मारे धोईं – धोईं
कविता, रोए घोंघा बसंत...
आलम ये है कि भैंस के खूंटा पर लहसुन उगाने वाले आपिया कवि जी बहुत
रो रहे हैं जयचंद की बड़ी याद आ रही है उनको ठीक वैसे ही जैसे कभी खाँटी भाई
कोंग्रेसी ने अपनी राजमाता के बारे मे बताया था कि वो बहुत रोई थीं किसी
सिक-उल्लू-रिस्ट की मौत पर ...बहुत रोईं माने बहुते रोईं थी ...आज का लहसुन जब
कविता के रूप में फूटता है तो बड़ों-बड़ों की आँखों से सामूहिक आँसू निकल आते हैं
ठीक सिक-उल्लू-रिस्ट की तर्ज पर। एक आपिया बता रहा था "...वो बड़े महान कवि
हैं ..." मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...मैंने तो ट्रेनिंग नहीं दी
..." इस पर आपिया भड़क गया बोला "...वो आपके ट्रेनिंग से कवि नहीं बने
हैं ..." मैंने शांत स्वभाव से उसका उत्तर दिया "...अरे भाई मैंने कब
ऐसा दावा किया...वैसे ..." आपिये ने उसी ऊंची आवाज में पूछा "...वैसे
क्या ...?"
मैंने
भी पिच ऊंचा करते हुए कहा "...मुझे कविता में नहीं व्यंग में मजा आता है
...जो मेरे व्यंग के शीर्षक ही बोल दें वो उनकी पूरी कविता भी कभी नहीं बोल पाएगी
..." मैंने आगे जोड़ते हुए पूछा "...इतना रोआ - रोहट क्यों मचा है आपियों
के बीच ...?"
आपिया
बोला रूआँसा होते बोला "...बीजेपी का ये फ़ाउल प्ले है ..." मैंने पूछा
"...कैसे ...?" आपिये ने पूछा "...मोदी जी ने बेदी जी का जवाब दे
दिया क्या ..." मैंने उत्तर प्रतिप्रश्न किया "...आपके घर में कपड़ा सूखा
नहीं है क्या...?" आपिए को बहुत आश्चर्य हुआ पूछा "...आपको कैसे पता
...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा
"...तुम्हारे मोहल्ले का जयचंद मुझे बता रहा था ..." आपिया ये सुनते ही
भड़क गया बोला "...इसका मोदी जी के उत्तर से क्या संबंध ..." मैंने कहा
"...वही अब तुमको बता के उत्तर तो कोई देगा नहीं ..." आपिया बोला
"...वैसे ..." मैंने बीच में ही उसकी बात को काटते हुए बोला
"...हाँ वैसे भी जयचंदी काव्यपाठ से ही आपिया पार्टी एकजुट है ..."
आपिया और भड़क गया और धम्की देते हुए बोला "...आप अपनी हद में रहिए ..."
मैंने शांति से उत्तर देते हुए ऊंची आवाज में पूछा "...सरहद पर करके आए हो
...?" आपिया बोला "...हम
सबके हको-हाकूक मुदा उठाते हैं ..." मैंने पूछा "..एक खूंटा पर कितना लहसुन उगा सकते हो
..?" आपिया गगरी की कसम खाते हुए बोला “...हम गागर में सागर
ला सकते हैं कसम से...” मैंने कहा “...तब काहें इतना परेशान हो गगरी में छेद हो गया
क्या...” आपिया बोला “...जयचंदों से कोई भी गगरी नहीं बची है ...” मैंने भी टांट कसते
हुए पूछा “...रावण और विभीषण नहीं याद आ रहे हैं तुमको...?” आपिया बोला “...हम ब्राम्हण नहीं
हैं...” मैंने उसके अजीब से उत्तर पर कहा “...जयचंदों के बीच में केजरीवाल कबसे बनिया
हो गए...?” आपिया बोला “...केजरीवाल पर आपत्ति क्यों...?” मैंने कहा “...मांगने का काम तो ब्राम्हणों का है जैसे रावण ने सीता माता
से भिक्षा मांगा था...” आपिए को जवाब देते नहीं बन रहा था तो मैंने कहा “...जैसे भैंस
के पोंछ में कपड़ा नहीं सूखता वैसे जयचंद की याद में आँसू बहाने से भैंस अनशन पर नहीं बैठती...” मैंने आपिए को नमस्कार कहा तो वो अपना कपार खजुआ रहा था।
No comments:
Post a Comment