Tuesday, 15 December 2015

आ बैल मुझे मार, जल्दी मार...

सारे के सारे अपोले तो ऐसे चीख रहे हैं जैसे वही 64-65 रेलवे लाइन के किनारे अपने सचिवों के साथ लाईन से सबेरे - सबेरे लोटा ले के बैठे ही थे तभी थोड़ी देर के बाद ही सफाई अभियान के दरोगा ने रेलवे लाइन पर छापा मार दिया...इसी पर अपोले भड़क गए चीखने लगे "...छापा मारने से पहले दरवाजा नाक करके आना चाहिए था। मैंने अपोले से कहा "...बरखुरदार रेलवे लाईन पर तो आका के अधिका (री) बैठे थे ..." अपोले ने चीखना जारी रखते हुए कहा "...मुख्यमंत्री भी वहीं बैठते हैं..." मैंने चुटकी लेते हुए पूछा "...आका अपना लोटा लेकर जाए हैं या सचिव का लोटा शेयर करते हैं ...?" अपोले ने मुझे धमकी देते हुए कहा "...देखिये आपको ये मज़ाक बहुत मंहगा पड़ेगा ..." मैंने उस अपोले के धमकी का जवाब में पूछा "...आपके आका बर्खास्तगी की उम्मीद क्यों कर  रहे हैं इस्तीफा दे कर भागते क्यों नहीं..?" अपोला फिर भी चीखे जा रहा था बोला "...आखिर छापा भी मारने का भी एक तरीका होता है..." मैंने उससे कहा "...सीबीआई ने छापा ही तो मारा है वो भी आका के अधिका पर...आपके आका क्यों चाहते हैं उनको भी उठा के पटक दिया जाए ...? " अपोला बोला "..ये गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी बहुत मंहगी पड़ेगी ..." मैंने उस पर टांट कसते हुए कहा "...रेलवे लाईन पर सचिवों के साथ लोटा लेकर सरे आम आप बैठते हो बावजूद इसके ढाई लाख रुपया तंख्वाह लेते हुए शर्म नहीं आती ..वैसे उकसाने से कोई उकसता है क्या ...?"  अपोला बोला "...ये हमे परेशान करने की एक साजिश है ..." मैंने उसे डांटते हुए हुए पूछा "...आपके रेलवे लाईन पर बैठने से क्या लोगों को सुविधा होती है ...?"  अपोला फिर चीखते हुए पूछा "...इसपर किसी को क्या आपत्ति है ...?" मैंने उससे कहा "...आपत्ति क्यों नहीं गंदगी- बदबू आप फैलाते हैं अपने सचिवों के साथ बदनाम बेचारे रेलवे के यात्री होते हैं ..." अपोला मुझसे शिकायत करने के अंदाज में बोला ".. भूल कर भी कभी केजरीवाल की तारीफ नहीं की तुमने..." मैंने उससे साफ - साफ कहा "... केजरीवाल ने पार्टी बनाने की घोषणा करते हुए जैसी हरकत की थी उसी समय विश्वास हो गया था कि ये आदमी बहुत गंदा है बहुत ज्यादा गंदा ..सबसे भ्रष्ट..." अपोला सफाई देते हुए बोला "...लेकिन मीडिया जम कर तारीफ कर रही थी ..."  मैंने कहा "...इसीलिए तो मीडिया जम कर तारीफ कर रही थी ..." अपोला बोला "...लेकिन आपने उस समय भी जम के केजरीवाल के खिलाफ लिखा था ..और आज भी ..." मैंने दावा ठोंकते हुए कहा "...मैंने उस समय जो केजरीवाल के बारे में लिखा वो आगे चल कर अक्षरशः सत्य साबित हुआ..." अपोला बेचैनी से चुप हो गया ...

Thursday, 3 December 2015

टेम्पू पर तुरही ...जनलो-कपाल ....!

दिल्ली में मसौदा पेश हुआ जनलो-कपाल का...कुछ लोग इसे प्यार से जोकपाल भी कह रहे हैं जो कि मेरे हिसाब से ठीक इसलिए नहीं है क्योंकि ये शब्द केजरीवाल के कपाल के बारे में सही जानकारी न दे कर उन्हें चिपकने वाला खूनचुसवा जोक ही साबित करता है। इसपर एक अपोले को लगा मैंने उनका समर्थन किया तो मारे खुशी के उछल पड़ा बोला "...आपका कहना एकदम दुरूरुस्त है ..." मैंने अपोले से इसपर प्रतिप्रश्न करते हुए पूछा  "...तो क्या ये साबित हो गया है कि केजरीवाल खूनचुसवा जोक नहीं है ...?" अपोला बोला "...हाँ बिलकुल ..." मैंने उससे कहा "...देख भाई मैं क्लीन चिट जारी करने वाला कोई सुप्रीम या हाईकोर्ट का जज नहीं हूँ ..." अपोला बोला "...तो क्या हुआ आपका कहना एकदम सही है..." मैंने उसे समझाते हुए कहा "...मेरे हिसाब से पेश किया गया मसौदा साबित करते हुए कहता है कि 'दिल्ली वालों जान लों केजरीवाल के कपाल को' ..." अपोला फिर खुश हो गया बोला "...वही तो केजरीवाल अध्ययन का विषय हैं ..." मैंने कहा "...अरे ये क्या कहते हो अपोला भाई इससे तो केजरीवाल खूनचुसवा जोक भी साबित हो सकते हैं ..." अपोला कनफ्यूज हो गया लेकिन बड़ी देर के बाद सहमति जताते हुए बोला "...शायद आपका कहना सही है ,,," मैंने पलट कर उससे पूछा "...फिर...?" अपोला उत्तर देते हुए बोला "...केजरीवाल जैसा ईमानदार नेता कोई नहीं है ये साबित हो गया ..." मैंने अपोले से कहा "...हाँ केजरीवाल लालू से गले मिलकर लालू को भी ईमानदार साबित कर ही दिया अपनी तरह ..." अपोला ये सुनते ही भड़क गया मुझसे पूछा "...अपनी तरह का क्या मतलब ...?" मैंने बड़े आराम से उसे उत्तर दिया "...चारा चबाने के उपलक्ष में लालू बेऊर जेल में ...लेकिन केजरीवाल..." अपोला बीच में ही चीखते हुए पूछा "...लेकिन केजरीवाल क्या ...?" मैंने शांति से उसका उत्तर दिया "...लेकिन केजरीवाल तिहाड़ में तगाड़ी धोना-ढोना नहीं चाहते..." अपोला चीखते हुए बोला "...ऐसा कुछ भी नहीं है ..." मैंने तपाक से पलट कर उससे पूछा "...क्यों ऐसा कुछ नहीं है एसीबी चीनी और प्याज घोटाले की जांच नहीं कर रही है क्या ...? अपोला बोला "....देखिएगा ये सारे आरोप गलत साबित होंगे ..." मैंने टांट कसते हुए कहा "...तीनपहिया टेम्पू के छत पर बैठकर तुरही तेरने से कोई विजेता साबित नहीं होता ..." अपोले को मेरा मुहावरा शायद समझ में नहीं आया इसलिए चुप रहा तो मैंने कहा "...तिहाड़ की तगाड़ी से बचने के लिए ये मसौदा ... केजरीवाल का संदेश 'जनलो - कपाल ' मेरा...!

Wednesday, 25 November 2015

सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँडुता ...असही-साँडुता

जैसे-जैसे दाऊद पर शिकंजा कसता जा रहा है काँग्रेस और उसके चमचे सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ का लबादा ओढ़ कर बिल से निकल कर उतने ही ज़ोर से असही-साँडुता - असही-साँडुता चिल्ला कर खुद को सही-साँड़ साबित करने में पूरा ज़ोर लगा रहे हैं। मैंने ऐसे ही एक सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से पूछा तो चीखते हुए चिल्लाने लगा, बोला "...आपको दिखाता नहीं देश में असहिष्णुता का माहौल है ..." मैंने उस सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से पूछा  "...मामला तो दाऊद का फिर उसके लिए आप लोग खुद को सही-साँड़ साबित करने पर क्यों उतारू है ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोला "...देखिये आपकी हिन्दी सही नहीं है पहले उसे ठीक कीजिये ..." मैंने सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से कहा "...हो सकता है लेकिन आप ये बताईए कि खुद को सही-साँड़ और दूसरों को असही-साँड़ साबित करने पर क्यों उतारू हैं ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ मुझे नसीहत देते हुए बोले "...देखिये हम सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ नहीं सहिष्णु हैं ..." मैंने कहा "...जिस प्रकार से गौमाता के मुद्दे पर आप सक्रिय हुए है वो सही-साँड़ का ही धर्म है ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ फिर मुझे नसीहत देते हुए बोला "...आप हमे हमारा धर्म न सिखाएँ ..." मैंने कहा "...अरे हम ऐसा कैसे कर सकते हैं सही-साँडों को कोई असही-साँड़ धर्म सिखाने की हिमाकत कैसे कर सकता है वो उनकी श्रीमती जी हैं...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ गुस्से में बोला "...देखिये आप किसी के व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते ..." मैंने कहा "...सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ जी मामले को निजी से सरकारी आपने सही-साँड़ खाँ ने ही बनाया ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोला "...खाँ की पत्नी ने उसे बताया ..." मैंने सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ से कहा "...वही खाँ की पत्नी अपने खाँ से भी ज्यादा बेहद करीबी लोगो से कह रही है कि खाँ ने उसके वक्तव्य को तोड़ - मरोड़ कर पेश किया है ..." इस पर सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ भड़क गया पूछा "...क्या आपकी उससे बात हुई है ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...ये मेरा निजी मामला है..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाऊरा कर मुझे धमकी देते हुए कहा "...आपको इसकी पुष्टि करनी होगी ..." मैंने भी तपाक से जवाब दिया "...सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब से उसके वक्तव्य की पुष्टि हुई क्या वास्तव में उसकी पत्नी ऐसा कहा है या नहीं ? क्योंकि मामला निजी से सरकारी हो चुका है ..." ये सुन कर सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ सहम गया बोला "...आप किसी पर ऐसे झूठ बोल कर कीचड़ नहीं उछाल सकते ..." मैंने कहा "...अपने ऊपर कीचड़ तो सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब उछाल रहे हैं जितनी सच्चाई उनकी बातों में है ठीक उतनी सच्चाई इस बात में भी है कि उसके पत्नी ने अपने बेहद करीबी लोगो कहा है कि सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ खाँ साहब उसकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं ..."   सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ की बहुत देर तक कुछ बोले नहीं तो मैंने कहा "...अभी सही-साँड़ अय्यर और खुर्शीद साहब भी पाकिस्तान हो कर आए हैं दाऊद पर शिकंजा कस रहा है ...ठीक उसके बाद सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ की श्रीमती जी ..." सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ बोले "...देखिये ऐसा कुछ नहीं है ..." मैंने कहा "...कैसे कुछ नहीं है फिल्म में दाऊद का पैसा नहीं लगता क्या ...?" सिक-उल्लू-रिस्ट सही-साँड़ चुप गया ,,, 

