Wednesday, 28 January 2015

खुलजी कटहल खोपड़ी, बाजे फटहल ढ़ोल...

20 जनवरी 2015 को मैंने अपना विश्लेषण दिल्ली विधान सभा चुनाव पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया जिसमें केजरीवाल की तानाशाही का कारण और ठीक उनके कारण निरंतर आम आदमी पार्टी का होते नुकसान का स्पष्ट कारण बताया। जिसका नतीजा हुआ श्री शांति भूषण और प्रशांत भूषण दोनों ने केजरीवाल के खिलाफ मोर्च खोल दिया जिसे दबाने के लिए केजरीवाल ऊटपटाँग बयानबाजी पर उतारू हो गए हैं। खैर मेरे अनुसार तो उनकी हार तो एक तरह से निश्चित ही है भले ही "अनसोशल मीडिया (टीवी, प्रेस)" उनको जीता हुआ दिखा रहा हो।

मेरे उक्त पोस्ट के बाद "अनसोशल मीडिया" में अजीब सी बेचैनी है। अचानक बेचैनी बढ़ने का कारण मेरा निष्कर्ष जिसमे मैंने स्पष्ट कहा था कि कॉंग्रेस आम आदमी को पछाड़ते हुए भाजपा (45 से 55 सीटें) के बाद दूसरे नंबर पर भी आ सकती है और मजे की बात ये है कि राहुल गांधी रोड शो में भीड़ देखने लायक थी केजरीवाल पर्चा दाखिला वाले शो से ज्यादा लोग राहुल गांधी के रोड शो मे थे।

शाजी जमान ने आनन-फानन में एक फर्जी सर्वे रिपोर्ट 27 जनवरी को अपने चैनल पर दिखा दिया जिसे मात्र दो दिनो में ही तैयार किया गया था। मैं भी रिसर्चर हूँ और मुझे पता है कि प्रश्नावली ही तैयार करने में ही 3 से 5 दिनो का समय लग जाता है, फिर उसे बांटना, इकट्ठा करना, छांटना और विश्लेषण करके निष्कर्ष निकालना पूरे "एक सप्ताह" का बेहद गंभीर काम है यदि इमानदारी से करें तो। मजे की बात इसमे ये है कि केजरीवाल को सबसे लोकप्रिय नेता करार दे दिया गया जबकि वास्तविकता ये है माकन, केजरीवाल और बेदी की लोकप्रियता क्रमशः 9%, 20% और 65% के आस पास है।  शाजी जमान का सर्वे में मुस्लिम बाहुल्य मतों पर आधारित था, आय वर्ग स्पष्ट तौर पर वर्गीकृत था और यादृच्छिक  निदर्शन नहीं था और फिर मात्र 2100 लोगों पर ही था मतलब एक मतदान केंद्र के क्षेत्र से एक भी निदर्शन नहीं। शाजी जमान का ये हास्यास्पद सर्वे उनके चैनलों से प्रतिदिन एसएमएस पोल से भी मेल नहीं खाता। ये वो बातें हैं जो जन-क्षेत्र में हैं ...भीतर क्या है केजरीवाल और उनके भक्त ही जाने।

रही-सही कसर आज दीपक चौरसिया ने पूरी कर दी। मामले को ही टांय-टांय फिस्स कर दिया। फैसला सुना दिया गया कि मैच टाई हो रहा है। चौरसिया जी ने तो ये भी नहीं बताया कि उनके सर्वे का आधार क्या था कैसे किया गया सिवाय इसके कि 30000 लोगों पर और सभी 70 सीटों पर किया गया।

मेरा अपना विशुद्ध वैज्ञानिक आकलन ये भी है कि हो सकता है दिल्ली विधान सभा चुनावों में भी उत्तर प्रदेश लोकसभा का परिणाम दोहरा दिया जाए। केजरीवाल की अपनी सीट भी आसान नहीं है वो हार भी सकते हैं ...उस क्षेत्र के किसी भी 15-20 मशहूर चाय की दुकान पर चर्चा से इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है।      

