वो कहाँ है ...?
"मेरी तरह" सबसे सटीक विश्लेषण के आधार पर चुनाव का आकलन करने वाली सर्वे एजेंसी "चाणक्य" के सर्वे का कोई आता -पता नहीं इस बार दिल्ली विधान सभा चुनाव में। केवल इसी एजेंसी ने "मेरी तरह" लोकसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया था बाकी किसी ने भी नहीं। आश्चर्य जनक रूप से इस बार न्यूज़ 24 ने "चाणक्य" के बजाय बोगस ISOME की सेवाएँ ली। चाणक्य को छोड़ कर सभी एजेंसियों के सर्वेक्षण वैसे ही होते हैं जैसे कोई सियार शेर को शिकार करने का तरीका बतावे और आला दर्जे की बोगस हैं इसीलिए इनके सर्वेक्षण के सफलता की दर 5% से भी कम है और ये 95% से अधिक बार बिलकुल असफल रही हैं। मैंने नेट पर भी बहुत खोजा लेकिन किसी भी "अनसोशल" मीडिया (प्रेस टीवी रेडियो आदि ) ने चाणक्य की सेवाएँ नहीं लीं जो अपने आप में "अनसोशल मीडिया" की भूमिका पर बहुत बड़ा और गंभीर संदेह उत्पन्न करता है। ये एक ऐसा तथ्य है जिससे ये स्पष्ट होता है "अनसोशल मीडिया " दिल्ली की जनता का दिल्ली की जनता से बहुत बड़ा तथ्य छिपा रही है।
"चाणक्य" के मैदान में न होने से एक तथ्य तो स्पष्ट तौर पर उभरता है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव का सारा खेल किसी खास व्यक्ति के पक्ष में जबरदस्ती करने का प्रयास किया जा रहा है जिसने अपने आप को "नकारा" के खिताब से बचने के लिए "भगोड़ा" का लबादा ओढ़ रखा है। वैसे मेरे अपने आकलन के अनुसार तो "अनसोशल मीडिया" के हिसाब से कोई माहौल दिल्ली में कहीं भी नहीं दिखता और संभवतः आम जनता को भी आश्चर्यचकित है ऐसे "बेहूदे-अवैज्ञानिक-कृत्रिम ओपीनियन पोल" को देख कर।
आप जरा गौर करें -
1 किसी भी सर्वे एजेंसी के पास कुख्यात और विख्यात में अंतर करने के विधि नहीं है या उनके पास ऐसा कोई एक्सपर्ट है ही नहीं।
2 प्रश्नावली भी ऐसी होती है जिसे कक्षा 5 में पढ़ने वाला एक बैक बेंचर छत्र भी बना सकता है बिलकुल बायस्ड और सतही।
3 उत्तरदाता यदि झूठा आंकड़ा दे तो उसका विश्लेषण इनके एक्सपर्ट कर ही नहीं सकते लिहाजा हमेशा ये गलत साबित होते हैं।
"मेरी तरह" सबसे सटीक विश्लेषण के आधार पर चुनाव का आकलन करने वाली सर्वे एजेंसी "चाणक्य" के सर्वे का कोई आता -पता नहीं इस बार दिल्ली विधान सभा चुनाव में। केवल इसी एजेंसी ने "मेरी तरह" लोकसभा चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया था बाकी किसी ने भी नहीं। आश्चर्य जनक रूप से इस बार न्यूज़ 24 ने "चाणक्य" के बजाय बोगस ISOME की सेवाएँ ली। चाणक्य को छोड़ कर सभी एजेंसियों के सर्वेक्षण वैसे ही होते हैं जैसे कोई सियार शेर को शिकार करने का तरीका बतावे और आला दर्जे की बोगस हैं इसीलिए इनके सर्वेक्षण के सफलता की दर 5% से भी कम है और ये 95% से अधिक बार बिलकुल असफल रही हैं। मैंने नेट पर भी बहुत खोजा लेकिन किसी भी "अनसोशल" मीडिया (प्रेस टीवी रेडियो आदि ) ने चाणक्य की सेवाएँ नहीं लीं जो अपने आप में "अनसोशल मीडिया" की भूमिका पर बहुत बड़ा और गंभीर संदेह उत्पन्न करता है। ये एक ऐसा तथ्य है जिससे ये स्पष्ट होता है "अनसोशल मीडिया " दिल्ली की जनता का दिल्ली की जनता से बहुत बड़ा तथ्य छिपा रही है।
"चाणक्य" के मैदान में न होने से एक तथ्य तो स्पष्ट तौर पर उभरता है कि दिल्ली विधान सभा चुनाव का सारा खेल किसी खास व्यक्ति के पक्ष में जबरदस्ती करने का प्रयास किया जा रहा है जिसने अपने आप को "नकारा" के खिताब से बचने के लिए "भगोड़ा" का लबादा ओढ़ रखा है। वैसे मेरे अपने आकलन के अनुसार तो "अनसोशल मीडिया" के हिसाब से कोई माहौल दिल्ली में कहीं भी नहीं दिखता और संभवतः आम जनता को भी आश्चर्यचकित है ऐसे "बेहूदे-अवैज्ञानिक-कृत्रिम ओपीनियन पोल" को देख कर।
आप जरा गौर करें -
1 किसी भी सर्वे एजेंसी के पास कुख्यात और विख्यात में अंतर करने के विधि नहीं है या उनके पास ऐसा कोई एक्सपर्ट है ही नहीं।
2 प्रश्नावली भी ऐसी होती है जिसे कक्षा 5 में पढ़ने वाला एक बैक बेंचर छत्र भी बना सकता है बिलकुल बायस्ड और सतही।
3 उत्तरदाता यदि झूठा आंकड़ा दे तो उसका विश्लेषण इनके एक्सपर्ट कर ही नहीं सकते लिहाजा हमेशा ये गलत साबित होते हैं।
No comments:
Post a Comment