Tuesday, 24 November 2015

बड़कू त बड़कू ...छोटकू काहें बड़कू ....?
अभी भी मीडिया के कमेडिया राजनीतिक सूरमा ये महसूसे नहीं कर पाए हैं कि लालू ने छोटकू को डिप्टी सीएम और बड़कू को केवल केबिनेट मंत्री ही क्यों बनाया ? बड़े - बड़े मीडिया घरानो मे राजनीतिक सूरमाओं के लिए विश्लेषण करना बड़े दूर की बात है। ये राजनीतिक सूरमा ऐसे हैं कि इनके आँख पर सर्च लाईट का फोकस मारो तब भी इनके लिए घुप्प अंधेरा ही होता है। लालू यादव तो सर्च लाईट मर रहे हैं लेकिन अभी तक किसी अखबार या टीवी में किसी कमेडिया राजनीतिक सूरमा के कान पर किसी जूँ ने रेंगने की जहमत नहीं उठाई है।
इसका सीधा और सरल अर्थ ये है कि लालू यादव को किसी अपने से अपना विरोध बर्दाश्त नहीं होता, वो उसे आस्तीन का साँप समझते हैं कहने की जरूरत नहीं जब लालू यादव सक्षम होते हैं तो "आस्तीन के साँपों" से कैसे निबटा जाता है बखूबी जानते हैं। साधू यादव, पप्पू यादव, राम कृपाल यादव जैसे ने तो कभी भी "लालू यादव मुर्दाबाद" जैसे आत्मा को छलनी कर देने वाले नारे कभी नहीं नहीं लगवाए फिर भी भनक तक लगते ही लालू यादव उन्हें ठिकाने लगाने में देर नहीं की जबकि ये लोग लालू यादव के बेहद खास हुआ करते थे। राम कृपाल यादव तो लालू यादव के दाहिने हाथ तक थे किसी जमाने में।
नितीश बाबू ने तो वो जघन्य अपराध किया है कि यकीन मानिए लालू यादव नितीश कुमार को माफ कर देंगे ऐसा संभव इसलिए नहीं कि मामला तंत्र - मंत्र का भी है जिस पर लालू यादव अगाध आस्था भी है और उस आस्था द्वारा "लालू मुर्दाबाद" का नारा लगना वो भी नितीश के इशारे पर और नितीश कुमार का मंद - मंद मुसकाना। आप सोच सकते हैं कितना मर्म भेदी दृश्य है ये लालू यादव के लिए और फिर अपराधी लालू चुंगल में हो तो आप कल्पना कर सकते हैं कि दृश्य कितना भयावह होगा।
लालू यादव ने छोटकू को डिप्टी सीएम बना कर ये सीधा और चीखने वाला संकेत दे दिया है नितीश बाबू आपकी औकात तो मेरे छोटू जितनी ही है और फिर बड़कू को केबिनेट मंत्री तक ही सीमित करना अजीब सा नहीं लगता ? जी बिलकुल अजीब है कयदे से तो बड़कू को तो सीएम होना चाहिए छोटकू को डिप्टीसीएम... क्यों होना चाहिए न ...जी आप बिलकुल ठीक समझे लालू यादव का स्पष्ट संकेत नितीश कुमार को है और नितीश कुमार इसे बखूबी समझते भी हैं लेकिन वो अपमानित महसूस कर रहे हैं या नहीं मुझे नहीं पता।
तो इंतजार कीजिये बड़कू के CM बनने का और छोटकू के DCM बने रहने का ..विश्वास रखिए इंतजार की घड़िया उम्मीद से बहुत जल्द खत्म होने वाली है ...खास समीकरण पर सारी तैयारी हो चुकी है ...

Tuesday, 17 November 2015

तमंचे पर डिस्को ...

बिहार विधान सभा चुनाव में लालू पर हमला करना तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही संदर्भों में उचित था। तात्कालिकता के संदर्भ मे तो ठीक नहीं बैठा लेकिन दूरगामी परिणाम के संदर्भ मे लालू का नितीश से आगे निकल जाना भाजपा के लिए शुभ तो है ही लोकतन्त्र की विभीषिका को भी दर्शाती है जिसका "गंगाजल" से तर्पण किया जाना जरूरी है।
भाजपा की दुखद बुरी पराजय के बाद भी यदि कोई दल सबसे अधिक सकते में है तो वो है काँग्रेस। काँग्रेसी खेमे में अजीब सा सन्नटा पसरा है लालू यादव की जबरदस्त जीत के बाद भी। काँग्रेस क्या किसी भी दल या व्यक्ति के लिए कुछ भी करना संभव है सिवाय लालू प्रसाद यादव की फितरत को बदल देने के। वैसे राजनीति की बहुत कठोर और कटु सच्चाई ये भी है कि यदि आप महत्वाकांक्षी नहीं हैं तो आप राजनीति कर ही नहीं सकते। ये किसी न किसी संदर्भ और रूप में होना ही चाहिए, यदि आप इससे समझौता करते हैं तो यकीन मानिए आप राजनीतिक आत्महत्या कर रहे हैं। लालू यादव, नितीश कुमार और काँग्रेस आत्महत्या करेंगे ये मानना अपने आप में बेहद निम्नकोटी का हस्य होगा। जब जीवित रहने के लिए महत्वकांक्षी होना अपरिहार्य है वो किसी को मार कर तो फिर सबसे बड़े दल के रूप में उभरे लालू प्रसाद यादव का अपना मुख्यमंत्री क्यों न हो ?
यकीन मानिए ये यक्ष प्रश्न नितीश कुमार के लिए भी है लिहाजा उनके लिए भी अपनी महत्वाकांक्षा से समझौता करना राजनीतिक आत्महत्या करने जैसा ही है लिहाजा मुख्यमंत्री की कुर्सी का त्याग करने का सीधा अर्थ ये भी होगा कि उनके अंदर सरकार चलाने की काबलियत भाजपा से अलग होने के साथ ही समाप्त हो चुकी है। बहुत कठोर यथार्थ ये भी है कि सरकार चलाना उनका कर्तव्य तो है ही लालू यादव को कमजोर करते हुए खत्म कर देना उनका राजनीतिक धर्म भी है वरना उल्टे वो ही समाप्त हो जाएंगे। अब लालू प्रसाद यादव इसे सहजता से होने देंगे वो भी सबसे ताकतवर के रूप में उभरने के बाद भी ? ये मौजूं सवाल वैसा ही है जैसे कुएं पर खड़े किसी व्यक्ति से कोई ये कहे कि कुएं में छलांग लगाओ तुम कुएं में गिरोगे नहीं। काँग्रेस तो 27 सीटें जीतने के बाद भी राजनीतिक आत्महत्या कर चुकी है सिर्फ अंतिम संस्कार होना बाकी है देखते हैं किस घाट पर कांग्रेसी अपना अंतिम संस्कार करवाना पसंद करते है लालू घाट पर या नितीश घाट पर।
20 नवंबर को शपथ ग्रहण समारोह में लाललृष्ण आडवाणी को यूं ही नहीं निमंत्रण भेजा गया है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री को नहीं। इसका सीधा सा अर्थ है न तो नितीश कुमार मुख्यमंत्री का पद छोडना चाहते हैं और न ही प्रधानमंत्री का सपना। लालू यादव द्वारा अपनी गोटी सेट करने से पहले नितीश खुद को सेट कर लेना चाहते हैं भले भाजपा का सहयोग लेना पड़े मोदी को बाई पास करते हुए। लालू और नितीश के लिए मामला इतना गंभीर है कि अपने सहयोगी द्वारा ही किसी एक की राजनीतिक हत्या निश्चित है।
नितीश कुमार का स्पष्ट मानना था कि इस चुनाव में वो जीतने की स्थिति में कुछ नहीं तो भी 80 सीटें आ ही सकती है और लालू प्रसाद यादव बहुत जीतेंगे तब भी 40-50 सीट से अधिक नहीं जीतेंगे। महज सामान्य बहुमत की ही दरकार थी नितीश कुमार को लेकिन ये बिलकुल उल्टा हो गया। लालू यादव की सीटों में 400% की बढ़ोत्तरी के बहुत बड़े निहितार्थ हैं जिसके बहुत दूरगामी परिणाम के साथ प्रतिपरिणाम भी देखने को मिलेंगे ये तय है।
बिहार में जनरल मोटर्स और अलस्टोम के निवेश का रास्ता केंद्र प्रशस्त कर चुका है। अनुमान के मुताबिक इस निवेश से करीब डेढ़-दो लाख लोगों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की उम्मीद है। व्यापारिक संदर्भ में निर्भर पारिस्थिकी की बात की जाए तो इसमे आप दस से गुणा कर दीजिये और भी निवेशों को मंजूरी मिलने प्रक्रिया जारी है। ये बहुत बड़ा आमूल-चूल सामाजिक बादलाव साबित होगा जिसका श्रेय लालू प्रसाद यादव नितीश कुमार को लेने देंगे या फिर नितीश कुमार लालू यादव को लेने देंगे, ये भी अपने आप में सर्वविदित खुला रहस्य है। लेकिन इतना तो तय है कि जो सत्ता में होगा उसे श्रेय लेने से कोई नहीं रोक सकता, बिहार की दिलचस्प राजनीति में ट्विस्ट यहाँ से भी आयेगा। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दिल्ली है कि कैसे दिल्ली मेट्रो को भाजपा (तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना) ले के आई और प्याज से भाजपा-सरकार गिरने के बाद उसी मेट्रो के नाम पर 15 साल जम के शासन किया भ्रष्ट होने के बावजूद। लिहाजा बिहार में नजारा देखने लायक हो सकता है।
लालू और नितीश दोनों को ये अच्छी तरह पता है कि दोनों का मतप्रतिशत क्रांतिक मात्रा 20% से नीचे है। मजे की बात ये है कि नितीश घटे हैं लालू यादव बढ़े हैं। दोनों ने साथ-साथ चुनाव लड़ा है लिहाजा वो एक दूसरे को मार कर ही अपना मतप्रतिशत बढ़ा कर 20% से ऊपर कर सकते हैं दूसरा कोई चारा ही नहीं है, जिन्हें ये लगता है कि दोनों साथ रहें हमेशा के लिए तो और भी खतरनाक होगा दोनों की लिए क्योकि भाजपा अकेले 20% से ऊपर है और महाराष्ट्र का उदाहरण सबके सामने है कि 1999 के बाद भाजपा-शिवसेना सत्ता में नहीं लौट सकी साथ लड़ने के बावजूद, वो तब संभव हुआ जब केंद्र में मोदी आ चुके थे। यहाँ भाजपा एनडीए के साथ लगभग 35% ही ज्यादा दूर नहीं है और कुछ भी कभी भी हो सकता है जैसा कि महागठबंधन में अविश्वास का नजारा छाया हुआ है। अतः कभी भी भाजपा 45% से ऊपर आसानी से जा सकती है अतः संभानाओं से समझौता करने से लाख गुना बेहतर है खुद को मजबूत किया जाए। लालू यादव को इससे शानदार सकारात्मक अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।
लालू यादव को भलीभांति पता है कि नितीश की सरकार जितनी अधिक स्थाई होगी वो उत्तरोत्तर उतने ही कमजोर होते जाएंगे। लिहाजा नितीश सरकार को जितनी जल्दी अस्थिर करेंगे उनके वोट-बैंक की उन्नति के लिए उतना ही बेहतर होगा। अतः नितीश के वजूद के लिए खतरा बनाना लालू यादव के लिए मजबूरी ही नहीं महती जरूरत भी है इसके साथ-साथ ये भी कि जबतक लालू का अपना मुख्यमंत्री नहीं होगा जबतक सरकार की सफलता का लेशमात्र भी श्रेय लालू यादव को मिलने से रहा।

Tuesday, 10 November 2015

लालू कुमार - नितीश प्रसाद यादव ....