Monday, 19 January 2015

दिल्ली विधान सभा चुनाव की वस्तुस्थिति

अनसोशल मीडिया (प्रेस - टीवी आदि ) दिखा रहा है कि भाजपा बढ़त पर है लेकिन अस्वाभाविक रूप से  दिल्ली के मुख्यमंत्री के लिए केजरीवाल अभी भी लोकप्रिय नेता बने हुए हैं तो तीन सवाल उठते है -
1 केजरीवाल का वजूद किससे है ?
2 उनका प्रभाव उनकी पार्टी पर नहीं है या
3 फिर वो किन्हीं अन्य कारणों से लोकप्रिय हैं
यदि अनसोशल मीडिया सही है तो वजूद का प्रश्न तो बाद में आएगा बाकी दोनों प्रश्न न सिर्फ इस मायने में बेहद गंभीर है कि क्या केजरीवाल की राजनीति निजी तौर पर सिर्फ उनके अपने लिए है पार्टी के लिए नहीं यदि ऐसा है तो जो व्यक्ति सर्वेसर्वा होकर भी पार्टी के लिए कुछ नहीं कर पा रहा है वो दिल्ली या किसी भी समाज के लिए क्या करेगा ? दूसरे यदि वो अन्य कारणों से मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे लोकप्रिय हैं जो कि स्पष्ट नहीं है तो फिर उन्हीं संदर्भों में केजरीवाल की प्रतिभा यानी लोकप्रियता का इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि सीधा अर्थ है वह जिसके कारण एक जनसमूह जो केजरीवाल का समर्थक है का कहीं से भी भला नहीं हो रहा या ऐसा संदेश नहीं जा रहा है कि पार्टी की लोकप्रियता बढ़े। अब वजूद का सवाल उनकी लोकप्रियता ये दर्शाती है कि उनका वजूद उनकी पार्टी से नहीं बल्कि खुद से है जाहिर है वो पार्टी के हिसाब से लोकतांत्रिक तरीके से क्यों चलेंगे ? कहीं यही कारण तो नहीं उनके सभी करीबी बारी - बारी से उनका साथ छोड़ रहे हैं ? यदि अनसोशल मीडिया सही है तो फिर केजरीवाल की लोकप्रियता बेहद गंभीर सवाल इसलिए खड़े करता है क्योंकि ये स्पष्ट रूप से "तानशाही" का रास्ता है।

सर्वप्रथम 28-31 मई 2013 (किसी भी मीडिया पर सोशल और अनसोशल दोनों ) मैंने जब लोकसभा चुनाव से एक साल पहले ही अनसोशल मीडिया की धारा के विपरीत ये बताया था कि भाजपा को 280 से 320 सीटें मिल रही हैं और कॉंग्रेस 33 के आस - पास रहने की उम्मीद है उस एक वर्ष के दौरान मेंने दर्जनों बार अपने आकलन को दोहराया भी जो बिलकुल सटीक था। (मेरे वाल से इसकी पुष्टि की जा सकती है )

दिल्ली के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली की जनता
1 नवीनता प्रेमी है लिहाजा नवीनता पहली शर्त है अन्ना का आंदोलन इसीलिए दिल्ली में सफल रहा जबकि मुंबई में असफल अन्ना के मराठी होने के बावजूद

2 जीवन संघर्ष भारत के अन्य स्थानो की तुलना में दिल्ली में बहुत अधिक है लिहाजा थोड़ी भी अनिश्चितता खतरनाक हो सकती है इसी का नाजायज फायदा केजरीवाल जैसे लोग उठा रहे हैं और बिना किसी नीति के भी कुछ हद तक सफल रहे। और इसीलिए भाजपा ने किरण बेदी को अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार प्रस्तुत किया।
 
