खुलजी कटहल खोपड़ी, बाजे फटहल ढ़ोल...
20 जनवरी 2015 को मैंने अपना विश्लेषण दिल्ली विधान सभा चुनाव पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसमें केजरीवाल की तानाशाही का कारण और ठीक उनके कारण निरंतर आम आदमी पार्टी का होते नुकसान का स्पष्ट कारण बताया। जिसका नतीजा हुआ श्री शांति भूषण और प्रशांत भूषण दोनों ने केजरीवाल के खिलाफ मोर्च खोल दिया जिसे दबाने के लिए केजरीवाल ऊटपटाँग बयानबाजी पर उतारू हो गए हैं। खैर मेरे अनुसार तो उनकी हार तो एक तरह से निश्चित ही है भले ही "अनसोशल मीडिया (टीवी, प्रेस)" उनको जीता हुआ दिखा रहा हो।
मेरे उक्त पोस्ट के बाद "अनसोशल मीडिया" में अजीब सी बेचैनी है। अचानक बेचैनी बढ़ने का कारण मेरा निष्कर्ष जिसमे मैंने स्पष्ट कहा था कि कॉंग्रेस आम आदमी को पछाड़ते हुए भाजपा (45 से 55 सीटें) के बाद दूसरे नंबर पर भी आ सकती है और मजे की बात ये है कि राहुल गांधी रोड शो में भीड़ देखने लायक थी केजरीवाल पर्चा दाखिला वाले शो से ज्यादा लोग राहुल गांधी के रोड शो मे थे।
शाजी जमान ने आनन-फानन में एक फर्जी सर्वे रिपोर्ट 27 जनवरी को अपने चैनल पर दिखा दिया जिसे मात्र दो दिनो में ही तैयार किया गया था। मैं भी रिसर्चर हूँ और मुझे पता है कि प्रश्नावली ही तैयार करने में ही 3 से 5 दिनो का समय लग जाता है, फिर उसे बांटना, इकट्ठा करना, छांटना और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना पूरे "एक सप्ताह" का बेहद गंभीर काम है यदि इमानदारी से करें तो। मजे की बात इसमे ये है कि केजरीवाल को सबसे लोकप्रिय नेता करार दे दिया गया जबकि वास्तविकता ये है माकन, केजरीवाल और बेदी की लोकप्रियता क्रमशः 9%, 20% और 65% के आस पास है। शाजी जमान का सर्वे में मुस्लिम बाहुल्य मतों पर आधारित था, आय वर्ग स्पष्ट तौर पर वर्गीकृत था और यादृच्छिक निदर्शन नहीं था और फिर मात्र 2100 लोगों पर ही था मतलब एक मतदान केंद्र के क्षेत्र से एक भी निदर्शन नहीं। शाजी जमान का ये हास्यास्पद सर्वे उनके चैनलों से प्रतिदिन एसएमएस पोल से भी मेल नहीं खाता। ये वो बातें हैं जो जन-क्षेत्र में हैं ...भीतर क्या है केजरीवाल और उनके भक्त ही जाने।
रही-सही कसर आज दीपक चौरसिया ने पूरी कर दी। मामले को ही टांय-टांय फिस्स कर दिया। फैसला सुना दिया गया कि मैच टाई हो रहा है। चौरसिया जी ने तो ये भी नहीं बताया कि उनके सर्वे का आधार क्या था कैसे किया गया सिवाय इसके कि 30000 लोगों पर और सभी 70 सीटों पर किया गया।
मेरा अपना विशुद्ध वैज्ञानिक आकलन ये भी है कि हो सकता है दिल्ली विधान सभा चुनावों में भी उत्तर प्रदेश लोकसभा का परिणाम दोहरा दिया जाए। केजरीवाल की अपनी सीट भी आसान नहीं है वो हार भी सकते हैं ...उस क्षेत्र के किसी भी 15-20 मशहूर चाय की दुकान पर चर्चा से इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।
