Wednesday, 22 April 2015

क्षमा ! ये आलेख व्यंग नहीं है

मीडिया, महामूर्ख केजरीवाल और मूर्खापियों का ध्यान खींचना जरूरी क्यों है ? इसी आदमी से दिल्ली चुनाव से पहले ये पूछा गया कि दिल्ली में महगाई कैसे कम करेंगे तो उस आदमी का जवाब था "...जी हम वैट के छापे नहीं मारेंगे ..." ये उत्तर सुन के तो कितने ही हाई स्कूल के छत्र भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए थे ... अनसोशल मीडिया के मूर्धन्य रवीश ने महामूर्ख से पूछा "...दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने के बाद मुफ्त में पानी कैसे देंगे..." तो इस आदमी का जवाब जानते हैं क्या था ? इसने बोला "...हम दिल्ली के व्यापरियों को गले लगा लेंगे ..." दिल्ली की सल्तनत जिसके हाथों में है उससे तो ये अब विश्वास होने लगा है कि बंदर के हाथ में तलवार ही है जिससे आज एक सीधे-सादे आदमी और किसान की सरे आम की अकाल मृत्यु हो गई। इसने भरे मंच से पुलिस वालों को कोसते हुए बोला कि उनकी जो भी राजनीति है लेकिन इंसान तो हैं ... मतलब महमूर्ख केजरीवाल साबित कर दिया कि वो इंसान नहीं हैं  क्योंकि महमूर्ख और मूर्ख लोमड़ी और भेड़िये की तरह सिर्फ और सिर्फ महाधूर्त और धूर्त ही हो सकते हैं। ये पता नहीं कैसे केजरीवाल ने और किस उधार के दिमाग से घोषित कर दिया कि इंसानियत पर केवल पुलिस वालों का ही कब्जा है। लोग बता रहे हैं वहाँ पर लगभग 2 हजार लोग थे जो केजरीवाल के सुपर इंसानियत का अनुसरण कर रहे थे।
गजेंद्र सिंह कल्यानावत किसी गरीब घर के नहीं थे। उनके घर की माली हालत इतनी खराब नहीं थी कि उनको आत्महत्या करनी पड़े। सवाल उठता है फिर ये सब कैसे हो गया वो भी अचानक। वैसे बेहद चौकाने वाले तथ्य इस लोंहर्षक घटना में है जैसे -
1     गजेंद्र सिंह कल्यानावत पूरे सजे धजे थे जो आत्महत्या करने की मानसिकता से कत्तई मेल नहीं खाती             क्या कभी किसी ने सुना है कि आत्महत्या करने वाले किसी व्यक्ति ने पूरा श्रिंगार करके आत्महत्या की
2      गजेंद्र सिंह कल्यानावत के हाथों में आपियों का चुनाव चिन्ह झाड़ू था जो अपने आप में बहुत बड़े संदेह का   कारण है। आत्महत्या करने वाले कभी सिंबल ले के आत्महत्या नहीं करते उन्हें सिर्फ अपनी मौत दिखाई         देती है जो पूरी तरह उनके अपने जीवन से विरक्ति पर आधारित होता है।
किसी भी आत्महत्या की घटना को देखें सभी आत्महत्याएँ एकांत में होती हैं जहां भी भी समूह होता है वहाँ आत्महत्या करने वाले आत्महत्या नहीं करते। जो लोग नदी, छत या रेलवे लाईन पर छलांग लगते हैं वो         हर संभव प्रयास करते हैं कि कोई देखे नहीं ... यहाँ तो 2 हजार लोगों का पूरा जनसमूह था लिहाजा ये पूरी         तरह उकसाने वाली घटना की ओर स्पष्ट संकेत करती है।
केजरीवाल और उनके साथियों का मंच से टस से मस न होना भी अजीब और अस्वाभाविक स्थिति है।
एक टीवी रेपोर्टर का कहना है उसने गजेंद्र सिंह कल्यानावत से पेड़ पर चढ़ने से पहले पूछा था कि आप पेड़         पर क्यों चढ़ रहे हैं तो गजेंद्र सिंह का जवाब था "...मेरा दिमाग ठीक नहीं है मुझे परेशान मत करो..." फिर           रिपोर्टर ने सोचा कि हो सकता गजेंद्र सिंह की पेड़ पर चढ़ के देखने की इच्छा हो जो स्वाभाविक बात है जो           कोई भी आम दर्शक ये सोच सकता है वैसे भी बहुत सी रैलियों में लोग पेड़ों और अट्टालिकाओं पर चढ़ के             देखते ही हैं। स्वाभाविक रूप से लगभग दो हजार लोगों ने ठीक वही महसूस किया जो रिपोर्टर ने महसूस         किया।
6 सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल केजरीवाल और उनके मंचासीन समूह को ये कैसे लगा कि गजेंद्र सिंह         आत्महत्या करने वाले है और वो उन्हें बचाने के लिए उतारने का आदेश देते रहे और सभी ने अनसुना कर         दिया अंतिम समय में कुछ लोग चढ़े तबतक बहुत देर हो चुकी थी। इसमे स्वाभाविक स्थिति तब होती जब         उनकी नजर पड़ते ही मंच छोड़ कर उस पेंड की ओर दौड़ पड़ते ठीक वैसे ही जैसे जब किसी व्यक्ति को               डूबते देख कर आस-पास के तैराक उसे बचाने के लिए या तो पानी में कूद पड़ते है या फिर उसकी ओर                 लपकते हैं।