3 जीवन संघर्ष बहुत अधिक होने के कारण एक सामाजिक भय भी व्याप्त है जिससे दिल्ली की जनता अन्य जगहों की जनता की तुलना में बहुत अधिक प्रतिक्रियावादी और निश्चित समय तक ट्रेंड का अनुसरण करने वाली है यही कारण भ्रष्ट होने के बावजूद काँग्रेस ने 15 साल राज किया और भाजपा समग्र नीति के आधार पर नहीं बल्कि केवल और केवल प्याज के मुद्दे पर सत्ता से बाहर हो गई थी। केजरीवाल के चिंता यही है कि इसबार वो सत्ता में नहीं आए तो उनका वजूद निश्चित रूप से समाप्त ये तय है।

ये तीन सामाजिक कारक ऐसे हैं जो दिल्ली का चुनाव बाकी अन्य जगहों से बिलकुल अलग तरह का बना देते हैं लेकिन आकर्षण, तात्कालिकता, संवेग (सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ), और सीमाकारी घटक । किरण बेदी के संदर्भ में नवीनता के कारण उत्पन्न आकर्षण जिसके संवेग की दर किसी भी अन्य की तुलना में सबसे तेज है जिसे हम देख सकते हैं सोशल और अनसोशल मीडिया दोनों पर यद्यपि सोशल मीडिया से काफी स्पष्ट होता है इसमे तात्कालिकता का अतिरिक्त प्रभाव भी है। इसका सकारात्मक संवेग तात्कालिक तौर पर तो बढ्ने वाली ही है जो केजरीवाल के लिए नकारात्मक ही साबित होगी क्यों जनता तो सीमित है अब सवाल ये है कि ये नकारात्मक संवेग केजरीवाल को कितना नुकसान पहुंचा सकता है तो इसका उत्तर ये है कि यदि वो वोट बैंक जो कॉंग्रेस से छिटक कर केजरीवाल के पाले में चला गया है उसे यदि लग गया कि केजरीवाल जीत नहीं रहे हैं तो ? आप खुद विचार कर सकते हैं। और फिर मायावती भी मैदान में हैं उनका भी असर तो दिखेगा। तो केजरीवाल के लिए सीमाकारी घटकों की संख्या बहुत अधिक बनती दिख रही है जो उनके नकारात्मक संवेग को बहुत बढ़ा देने का माद्दा रखते हैं। जिसका सीधा परिणाम भाजपा के पक्ष में एक तरफा चुनाव होने का स्पष्ट संकेत कर रहे हैं। वेग और संवेग का दर अगर क्रमशः 2% और 4% प्रतिदिन का भी रहा सामान्य से बहुत कम है तो भी भाजपा को दिल्ली विधान सभा चुनावों में 45 से 55 सीटें आसानी से मिलती दिख रही हैं कॉंग्रेस और आम आदमी पार्टी या तो बराबर रहेंगे या फिर बहुत कम अंतर से कॉंग्रेस नंबर दो पर भी आ सकती है। एकतरफा चुनाव तो दिलचस्प नहीं होता लेकिन आश्चर्यजंनक और दिलचस्प चुनाव परिणाम के लिए जरूर तैयार रहिये....  

Friday, 16 January 2015

मारे धोईं – धोईं कविता, रोए घोंघा बसंत...