बड़े बड़े राजनीतिक सूरमाओं के लेख आप अनसोशल मीडिया (टीवी प्रेस) में आने शुरू हो चुके हैं ये वही सब लेख हैं जिनको  मतगणना के समय से ही सुन - सुन के कान पक चुके हैं टीवी पर वही सब अखबार मे वही सब घिसी पिटी बातें कुछ भी ऐसा नहीं जिसे विश्लेषण कहा जा सके। हद तो तब हो जाती जब उसमे से भी 80% या उससे अधिक वो सब होता है जो हम सभी पिछले 4-5 महीने से पढ़ते देखते आ रहे हैं। जय-पराजय के भांति-भांति के लोग भांति के कारण गिना रहे हैं जिसको जो मिल रहा है वही लिख रहा है। हम वो सब फालतू के अर्थ - अनर्थमेटिक, फ़िज़िक्स, केमिस्ट्री, बायोलोजी, आदि की चर्चा बिलकुल नहीं करेंगे क्योकि आप सभी वो सब मुझसे और सभी राजनीतिक सूरमाओं से काफी बेहतर जानते हैं। हम यहा केवल तथ्यों का विश्लेषण करेंगे।

जो लोग ये बता रहे हैं कि मोहन भगवत के बयान से चुनाव पलट गया, लालू यादव पर बहुत अधिक आक्रमण हो गया था, गाय, बाहरी - बिहारी, डीएनए-आरएनए, पाकिस्तान-अफगानिस्तान आदि आदि तो उन लोगों को ये जान लेना चाहिए कि चुनावों में इन सब बातों का बहुत ज्यादा असर नहीं होता। डीएनए-आरएनए की बात अस्र किया होता तो एनडीए को 5% वोट भी नहीं मिलते, मोहन भगवत की बात चुभी होती तो यकीन मानिए भाजपा 12% वोट कभी नहीं मिलते, गाय गोरू अपनी जगह हैं चूंकि ये सब बातें मनोरंजक होती हैं अतः जीतने पर शानदार लगती हैं हारने पर चुभती हैं बस इससे अधिक कुछ भी नहीं। यदि ऐसा होता तो लालू यादव का गऊ को भोज्य बताने पर उनको 10% से अधिक वोट नहीं मिलते स्टिंग की सीडी के आने पर नितीश की 95% सीटों पर जमानत जब्त हो जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जनता इतनी बेवकूफ़ नहीं है कि मोहन भागवत के बयान को नहीं समझती या फिर उस पर की जा रही भददगी को नहीं समझती।

बिहार चुनावों में सारा खेल  उड़न्तू-घुमंतू मतों (floating votes) का था जो हर चुनावों में लगभग 4 से 8%  के आस-पास होता हैं, बिहार में भी यही अंतर केवल 7.8% मतों का था। ये वोट किसी भी करवट बैठ सकते हैं कारण ये होता है इन मतों की कोई अवधारणा व आधार नहीं होता। चुनाव इनके लिए बस एक मनोरंजन के साथ थोड़ी सुरक्षा का भी विषय बन जाता है इससे अधिक कुछ भी नहीं। बिहार के संदर्भ में ऐसे उड़न्तू-घुमंतू मतों की संख्या (प्रतिशत में) और राज्यों की तुलना में थोड़ी अधिक है क्योंकि बहुत बड़ी संख्या पुरुष - परिवार प्रवासी हैं इसीलिए वहाँ मत प्रतिशत कभी 60% ऊपर नहीं जाता। प्रवासी कहीं के भी हो और कहीं भी हों वो अन्यों की तुलना में संवेदनशील ज्यादा होते हैं अपनी सुरक्षा को लेकर, लिहाजा तात्कालिकता उन्हें जोरदार तरीके से गहरे प्रभावित करती है। इस चुनाव से ये बिलकुल स्पष्ट है कि मोदी जी कितने भी पैकेज की बात क्यों कर लें, शानदार भविष्य की बातें कर लें तात्कालिकता की बात नहीं करेंगे तो बड़ी मुश्किल होगी। मेरे अनुमान से काँग्रेस को जो 6.5% वोट मिले हैं उसमे से आधे से अधिक उड़न्तू-घुमंतू मत ही हैं क्योकि काँग्रेस सिरे से संदर्भ से ही बाहर थी।

इन चुनावों मे सबसे मजेदार बात ये हुई कि दो बिलकुल नए व्यक्तित्वों का उदय हुआ एक "लालू कुमार" और दूसरे "नितीश प्रसाद यादव" । तांत्रिक वाली सीडी याद है जिसमे भाटपार रानी के तांत्रिक लालू मुर्दाबाद के नारे लगा रहे हैं और नितीश मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। "लालू कुमार" का 80 सीटे ले आना "नितीश प्रसाद यादव" के लिए कितना बड़ा सिर दर्द है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि "लालू कुमार" ने "नितीश प्रसाद यादव" को फरमान जारी कर दिया "... नितीश सरकार चलाएँगे और वो उनकी छवि को अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय संदर्भ में वो भुनाएँगे जैसा इस चुनाव भुना लिए ..." और "नितीश प्रसाद यादव" बेचारे मन मसोसते हुए अपमान का घूंट पी कर रह गए कुछ बोलने की स्थिति में नहीं बचे है। मजे की बात ये है कि अभी पार्टी शुरू भी नहीं हुई है रंग रोगन शुरू हो गया है।

"लालू कुमार" के लिए ये चुनाव तो बोनस है लेकिन साथ में दिक्कत ये है कि मत-प्रतिशत केवल 18.4% ही है फिर भी वो इस अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठा लेना चाहते हैं लेकिन "नितीश प्रसाद यादव" के लिए मुसीबत का एक और पहाड़ यही मात्र 16.8% मत  है कहाँ एनडीए में बांका बास बन के थे यहाँ तो सब उल्टे हो गया जिसको गरियाए थे कभी अब उसी के मातहत काम करना है दोयम दर्जे का बन के और गोडधरिया करते हुए।

दोनों का मत प्रतिशत क्रांतिक मात्रा (20%) से नीचे है ये बहुत बड़ा सर दर्द है। ऐसा इसलिए कि जिस राज्य में किसी भी पार्टी का मत प्रतिशत 20% से नीचे गिरा है वो फिर खड़ी नहीं हो पाई। काँग्रेस, भाजपा और कई खत्म हो चुकी पार्टियां इसका जीता-जागता प्रमाण है। ये सरदर्द  ऐसा है दोनों को अलग करने को विवश करेगा नहीं तो किसी भी सूरत में एक दूसरे के आसरे अपना मत प्रतिशत नहीं बढ़ा सकते क्योंकि ये शीर्ष है और अपना शीर्ष विकसित करने के लिए अलग होना अति आवश्यक है। लेकिन जहां तक भाजपा के डर का सवाल है उससे मुक्त होने के लिए "लालू कुमार" के पास दो विकल्प हैं एक खुद "नितीश प्रसाद यादव" की अपनी सरकार और दूसरे यकीन मानिए केजरीवाल। लालू कुमार से चुंगल केजरीवाल भाग नहीं सकते ये तय है। पार्टी के हंगामेदार और काफी मजेदार होने वाली है।

भाजपा लगभग 25% मत लेकर सबसे ऊपर है उसके घटकों से उसे किसी प्रकार का डर नहीं है जैसा महागठबंधन को है। जैसे महागठबंधन के गठन के समय से ही उसके उल्टी गिनती शुरू हो गई थी इस सरकार के गठन से पहले ही सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है "लालू कुमार" ने इसके संकेत देने शुरू भी कर दिये हैं। सरकार गिरने की सूरत में भाजपा को किसी भी कीमत पर "नितीश प्रसाद यादव" को समर्थन नहीं देना चाहिए और तुरंत हो सके तो अकेले चुनाव में जाना चाहिए। नहीं तो भाजपा के लिए नितीश मायावती साबित होंगे उत्तर प्रदेश की तरह ।    


Friday, 6 November 2015

चपरासी चोखा चौरासी रंग ....
सन्नी लियोन शाहरुख खान का मामा जहीर-उल-इस्लाम पाकिस्तानी इंटेलीजेन्स ISI का 2012 से 2014 तक मुखिया रह चुका है। ये सर्वविदित है कि पाकिस्तान में दाऊद इब्राहीम की सुरक्षा ISI के जिम्मे था और आज भी है। अभी 27 अक्टूबर को छोटा राजन की गिरफ्तारी के बाद एक तथ्य प्रमाणित हो गया कि बॉलीवुड मे बहुत बड़े पैमाने पर दाऊद का पैसा लगता है। 90 के दशक में ये चरम पर था जिस समय खान ने बालीवुड मे प्रवेश किया।
जिस दौर मे शाहरुख खान का बॉलीवुड में प्रवेश हुआ था उस दौरान दाऊद की मर्जी के बगैर वहाँ पत्ता भी नहीं हिलता था। जिसने पत्ता हिलाने की कोशिश की उसका पत्ता ही दुनिया से कट गया। टी-सीरीज़ के मालिक गुलशन कुमार की सारे आम नृशंस हत्या इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उस घटना के बाद बॉलीवुड हदस ही नहीं गया हमेशा के लिए सहम भी गया और दाऊद की तूती बोलने लगी। कहने की जरूरत नहीं हर फिल्म में दाऊद कैसे डाकादारी करता है। यहा हर फिल्म का मतलब हर फिल्म। ये महज संयोग नहीं है कि बालीवुड के जबरदस्त प्रोड्यूसर और विश्व के सर्वश्रेष्ट लाइज़ेनर माने जाने वाले अमर सिंह को बॉलीवुड छोडकर सक्रिय राजनीति में आना पड़ा। अद्भुत और विलक्षण अभिनय प्रतिभा के धनी ऋतिक रोशन को बॉलीवुड मे दूसरे प्रोड्यूसर और डाइरेक्टर ही नहीं मिलते हैं लिहाजा उनके पिता राकेश रोशन को ही ऋतिक रोशन के लिए फील्म प्रोड्यूस और डाइरैक्ट करना पड़ता है। उसी दौरान अमिताभ बच्चन की कंपनी ABCL भी यूं ही बर्बाद नहीं हुई उसके पीछे भी कृत्रिम ठोस कारण हैं। और भी बहुत से रोंगटे खड़े कर देने वाले उदाहरण हैं जो दिये जा सकते हैं।
आज की तारीख में भी दाऊद की मर्जी बॉलीवुड में चलती है जो एक टॉप-सीक्रेट इसी साल जुलाई के पहले हफ्ते में तब उजागर हो गया जब ये पता चला कि दीपिका पादुकोण दाऊद से मिलकर बॉलीवुड छोड़िए हॉलीवुड फिल्म में पैसा लगाने का अनुरोध कर डाला है ये जानते हुए भी कि अमेरिका जैसे देश में किसी आतंकवादी का किसी भी माध्यम से कहीं भी पैसा लगना नामुमकिन है। इससे आप समझ सकते हैं दाऊद की पैठ किस हद तक बॉलीवुड में है।
शाहरुख खान इतना प्रतिभावान नहीं हैं कि इस मुकाम पर हो। अभिनय के निमित्त किसी स्टूडियो का चपरासी बनने की भी शायद ही योग्यता रखने वाला आज बालीवुड मे जिस स्थिति में है उसके पीछे पूरी तरह दाऊद का वरदहस्त है जो ISI मे उसके मामा जहीर-उल-इस्लाम के इशारे पर थोपा गया। आज खान की पूरी मार्केटिंग दाऊद के इशारे पर होती है और जानबूझ कर अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, ऋतिक रौशन आदि अन्यों से हमेशा ऊपर रखने की कोशिश की जाती है। इसने काई बार ये स्वीकार किया भी है उसे सिर्फ काम चाहिए था फिल्म चले या न चले इससे मतलब नहीं, इसीलिए जो भी फिल्म मिली साइन करता चला गया। यही कारण है इसकी कई फिल्मे बुरी तरह फ्लॉप होने के बावजूद इसका कैरियर-ग्राफ बढ़ता ही रहा और बदले में दाऊद को मोटी रकम भी मिलती रही पाकिस्तान जाने के बावजूद और उसमे से पाकिस्तान भी हिस्सेदारी करता हो तो आश्चर्य मत करिएगा। इसीलिए चचाजान हाफिज़ सईद के बुलावे को इसने अस्वीकार नहीं किया। जब भी ये खान अमेरिका जाते हैं हमेशा इन सब को अमेरिकी एयरपोर्ट पर ही पूरी तरह नंगा कर के हवाई अड्डे पर ही घंटों डिटेन किया जाता है ये ठीक वैसी ही कार्यवाही है जो किसी व्यक्ति के आतंकवादी होने के संदेह पर किया जाता है।
“आजतक” चैनल पर ‘अंजना ओम कश्यप’ जिस तरह से जानबूझ कर ये जानते हुए भी कि इसके खिलाफ ईडी से तीसरी बार सम्मन जारी हुआ है चीखते हुए बार – बार ये घोषणा कर रही थी “...शाहरुख खान अपने बलबूते आगे बढ़े हैं...” और “न्यूज़ 24” पर मानक गुप्ता द्वारा खान को देश की शान घोषित करता रहा चीख- चीख कर अपने आप में बहुत बड़ा संदह पैदा करता है। और भी बहुत से चैनलों पर इसे दोहराया गया हो तो क्या आश्चर्य। अभी ये महज ट्रेलर भर है पूरी फिल्म तो अभी बाकी है जो पूरी जांच के बाद चलेगी....
इसलिए शाहरुख खान का विषय अपने आप में बहुत बड़े और अतिगंभीर जांच का विषय है जिससे पता चल सके कि और कितने शाहरुख खान आज सक्रिय हैं।