Tuesday, 21 April 2015

चोर मचाए शोर, नाचे हजाम भोर

केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं ऐसी मान्यता है नाई और खलनाई के बीच झूला झूलने वाले ने मुझसे पूछा "... कैसी ये मान्यता ...? " मैंने उनको उत्तर देते हुए कहा "...वैसी ही मान्यता जैसी AK 47 मिलने पर अदालत ने सजा सुनाई और वो सजा काट रहे हैं वैसी ही मान्यता ..." उन व्यक्ति का गुस्सा चढ़ गया सुई गुस्से में उन्होने मुझसे पूछा "...केजरीवाल का मान्यता से क्या संबंध है ...?" मैंने शांति से उनको उत्तर देते हुए कहा "...वही जैसी मान्यता AK 47 वाले को मिली हुई है ..." उन व्यक्ति ने रागो वर्मा को संबोधित करते हुए कहा "...देखो वो लीक से हट कर लीक पर ही फिल्म बनाते हैं ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा " ...वही तो केजरीवाल भी लीक से हट कर लीक पर चल रहे हैं लिहाजा 2 महीने में ही दिल्ली में तो भ्रष्टाचार संवैधानिक और गोपनीयता से विस्फोटक बन चुका है ..." व्यक्ति को समझ में नहीं आया तो पूछा "...कैसे ...?" मैंने उनको उत्तर देते हुए कहा "...अरे भाई जो कैमरे में होगा वही भ्रष्टाचार है बाकी नहीं ..." व्यक्ति सन्न रह गए बोले "...इधर तो हमने कभी सोचा ही नहीं ..." मैंने उनसे कहा "...तो अब सोचो ..." लेकिन फिर थोड़ी देर में उनका दिमाग चला और आपत्ति करते हुए बोले "...लेकिन स्कूल पर छापा डाला था तो ..." मैंने उनसे कहा "...वही तो दिखाने के लिए था ... पैसा भी ऐंठने का एक जरिया था ...ताकि लोगों को विश्वास भी हो जाए और आपियों को पैसा भी मिले ..." व्यक्ति बोले "... कोई आपियों को पैसा क्यों देगा ...?" मैंने कहा "...इसलिए क्योंकि चंदा तो अब कोई दे नहीं रहा पिछले महीने आपियों को 756 रुपये  चंदे में मिले थे ..." व्यक्ति आश्चर्य जताते हुए बोले "...ये तो काला धन है ..."  मैंने उनसे प्रश्न पूछते हुए कहा "...तो क्या काले कुत्ते पाले नहीं जाते क्या  ...?" व्यक्ति बोले "...क्यों नहीं ..." मैंने कहा "... अब चिंता की कोई बात नहीं ..." व्यक्ति बोले "...क्यों ? चिंता क्यों नहीं करनी चाहिए ..." मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "... पैसा तो पैसा है चंदे से न सही घूस से ही सही ..." व्यक्ति बोले "... मतलब दिल्ली भ्रष्टाचार बिलकुल चरम पर है ..." मैंने उनको सांत्वना देते हुए कहा "... आपको अगर कोई काम हो तो घबराईए नहीं तो कोई बात नहीं ..." वो व्यक्ति फिर  बहुत कुछ बुदबुदाते हुए अपनी दुनिया में खो गए 
लंगोटी से ज़ोर दुम...चुरकी में अंडा