आलम ये है कि भैंस के खूंटा पर लहसुन उगाने वाले आपिया कवि जी बहुत रो रहे हैं जयचंद की बड़ी याद आ रही है उनको ठीक वैसे ही जैसे कभी खाँटी भाई कोंग्रेसी ने अपनी राजमाता के बारे मे बताया था कि वो बहुत रोई थीं किसी सिक-उल्लू-रिस्ट की मौत पर ...बहुत रोईं माने बहुते रोईं थी ...आज का लहसुन जब कविता के रूप में फूटता है तो बड़ों-बड़ों की आँखों से सामूहिक आँसू निकल आते हैं ठीक सिक-उल्लू-रिस्ट की तर्ज पर। एक आपिया बता रहा था "...वो बड़े महान कवि हैं ..." मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...मैंने तो ट्रेनिंग नहीं दी ..." इस पर आपिया भड़क गया बोला "...वो आपके ट्रेनिंग से कवि नहीं बने हैं ..." मैंने शांत स्वभाव से उसका उत्तर दिया "...अरे भाई मैंने कब ऐसा दावा किया...वैसे ..." आपिये ने उसी ऊंची आवाज में पूछा "...वैसे क्या ...?" मैंने भी पिच ऊंचा करते हुए कहा "...मुझे कविता में नहीं व्यंग में मजा आता है ...जो मेरे व्यंग के शीर्षक ही बोल दें वो उनकी पूरी कविता भी कभी नहीं बोल पाएगी ..." मैंने आगे जोड़ते हुए पूछा "...इतना रोआ - रोहट क्यों मचा है आपियों के बीच ...?" आपिया बोला रूआँसा होते बोला "...बीजेपी का ये फ़ाउल प्ले है ..." मैंने पूछा "...कैसे ...?" आपिये ने पूछा "...मोदी जी ने बेदी जी का जवाब दे दिया क्या ..." मैंने उत्तर प्रतिप्रश्न किया "...आपके घर में कपड़ा सूखा नहीं है क्या...?" आपिए को बहुत आश्चर्य हुआ पूछा "...आपको कैसे पता ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...तुम्हारे मोहल्ले का जयचंद मुझे बता रहा था ..." आपिया ये सुनते ही भड़क गया बोला "...इसका मोदी जी के उत्तर से क्या संबंध ..." मैंने कहा "...वही अब तुमको बता के उत्तर तो कोई देगा नहीं ..." आपिया बोला "...वैसे ..." मैंने बीच में ही उसकी बात को काटते हुए बोला "...हाँ वैसे भी जयचंदी काव्यपाठ से ही आपिया पार्टी एकजुट है ..." आपिया और भड़क गया और धम्की देते हुए बोला "...आप अपनी हद में रहिए ..." मैंने शांति से उत्तर देते हुए ऊंची आवाज में पूछा "...सरहद पर करके आए हो ...?" आपिया बोला "...हम सबके हको-हाकूक मुदा उठाते हैं ..." मैंने पूछा "..एक खूंटा पर कितना लहसुन उगा सकते हो ..?" आपिया गगरी की कसम खाते हुए बोला “...हम गागर में सागर ला सकते हैं कसम से...” मैंने कहा “...तब काहें इतना परेशान हो गगरी में छेद हो गया क्या...” आपिया बोला “...जयचंदों से कोई भी गगरी नहीं बची है ...” मैंने भी टांट कसते हुए पूछा “...रावण और विभीषण नहीं याद आ रहे हैं तुमको...?” आपिया बोला “...हम ब्राम्हण नहीं हैं...” मैंने उसके अजीब से उत्तर पर कहा “...जयचंदों के बीच में केजरीवाल कबसे बनिया हो गए...?” आपिया बोला “...केजरीवाल पर आपत्ति क्यों...?” मैंने कहा “...मांगने का काम तो ब्राम्हणों का है जैसे रावण ने सीता माता से भिक्षा मांगा था...” आपिए को जवाब देते नहीं बन रहा था तो मैंने कहा “...जैसे भैंस के पोंछ में कपड़ा नहीं सूखता वैसे जयचंद की याद में आँसू बहाने से भैंस अनशन पर नहीं बैठती...” मैंने आपिए को नमस्कार कहा तो वो अपना कपार खजुआ रहा था।

Wednesday, 14 January 2015

...यूं ही नहीं आपियों को मूर्ख और गब्बर को महामूर्ख कहा जाता है ...

