दिल्ली विधान सभा चुनाव की वस्तुस्थिति
अनसोशल मीडिया (प्रेस - टीवी आदि ) दिखा रहा है कि भाजपा बढ़त पर है लेकिन अस्वाभाविक रूप से दिल्ली के मुख्यमंत्री के लिए केजरीवाल अभी भी लोकप्रिय नेता बने हुए हैं तो तीन सवाल उठते है -
1 केजरीवाल का वजूद किससे है ?
2 उनका प्रभाव उनकी पार्टी पर नहीं है या
3 फिर वो किन्हीं अन्य कारणों से लोकप्रिय हैं
यदि अनसोशल मीडिया सही है तो वजूद का प्रश्न तो बाद में आएगा बाकी दोनों प्रश्न न सिर्फ इस मायने में बेहद गंभीर है कि क्या केजरीवाल की राजनीति निजी तौर पर सिर्फ उनके अपने लिए है पार्टी के लिए नहीं यदि ऐसा है तो जो व्यक्ति सर्वेसर्वा होकर भी पार्टी के लिए कुछ नहीं कर पा रहा है वो दिल्ली या किसी भी समाज के लिए क्या करेगा ? दूसरे यदि वो अन्य कारणों से मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय हैं जो कि स्पष्ट नहीं है तो फिर उन्हीं संदर्भों में केजरीवाल की प्रतिभा यानी लोकप्रियता का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि सीधा अर्थ है वह जिसके कारण एक जनसमूह जो केजरीवाल का समर्थक है का कहीं से भी भला नहीं हो रहा या ऐसा संदेश नहीं जा रहा है कि पार्टी की लोकप्रियता बढ़े। अब वजूद का सवाल उनकी लोकप्रियता ये दर्शाती है कि उनका वजूद उनकी पार्टी से नहीं बल्कि खुद से है जाहिर है वो पार्टी के हिसाब से लोकतांत्रिक तरीके से क्यों चलेंगे ? कहीं यही कारण तो नहीं उनके सभी करीबी बारी - बारी से उनका साथ छोड़ रहे हैं ? यदि अनसोशल मीडिया सही है तो फिर केजरीवाल की लोकप्रियता बेहद गंभीर सवाल इसलिए खड़े करता है क्योंकि ये स्पष्ट रूप से "तानशाही" का रास्ता है।
सर्वप्रथम 28-31 मई 2013 (किसी भी मीडिया पर सोशल और अनसोशल दोनों ) मैंने जब लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही अनसोशल मीडिया की धारा के विपरीत ये बताया था कि भाजपा को 280 से 320 सीटें मिल रही हैं और कॉंग्रेस 33 के आस - पास रहने की उम्मीद है उस एक वर्ष के दौरान मेंने दर्जनों बार अपने आकलन को दोहराया भी जो बिलकुल सटीक था। (मेरे वाल से इसकी पुष्टि की जा सकती है )
दिल्ली के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली की जनता
1 नवीनता प्रेमी है लिहाजा नवीनता पहली शर्त है अन्ना का आंदोलन इसीलिए दिल्ली में सफल रहा जबकि मुंबई में असफल अन्ना के मराठी होने के बावजूद
2 जीवन संघर्ष भारत के अन्य स्थानो की तुलना में दिल्ली में बहुत अधिक है लिहाजा थोड़ी भी अनिश्चितता खतरनाक हो सकती है इसी का नाजायज फायदा केजरीवाल जैसे लोग उठा रहे हैं और बिना किसी नीति के भी कुछ हद तक सफल रहे। और इसीलिए भाजपा ने किरण बेदी को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार प्रस्तुत किया।
3 जीवन संघर्ष बहुत अधिक होने के कारण एक सामाजिक भय भी व्याप्त है जिससे दिल्ली की जनता अन्य जगहों की जनता की तुलना में बहुत अधिक प्रतिक्रियावादी और निश्चित समय तक ट्रेंड का अनुसरण करने वाली है यही कारण भ्रष्ट होने के बावजूद काँग्रेस ने 15 साल राज किया और भाजपा समग्र नीति के आधार पर नहीं बल्कि केवल और केवल प्याज के मुद्दे पर सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल के चिंता यही है कि इसबार वो सत्ता में नहीं आए तो उनका वजूद निश्चित रूप से समाप्त ये तय है।