जनता पवार से भात के भावी पामन्ती, कुछ लोगों को ये बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन पमन्ती बन्ने के लिए मुलाम सींग आदो ने जनता पवार को एक कर दिया। लोग बताते हैं की शी मुलाम सींग आदों जनता पवार के पा हैं। ऐसे पा हैं जो बच्चों को गलतियों के उनको माफी देने मे कत्तई पीछे नई रत्ता। केजीवाल के रायता फेलाने पर इस महानायक को गुस्सा नई आता। उनके भात के पामन्ती बन्ने से पैहले ई हिस्सेदारी औ मजबूत ओ गई रिसतेदरी मे बादल कर। समधियों की धम्की पूआ भात सुनेगा देक्ते हैं किसकी हिम्मत है इस महानायक को पमन्ती बन्ने से रोक ले। कुछ लोग आपत्ति कत्ते हैं कि "मोगली के जंगल मे ये बिना चड्डी के फूल कैसे खिल गया " भाई देखों जबलपुर मे पूड़ी खाने से कोई पहलवान हुआ है क्या ? ठीक वैसे ही जहांगीर वहां पूड़ी इसलिए खाते थे कि सल्तनत बनी रहे लेकिन वो तो कबकी कबड्डी के खेल में हार चुके थे सिर्फ इसलिए कि जुगाड़ महाविद्यालय से जुगाड़ की डिग्री  (इंजीनियरिंग कालेज से बी॰ टेक॰) लेते समय प्रयोगशाला से हाइड्रोजन खतम हो गया था तो इनहोने ही आर्डर दिया था जिसे उन्होने लिखवाया "हाईड्रों-" ...लेकिन जब 3 महीने बाद "-जन" लिखावया तबतक प्रयोग समाप्त हो चुका था। सारा खेल खत्म हो चुका था। इनके आज के "राज-" और 3 महीने बाद की "-नीति" बिहार शब्द को ही सार्थक कर दिया जिसका "बीज ही हारने का है" उसे लोहिया का ललीपाप चूसने वाले भब्ब की सूचना दबाने वालों ने बिहार को उससे जगह पर मोगली के जंगल को स्वयात कर दिया। टीस लिए अंगारों से भरा सीना जब भारत से प्रधानमंत्री से मिलता है तो टीस और असहनीय हो जाती है तो केजरीवाल की खांसी के दमकल का सहारा लेना पड़ता है टीस लिए सीने को ये सब इसलिए बहुत बढ़िया लगा क्योंकि क्यों "खांसी का दमकल" तेल से नहीं "गाली" से चलता है साथ में परसादी के रूप पिछवाड़े लातों मारते हैं। दिल्ली की जनता बिल्कुल न घबराए जल्दी ही बिहार के तर्ज पर दिल्ली भी मोगली के जंगल की तरह स्वायत्त हो आत्मनिर्भर हो जाएगा जो रफ्तार है उससे तो लगता है 5-6 महीने में जनता फिर जंतर पहन के केजरीवाल के खिलाफ मंतर फूंकेगी ... विश्वास नहीं होता तो अपने आस-पास सूंघने की कोशिश कीजिये ... सुलगते गोईठे की खुशबू आ जाएगी ...जो केजरीवाल के लिए किसी मरे मूस की बदबू से कम नहीं है .... जय थाना माता की     

Monday, 13 April 2015

खाँटी मांगे बैगन ... टमाटर तोंद ललचाए

काँग्रेस पार्टी मे अब केवल पार्टी ही हो रही है ...बहुत खाँटी भाई लोग बताते हैं कि बेवजह भी पार्टी भी करनी पड़ती है राजमा-ता के लिए ...भैये चिखना बहुत जरूरी है इसके लिए राजमा से बढ़िया कुछ लगता भी नहीं खाँटी भाई लोगों को ...लेकिन केवल इसी से काम चलेगा जब ये मजबूरी शहजादे पर थोपी गई तो ...बबुआ बहुत लंबी छुट्टी पर भाग गया .... अभी भी भागा ही हुआ है ... एक खाँटी भाई कोंग्रेसी से मैंने इस बारे पूछा तो खाँटी भाई चीखते हुए बोले "...माता की जय हो ...राजमा जिंदाबाद ..." मैंने चुटकी लेते हुए खाँटी भाई से पूछा "...ये आवाज दुनिया के दूसरे छोर पर पहुँचाने का इरादा क्यों है ...?" खाँटी भाई बोले "...पंहुचाने का नहीं संदेश देने का इरादा है ..." मैंने उनसे कहा "...हाँ मैंने भी सुना है विपश्ना में आदमी मोबाईल नहीं रहता ..." खाँटी भाई बोले "...जब संपत्ति खतरे में हो तो विपत्ति में विपश्ना ही याद आती है ..." मैंने गोईठा में घी डालते हुए कहा "...हाँ वो भी थाईलैंड जैसी जगह पर ..." ये सुनते ही खाँटी भाई उखड़ गए "...आपके कहने का क्या मतलब है ...?" मैंने कहा "...काहें गरमाते हैं बीच ब्यूटी पर ऐसी विपश्ना करने का किसी को मौका मिले तो ..." खाँटी भाई और उखड़ गए बोले "...तो का क्या मतलब ..." मैंने भी उसी टोन में उत्तर देते हुए कहा "...तो का मतलब ये कि ऐसे जगह पर किसी को कुछ करने का मौका मिले तो वो लोटा फेंक के विपश्ना करेगा ... घर में लोटने का मन थोड़े न करेगा ..." खाँटी भाई अब पश्चगामी थे बोले "...देखिये आपको गलत सूचना है वो थाईलैंड में नहीं है ..." मैंने तपाक से पलटते हुए पूछ "...तो क्या वो किसानी की सीख रहे हैं ...?" खाँटी भाई को जैसे विकल्प मिल गया आंखो में चमक आ गई बोले "...हाँ हाँ ऐसा ही कुछ है ..." मैंने फिर टांट कसते हुए कहा "...ये तो वही बात हुई मौज मारे गाजी मियां धक्का सहे मुनव्वर ..." खाँटी भाई बेचैन हो गए बोले "..मोदी की लोकप्रियता घट रही है ..." मैंने कहा "...तो काँग्रेस बैगन खा के मोटाएगी या फिर ओवर एज टमाटर से ही काम चलाएगी ...?" खाँटी भाई को समझ में नहीं आया तो मुझसे पूछा "...आपके कहने क्या मतलब ...?" मैंने आराम से कहा "...मोदी के नाम का गुब्बारा फुलाईएगा तो फायदा तो मोदी का ही होगा न ..." खाँटी भाई अनुशासन के डर से मुंह पर हाथ रख के भाग गए....

