चौखट जान फंसरी...गाना गए कजरी ????
चलो भाई मान लिया कि केजरीवाल झूठ नहीं बोलते लिहाजा वो जो कुछ भी कहेंगे सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे। उन्होने दिल्ली विधान सभा चुनावों की मतगणना के ठीक पहले ट्वीट किया था "...उनके पास इस बात के सुबूत हैं कि ईवीएम की माइक्रोचिप बदली गई है उनके किसी वालण्टीयर ने भाजपा के वोटों से भरे हुए माइक्रोचिप बदलते हुए किसी व्यक्ति का विडियो बनाया है जो उनके पास है ..." अब केजरीवाल कह रहे हैं तो सच ही होगा उनके पास वो विडियो भी निश्चित रूप से होगा लिहाजा जांच तो हो ही जानी चाहिए जांच इसलिए भी जरूरी है इस सुनामी में भी केजरीवाल की जीत का अंतर बढने के बजाय लगभग पिछले चुनाव जितना ही सामान्य है किसी भी आपिए ने रिकार्ड जीत हासिल नहीं की और न ही किसी भाजपाई की जमानत जब्त हुई है। अबतक का ये इतिहास रहा है कि जब किसी की लहर चलती है उस पार्टी के नेता और कुछ लोग रिकार्ड मतों से जीतते हैं पिछले दिल्ली विधान सभा चुनाव में भी दो रिकार्ड जीत भाजपा विधायकों के ही नाम है लेकिन इस बार किसी भी आपिए ने रिकार्ड जीत हासिल नहीं की है। आप याद कीजिये वीपी सिंह के समय जनता दल लहर में खुद वीपी सिंह और रमविलास पासवान ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल थी। इस बार लोकसभा चुनावों में खुद मोदी जी ने बदोदरा से रिकार्ड जीत हासिल की और वाराणसी से भी उनकी जीत वाराणसी के लिए ऐतिहासिक और सबसे बड़ी जीतों मे से जीत है।
परिणाम तो केजरीवाल की उम्मीद के खिलाफ है ही इसीलिए उन्होने चुनाव जीतते ही कहा था "... हमें बहुत डर लग रहा है..."। सारे एक्ज़िट पोल आपियों को जीता हुआ दिखा रहे थे लेकिन टीवी पर बहसों में आपियों के चेहरे से हवाईया उडी हुई थीं आलम ये था कि चुनाव जीतने के बाद भी एक आपिया नेता से एंकर को कहना पड़ा "...अरे अब तो आप मुस्कुराईए आपने शानदार जीत अर्जित की है ..." ठीक इसके उलट भाजपईयों के चेहरे पर न तो कोई शिकन है और न ही कोई दुख का भाव। तो फिर केजरीवाल और आपिए चुनाव जीतने के बाद भी इतने डरे हुए क्यों हैं ? उसी डर का एक आलम ये भी मनीष सिसोदिया उपमुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं जबकि एक ही पार्टी की सरकार है और प्रचंड बहुमत की सरकार है। ये उपमुख्यमंत्री का पद कब और किसलिए होता है ये सभी को पता है।
क्या दिल्ली में वास्तव में भाजपा इतनी कमजोर है दिल्ली में कि मात्र तीन सीट तक सिमट जाए और किसी की जमानत तक जब्त न हो ? भाजपा की हार में अस्वाभाविक रूप से एकरूपता है जो चुनावी इतिहास में न सिर्फ अनोखा है बल्कि अप्राकृतिक और अस्वाभाविक भी है। वैसे जो भी सरकार केंद्र मे होती आईबी से भी सर्वेक्षण कराती है इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी वीपी सिंह, नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह सभी ने कराया इसी आधार पर प्रियंका गांधी ने लोक सभा चुनावों में ऑफ दी रिकार्ड कहा था कि जमीनी हालत कॉंग्रेस के लिए बहुत बुरे हैं। आईबी का सर्वेक्षण आज तक कभी भी गलत नहीं हुआ है उसे तो ये भी पता होता है कौन किसको वोट देगा या देता है। इस बार आईबी ने साफ कहा था भाजपा 45 सी 50 सीटे मिलेंगी वही आपिए 14 सीट से अधिक नहीं बढ़ पाएंगे हालात ये भी थे कि केजरीवाल और मनीष सीसोदिया तक चुनाव हार रहे थे लेकिन उन्हें भाजपा ने जानबूझ कर जिता दिया। शायद किसी ने गौर किया कि नहीं मतदान केन्द्रों पर भाजपा कार्यकर्ता गए ही नहीं और तो और प्रचंड भाजपा समर्थकों से भी आम आदमी पार्टी को जिताने की अपील की गई जिनहोने बड़ी मुश्किल से माना और बड़े बेमन से आपियों को वोट किया और यही वोटों का अंतर 57 विधान सभा क्षेत्रों में है।