20 जनवरी 2015 को मैंने अपना विश्लेषण दिल्ली विधान सभा चुनाव पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसमें केजरीवाल की तानाशाही का कारण और ठीक उनके कारण निरंतर आम आदमी पार्टी का होते नुकसान का स्पष्ट कारण बताया। जिसका नतीजा हुआ श्री शांति भूषण और प्रशांत भूषण दोनों ने केजरीवाल के खिलाफ मोर्च खोल दिया जिसे दबाने के लिए केजरीवाल ऊटपटाँग बयानबाजी पर उतारू हो गए हैं। खैर मेरे अनुसार तो उनकी हार तो एक तरह से निश्चित ही है भले ही "अनसोशल मीडिया (टीवी, प्रेस)" उनको जीता हुआ दिखा रहा हो।
मेरे उक्त पोस्ट के बाद "अनसोशल मीडिया" में अजीब सी बेचैनी है। अचानक बेचैनी बढ़ने का कारण मेरा निष्कर्ष जिसमे मैंने स्पष्ट कहा था कि कॉंग्रेस आम आदमी को पछाड़ते हुए भाजपा (45 से 55 सीटें) के बाद दूसरे नंबर पर भी आ सकती है और मजे की बात ये है कि राहुल गांधी रोड शो में भीड़ देखने लायक थी केजरीवाल पर्चा दाखिला वाले शो से ज्यादा लोग राहुल गांधी के रोड शो मे थे।
शाजी जमान ने आनन-फानन में एक फर्जी सर्वे रिपोर्ट 27 जनवरी को अपने चैनल पर दिखा दिया जिसे मात्र दो दिनो में ही तैयार किया गया था। मैं भी रिसर्चर हूँ और मुझे पता है कि प्रश्नावली ही तैयार करने में ही 3 से 5 दिनो का समय लग जाता है, फिर उसे बांटना, इकट्ठा करना, छांटना और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना पूरे "एक सप्ताह" का बेहद गंभीर काम है यदि इमानदारी से करें तो। मजे की बात इसमे ये है कि केजरीवाल को सबसे लोकप्रिय नेता करार दे दिया गया जबकि वास्तविकता ये है माकन, केजरीवाल और बेदी की लोकप्रियता क्रमशः 9%, 20% और 65% के आस पास है। शाजी जमान का सर्वे में मुस्लिम बाहुल्य मतों पर आधारित था, आय वर्ग स्पष्ट तौर पर वर्गीकृत था और यादृच्छिक निदर्शन नहीं था और फिर मात्र 2100 लोगों पर ही था मतलब एक मतदान केंद्र के क्षेत्र से एक भी निदर्शन नहीं। शाजी जमान का ये हास्यास्पद सर्वे उनके चैनलों से प्रतिदिन एसएमएस पोल से भी मेल नहीं खाता। ये वो बातें हैं जो जन-क्षेत्र में हैं ...भीतर क्या है केजरीवाल और उनके भक्त ही जाने।
रही-सही कसर आज दीपक चौरसिया ने पूरी कर दी। मामले को ही टांय-टांय फिस्स कर दिया। फैसला सुना दिया गया कि मैच टाई हो रहा है। चौरसिया जी ने तो ये भी नहीं बताया कि उनके सर्वे का आधार क्या था कैसे किया गया सिवाय इसके कि 30000 लोगों पर और सभी 70 सीटों पर किया गया।
मेरा अपना विशुद्ध वैज्ञानिक आकलन ये भी है कि हो सकता है दिल्ली विधान सभा चुनावों में भी उत्तर प्रदेश लोकसभा का परिणाम दोहरा दिया जाए। केजरीवाल की अपनी सीट भी आसान नहीं है वो हार भी सकते हैं ...उस क्षेत्र के किसी भी 15-20 मशहूर चाय की दुकान पर चर्चा से इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।
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