ये तीन सामाजिक कारक ऐसे हैं जो दिल्ली का चुनाव बाकी अन्य जगहों से बिलकुल अलग तरह का बना देते हैं लेकिन आकर्षण, तात्कालिकता, संवेग (सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ), और सीमाकारी घटक । किरण बेदी के संदर्भ में नवीनता के कारण उत्पन्न आकर्षण जिसके संवेग की दर किसी भी अन्य की तुलना में सबसे तेज है जिसे हम देख सकते हैं सोशल और अनसोशल मीडिया दोनों पर यद्यपि सोशल मीडिया से काफी स्पष्ट होता है इसमे तात्कालिकता का अतिरिक्त प्रभाव भी है। इसका सकारात्मक संवेग तात्कालिक तौर पर तो बढ्ने वाली ही है जो केजरीवाल के लिए नकारात्मक ही साबित होगी क्यों जनता तो सीमित है अब सवाल ये है कि ये नकारात्मक संवेग केजरीवाल को कितना नुकसान पहुंचा सकता है तो इसका उत्तर ये है कि यदि वो वोट बैंक जो कॉंग्रेस से छिटक कर केजरीवाल के पाले में चला गया है उसे यदि लग गया कि केजरीवाल जीत नहीं रहे हैं तो ? आप खुद विचार कर सकते हैं। और फिर मायावती भी मैदान में हैं उनका भी असर तो दिखेगा। तो केजरीवाल के लिए सीमाकारी घटकों की संख्या बहुत अधिक बनती दिख रही है जो उनके नकारात्मक संवेग को बहुत बढ़ा देने का माद्दा रखते हैं। जिसका सीधा परिणाम भाजपा के पक्ष में एक तरफा चुनाव होने का स्पष्ट संकेत कर रहे हैं। वेग और संवेग का दर अगर क्रमशः 2% और 4% प्रतिदिन का भी रहा सामान्य से बहुत कम है तो भी भाजपा को दिल्ली विधान सभा चुनावों में 45 से 55 सीटें आसानी से मिलती दिख रही हैं कॉंग्रेस और आम आदमी पार्टी या तो बराबर रहेंगे या फिर बहुत कम अंतर से कॉंग्रेस नंबर दो पर भी आ सकती है। एकतरफा चुनाव तो दिलचस्प नहीं होता लेकिन आश्चर्यजंनक और दिलचस्प चुनाव परिणाम के लिए जरूर तैयार रहिये....
अनसोशल मीडिया (प्रेस - टीवी आदि ) दिखा रहा है कि भाजपा बढ़त पर है लेकिन अस्वाभाविक रूप से दिल्ली के मुख्यमंत्री के लिए केजरीवाल अभी भी लोकप्रिय नेता बने हुए हैं तो तीन सवाल उठते है -
1 केजरीवाल का वजूद किससे है ?
2 उनका प्रभाव उनकी पार्टी पर नहीं है या
3 फिर वो किन्हीं अन्य कारणों से लोकप्रिय हैं
यदि अनसोशल मीडिया सही है तो वजूद का प्रश्न तो बाद में आएगा बाकी दोनों प्रश्न न सिर्फ इस मायने में बेहद गंभीर है कि क्या केजरीवाल की राजनीति निजी तौर पर सिर्फ उनके अपने लिए है पार्टी के लिए नहीं यदि ऐसा है तो जो व्यक्ति सर्वेसर्वा होकर भी पार्टी के लिए कुछ नहीं कर पा रहा है वो दिल्ली या किसी भी समाज के लिए क्या करेगा ? दूसरे यदि वो अन्य कारणों से मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय हैं जो कि स्पष्ट नहीं है तो फिर उन्हीं संदर्भों में केजरीवाल की प्रतिभा यानी लोकप्रियता का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि सीधा अर्थ है वह जिसके कारण एक जनसमूह जो केजरीवाल का समर्थक है का कहीं से भी भला नहीं हो रहा या ऐसा संदेश नहीं जा रहा है कि पार्टी की लोकप्रियता बढ़े। अब वजूद का सवाल उनकी लोकप्रियता ये दर्शाती है कि उनका वजूद उनकी पार्टी से नहीं बल्कि खुद से है जाहिर है वो पार्टी के हिसाब से लोकतांत्रिक तरीके से क्यों चलेंगे ? कहीं यही कारण तो नहीं उनके सभी करीबी बारी - बारी से उनका साथ छोड़ रहे हैं ? यदि अनसोशल मीडिया सही है तो फिर केजरीवाल की लोकप्रियता बेहद गंभीर सवाल इसलिए खड़े करता है क्योंकि ये स्पष्ट रूप से "तानशाही" का रास्ता है।