एक महीना पहले बाबी नक़वी का अंतर्राष्ट्रीय अखबार गल्फ न्यूज़ में छपा लेख अपनी जगह है, 2-4 महीने बाद ही केजरीवाल का भ्रष्टाचार के आरोप में क्या होगा तब उनकी जगह उपमुख्यमंत्री मनीष सीसोदिया होंगे वो सब अलग बात है बात यहाँ ये है कि अब केजरीवाल न चाहते हुए भी मोदी विरोधी भ्रष्टचारी क्लब में शामिल हो चुके हैं ममता, लालू, नितीश, मुलायम, मायावती, जयललिता, करुणानिधि, सीपीआई, सीपीएम आदि के साथ हो चुके हैं और उनकी हैसियत अब इंकार करने है ही नहीं क्योंकि इन लोगों ने न सिर्फ मानव संसाधन के रूप मे अपने कार्यकर्ताओं का सहयोग किया बल्कि बहुत बड़ा आर्थिक सहयोग भी दिया है और ऊपर से प्रचड़ जीत लिहाजा केजरीवाल अब कहीं भाग भी नहीं सकते। सारे के सारे भ्रष्टाचारी अब केजरीवाल को आगे रख कर पीछे से राजनीति करेंगे और केजरीवाल कुछ नहीं कर सकते उल्टे केजरीवाल की ईमानदारी के ढोंग का फायदा ये सारे भ्रष्टाचारी खुल के उठाएंगे यही कारण है कि श्री शांति भूषण ने केजरीवाल को बधाई नहीं दी। केजरीवाल ने टिकट भी उन दागी और संभावित दागी लोगों को दिया गया जिन्हें ये भ्रष्टाचारी- मोदी विरोधी चाहते थे। आज केजरीवाल भी गैर भाजपवाद का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
यकीन मानिए केजरीवाल भाग जाना चाहते हैं इसीलिए शपथ ग्रहण से पहले ही वो टकराव का रास्ता अख़्तियार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही धरना-प्रदर्शन की आहटें सुनाई देने लगी हैं। आज प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद केजरीवाल की क्या स्थिति है आप समझ सकते हैं।
चलो भाई मान लिया कि केजरीवाल झूठ नहीं बोलते लिहाजा वो जो कुछ भी कहेंगे सच कहेंगे और सच के सिवा कुछ नहीं कहेंगे। उन्होने दिल्ली विधान सभा चुनावों की मतगणना के ठीक पहले ट्वीट किया था "...उनके पास इस बात के सुबूत हैं कि ईवीएम की माइक्रोचिप बदली गई है उनके किसी वालण्टीयर ने भाजपा के वोटों से भरे हुए माइक्रोचिप बदलते हुए किसी व्यक्ति का विडियो बनाया है जो उनके पास है ..." अब केजरीवाल कह रहे हैं तो सच ही होगा उनके पास वो विडियो भी निश्चित रूप से होगा लिहाजा जांच तो हो ही जानी चाहिए जांच इसलिए भी जरूरी है इस सुनामी में भी केजरीवाल की जीत का अंतर बढने के बजाय लगभग पिछले चुनाव जितना ही सामान्य है किसी भी आपिए ने रिकार्ड जीत हासिल नहीं की और न ही किसी भाजपाई की जमानत जब्त हुई है। अबतक का ये इतिहास रहा है कि जब किसी की लहर चलती है उस पार्टी के नेता और कुछ लोग रिकार्ड मतों से जीतते हैं पिछले दिल्ली विधान सभा चुनाव में भी दो रिकार्ड जीत भाजपा विधायकों के ही नाम है लेकिन इस बार किसी भी आपिए ने रिकार्ड जीत हासिल नहीं की है। आप याद कीजिये वीपी सिंह के समय जनता दल लहर में खुद वीपी सिंह और रमविलास पासवान ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल थी। इस बार लोकसभा चुनावों में खुद मोदी जी ने बदोदरा से रिकार्ड जीत हासिल की और वाराणसी से भी उनकी जीत वाराणसी के लिए ऐतिहासिक और सबसे बड़ी जीतों मे से जीत है।