Tuesday, 3 November 2015

लंगोटी पर लहसुन ...जीव मुआवे जुआं

कुछ जीव सूंघ कर भौंकते हैं जो स्वाभिक है होना भी यही चाहिए  यदि भौकने की ज्यादा इच्छा है तो, लेकिन कुछ सन्नी लिओन छाप जीव ऐसे होते हैं जो भौकने के बाद सूंघने की भी जहमत नहीं उठाते। दुनियाँ में तीन श्रेणियाँ हैं लोगों की, तीनों की पहचान के मुहावरे भी है जी पहली श्रेणी है "सोने पे सुहागा" बेहद लोकप्रिय, दूसरी है "चाँदी पे चावल" और तीसरी "लोहे पे लौकी"। लेकिन सन्नी लियोन के अवतरण के बाद चौथी श्रेणी ने भी अपना विराट स्वरूप धरण कर लिया जो पहले पर्दे में थी अब पर्दा गिर चुका है "लंगोटी पे लहसुन" श्रेणी वालों ने बास मारना शुरू कर दिया है। बड़ी खरतनाक है ये क्योकि जो दूर से भी इनकी संगत में आया उसका सन्नी लियोन की तरह सिवाय लोगों की लंगोटी लहराने के कुछ नहीं कर पाया। हवा के रुख के शौकीन और उसी पर अपना लाल पैजमा चमकाने ने वाले एक महाशय चीखते हुए मेरा विरोध रहे थे "...वो सुपर स्टार हैं जन्मदिन पर आप उनको सन्नी लियोन नहीं कह सकते ..."  मैंने जले पर नमक रगड़ते हुए पूछा "..क्यों क्या अंतर है सन्नी लियोन और आपके हवारुख में...?".लाल पैजामा मुझे समझाते हुए बोले "...देखिये खान साहब की भी इज्जत है ..." मैंने तपाक से कहा "... सन्नी लियोन की भी इज्जत आपके खान साहब से कम नहीं है ...जैसी सन्नी लियोन वैसे आपके खान साहब ..." लाल पैजामा को कुछ सूझ नहीं रहा था तो मैंने कहा "...अभी पाँच दिन पहले ईडी का सम्मन जारी हुआ आपके खान साहब के खिलाफ..." लाल पैजामा ज़ोर शोर से सवाल दागने लगे "...सन्नी लियोन के खिलाफ सम्मन नहीं हुआ क्यों ...?" मैंने कहा "...ये सवाल तो आप ईडी से करिए ..." लाल पैजामा बोले "...देखिये देश का माहौल खराब हो रहा है ..." मैंने कहा "...हाँ खराब तो हो रहा है दाऊद के घर पर पाकिस्तान ने सुरक्षा बढ़ा दी ...और आपके खान साहब की चिंता बढ़ गई..." लाल पैजामा खाऊरा कर मुझसे पूछे "...आपके कहने का क्या मतलब है ..." मैंने भी तपाक से कहा "...ठीक वही जो आपके समझ में आ रहा है ..." लाल पैजामा बोले "... खान साहब कभी दाऊद नहीं हो सकते ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा "...हे भगवान मैंने ऐसा कब कहा ...ऐसा कह के तो झूठ-मूठ में माहौल खराब कर रहे हैं पैजामा जी ..." लाल पैजामा चीखते हुए बोले "...बालीवुड का किंग खान कभी सन्नी लियोन नहीं हो सकता..." मैंने भी उसी तों में जवाब दिया "...सन्नी लियोन भी आपके किंग खान से बहुत इज्जतदार है..." लाल पैजामा खिसिया से गए तो मैंने फिर कहा "...सन्नी लियोन एक उपाधि भी है आपके खान साहब और उनके जैसों के लिए....संभाल के रखिए और ये ऐसी उपाधि है जिसे आपके खान साहब लोग चाह कर भी वापस नहीं कर सकते ..चौथी श्रेणी  'लंगोटी पर लहसुन'.." का नाम रौशन कीजिये..."  लाल पैजामा अपनी लम्बोर्गिनी चालू करने लगे ....    

Saturday, 31 October 2015

भारत से ज्ञान की लूट की एक बानगी ...

क्या ये मात्र संयोग है कि जब म्लेच्छों (अंगरेजों) ने भारत गुलाम बनाना शुरू किया तभी यूरोप में पुनर्जागरण हुआ औद्योगिक क्रांति के साथ - साथ आधुनिक विज्ञान क्रांति का भी सूत्रपात हुआ। भारत में इतना धन और ज्ञान था कि भारत में लूट से समूचा यूरोप और अमेरिका न सिर्फ दरिद्र और जंगली से अमीर बन गए बल्कि भारत के ज्ञान को लूट कर ढोंगी ज्ञानी भी बन बैठे। भारत में सबसे पहले पुर्तगाली 1502 में भारत आए फिर डच 1602 में यूनाइटेड ईस्ट इंडियन कंपनी के माध्यम से आए और ठीक दस साल के बाद 1612 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के मादयम से भारत आए और यहाँ के लोगों को गुलाम बनाना शुरू किया धन तो लूटा ही ज्ञान की लूट मच गई।

ठीक  75 साल के बाद एक चोर जिसका नाम आईसैक न्यूटन था, ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त भारत से चुरा कर अपने नाम से प्रतिपादित करता है। ये सिद्धान्त हूबहू भास्कराचार्य के सिद्धान्त की नकल है जिसे उसने  500 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य द्वारा रचित ग्रंथ प्रथम "सिद्धान्त शिरोमणि" से चुराया था। हद तो तब हो गई जब उसने अपनी पुस्तक का नाम तक चुराया और अपनी पुस्तक नाम भी "प्रिंसिपिया" ही रखा यानी ठीक म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में अनुवाद। भास्कराचार्य का ग्रंथ "सिद्धान्त शिरोमणि" बेहद गूढ ग्रंथ है जो चार भागों ('पारी गणित', बीज गणित', 'गणिताध्याय' तथा 'गोलाध्याय') में है  जिसमे भौतिकी, गणित, खगोलविज्ञान गूढ रहस्यों का खजाना है।  म्लेच्छों द्वारा ये ज्ञान की ये पहली लूट थी जिसके बाद ही यूरोप में आधुनिक विज्ञान की शुरू होती है। भास्कराचार्य के अन्य ग्रन्थों "लीलवती" (गणित और खगोलविज्ञान), "करण कौतूहल" (खगोल विज्ञान) आदि भी हैं जिसको चुरा कर यूरोप के चोरों ने अपने नाम के आगे वैज्ञानिक होने का ठप्पा लगवा लिया।

उसी दौरान विलियम हार्वे नाम का एक व्यक्ति हुआ जिसने 1628 में रक्त संचरण पर अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे मूर्खों द्वारा तथाकथित आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की नीव माना जाता है, ने आचार्य भाव मिश्र के लघुत्रयी ग्रन्थ जिसमे तीन ग्रंथ (भाव प्रकाश, माधावनिदान और शंईगधरसंहिता ) हैं की  नकल करके चोरी की जिसमे शरीर क्रिया विज्ञान रक्त संचरण सहित और औषधि विज्ञान का भी विस्तृत वर्णन है। एंड्रियास विसैलियस भी उसी समय हुआ जिसने सुश्रुतसंहिता से शव विच्छेदन की पूरी प्रक्रिया चुराई और अपनी पुस्तक लिखी वो ठीक उसी प्रकार है जैसा सुश्रुत संहिता में बताया गया है। बात यही पर खत्म नहीं होती शल्य चिकित्सा भी पूरी तरह हूबहू चुराया गया और आज भी वही पद्धति और उपकरण हैं जैसा संहिता में बताया गया है।

"योग्यतम की उत्तर जीविता" का सिद्धान्त देने वाले चार्ल्स डार्विन भी कम नहीं थे। वेदों (ऋग्वेद ) से चुरा कर उसने "ऑरिजिन ऑफ स्पिशीज़" लिख डाली। यही नहीं उसने ठीक गीता के एक वाक्य "वीर भोग्या वसुधरा" को चुरा कर अपना सिद्धान्त दिया जिसे "प्रकृतिक चयन" या "योग्यतम की उत्तर जीविता" का नाम दे दिया। जैव विकास का क्रमिक सिद्धान्त हमारे ऋग्वेद में पहले से ही है जिसे पाँच महाकल्पों में विभाजित किया गया जिसमे धरती की कहानी 5 कल्पों में कही गई है- महत कल्प, हिरण्यगर्भ कल्प, ब्रह्मा कल्प, पद्मकल्प और वराह कल्प जिसमे विस्तार आए। तो क्या जैव विकास के पाँच कल्प आर्किओजोइक, प्रोटिरोजोइक, पैलियोजोइक, मेसोंजोइक और सीनोजोइक इन्हीं वेदों से नहीं चुराए गए हैं?

