मुन्ना मुगरी ठेकुआ ...चाभे ममता गब्बर संठ
तरकुल के पेड़ पर चढ़ के भैंस को अंडा मारना मुन्ना हज़ारे के लिए उतना कठिन नहीं रहा ...लोग-बाग बताते हैं कि अब उन्हीं के गाँव में हाथी साईकिल की सवारी करने लगी है। मुन्ना हज़ारे भी कम कमाल के नहीं है एक बार कुत्ता भी शरद ऋतु में तरकुल पर चढ़के लगा भौकने तो लंबा-चौड़ा घोटाला हो गया बड़े-बड़े सूरमा तेल नापने जा चुके हैं। ये वही शरद ऋतु वाला घोटाला है जिसके लिए मुन्ना हजारे ने अपना आपा खो दिया और अपनी अद्भुत ममता बरसाने लगे थे। याद है इसी रामलीला मैदान पर मुन्ना हज़ारे को बड़ी ममता से लोटा ले के मैदान होने आना था लेकिन आईबे नहीं किए थे। एक आपिया उस समय भी चिल्लाया था "...मुन्ना हज़ारे की जय हो ..." तभी गब्बर जरीवाल ने पिस्तौल निकाल के अपने ही कनपटी पर लगा लिया था। भाई उस समय तो स्वक्षता अभियान तो था नहीं फिर पता नहीं क्यों मुन्ना हज़ारे को क्या परेशानी हो गई थी। बाद में उन्हीं मुन्ना हज़ारे ने कोलकाता का रोशो गुल्ला खाने से भी परहेज नहीं किया भले ही ये सुनने में आया था कि हवाई चप्पल बड़ी ममतामयी लगी थी। आजकल आपिए अपनी ललचाई भूरी नजरों से पूरी ताकत से मुन्ना हज़ारे की बाट जोह रहे हैं। एक जमाना था जब मुन्ना हज़ारे ने इसी गब्बर जरीवाल को लालची, ठग, धोखैत, सट्टा का भुख्खड़ और न जाने क्या क्या उल्टा-सीधा कहा था आपिया लोग कापार खजुआते हुए बताते हैं कि वो सब झूठ था। भाई अगर वो सब झूठ था तो अब क्या सब सही हो रहा है ? एक बड़े आपिया बता रहे थे "...ये सब सत्य और ईमानदारी का खेल है ..." मैंने उनसे पूछा "...मुन्ना हजारे उस समय झूठे थे या अब ...?" ये प्रश्न सुनते ही आपिया भड़क गया और गुस्से में बोला "...वो मुन्ना हज़ारे नहीं हैं ..." मैंने भी तैश में बोला "...तो मैं क्या करूँ एमबीबीएस तो गब्बर की ममता ने ही कराया है न ..." आपिया अपना आपा खोने लगा बड़े गुस्से में पूछा "...आपके कहने का क्या मतलब है ..." मैंने उससे समझाते हुए कहा "...भाई देख सट्टा से पैसा पैसा से सट्टा ..." आपिया और भड़क गया बोला "...सट्टा नहीं सत्ता बोलिए ..." मैंने शांति से कहा "...अच्छा भाई सट्टा नहीं सत्ता...ये बोलते हुए किसे नारा खोला था...मैंने नारा बोला है नाड़ा नहीं... समझा ..!." आपिया बोला "...अब इस नारे में कोई दम नहीं ..." मैंने उससे पूछा "...मुन्ना हज़ारे शरद ऋतु के चिट फ़ंड वाला पैसा ..." ये सुनते ही जैसे पगला ही गया और बात कटते हुए बोला "...आपके कहने का मतलब है दिल्ली चुनाव शारदा घोटाले का पैसा लगा है ...?" मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...नहीं मैंने नहीं कहा जैसे मुन्ना हज़ारे को कोलकाता का रोशों गुल्ला बहुत पसंद है ...गब्बर को भी सोन्देश बहुत भाता रहा है ...बस बात इतनी सी है..." आपिया फिर अपने कापार में चारो उंगली लगा के मगन हो गया ...मैंने कहा नमस्कार....