परिणाम तो केजरीवाल की उम्मीद के खिलाफ है ही इसीलिए उन्होने चुनाव जीतते ही कहा था "... हमें बहुत डर लग रहा है..."। सारे एक्ज़िट पोल आपियों को जीता हुआ दिखा रहे थे लेकिन टीवी पर बहसों में आपियों के चेहरे से हवाईया उडी हुई थीं आलम ये था कि चुनाव जीतने के बाद भी एक आपिया नेता से एंकर को कहना पड़ा "...अरे अब तो आप मुस्कुराईए आपने शानदार जीत अर्जित की है ..." ठीक इसके उलट भाजपईयों के चेहरे पर न तो कोई शिकन है और न ही कोई दुख का भाव। तो फिर केजरीवाल और आपिए चुनाव जीतने के बाद भी इतने डरे हुए क्यों हैं ? उसी डर का एक आलम ये भी मनीष सिसोदिया उपमुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं जबकि एक ही पार्टी की सरकार है और प्रचंड बहुमत की सरकार है। ये उपमुख्यमंत्री का पद कब और किसलिए होता है ये सभी को पता है।
क्या दिल्ली में वास्तव में भाजपा इतनी कमजोर है दिल्ली में कि मात्र तीन सीट तक सिमट जाए और किसी की जमानत तक जब्त न हो ? भाजपा की हार में अस्वाभाविक रूप से एकरूपता है जो चुनावी इतिहास में न सिर्फ अनोखा है बल्कि अप्राकृतिक और अस्वाभाविक भी है। वैसे जो भी सरकार केंद्र मे होती आईबी से भी सर्वेक्षण कराती है इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी वीपी सिंह, नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह सभी ने कराया इसी आधार पर प्रियंका गांधी ने लोक सभा चुनावों में ऑफ दी रिकार्ड कहा था कि जमीनी हालत कॉंग्रेस के लिए बहुत बुरे हैं। आईबी का सर्वेक्षण आज तक कभी भी गलत नहीं हुआ है उसे तो ये भी पता होता है कौन किसको वोट देगा या देता है। इस बार आईबी ने साफ कहा था भाजपा 45 सी 50 सीटे मिलेंगी वही आपिए 14 सीट से अधिक नहीं बढ़ पाएंगे हालात ये भी थे कि केजरीवाल और मनीष सीसोदिया तक चुनाव हार रहे थे लेकिन उन्हें भाजपा ने जानबूझ कर जिता दिया। शायद किसी ने गौर किया कि नहीं मतदान केन्द्रों पर भाजपा कार्यकर्ता गए ही नहीं और तो और प्रचंड भाजपा समर्थकों से भी आम आदमी पार्टी को जिताने की अपील की गई जिनहोने बड़ी मुश्किल से माना और बड़े बेमन से आपियों को वोट किया और यही वोटों का अंतर 57 विधान सभा क्षेत्रों में है।
एक महीना पहले बाबी नक़वी का अंतर्राष्ट्रीय अखबार गल्फ न्यूज़ में छपा लेख अपनी जगह है, 2-4 महीने बाद ही केजरीवाल का भ्रष्टाचार के आरोप में क्या होगा तब उनकी जगह उपमुख्यमंत्री मनीष सीसोदिया होंगे वो सब अलग बात है बात यहाँ ये है कि अब केजरीवाल न चाहते हुए भी मोदी विरोधी भ्रष्टचारी क्लब में शामिल हो चुके हैं ममता, लालू, नितीश, मुलायम, मायावती, जयललिता, करुणानिधि, सीपीआई, सीपीएम आदि के साथ हो चुके हैं और उनकी हैसियत अब इंकार करने है ही नहीं क्योंकि इन लोगों ने न सिर्फ मानव संसाधन के रूप मे अपने कार्यकर्ताओं का सहयोग किया बल्कि बहुत बड़ा आर्थिक सहयोग भी दिया है और ऊपर से प्रचड़ जीत लिहाजा केजरीवाल अब कहीं भाग भी नहीं सकते। सारे के सारे भ्रष्टाचारी अब केजरीवाल को आगे रख कर पीछे से राजनीति करेंगे और केजरीवाल कुछ नहीं कर सकते उल्टे केजरीवाल की ईमानदारी के ढोंग का फायदा ये सारे भ्रष्टाचारी खुल के उठाएंगे यही कारण है कि श्री शांति भूषण ने केजरीवाल को बधाई नहीं दी। केजरीवाल ने टिकट भी उन दागी और संभावित दागी लोगों को दिया गया जिन्हें ये भ्रष्टाचारी- मोदी विरोधी चाहते थे। आज केजरीवाल भी गैर भाजपवाद का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं।
यकीन मानिए केजरीवाल भाग जाना चाहते हैं इसीलिए शपथ ग्रहण से पहले ही वो टकराव का रास्ता अख़्तियार कर रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने से पहले ही धरना-प्रदर्शन की आहटें सुनाई देने लगी हैं। आज प्रधानमंत्री से मुलाक़ात के बाद केजरीवाल की क्या स्थिति है आप समझ सकते हैं।
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