महर्षि भारद्वाज विलक्षण विमान और यंत्र शास्त्री थे। उन्होने दो ग्रंथ लिखे "आशुबोधिनी" जिसमे अनेक विद्याओं का उल्लेख है और दूसरी "यंत्र-सर्वस्व" जिसमें हवाई जहाज बनाने के 500 विधियों का वर्णन है जिसके आधार पर विश्व का सबसे पहला जहाज भारत में 1895 में महाराष्ट्र के "शिवकर बापूजी तलपड़े" द्वारा बनाया और उड़ाया गया था जो 1500 फीट तक बिना किसी पायलट के उड़ा था। इन्हीं के डिजाईंन की चोरी राईट बंधुओं ने की और अपने नाम पेटेंट कराया। आखिर साईकिल बनाने वाला जहाज के बारें में कैसे सोच सकता है जो कि उसका यही मुख्य धंधा ही हो। लुई पाश्चर ने "पश्चराईजेशन" का पेटेंट कराया जिससे दूध लंबे समय तक खराब नहीं होता ये भारत प्राचीन काल से चली आ रही परंपरा का ही चोरी है जिसे "औटाना" कहते हैं। ये इतना बड़ा चोर था कि चीन से टीकाकारण (वैक्सीनेशन) की विधि का भी चोरी करके अपने नाम पेटेंट करा लिया। जगदीश चंद्र बोस के रेडियो की खोज को भी मार्कोनी ने चुरा कर अपने नाम कर लिया।

अल्बर्ट आईन्स्टिन ने लिखा है "मैं भारत के ज्ञान का कायल हूँ जिसने गणना करना सिखाया" और तो और सापेक्षता के सिद्धान्त का आधार श्रीमद भागवत गीता से ही लिया गया जिसमे ब्रम्हलोक में रेवती के पिता रैवतक और ब्रम्हा जी के संवाद में मिलता है जहां से इसे लिया गया। लेकिन वो अहंकार के कारण कभी अपने से भी कहीं ज्यादा बुद्धिमान आधुनिक भारत के महान गणितज्ञ "श्रीनिवास रामानुजम" को कभी भी जानबूझ कर महत्व नहीं दिया आखीर तक रामानुजम के बहुत से सूत्र तो आईन्स्टीन के समझ से परे था। 

भारत से धन और वैभव की लूट से सभी परिचित हैं और ज्ञान की चोरी का ये महज एक बानगी भर है। आखिर भारत के गुलाम होते ही अचानक ये जंगली सभ्य, ज्ञानी और वैभवशाली कैसे हो गए? हम भारतियों को मात्र अपना स्वाभिमान जगाने भर की जरूरत है फिर भारत को पुनः विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता हर क्षेत्र में वो भी बहुत जल्दी।


Tuesday, 27 October 2015

ईनाम दियावे कुर्सी..जोकर भंईस पगुराय ..

नितीश बाबू को आप लोग बकलोल बूझते हैं। दिमाग ठिकाने लगा देने वाले नेता हैं। एक जद्दू नेता उनका कच्चा चिट्ठा खोलते हुए तारीफ कर रहे थे "...वो जब इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ते थे तब्बे से शेरो-शायरी और अंत्याक्षरी खेलते थे ..." मैंने कहा "...मने वो पुराने खिलाड़ी हैं फिर भी साहित्य अकादमी पुरस्कार नहीं मिला ...?" जद्दू नेता बोले "...नितीश जी किसी पुरस्कार के भूखे नहीं हैं ..." मैंने तपाक से पूछा "...तब काहें आज कविता बाँच रहे थे ...?" जद्दू नेता बोले "...आपको तो समझ मे आ ही गया होगा ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...हाँ भाई समझ में आ गया ..." जद्दू नेता से नहीं रहा गया मारे उत्साह में उछल कर पूछे "...क्या ...?" मैंने कहा "...नितीश बाबू बहुत दूर की सोचते हैं और उसी हिसाब से योजना नाते हैं ..." जद्दू नेता तो मानो फूले नहीं समा रहा था मारे आनंद से पूछा "...आपके हिसाब से क्या योजना ..." मैंने कहा "....जैसे लेखन के दुर्भिक्षों को साहित्य अकादमी पुरस्कार थमा दिया गया बात वही है ..." जादू नेता को लगा जैसे मैंने उनके नेता की तारीफ की है बोले "...हाँ वो तो है ही ..." मैंने उनसे पूछा "...उनके थ्री ईडियट वाली कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलेगा ...?" जाद्दू नेता बोले "...हाँ हाँ क्यों नहीं जरूर मिलेगा मिलना भी चाहिए ..." मैंने उनको संतुष्ट करते हुए कहा "...फिर नितीश बाबू उसी पुरस्कार को वापस करके मोदी का विरोध करेंगे ..." अब सिरे से उखड़ने के बारी थी जद्दू नेता की "...देखिये आप ऐसा कह के नितीश बाबू का अपमान कर रहे हैं ..." मैंने उनसे पुष्टि करने के अंदाज में पूछा "...आपको पूरा यकीन है कि कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल जाएगा ...?"  जद्दू नेता बोले "...जरूर मिलेगा आखिर नितीश बाबू भी ओबीसी मे आते हैं ..." मैंने कहा "...ठीक बिलकुल ठीक ...इस चुनाव में तो तो वो मोदी का प्रत्यक्ष विरोध कर नहीं पाएंगे तो पुरस्कार वापसी का ही एक रास्ता बचाता है सत्ता हथियाने का ..."  जद्दू नेता बोले "..नितीश बाबू इतने घटिया इंसान नहीं हैं जो मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने के लिए पुरस्कार वापस करेंगे ..." मैंने उनको चुनौती देते कहा "...फिलहाल तो नितीश बाबू अपनी कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार हथिया कर दिखाएँ ..." जद्दू नेता अपना सीना फुलाते हुए बोले "...देखिये केजरीवाल की तरह नितीश कुमार भी ईमानदार नेता हैं ..." मैंने कहा "..हाँ केजरीवाल अभी -अभी आदमी का चारा प्याज और चीनी फाँके हैं नितीश बाबू लालू को फांक रहे हैं ..." जद्दू नेता जैसे उखाड़ गए गुस्से में मुझसे पूछे "...आपके कहने क्या मतलब है ...?" मैंने उत्तरा देते हुए कहा "...विपक्ष में बैठे-बैठे कविता लिख कर साहित्य अकादमी पुरस्कार हथियाने की योजना बना रहे हैं ये उसी का पूर्वाभ्यास था ..." जद्दू नेता चुप हो गए ... 

Tuesday, 20 October 2015

जोकर जंग अज़ब हैरानी ...

बड़े ज़ोर-शोर से तमंचा लहरा-लहरा कर पुरस्कार विसर्जन न करने का दावा करते हुए अवसाद रस और अवसादी लफ्जों के शायर चिल्ला रहे थे कि जो लोग एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन कर रहे हैं वो थक चुके हैं उनके कलाम मे वो ताकत नहीं बची। ट्विट्टर पर भी उन्होने बहुत तमंचा लहराए जा थे। आलम तो ये भी था जोकरों के उच्च मनोरंजक हाइ भोल्टेज ड्रामे के खिलाफ शायर महोदय एक साक्षात्कार (चीत्कार नहीं) ठीक एक दिन पहले नामी अन-सोशल मीडिया अमर उजाला मे छपा भी था जिसका साफ मतलब था वो पुरस्कार विसर्जन नहीं करेंगे, लेकिन 16 तारीख को जैसे ही मेरा लेख आया जिसका बहुत दिनो लोगो को इन्तजार था,(वैसेभी  देश भर में हजारों लोगों को मेरे लेखों बेसब्री से इंतजार रहता ही है )  ठंडे बस्ते की ओर लौटते इस मजेदार मज़ाकिया विषय मे फिर से गर्माहट आ गई जिसका नतीजा ये हुआ कि ठीक उसी दिन "काशी के अस्सी" ने अपने एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन का दिया फिर दो दिन ही बाद शायर महोदय भी पल्टी मारने पर मजबूर हो गए और उन्होने भी पुरस्कार विसर्जन कर दिया।

बड़े ज़ोर-शोर से चीख रहे उस दिन "सत्ता रायबरेली की नालियों मे बहता है" लेकिन एक-आदमी पुरस्कार उनको 2014 में तब मिला जब कोंग्रेसी ईटल्ली राजमा-ता की चरण वंदना करते हुए उसी नाली की पवित्रता से खुद ही अपना अभिषेक किया था। आज फिर उसी सत्ता से पुरस्कार वापस लेना चाहते हैं जो उनके शहर के नालियों मे बहता है। बात यहीं खत्म नहीं होती उन महोदय को एखलाक के बराबर पैसा भी चाहिए कम से कम 50 लाख हाँ भाई पुरस्कार राशि के रूप मे जिसका उन्होने ब्याज नहीं लौटाया,  उसी नालियों में बहने वाले सत्ता से वो जुड़ना भी चाहते भी हैं ठीक किसी सचिव की तरह। सत्ता रायबरेली के नालियों मे बहता है। शायर महोदय आप "सत्ता का खेल" नहीं खेल रहे आप आप तो "सट्टा" लगा रहे हैं अपने  अवसादी अ-लेखन की क्षमता का। जब सिर्फ गाली-गलौज करने वाले तक एक दो नहीं दर्जनो "साहित्य एक-आदमी पुरस्कार" हथिया सकते हैं तो आपने भी हथियाया तो इसमे क्या आश्चर्य।

शायर महोदय को आतंकवाद की भी परिभाषा चाहिए ठीक यूएनओ के संदर्भ में आजम खाँ की तर्ज पर जबकि मेरे ही वाल पर आतंकवाद की परिभाषा स्पष्ट रूप से दे गई थी 30 सितंबर को ही जो अभी  भी है, देख लें उक्त तिथि में। ये परिभाषा सत्ता अधिष्ठान में विचाराधीन भी है लिहाजा इसे भी उसी रौशनी में देखना चाहिए जिस अवसाद से वो जिन्न-जिन्नातों को भगा कर उजाला करने का दावा करते हैं। वो अच्छा हुआ उस जमाने में ISIS नहीं था इसीलिए शायर महोदय नक्सली बनने बंगाल चले गए थे अपना गाल बजाते हुए पुलिस ने पकड़ लिया और थाने में इनके पिता जब जी ने शपथ पत्र दाखिल किया तब इनको मुक्ति मिली। इन लोगों का हाई भोल्टेज ड्रामें को भी इसी आतंकवाद की रोशनी में देखना चाहिए।

ये तय है मेरा लेख 16 अक्तूबर को नहीं आया होता ये शायर महोदय भी पल्टी मारते हुए एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन नहीं करते। कुछ मित्र राष्ट्रवादी साहित्यकार तो यहा तक कह रहे हैं काशी का अस्सी का भेद भी खुलने के बाद एक-आदमी के साहित्यकारों का असली रूप तो लोगों के सामने आ ही गया है उनकी बास मारती बजबजाती प्रतिभा भी लोगों के सामने आ गई ठीक रायबरेली की नालियों की तरह ...शायर महोदय को इसे ढ़कने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई ...लेकिन वो पासा भी उल्टा पड़ गया .... 

Thursday, 15 October 2015

ओ ! एक-आदमी के साहित्यकारों इस लेख शीर्षक बताओ ....