अपनी शादी में दूसरों को दूल्हा बनाने वाले आपियों को जब ये आभास होता है कि उनकी दुलहन वास्तव में अब उनकी नहीं रही तब लगते हैं तब कहीं से बुद्धि उपरियाने की कोशिश करते हैं। दिल्ली छवानी के चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद उनकी बोहनी क्या हो गई लगे नोट और दारू की बोतलों का खाता खोलने। अंगीठी पर लोढ़ा चमकाने लगे आखिर चुनाव जो है। एक आपिया चिल्ला रहा था "...गब्बर की जय हो ..." लेकिन गब्बर को सुनाई नहीं दिया ...बेचारा गब्बर केजरीवाल बहुत परेशान है आज कल ...किसी ने स्टैम्प के कागज पर लिखा-पढ़ी करके दावा कर दिया है कि इस बार उसके गब्बरई की दाल नहीं गलने वाली...सो लोटा ले के तभी से दक्खिन की ओर मुंह करके खड़ा था और कुतुबमीनार को बड़े ध्यान से निहारे जा रहा था। वही पर किसी मूर्ख आपिए ने शिकायत की "...गुरु दारू और नोट का खाता खुल गया ..आप देखिये " ये सुनते ही गब्बर केजरीवाल मुस्कुराया बोला "...वाह मेरे वीरों झाड़ू के सींकों से दारू की बोतल खोलना बहुत कम समय मे सीख गए ..." मुझे बहुत आश्चर्य हुआ सो मूर्ख आपिए से पूछा "...आपने तो गब्बर से शिकायत की थी ...?" मूर्ख आपिया शातिर मुस्कान मे बोला "...शिकायत उसकी होती है जो किसी लायक नहीं होता ..." मेरा माथा ठनका मैंने आश्चर्य से पूछा "...सवाल लायकियत या नालायकियत की नहीं है ..." मूर्ख आपिए ने पलट कर मुझसे पूछा "...तो किसका है ...?" मैंने आश्चर्य जाताते हुए कहा "...वो दारू पी रहे हैं नोट के बंडल उड़ा रहे हैं ...!" मूर्ख आपिया मुस्कुराए जा रहा था बोला "...दुनिया बहुत रंगीली है ..."

मुझे लग गया कि बहुत जल्दी कुछ अनिष्ट होने वाला है गब्बर केजरीवाल दक्खिन की ओर मुंह किये लोटा ले के खड़ा है कुतुबमीनार निहार रहा है निश्चित रूप से कैंट के नोट और दारू तो अपना असर दिखाएंगे ही। भाई मानना पड़ेगा कैंट के पानी असर कई दिनो तक रहता है। आज गब्बर केजरीवाल ने फिर दक्खिन मे कुतुबमीनार पे जोर से लोटा फेंका। मैंने मूर्ख आपिए से कहा "...उधर से कोई गब्बर को निशाना बना लिया तो ..." मूर्ख आपिया बोला "...ये बहुत बढ़िया रहेगा ..." मैंने चेतावनी के लहजे में कहा "...काठ की हांडी दुबारा चूल्हे पर नहीं चढ़ती ..." मूर्ख आपिया बोला "...इसलिए दक्खिन में लोटा फेंकना जरूरी था ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...रिवर्स हुआ तो गब्बर की टाग टूटनी तय है ..." आपिया बोला "...वो हम रोज वर्जिश करते हैं ..." मैंने सहमति में कहा "...तो और मजबूत कर लो आपिए तीसरे नंबर पर आ रहे है केजरीवाल फिए अपने क्षेत्र में अपना लोटा खोजते फिरेंगे ..." आपिया किसी को बार-बार मिस्ड काल मारे जा रहा था तो मैंने भी वहाँ से जल्द से जल्द फूट लेना बेहतर समझा। 

Sunday, 11 January 2015

आधा गदहा घोडा हाँके डींग...

