के लिए उतारने का आदेश देते रहे और सभी ने अनसुना कर दिया अंतिम समय में कुछ लोग चढ़े तबतक बहुत देर हो चुकी थी। इसमे स्वाभाविक स्थिति तब होती जब उनकी नजर पड़ते ही मंच छोड़ कर उस पेंड की ओर दौड़ पड़ते ठीक वैसे ही जैसे जब किसी व्यक्ति को डूबते देख कर आस-पास के तैराक उसे बचाने के लिए या तो पानी में कूद पड़ते है या फिर उसकी ओर लपकते हैं।
मीडिया, महामूर्ख केजरीवाल और मूर्खापियों का ध्यान खींचना जरूरी क्यों है ? इसी आदमी से दिल्ली चुनाव से पहले ये पूछा गया कि दिल्ली में महगाई कैसे कम करेंगे तो उस आदमी का जवाब था "...जी हम वैट के छापे नहीं मारेंगे ..." ये उत्तर सुन के तो कितने ही हाई स्कूल के छत्र भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए थे ... अनसोशल मीडिया के मूर्धन्य रवीश ने महामूर्ख से पूछा "...दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुफ्त में पानी कैसे देंगे..." तो इस आदमी का जवाब जानते हैं क्या था ? इसने बोला "...हम दिल्ली के व्यापरियों को गले लगा लेंगे ..." दिल्ली की सल्तनत जिसके हाथों में है उससे तो ये अब विश्वास होने लगा है कि बंदर के हाथ में तलवार ही है जिससे आज एक सीधे-सादे आदमी और किसान की सरे आम की अकाल मृत्यु हो गई। इसने भरे मंच से पुलिस वालों को कोसते हुए बोला कि उनकी जो भी राजनीति है लेकिन इंसान तो हैं ... मतलब महमूर्ख केजरीवाल साबित कर दिया कि वो इंसान नहीं हैं क्योंकि महमूर्ख और मूर्ख लोमड़ी और भेड़िये की तरह सिर्फ और सिर्फ महाधूर्त और धूर्त ही हो सकते हैं। ये पता नहीं कैसे केजरीवाल ने और किस उधार के दिमाग से घोषित कर दिया कि इंसानियत पर केवल पुलिस वालों का ही कब्जा है। लोग बता रहे हैं वहाँ पर लगभग 2 हजार लोग थे जो केजरीवाल के सुपर इंसानियत का अनुसरण कर रहे थे।
गजेंद्र सिंह कल्यानावत किसी गरीब घर के नहीं थे। उनके घर की माली हालत इतनी खराब नहीं थी कि उनको आत्महत्या करनी पड़े। सवाल उठता है फिर ये सब कैसे हो गया वो भी अचानक। वैसे बेहद चौकाने वाले तथ्य इस लोंहर्षक घटना में है जैसे -
1 गजेंद्र सिंह कल्यानावत पूरे सजे धजे थे जो आत्महत्या करने की मानसिकता से कत्तई मेल नहीं खाती क्या कभी किसी ने सुना है कि आत्महत्या करने वाले किसी व्यक्ति ने पूरा श्रिंगार करके आत्महत्या की
2 गजेंद्र सिंह कल्यानावत के हाथों में आपियों का चुनाव चिन्ह झाड़ू था जो अपने आप में बहुत बड़े संदेह का कारण है। आत्महत्या करने वाले कभी सिंबल ले के आत्महत्या नहीं करते उन्हें सिर्फ अपनी मौत दिखाई देती है जो पूरी तरह उनके अपने जीवन से विरक्ति पर आधारित होता है।
3 किसी भी आत्महत्या की घटना को देखें सभी आत्महत्याएँ एकांत में होती हैं जहां भी भी समूह होता है वहाँ आत्महत्या करने वाले आत्महत्या नहीं करते। जो लोग नदी, छत या रेलवे लाईन पर छलांग लगते हैं वो हर संभव प्रयास करते हैं कि कोई देखे नहीं ... यहाँ तो 2 हजार लोगों का पूरा जनसमूह था लिहाजा ये पूरी तरह उकसाने वाली घटना की ओर स्पष्ट संकेत करती है।
4 केजरीवाल और उनके साथियों का मंच से टस से मस न होना भी अजीब और अस्वाभाविक स्थिति है।
5 एक टीवी रेपोर्टर का कहना है उसने गजेंद्र सिंह कल्यानावत से पेड़ पर चढ़ने से पहले पूछा था कि आप पेड़ पर क्यों चढ़ रहे हैं तो गजेंद्र सिंह का जवाब था "...मेरा दिमाग ठीक नहीं है मुझे परेशान मत करो..." फिर रिपोर्टर ने सोचा कि हो सकता गजेंद्र सिंह की पेड़ पर चढ़ के देखने की इच्छा हो जो स्वाभाविक बात है जो कोई भी आम दर्शक ये सोच सकता है वैसे भी बहुत सी रैलियों में लोग पेड़ों और अट्टालिकाओं पर चढ़ के देखते ही हैं। स्वाभाविक रूप से लगभग दो हजार लोगों ने ठीक वही महसूस किया जो रिपोर्टर ने महसूस किया।
6 सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल और उनके मंचासीन समूह को ये कैसे लगा कि गजेंद्र सिंह आत्महत्या करने वाले है और वो उन्हें बचाने के लिए उतारने का आदेश देते रहे और सभी ने अनसुना कर दिया अंतिम समय में कुछ लोग चढ़े तबतक बहुत देर हो चुकी थी। इसमे स्वाभाविक स्थिति तब होती जब उनकी नजर पड़ते ही मंच छोड़ कर उस पेंड की ओर दौड़ पड़ते ठीक वैसे ही जैसे जब किसी व्यक्ति को डूबते देख कर आस-पास के तैराक उसे बचाने के लिए या तो पानी में कूद पड़ते है या फिर उसकी ओर लपकते हैं।
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