अपने आप को नामी कहलवाने के शौकीन नकली प्रगतिशील बिरादरी के दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी अपना पुरस्कार विसर्जन करने के लिए पूरे दल बल के साथ निकले ही थे कि बाहर घूम रहे साँड़ों ने दौड़ा लिया तो एक साहित्यकारों ने अपने जेब से जानवरों का वध करने वाला गंडासा निकाल लिया जिससे डर कर सांडों ने दौड़ाना बंद कर दिया। फिर वो दुर्गतिशील साहित्यकार अपना साहित्य एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के लिए निकल पड़े। ये तमाशा देखते हुए भीड़ के व्यक्ति से हमने पूछा "...भाई माजरा क्या है..?." वो सज्जन बताने लगे "...कुछ मूर्खवादी लोग मूर्ति विसर्जन के बजाय पुरस्कार विसर्जन करने निकले थे ..." तभी उस भीड़ के एक और सज्जन ने टोका "...मूर्खवादी नहीं मार्क्सवादी ..." उत्तर देने वाले व्यक्ति ने टोकने वाले  को लगभग डांटते हुए कहा "...एक ही बात है जैसे 'बुट को बट, जो को गो' कहा जाता है वैसे ही ' कार्ल मार्क्स' को  'काल मूर्ख'  कहा जाता है और बीच में टोका मत करो ..." उत्तर दाता बताने लगे "...उन लोगों को सांडों ने दौड़ा लिया था ..." मैंने कहा "...इससे पहले कभी गोवंशियों ने उन मूर्खवादियों को नहीं दौड़ाया..." सज्जन बोले "...इससे पहले वो सब काभी अपने कार से बाहर निकलते ही नहीं थे ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए पूछा "...लेकिन आज वो साथ में गोश्त काटने वाला गंडासा भी साथ लेकर निकले थे ...ऐसा क्यों ?" सज्जन कहने लगे "...वो तो हमेशा उनके पास ही रहता है जब चाहा जहां चाहा किसी को भी काट कर गोश्त बनाया और पार्टी दे दी ..." मेरा आश्चर्य और बढ़ गया मैंने पूछा "...फिर उनको ये पुरस्कार कैसे मिला ..?" सज्जन बोले "...ठीक उसी तरह जैसे एक कसाई दूसरे कसाई को सम्मानित करता है ..." सज्जन के उत्तर से मेरा मुंह और आँखें खुली की खुली रह गईं मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था ये देखते हुए सज्जन बोले "...पुरस्कार केवल और केवल साहित्यकारों को ही मिलना चाहिए था ..किसी भी कीमत पर...." मैंने फिर उसी आश्चर्य से पूछा "...मतलब ज़्यादातर पुरस्कार साहित्यकारों को नहीं मिले ...?" सज्जन बोले "...इसीलिए तो वो लोग गोश्त बनाने वाला गंडासा हमेशा अपने साथ रखते हैं ..." मैंने संतोष जताते हुए कहा "....मतलब उन्हें साँड़ों ने यूं ही नहीं दौड़ाया था ..असल बात यही है ." सज्जन सहमति जताते हुए बोले "...हाँ बात यही है... बहुत साल पहले एक बार मैंने इसी एक-आदमी वाली किताब खरीदी थी ..." मैंने पूछा "...फिर ...?" सज्जन बोले "...मुझे मनोचिकित्सक से अवसाद का ईलाज करना पड़ा जो अभी चल रहा है..." मैंने कहा "...एक बार अवसाद पकड़ ले तो ये डिस्को छाप अंगरेजी दवाई से ठीक नहीं होता ...खैर " सज्जन बोले "...ये लोग ऐसी ही अनेक बीमारियाँ समाज में फैला रहे हैं अपने अवसाद रस के लेखन और अपने गोश्त बनाने वाले गंडासे से ..." मैंने सज्जन से कहा "...एक-आदमी पुरस्कार विसर्जन के बाजाय कोई रास्ता नहीं है ..." सज्जन बोले "...बहुत बढ़िया होगा अगर ये लोग अपने असली पेशे में लौट जाएँ तो वैसे भी ये लोग गंडासा अपने साथ रखते ही हैं ..." मैंने पलट कर उनसे पूछा "....तो मतलब अब बेचारे निरीह पशु ही इसका खामियाजा भुगतें ...? सज्जन को अपनी गलती का एहसास हुआ बोले "...हाँ ये तो है ...बेचारे पशुओं का क्या दोष...?" मैंने सज्जन से पूछा "...धरती पर बोझ बन चुके इन एक-आदमी साहित्यकारों से मुक्ति का कोई रास्ता नहीं ..." सज्जन उत्तर देते हुए बोले "...अगर इनके पास स्वाभिमान नाम की चीज होती तो किसानो वाला रास्ता था जिसकी शुरुआत कॉंग्रेस ने 1993 मे की थी और तबसे फलते-फूलते आज भी जारी है ..."मैंने आहें भरते हुए कहा "...काश ! इन साहित्य एक-आदमियो के साहित्यकारों के पास थोड़ा भी स्वाभिमान होता तो ये धरती अवसाद सहित कई मानसिक बीमारियो से तो मुक्त तो होती ही साथ है धरती का बहुत बड़ा बोझ भी खत्म हो जाता ..."  

Sunday, 27 September 2015

दिल्ली में लालू, पियाज खाए अके...लू...

बक़राईद बीत जाने के बाद केजरीवाल से यही उम्मीद थी क्योंकि दिल्ली में भी नासिक के "चारा घोटाला" हो ही गया जो स्वाभाविक था ठीक लालू यादव के MY समीकरण की तर्ज पर। बावजूद इसके बेगानी आग से अपनी लुआठी लहका कर पहलवानी झाड़ना भी बहुत भाता है, लेकिन गाहे-बगाहे मुन्ना हज़ारे जैसे लोग अपनी टोपी की दुहाई देने पर उतारू हो जाते हैं तो केजरीवाल की इज्जत ही दांव पर लग जाती है। आज बड़े ताव मे आ कर मेरी ही पोस्ट के तीसरे पैरा की अंतिम चार पंक्तियों की  नकल मार कर "मेक इन इंडिया" की तर्ज पर "मेक इंडिया" कर दिया जो मूल रूप से पूरी तरह से मेरी अवधारणा है। वैसे नकल मारना केजरीवाल की पुरानी आदत है। पिछले सितंबर से ही "मेक इन इंडिया" चल रहा है और मोदी की ये 29 वीं विदेश यात्रा थी अबतक उनको "मेक इंडिया" का विचार नहीं आया था। विचार तब आया जब मेरी पोस्ट 22 सितंबर को "हीन भावना बहुत बड़ी गंभीर समस्या" शीर्षक से आती है।आखिर केजरीवाल का दिमाग बकाराईद के बाद ही सक्रिय क्यों होता है? वैसे इस बार कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल मेरी अवधारणा की चोरी नहीं कर सकते क्योकि मेरी हर पोस्ट सबसे पहले मोदी जी के पास जाती है फिर वो मेरे और अन्य समूहों के वाल पर प्रकाशित होती है।

वैसे मेरे पास आ कर केजरीवाल अवधारणा के लिए गिड़गिड़ाए होते तो निश्चित रूप से उस तरीके से निराश बिलकुल नहीं होना पड़ता जिस तरीके से दिल्ली वाले निराश हैं हताश हैं। डेंगू से प्लेटलेट्स कम जरूर होते हैं लेकिन दिल्ली वालों का हौसला कम नहीं होता 15 साल काँग्रेस जैसे महामुसीबत को झेल सकते हैं तो केजरीवाल जो भले ही डेंगू से भी खतरनाक क्यों न हो दिल्ली वाले हँसते हुए झेल ही जाएंगे। वैसे केजरीवाल स्वराज्य भूल ही चुके हैं कारण साफ है यदि वो इसे लागू करते हैं तो उन्हें अपनी जेब से उसे भारी भरकम रायल्टी देनी पड़ेगी जिसके स्वराज के अवधारणा की चोरी केजरीवाल ने की है। मामला वैसे भी न्यायालय में विचाराधीन है।

वैसे जिसके मित्र सोमनाथ भारती, तोमर, कुमार विषवास, आशुतोष आदि आदि जैसे लोग हों उससे उम्मीद भी क्या की जा सकती है। इसीलिए दिल्ली वालों को अपने महफूजियत से ज्यादा खतरा तब बहुत बढ़ जाता है जब से वो लालू यादव का खुल कर समर्थन करने लगे। लालू ने चौपायों का चारा खाया और केजरीवाल आदमी का चारा खा गए हाँ हाँ वही चारा जो नासिक से आया था 18 रुपये किलो बिका था 40 रुपये किलो फिर भी केजरीवाल का पेट नहीं भरा तो उसपर भी 10 रुपये सबसिडी देकर उसे भी निगल गए और डकार तक नहीं ली।    

    

Monday, 21 September 2015

हीनभावना बहुत बड़ी गंभीर समस्या...

2013 के पहले कुछ स्तर पर हिन्दी पखवाड़े पर जनता से दुहाई देते हुए यही याचना की जाती थी कि कृपया हिन्दी अपनाईए हिन्दी हमारी मातृभाषा है। इसी याचना के साथ अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती थी।  पहली बार मैंने पूरे वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मैंने म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के खिलाफ 23 अप्रैल 2013 सबसे पहले आवाज उठाई थी। फिर उसके बाद कई बार मैंने इस गंभीर विषय पर अनुगामी लेख लिखे उसके बाद उस समय के तत्कालीन भाजपाध्यक्ष और आज के गृहमंत्री ने आधिकारिक बयान दे कर कहा "...अंगरेजी ने देश का कबाड़ा कर दिया ..." भौतिकी के प्रकाण्ड विद्वान द्वारा दिया गया अपने आप मे बहुत बड़ा और अतिगंभीर बयान था क्योंकि विज्ञान वर्ग द्वारा ही म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का सबसे अधिक समर्थन किया जाता है। कारण स्पष्ट है इस बोली के कारण नष्ट हो चुकी बुद्धिमत्ता के कारण  नकल मारने के लिए विदेश यात्रा, अमेरिका जैसे देश में भागने और भ्रष्टाचार का भयावह लोभ ये लोग प्रमुखता से पालते हैं, वहीं विज्ञान के सहारे आधुनिकतम प्रौद्योगिकी विकसित कर उसका उपयोग करने वाली विश्व की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं मे से एक "इसरो" तेजी से मातृभाषा अपनाने की ओर बढ़ रही है जिन्हें विश्वास न हो वो कृपया "इसरो" के जनमाध्यम विशेषज्ञ शुकदेव प्रसाद से पुष्टि कर सकते हैं।

मैंने उसी समय अपने अध्ययन में म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को एक बेहद गंभीर समस्या के रूप में पाया तब उस समय इसे एक गंभीर मुद्दे के रूप मे पेश किया तब जाकर अब दो साल बाद आज म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की समस्या मुद्दा बन सकी और अब ये कहा जा रहा है कि जबतक हिन्दी विज्ञान की भाषा नहीं बनेगी ताबतक न देश का उत्थान संभव है न ही मातृभाषा का। साहित्य से भाषा उत्थान संभव ही नहीं ये तय है यदि साहित्य से उत्तान संभव होता तो निश्चित रूप से आज हिन्दी और मातृभाषाओं की ये दुर्गति नहीं होती जो आज है। मातृभाषा के माध्यम से ही हम ग्रामीण क्षेत्र को देश के विकास में सीधे भागीदार बना सकते हैं क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के प्रति आग्रह के कारण वो गंभीर रूप से हीन भावना से ग्रस्त है जिससे उन्हें लगता है कि किसी लायक नहीं है और वो कुछ नहीं कर सकते।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के विरुद्ध मेरे अभियान छेड़ने के पीछे  मेरे दो महत्वपूर्ण उद्देश्य थे एक तो इसके कारण लोगों की बुद्धिमत्ता सममाप्त हो रही है जिसके भयावह परिणाम अनेक मानसिक रोग, शारीरिक रोग, व्यावहारिक परेशानिया, समंजस्य की समस्या, संस्कारों का विलोप आदि आदि के रूप मे सामने तो आ ही रहे हैं साथ ही ये बहुत बड़ी राष्ट्रीय आर्थिक क्षति भी है मानव संसाधन के रूप मे मसलन अभी तक आजादी के 70 साल बाद भी आत्मनिर्भर नहीं हो सके हैं और अरबों डालर सिर्फ यूं ही खर्च कर हो जाते हैं और तो और जिनका उत्पादन और निर्माण हम बड़ी आसानी से कर सकते थे जैसे बुलेट ट्रेन, दक्ष (समार्ट) नगर आधुनिक हथियार तोप, बंदूक आदि,उनका बाहर से आयात करना पड़ता है जो बहुत बड़ा नुकसान है।