कुत्ता पालतू बनने के बाद मालिक के प्रति अराजकता का पूर्णतः त्याग कर देता है। लेकिन सड़क पर गिरोह बना कर हमेशा भोजन की तलाश मे घूमने और फुटपाथ पर लालचवाश स्वाननिद्रा लेने वाले कुत्ते न तो कभी पालतू बनते हैं और ही उन्हें कोई पालतू बनाना चाहता है। उन अराजक कुत्तों को  भौकने पर कोई आपत्ति करता है तो वे उल्टे उसे काटने दौड़ पड़ते हैं ठीक उसी अपने अंदाज में। आखिर कोई मालिक या माई - बाप होता तो ऐसा करते ही नहीं। एक आपिया चिल्लाया "...महात्मा गांधी ने भी खुद को अराजक कहा था ..." मैंने भी उसी अंदाज में उससे पूछा "...बैरिस्टर रहते किया या म्लेच्छों (अंगरेजों) की नौकरी करते हुए किया ...?" आपिया बोला "...उन्होने संघर्ष करते हुए ऐसा कहा था ..." तो मैंने कहा "...तो तुम भी संघर्ष क्यों नहीं करते ..." आपिया बोला अपने सपने साकार करने का अधिकार हमें भी है..." मैंने कहा "...महात्मा गांधी ने भी सपने को साकार किया लेकिन जिसका खाया उसके प्रति कभी अराजक नहीं हुए तो केजरीवाल ऐसा क्यों कर रहे है...?" आपिया बोला "...ये हमारा स्टाइल है ..." मैंने टांट कसते हुए कहा "...अच्छा जिस थाली में खाते हो उसी में छेद करने की आदत है ..." मूर्ख आपिया बोला "...राजनीति मे सब जायज है ..."  फिर उसी टोन मे उससे पूछा "...केजरीवाल फिर तो मुख्यमंत्री की कुर्सी में 49 छेद भी कर दिये होंगे ..." ये सुनते ही आपिया सकपका गया और बड़े सहमते हुए जवाब दिया "...ये मुझे नहीं पता ..." मैंने उससे कहा "...काहे नहीं पता...?  महात्मा गांधी खुद को अराजक कहे ये पता है...? आपिया बोला "...हाँ गांधी जी की ये बात पता है..." मैंने कहा "...जब तुमको महात्मा गांधी ये बात पता है तो ये बात भी पता होनी चाहिए महात्मा गांधी दिल्ली या गुजरात के मुख्यमंत्री कभी नहीं थे ..." आपिया कनफ्यूज हो कर कपार खजुआने लगा फिर बोला "...फिर तो ....!" मैंने बीच में उसकी बात काटते हुए कहा "...हाँ बिल्कुल अगर अराजक बनने का इतना ही शौक है तो वही करना पड़ेगा ..." आपिए ने पलट कर गुस्से में मुझसे पूछा "...क्या वही करना पड़ेगा ...?" मैंने आराम से उसका उत्तर दिया "...महात्मा गांधी ने कभी चुनाव नहीं लड़ा और न ही लड़ने की इच्छा व्यक्त की ..." आपिए के दिमाग में कुछ नहीं घुसा उसी उपेक्षा के लहजे में उसने कहा "...तो ..." मैंने कहा "...तो मतलब यही कि अराजक बनो या फिर चुनाव लड़ो ...पालतू बनने के बाद मालिक को काटने की कोशिश करोगे तो मालिक सीधे खोपड़ी में गोली मरेगा ..." आपिया सफाई देते हुए बोला "...लेकिन हम ईमानदार लोग हैं ..." मैंने कहा "...तो ईमानदारी से करो न बेईमानी से ईमानदारी दिखाओगे तो ...तो मुश्किल हो जाएगी..." आपिया फिर कनफ्यूज हो गया और कपार खजुआने लगा ...ज़ोर ज़ोर से खजुआने लगा ...  