सर्वप्रथम 28-31 मई 2013 (किसी भी मीडिया पर सोशल और अनसोशल दोनों ) मैंने जब लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही अनसोशल मीडिया की धारा के विपरीत ये बताया था कि भाजपा को 280 से 320 सीटें मिल रही हैं और कॉंग्रेस 33 के आस - पास रहने की उम्मीद है उस एक वर्ष के दौरान मेंने दर्जनों बार अपने आकलन को दोहराया भी जो बिलकुल सटीक था। (मेरे वाल से इसकी पुष्टि की जा सकती है )
दिल्ली के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली की जनता
1 नवीनता प्रेमी है लिहाजा नवीनता पहली शर्त है अन्ना का आंदोलन इसीलिए दिल्ली में सफल रहा जबकि मुंबई में असफल अन्ना के मराठी होने के बावजूद
2 जीवन संघर्ष भारत के अन्य स्थानो की तुलना में दिल्ली में बहुत अधिक है लिहाजा थोड़ी भी अनिश्चितता खतरनाक हो सकती है इसी का नाजायज फायदा केजरीवाल जैसे लोग उठा रहे हैं और बिना किसी नीति के भी कुछ हद तक सफल रहे। और इसीलिए भाजपा ने किरण बेदी को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार प्रस्तुत किया।
3 जीवन संघर्ष बहुत अधिक होने के कारण एक सामाजिक भय भी व्याप्त है जिससे दिल्ली की जनता अन्य जगहों की जनता की तुलना में बहुत अधिक प्रतिक्रियावादी और निश्चित समय तक ट्रेंड का अनुसरण करने वाली है यही कारण भ्रष्ट होने के बावजूद काँग्रेस ने 15 साल राज किया और भाजपा समग्र नीति के आधार पर नहीं बल्कि केवल और केवल प्याज के मुद्दे पर सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल के चिंता यही है कि इसबार वो सत्ता में नहीं आए तो उनका वजूद निश्चित रूप से समाप्त ये तय है।
ये तीन सामाजिक कारक ऐसे हैं जो दिल्ली का चुनाव बाकी अन्य जगहों से बिलकुल अलग तरह का बना देते हैं लेकिन आकर्षण, तात्कालिकता, संवेग (सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ), और सीमाकारी घटक । किरण बेदी के संदर्भ में नवीनता के कारण उत्पन्न आकर्षण जिसके संवेग की दर किसी भी अन्य की तुलना में सबसे तेज है जिसे हम देख सकते हैं सोशल और अनसोशल मीडिया दोनों पर यद्यपि सोशल मीडिया से काफी स्पष्ट होता है इसमे तात्कालिकता का अतिरिक्त प्रभाव भी है। इसका सकारात्मक संवेग तात्कालिक तौर पर तो बढ्ने वाली ही है जो केजरीवाल के लिए नकारात्मक ही साबित होगी क्यों जनता तो सीमित है अब सवाल ये है कि ये नकारात्मक संवेग केजरीवाल को कितना नुकसान पहुंचा सकता है तो इसका उत्तर ये है कि यदि वो वोट बैंक जो कॉंग्रेस से छिटक कर केजरीवाल के पाले में चला गया है उसे यदि लग गया कि केजरीवाल जीत नहीं रहे हैं तो ? आप खुद विचार कर सकते हैं। और फिर मायावती भी मैदान में हैं उनका भी असर तो दिखेगा। तो केजरीवाल के लिए सीमाकारी घटकों की संख्या बहुत अधिक बनती दिख रही है जो उनके नकारात्मक संवेग को बहुत बढ़ा देने का माद्दा रखते हैं। जिसका सीधा परिणाम भाजपा के पक्ष में एक तरफा चुनाव होने का स्पष्ट संकेत कर रहे हैं। वेग और संवेग का दर अगर क्रमशः 2% और 4% प्रतिदिन का भी रहा सामान्य से बहुत कम है तो भी भाजपा को दिल्ली विधान सभा चुनावों में 45 से 55 सीटें आसानी से मिलती दिख रही हैं कॉंग्रेस और आम आदमी पार्टी या तो बराबर रहेंगे या फिर बहुत कम अंतर से कॉंग्रेस नंबर दो पर भी आ सकती है। एकतरफा चुनाव तो दिलचस्प नहीं होता लेकिन आश्चर्यजंनक और दिलचस्प चुनाव परिणाम के लिए जरूर तैयार रहिये....
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