दूसरे बहुत गंभीर समस्या इस म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण ये है कि जो लोग इसे नहीं जानते वो  इसके प्रति आग्रह से  "हीन भावना" से गंभीर रूप से ग्रस्त हो जाते है जिसका परिणाम ये होता है कि व्यक्ति योग्य होते हुए भी अपने आप को अयोग्य मानने लगता है। ऐसे लोगों की संख्या भारत में बहुत ज्यादा है जो सीधे व्यक्ति की प्रवीणता को नकरातमक रूपसे प्रभावित तो करती ही है उसे कुछ सोचने तक तक नहीं देती नतीजा वो  इस उम्मीद में उस नकारात्मक धारा में चलता है कि उसे भी महत्व मिल सके। मतलब उसे शून्य पर भी आने के लिए गंभीर प्रयास करना पड़ता है। उसकी सारी प्रतिभा सिर्फ शून्य पर आने में ही खर्च हो रही है यही कारण है कि अभी तक भारत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ भी नहीं कर सका है। इसलिए म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) को हटा कर जामवंत जी को हमारे अंदर के बजरंग बली को जगाना होगा।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) हमारे ऊपर दोहरी मार कर रही है एक तो हमे बुद्धिहीन, मानसिक रोगी, शारीरिक रोगी बना रही है दूसरे जो लोग इसे नहीं जानते उन्हें ये हीन भावना से ग्रस्त कर रही है। मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपराध एक मूल कारण हीन भावना का होंना भी है। इसलिए कुछ गैर म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले भी बड़ी संख्या में अपराधी हो जाते हैं इसके पीछे दोहरे मार करने वाले कारक हैं एक तो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) वालों संस्कारहीन और अपराध को उकसाने वाला बेहूदा प्रदर्शन है दूसरा शून्य के लिए जद्दोजहद करता हीनभावना से ग्रस्त वो व्यक्ति जो अपराध से अपने अह को तुष्ट करता है। इसलिए बहुत आवश्यक है कि भारत को म्लेच्छपना से जल्द से जल्द मुक्त किया जाए एक परम विकसित भारत के निर्माण के निमित्त ।  

Friday, 18 September 2015

इन्सेफिलाइटिस - डेंगू का ईलाज डॉ चड्ढा नहीं ...

याद है मुंशी प्रेमचंद की कालजयी कहानी "मंत्र" जितनी बार पढ़ो नई लगती और हर बार उतनी ही भावुकता से आँखें भर आती हैं जितनी पहली बार पढ़ने में अनुभव होता है। डॉ चड्ढा के गोल्फ खेलने जाने के समय पर पर वो बूढ़ा अपने बीमार बच्चे को लेकर डॉ चड्ढा के क्लीनिक पर लेकर आता है लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वाले डॉ चड्ढा ने बड़ी निर्ममता से उसे अगले दिन देखने के कहते हैं और वो बच्चा जो बूढ़े माँ-बाप का इकलौता सहारा था, उसी रात दुनिया से विदा हो जाता है। कुछ वर्ष बार डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को साँप काट लेता है और वही बुड्ढा रात के दो बजे उसी डॉ चड्ढा के बेटे कैलाश को अपनी विधा से नई जिंदगी देता है। हालांकि उस बुड्ढे की बुढ़िया इसके लिए तैयार न थी लेकिन उसकी गज़ब की संवेदनशीलता उसे सोने तक नहीं देती वो बेचैन हो उठता है कभी बाहर कभी अंदर होता है लेकिन पत्नी के घोर विरोध के बावजूद अंत मे चल पड़ता है उस घोर अंधेरी रात में डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने। क्यों चल पड़ता है क्योंकि उसकी माँ ( मातृभाषा ) ने जमीर से समझौता करना नहीं सिखाया ही नहीं भले ही सामने वाला दुश्मन ही क्यों न हो ।

हमारा इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) बोलने वालो के पास जमीर नाम की चीज होती ही नहीं उन्हें अपने गोल्फ के आगे किसी की जान की भी कोई कीमत नहीं। हमारा प्यारा पूर्वाञ्चल हर वर्ष मस्तिष्क ज्वर से खून की होली खेलता है, दिल्ली डेंगू से मर रही है लेकिन म्लेच्छ बोली बोलने वाले डॉ चड्ढों को क्या चाहिए ? यही गरीब दुखियारे हैं जो अपनी जान पर खेल कर इस डॉ चड्ढों को करोड़पति बनाते हैं उनकी हर सुख सुविधा का ख्याल रखते हैं लेकिन बदले मे इन दुखियारों को क्या मिलता है कोई अपना बुढ़ापे का सहारा खो देता है, कोई माँ कोई बहन अपना सुहाग इन डॉ चड्ढों के छोटी-छोटी खुशियों के आगे न्योछवार कर देती है मामला यहीं खत्म नहीं होता उनका घर द्वार भी गिरवी हो जाता है बिक जाता है।

मैंने अपनी पिछली 1 सितंबर की पोस्ट मे उदधृत किया है मातृभाषा में व्यक्ति का मस्तिष्क पूरे 100% काम करता है, जबकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में 2% भी नहीं। जमीर भी दिमाग के एक कोने में ही होता है जो म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण उपयोग मे न आने के कारण मर ही जाता है वहीं मातृभाषा अपने परिवेश से सम्बद्ध होने का मंच तैयार करती है और पूरी तरह सक्रिय रहती है लिहाजा व्यक्ति का जमीर भी उसी मात्रा में सक्रिय रहता है जिसके कारण वो बुड्ढा अपनी पत्नी का विरोध करके डॉ चड्ढा के बेटे को बचाने उस घोर अंधेरी रात में निकल पड़ता है और तो और नई जिंदगी देने के बदले पैसे भी नहीं लेता है चुपचाप निकल लेता है।

डेंगू सहित लगभग सभी बीमारियाँ एलोपैथी के लिए लाइलाज है लेकिन कोई डॉ चड्ढा ये नहीं बताता ही नहीं। कोई दुखिया यदि इन चड्ढों के पास पहुँच गया तो क्या होता है सभी को पता है। एण्डोक्रईनोंलोजी मे पहले पन्ने पर लिखा है कि यदि आपको लगता है कि दवाई के बगैर आप जिंदा नहीं रह सकते तो ये "हार्मोनल डिसऑर्डर" है। मतलब दवाई खाना भी अपने आप में खतरनाक बीमारी है लेकिन कोई भी डॉ चड्ढा ये कभी नहीं कहता। वो जिंदगी भर दवा खाने को मजबूर करते हैं।

 डॉ स्वामी रामदेव चाहते तो डेंगू से करोड़ों बना सकते थे लेकिन उन्होने सार्वजनिक मंच पर मुफ्त में डेंगू की अचूक रामबाण दावा बताई। क्यों ? क्योंकि डॉ स्वामी रामदेव म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं बोलते ।     

Monday, 14 September 2015

मेरी मातृभाषा हिन्दी ने मुझे बहुत कुछ दिया है इतना कि मैं शोध कर सकूँ ...नई खोज कर सकूँ...दुनियाँ जीत सकूँ ...अपनी मानसिक क्षमता और दक्षता से हलचल उत्पन्न कर सकूँ ...उस हलचल को हजारों हजार लोगों ने प्रत्यक्ष अनुभव भी किया...मातृभाषाओं और हिन्दी के शत्रुओं का नाश कर सकूँ...शुभकामना नहीं... मेरा कोटि - कोटि नमन प्रिय मातृभाषा हिन्दी को...कोटिशः नमामि मातृभूमे, नमामि कोटिशः मातृभाषे..

Wednesday, 2 September 2015

पावहिं देख गरज सौभागी...तर्क कलह वितर्क बैरागी

हमसे कह रहे थे प्लीज़ हामिद अंसारी को बीच में घसीटिए तो मैंने उनको सफाई देते हुए उनसे पूछा ",,,वैसे तो मैंने ऐसा किया नहीं लेकिन आप क्यों कह रहे हैं ...?" वो बोले "...वो औरंगजेब के खानदानी नहीं  हैं ..." मैंने उनसे कहा "...खानदानी नहीं हैं तो क्या देश अगड़ रहा है और सिर्फ मुसलमान की पिछड़ रहा है ...?" उन्होने उत्तर दिया "...वो इस देश के उपराष्ट्रपति हैं ..." मैंने इसपर उनसे कहा  "...तो फिर उनको साबित करना चाहिए कि वास्तव में वो हैं..." ये सुनते ही वो उखड़ गए और लगभग चीखते हुए  बोले "...देखिये वो हैं और उनकी चिंता लजामी है ..." मैंने इस पर उनसे पूछा "...उनकी चिंता का जस्टीफ़िकेशन  औरंगजेब से होगा या डॉ कलाम से ...वैसे उनकी चिंता उसी समय क्यों हुई जब सड़क काम बदला गया ...?"  वो तो जैसे निरुत्तर ही हो गए बहुत सोचने के बाद बोले "...औरंगजेब ने दिल्ली पर राज किया था लिहाजा उसकी  भी चिंता लजामी हैं ..." मैंने उनसे तर्क करते हुए कहा "...इसका मतलब ये हुआ कि जिस घर मे डकैती पड़े उस  घर के मालिक डकैतों की चिंता करे उनके नाम पर अपने घर का नाम रख ले...?" वो ये सुन के परेशान हो गए लिहाजा वो सफाई मे बोले "...औरंगजेब डकैत नहीं था ..." मैंने कहा "...हाँ मैंने थोड़ा लिहाज करते हुए  डकैत कहा वो लुटेरा था, हत्यारा था और न जाने क्या क्या था ..." ये सुन कर वो फिर सफाई मे बोले "...लेकिन  मुग़लों ने भारत को बहुत कुछ दिया है ..." मैंने कहा "...भारत को ही नहीं विश्व को दिया है और जो दिया है ठीक  वही नमूना ISIS वाले प्रस्तुत कर रहे हैं ..." वो बहुत मजबूत तर्क देने की कोशिश मे बोले "....मुग़लों ने भारत को  बहुत कुछ दिया लालकिला दिया, ताजमहल, कुतुबमीनार दिया बहुत कुछ दिया .." मैंने इसके प्रतिउत्तर मे कहा "...बड़ा अजीब लगता है एक लुटेरा जब किसी भवन में लूट-पाट करने जाता है तो उस भवन को सजाता है, सवांरता और विश्व प्रसिद्ध बनाने का प्रयास करता है और लूट-पाट भी करता है ..." ये सुनते ही वो उखड़ गए और तैश मे बोले "...आपका मतलब ये सब मुग़लों ने नहीं बनवाया ...इतिहास मे लिखा है कि ताजमहल बनाने के लिए बुखारा (उज्बेकिस्तान) से मिस्त्री और बलूचिस्तान से करीगर बुलाए गए थे ..." मैंने उनके जवाब मे कहा "...इतिहास को तार्किक और प्रामाणिक होना चाहिए मनगढ़ंत नहीं ..." ये सुन कर वो चौंक गए बोले "...ये कैसे दावा कर सकते हैं इतिहास मे लिखा है वो तार्किक और प्रामाणिक नहीं है ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...कायदे से एक्सपर्ट मिस्त्री वही से आते हैं जहां पर वो अपनी विशेषज्ञता साबित कर चुके होते हैं तो जरा हमको ये बताईए कि बुखारा या पूरे उज्बेकिस्तान मे ताजमहल या उसके जैसी कितनी इमारतें थीं उस समय ...जवाब है एक भी नहीं ....बलूचिस्तान से करीगर बुलाए गए थे तो बलूचिस्तान मे कितने स्मारक हैं इस प्रकार के ... उत्तर है एक भी नहीं ...तब बताईए जब वहाँ इस प्रकार का कुछ था ही नहीं तो ऐसी विलक्षण इमारतों के लिए विशेषज्ञ कहाँ से पैदा हो गए ...ताजमहल निर्माण बारे मे तार्किक बातें सभी इमारतों पर समान रूप से लागू होते जिन्हें मुग़ल कहा जाता है ..." मेरा तर्क सुन कर वो सन्न रह गए फिर भी बोले "...लेकिन हामिद अंसारी की चिंता तार्किक है ..." मैंने साफ साफ कहा "...हो सकता है लेकिन व्यावहारिक नहीं ...नमस्कार " 

Monday, 31 August 2015

तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर ....