Saturday, 10 January 2015

प्रधानमंत्री नरेंद्र और नकलची भागेंद्र

कुतुब मीनार पर लोटा फेकने के शौकीन गब्बर केजरीवाल 12 मई 2014 को बनारस में चुनाव के दिन माथे पर त्रिपुंड लगाए घूम रहे थे तो लंगोट कसे बनारसी लोगों को अच्छा बिल्कुल नहीं लगा था उसी दिन बनारस के लोगों को लग गया था कि गब्बर भले ये कह रहे हों कि लोकसभा का चुनाव हारे या जीते बनारस के लोगों की मरते दम तक सेवा करते रहेंगे लेकिन ये आदमी जल्दी ही लोटा फेंक के भागेगा जैसे दिल्ली से भागा था और हुआ भी वही। और तो और ये वादा गब्बर ने त्रिपुंड माथे पर त्रिपुंड लगा के किया था तब भी लोगों ने विश्वास नहीं किया। आज वही गाजियाबाद का गब्बर दिल्ली में त्रिपुंड की तर्ज पर साफा बांध के घूम रहे हैं ठीक नरेंद्र भाई मोदी की तरह लेकिन धूम है कि मचने का नाम ही नहीं ले रहा। आज रामलीला मैदान में मोदी की जैसी धूम मची गब्बर की खोपड़ी हिल गई और प्रेस कोन्फ्रेंस में साफा की जगह मफ़लर आ गया। एक मूर्ख आपिया चीखते हुए चिल्लाते हुए पता नहीं गब्बर को या किसी और को  नसीहतें दिये जा रहा था तो वहीं उसका पालतू कुत्ता आराम से सोफ़े पर बैठ के लोटा पर पूंछ फेर रहा था। मैंने आपिए से पूछा "...कुछ ज्यादा परेशानी हो गई क्या ...?" आपिया सकपका गया और परेशानी छिपते हुए बोला "...हमे क्यों परेशानी होगी हम तो ईमानदार हैं जी ..." मैंने कहा "...फिर चीख क्यों रहे हो कहीं कुत्ता काट लिया तो ...? आपिया बोला "...वो नहीं काटेगा ..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...इतना यकीन कैसे ...?" आपिया उत्तर देते हुए बोला "...इसका फार्मूला तो केवल मेरे पास है किसी और के पास नहीं ...." मैंने गाजोधर को याद किया और बोला "...अच्छा ! मुझे पता है तुम्हारे पास फार्मूला है, तुझे पता है तुम्हारे पास फार्मूला है कुत्तवा को थोड़े न पता है तुम्हारे पास फार्मूला है ..." इस पर मूर्ख आपिया माथा खजुआते हुए बोला "...शायद आपका कहना सही है कुत्ते को मेरा फार्मूला नहीं मालूम..." मैंने उससे पूछा "...आपके विरोधी तो ऐसे नहीं चीखते ..." मूर्ख आपिया बोला "...विरोधियों के पास मुद्दा ही नहीं है ..." मैंने उससे पूछा "...कैसे पता ? लोटा फेंक के पता किए थे क्या ...?" आपिया बोला "...मुद्दा होता तो वही करते ..." मैंने कहा "...लेकिन परेशानी है तभी चीख रहे हो वैसे भी मुद्दा था तभी भीड़ थी आज मैदान खचाखच भरा था ..." इस पर आपिया बिगड़ गया और चीखते हुए फिर बोला "...केजरीवाल को कोई नहीं हरा सकता ..." मैंने आराम से कहा "...कुतुब मीनार पर अकेले हो ?...आराम से ..." आपिया बोला "...हम यहा सत्ता के लिए नहीं राजनीति बदलने आए हैं ..सब हमारी नकल करते हैं ..." मैंने कहा "..त्रिपुंड से साफा तक का नौ नोमिनाशन होते हुए सफर  ...?" आपिया फिर सकपका गया बोला  "...नकल का सवाल ही नहीं ..." मैंने उससे पूछा "...कुतुब मीनार से आवाज आती है..?" इस आपिया फिर गरमा गया बोला "...आप मुद्दे से भटक रहे हैं ..." मैंने पूछा "...तो आप मुद्दे का लोटा लटका रहे हैं...?" आपिया कुछ बोल नहीं रहा था।   

Friday, 9 January 2015

चुनाव में गब्बर की नाव ...