तरकुल के पेड़ पर चढ़ के भैंस को अंडा मारना मुन्ना हज़ारे के लिए उतना कठिन नहीं रहा ...लोग-बाग बताते हैं कि अब उन्हीं के गाँव में हाथी साईकिल की सवारी करने लगी है। मुन्ना हज़ारे भी कम कमाल के नहीं है एक बार कुत्ता भी शरद ऋतु में तरकुल पर चढ़के लगा भौकने तो लंबा-चौड़ा घोटाला हो गया बड़े-बड़े सूरमा तेल नापने जा चुके हैं। ये वही शरद ऋतु वाला घोटाला है जिसके लिए मुन्ना हजारे ने अपना आपा खो दिया और अपनी अद्भुत ममता बरसाने लगे थे। याद है इसी रामलीला मैदान पर मुन्ना हज़ारे को बड़ी ममता से लोटा ले के मैदान होने आना था लेकिन आईबे नहीं किए थे। एक आपिया उस समय भी चिल्लाया था "...मुन्ना हज़ारे की जय हो ..." तभी गब्बर जरीवाल ने पिस्तौल निकाल के अपने ही कनपटी पर लगा लिया था। भाई उस समय तो स्वक्षता अभियान तो था नहीं फिर पता नहीं क्यों मुन्ना हज़ारे को क्या परेशानी हो गई थी। बाद में उन्हीं मुन्ना हज़ारे ने कोलकाता का रोशो गुल्ला खाने से भी परहेज नहीं किया भले ही ये सुनने में आया था कि हवाई चप्पल बड़ी ममतामयी लगी थी। आजकल आपिए अपनी ललचाई भूरी नजरों से पूरी ताकत से मुन्ना हज़ारे की बाट जोह रहे हैं। एक जमाना था जब मुन्ना हज़ारे ने इसी गब्बर जरीवाल को लालची, ठग, धोखैत, सट्टा का भुख्खड़ और न जाने क्या क्या उल्टा-सीधा कहा था आपिया लोग कापार खजुआते हुए बताते हैं कि वो सब झूठ था। भाई अगर वो सब झूठ था तो अब क्या सब सही हो रहा है ? एक बड़े आपिया बता रहे थे "...ये सब सत्य और ईमानदारी का खेल है ..." मैंने उनसे पूछा "...मुन्ना हजारे उस समय झूठे थे या अब ...?" ये प्रश्न सुनते ही आपिया भड़क गया और गुस्से में बोला "...वो मुन्ना हज़ारे नहीं हैं ..." मैंने भी तैश में बोला "...तो मैं क्या करूँ एमबीबीएस तो गब्बर की ममता ने ही कराया है न ..." आपिया अपना आपा खोने लगा बड़े गुस्से में पूछा "...आपके कहने का क्या मतलब है ..." मैंने उससे समझाते हुए कहा "...भाई देख सट्टा से पैसा पैसा से सट्टा ..." आपिया और भड़क गया बोला "...सट्टा नहीं सत्ता बोलिए ..." मैंने शांति से कहा "...अच्छा भाई सट्टा नहीं सत्ता...ये बोलते हुए किसे नारा खोला था...मैंने नारा बोला है नाड़ा नहीं... समझा ..!." आपिया बोला "...अब इस नारे में कोई दम नहीं ..." मैंने उससे पूछा "...मुन्ना हज़ारे शरद ऋतु के चिट फ़ंड वाला पैसा ..." ये सुनते ही जैसे पगला ही गया और बात कटते हुए बोला "...आपके कहने का मतलब है दिल्ली चुनाव शारदा घोटाले का पैसा लगा है ...?" मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...नहीं मैंने नहीं कहा जैसे मुन्ना हज़ारे को कोलकाता का रोशों गुल्ला बहुत पसंद है ...गब्बर को भी सोन्देश बहुत भाता रहा है ...बस बात इतनी सी है..." आपिया फिर अपने कापार में चारो उंगली लगा के मगन हो गया ...मैंने कहा नमस्कार....
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