Wednesday, 1 April 2015

कैसे फूटे अंडा...जब लगे भैंस पुछिन्डा

"...हिम्मत कैसे हुई भैंस को अंडा मारने की...?" भैंस का मालिक चीखा तो अंडा मारने वाले ने माफी मांग ली तो इस पर मालिक शांत होने के बजाय और चीखा बोला "...तेरे माफी क्या मैं क्या करूं...?" अंडा मारने वाले ने कहा "...मेरे माफीनामे को मढ़वा के दीवार पर टांग ले ..."  भैंस वाले को इससे भी संतुष्टि नहीं हुई वो फिर चीखा "...इससे क्या होगा ...?" अंडा मारने वाले भैंस वाले से तपाक से पूछा "...तू क्या होने की उम्मीद करता है ...?" भैंस वाला बोला "...इस भैंस ने बहुत ने त्याग किया है ...?" अंडा मारने वाले ने पूछा "...दूध का ...?" भैंस का मालिक ये सुन के सकपका गया बोला "...नहीं नहीं अपने लोगो का ..." अंडा मारने ने कहा "...इसीलिए मैंने भी अंडे का त्याग कर दिया तेरी भैंस को देख के ..." अंडा मारने ने चुटकी लेते हुए कहा तो भैंस का मालिक बोला "...अबे अंडा मारा भी इतना धीरे कि फूटा ही नहीं ..." अंडा मारने ने कहा "...अब अंडा फोड़ने के लिए पाकिस्तान थोड़े ही न जाऊंगा ..." भैंस के मालिक ने कहा "...वैसे पाकिस्तान विदेश तो है नहीं ...वहाँ भी लोग अपने जैसे ही हैं ..." अंडा मारने वाले ने भैंस मालिक से पूछा "...तो वहाँ से भैंस को अंडा मारने से अंडा फूटता है क्या ..?" भैंस का मालिक बोला "...काफी अंडे हमने वहाँ से फोडवाते हैं ..." अंडा मारने वाले ने ने मालिक से पूछा "...इसके लिए आप अपनी ही भैंस का इस्तेमाल करते हैं या फिर भैंस किराए पर लेते हैं ...?"  भैंस का मालिक उत्तर देते हुए बोला "...दिल्ली में हमारा डब्बा गोल है फिर भी यहाँ के हम हैं राजकुमार ..."  अंडा मारने वाला तंज़ कसते हुए बोला "... इसी लिए भैंसो को चरने के लिए जमीन चाहिए थी और इसीलिए भैंस के पडुओं ने बहुत इधर - उधर मुंह मारा है ..." भैंस का मालिक तैश में आ गया बोला "...देखिये मेरी भैंस को अंडा मारने के बाद आप उल्टे हमारा मज़ाक नहीं बना सकते ..." अंडा मारने वाला बोला "...आज पहली अप्रैल है तो क्या हुआ टोपीबाज तो कोई और बन के दिल्ली से भैंस पर फूल बरसवा रहा है ..." भैंस का मालिक बोला "...ये कमीनापंथी यहा नहीं चलेगी ..." अंडा मारने वाला उससे विनती करते हुए बोला "...यार एक अंडा बनता है तो मज़ाक भी तो बनता है ना ..." भैंस का मालिक बोला "...आपको मेरी भैंस को अंडा मारने से पहले सोचना चाहिए था ..." अंडा मारने वाला बोला "...अंडा फूटा ही नहीं...फिर खेद व्यक्त किया ...ये भैंस की नस्ल पे टिप्पणी है क्या ...?" इस प्रश्न पे भैंस का मालिक चुप हो गया और अपनी भैंस ले के चला गया ....