एक बार गब्बर केजरीवाल से किसी बच्चे (वो बच्चे जिसकी वो कसम नहीं खाए थे ) ने पूछा था कि अंकल लुंगी को अगरेजी में क्या कहते हैं तो केजरीवाल उसका उत्तर उसी तरह नहीं दे पाए थे जैसे भ्रष्टाचार, जनलोकपाल, स्वराज्य (शायद सुराज) पर नहीं दे पा रहे हैं। लेकिन ये बात उनके मन मे उसी तरह बैठ गई थी जैसे शीला दीक्षित, कलमाड़ी, ए राजा आदि का भ्रष्टाचार उनके मन में हमेशा के लिए बैठ गया था। उनकी श्रीमती जी ने भी गब्बर को बहुत नहीं समझाया तो पड़ोसियों बहुत आश्चर्य हुआ आखिर ये कैसा पति है जो अपने मन में कितने ही महाभ्रष्टों को बैठा लिया है और ये कैसी पत्नी है कि पति को समझाती नहीं। लेकिन जिस किसी ने भी गब्बर केजरीवाल को समझाने की कोशिश की गब्बर ने उसे लात मार के खदेड़ दिया सिवाय कुछ लोगों के जैसे योगेंदर चचा सलीम। कुछ लोग तो बताते हैं कि गब्बर ने सलीम चचा का गोडवे धो के छान लिए थे और जब वही छेना जब पीए हैं तो तब सलीम चचा के जान मे जान आया है और गब्बर के गले लगे हैं।

कुछ गुणगानी अपिए कहते हैं इस बार की ठंडी में गब्बर को ठंड नहीं लग रही है लेकिन मफ़लर तो केवल इसलिए है कि कुछ गले में फंसा हुआ है जिसे दिखना खतरनाक हो सकता है लिहाजा मफ़लर जरूरी है। लेकिन माता जी हैं कि पुत्रमोह माता प्रवृत्ति है लिहाजा शीला जी ने अपने पुत्र को आशीर्वाद देते हुए कह डाला कि बुरे वक्त में काँग्रेस का साथ मिलेगा ठीक वैसे ही जैसे गांधारी ने दुर्योधन को आशीर्वाद दिया था। यही फंसरी है जो इस बार गले में फंसा है और सर्दी बहुत कम लग रही है। वैसे महाभारत में इसका वर्णन है कि गांधारी ने अपने पुत्र दुर्योधन को नग्नवस्था में बुलाया था आशीर्वाद देकर शरीर को वज्र जैसा कठोर बनाने के लिए लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने चालबाजी से दुर्योधन को नग्नता से बचा कर कमर का हिस्सा वज्र होने से रोक दिया और वो कमजोर रह गया। एक आपिया बता रहा था माता जी के लिए गब्बर ने बहुत कुछ किया है ब्याज सहित किया है उनका भ्रष्टाचार तो अपने मफ़लर में छिपाया ही है उनके चमचों का भी भ्रष्टाचार अपने में समेट लिया है इसीलिए दू गो स्वेटर पहनना पड़ता है गब्बर केजरीवाल को।

चुनाव के समय पैसे की बहुत जरूरत होती है लिहाजा केजरीवाल जूता नहीं पहनते मोजा पर सेंडिल पहनते हैं  गुणगानी आपिए बताते हैं कि गब्बर जूता किराए पर चलाते हैं इससे भी कुछ करोड़ पैसा मिल जाता है जिससे उनके चुनाव आलीशान खर्चा निकलता है कुछ लोग सोच रहे होंगे कि जूता भाड़े पर लेता कौन है तो गुणगानी आपिए बताते है कि वही लोग जो 12 रूपिया में 12 करोड़ काला का सफ़ेद बनाना चाहते हैं लेकिन गब्बर का सर्टिफिकेट उनको ईमानदार बनाने का दावा करता है तो भ्रम ही सत्य है गब्बर केजरीवाल भी किसी का नाम है।