अरे भाई किसी को कोई खबर है कॉंग्रेस के नकली अध्यक्ष यानी उपाध्यक्ष कहाँ है ? अंतिम सूचना तक तो बकलोल बबुआ ढाई महीना पहले ही राजस्थान मे बिहार का चुनाव प्रचार कर काम खतम करके गायब हो गए अब पते नहीं चल रहा है वो है कहाँ। गधे के सर सींग गायब होते तो सुना था लेकिन कॉंग्रेस के सर से उपाध्यक्षवे गायब हो जाए ये पहली बार हो रहा है स्वतंत्र भारत के इतिहास में। मैंने एक खाँटी भाई कोंग्रेसी जो घनघोर बरसात में पता नहीं अपनी लंगोटी उबाल रहे थे, सुखा रहे थे या फूँक रहे थे, कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा था, मैंने उनसे पूछा "...आपके नकली अध्यक्ष का अता-पता नहीं चल रहा ...कहाँ हैं वो...?" खाँटी भाई प्रश्न सुन कर जैसे सनपात गए खुद को मुश्किल से संभालते हुए बोले "...देखिये वो अपने तय कार्यक्रम के अनुसार ही बिहार में चुनाव प्रचार करेंगे ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...बिहार मे बांग-दंगल अपने चरम पर है और वो हैं कि पता नहीं किस चरम सुख की तलाश कहाँ लटक रहे हैं ...?" खाँटी भाई बोले "...जिस तरीके से बिहार मे DNA पर घमासान मचा है उससे वो दुखी हैं ..." मैंने उसी आश्चर्य से पूछा "...काहें भाई ...?" खाँटी भाई बोले "...सबका DNA सैंपल जांच के लिए भेजा जा रहा है ..." मेरा आश्चर्य कम नहीं हो रहा था सो मैंने पूछा "...तो इसमे भेजा खराब होने वाली कौन सी बात है ... उनका भी DNA लेकर जांच के लिए भेजने की योजना है क्या ...?" खाँटी भाई बोले "...ऐसा तो कोई प्रस्ताव नहीं है ..." मैंने प्रश्न दागा "...जब प्रस्ताव नहीं है तो फिर बिहार मे वो ताव क्यों दिखा नहीं रहे है ...?" खाँटी भाई बोले "...मामला DNA टेस्ट का नहीं लेकिन DNA का ही है ..." मुझे फिर आश्चर्य हुआ पूछा "...कैसे ..?" खाँटी भाई बड़े संजीदा हो कर बोले "...DNA बोलने से NDA का ही प्रचार होता है केवल D और N के स्थान मे फर्क है ..ये जनता परिवार के जोकर समझ नहीं रहे..." मैंने संतोष जताते हुए खाँटी भाई से कहा "...ओSS तो ये बात है मतलब कुश्ती मोदी के अखाड़े मे और मोदी के ही पैंतरे पर लड़ी जा रही है जिसके मोदी माहिर खिलाड़ी हैं..." खाँटी भाई आगे शायराना अंदाज  बोले "...कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी वरना यूं नहीं कोई बेवफा होता ..." मैंने सांत्वना देते हुए कहा "...इसीलिए गीली लंगोटी सूख नहीं रही या फुंक नहीं रही ..." खाँटी भाई बोले "...अब जो कॉंग्रेस के फायदे मे है केवल वही करना है..." मैंने कहा "...मतलब यदि बिहार के दंगल वो ताव दिखाते हैं तो NDA को बोनस मिल सकता है ..इसीलिए जनता परिवार के जोकर उन्हें बिहार आने नहीं दे रहे ..." मैंने खाँटी भाई को कहा नमस्कार... 

Sunday, 30 August 2015

मन चंगा तो पटना में दरभंगा...
पार्ट 2
बिहार की राजनीति लाठी से हट कर लुआठी पर आ गई है। सारे सिक-उल्लूरिस्टवे भरसक प्रयास कर रहे हैं कि उस लुआठी से सर की टोपी न फुंकाए। ईसीलिए उसमे बड़े-बड़े टल्ली जिसमे ई-कामर्स ई-गवर्नमेंट की तर्ज पर ई-टल्ली भी शामिल हैं। जब ई-टल्लियों को देखने-सुनने बिहार जनता गांधी मैदान नहीं पहुंची तो टोपी को दोष देने के बजाय जिसे कोसने लगे वो तो कोसों दूर था। मैंने एक राजद पहलवान से इस बारे मे पूछा तो गुस्से मे कहने लगे "...आप लोग समझते क्यों नहीं ये ऐतिहासिक रैली थी..." मैंने कहा "...हम तो समझबे करते हैं लेकिन जनता समझे तब न ..." राजद पहलवान का गुस्सा फिर कम नहीं हुआ बोले "...बिहार जनता स्वाभिमानी है वो किसी के बहकावे मे नहीं आने वाली ..." मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...लेकिन आम-लीची का मौसम तो कबका चला गया कटहल भी पक कर पूरा बड़ा सा कटहर हो गया है ..." राजद पहलवान फिर तैश में आकर मुझसे पूछे "...आपका मतलब उसी कारण से जनता नहीं आई...?" मैंने फिस्स से हँसते हुए कहा "..आपे तो कह रहे हैं बिहार की जनता किसी के बहकावे मे नहीं आने वाली ..." ये सुन कर राजद पहलवान चौक गए फिर पूछा "...आपका मतलब क्या है ...?" मैंने फिस्स वाले हंसी के साथ उनसे पूछा "...बिहार की जनता का स्वाभिमान तो आमे-लीची है कटहलवो अब कटहर हो गया तो बचा ही क्या अब...?" तभी कहीं से टहलते हुए खाँटी भाई काँग्रेसी और जद्दू नेता भी आ धमके जद्दू नेता खुद को होशियार जताते हुए बोले "...बिहार की जनता का कोई अपमान करे ये जनता बर्दाश्त नहीं करेगी ..." मैंने जवाब देते हुए कहा "...हाँ इसीलिए तो कोआ खाने लोग आए नहीं ..." ये सुन कर जद्दू नेता खाऊरा गए उनको शांत करते हुए खाँटी भाई बोले "...देखिये बिहार की जनता का DNA का मुद्दा चुनावी नहीं होना चाहिए था ..." मैंने उनको याद दिलाते हुए कहा "...आपके आज के नकली अध्यक्ष यानी उपाध्यक्ष ने भारत के लोगों के DNA का मुद्दा उठाया था ...वैसे बिहार की जनता के DNA की बात नहीं बल्कि केवल ईटल्लियों के DNA का मुद्दा है ..." ये सुनते ही खाँटी भाई भी भड़क गए बोले "...हालांकि आपको इटली कहने का अधिकार नहीं इटली को ईटल्ली कहना आपकी हिमाकत है ..." मैंने भी खाँटी भाई को उसी टोन मे जवाब दिया कहा "...यहा पर जनता अब पाकल कटहर खाने नहीं आने वाली नजारा आपके सामने हैं.." ये सुन कर राजद पहलवान जैसे हिल गए लेकिन खुद को काबू करते हुए बोले "...देखिये बिहार मे हम सरकार बनाने जा रहे हैं ..." मैंने आश्चर्य जताते हुए कहा "...अच्छा लेकिन NDA को तो 140 से 180 के बीच सीटें मिलने जा रही है ...तो आप अल्पमत की सरकार बनाएँगे ...?" राजद पहलवान भड़क कर बोले "...हम ही सरकार बनाएँगे ...हम सीटें जीतेंगे ...हम ईमानदारी की वो मशाल हैं जो रास्ता दिखा दे ..." केजरीवाल छाप आदमी पीछे खड़ा था लेकिन उसकी हिम्मत नहीं हुई कुछ बोलने की ... 

Wednesday, 26 August 2015

भारत के खिलाफ एक गहरी साजिश

अचानक ये क्या हो गया उधर नेपाल जो हिन्दू राष्ट्र की ओर फिर से बढ़ रहा है हिंसा की चपेट मे आ गया, इधर गुजरात जो सबसे अधिक शांत और प्रगतिशील है अचानक हिंसा की चपेट आ गया "पटेल आरक्षण" तो महज एक बहाना है। उधर नेपाल मे चीन और पाकिस्तान दोनों प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताया जा रहा है। अभी कुछ ही दिन पहले ये खबर मिली थी कि चीन तिब्बत मे अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए कुछ ठोस उपाय कर रहा है मसलन अभी कुछ दिन पहले ICT के माध्यम से ख़बर आती है कि चीन ने तिब्बत मे सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। गुजरात मे अचानक तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटती है और दूसरे दिन ही हिंसा पर उतारू हो जाती है जिसे शांत करने के लिए सीआरपीएफ़ की तीस कंपनियाँ भेजी जाती हैं। ध्यान देने वाला तथ्य ये है कि ये सब प्रधानमंत्री के UAE की बेहद सफल यात्रा के बाद ये सब अचानक हो रहा है।

गुजरात हिंसा को प्रायोजित करने के लिए केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को आगे किया जाता जिसकी उम्र मात्र 22 साल बताई जा रही है। आखिर इतनी सफल रैली को हिंसा पर उतारू होना पड़ा ये अपने आप मे आश्चर्य का विषय है। वियसे मामला ये गुजरात का ही है पटेल इतने समृद्ध है कि ये 80% हीरे के कारोबार में हैं। अहमद पटेल और अरविंद केजरीवाल के अतिरिक्त किसी भी किसी पटेल ने आरक्षण की मांग कभी नहीं की यहाँ तक कि "सरदार वल्लभ भाई पटेल" ने भी नहीं। जो दूसरों के लिए बैसाखी है वो कूद बैसाखी पर चलेगा ये बात व्यवहारिक और तार्किक स्तर पर हजम नहीं होती।

आखिर ये पटेल आरक्षण का विषय तो गुजरात का था तो फिर जनता भी गुजरात की ही होनी चाहिए तार्किक रूप से और यदि जनता गुजरात की थी तो फिर हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण क्यों देना पड़ा? और फिर यदि उनके अपने समुदाय के लिए आरक्षण की मांग करनी थी तो फिर नितीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू बीच मे कहाँ से आ गए ? मतलब जो तीन-साढ़े तीन लाख की भीड़ जुटी थी वो गुजरात की स्थानीय भीड़ नहीं थी यही नहीं वो भीड़ ऐसी थी जो अधिकांशतः गुजरती भाषा नहीं जानती थी लिहाजा केजरीवाल के चेले हार्दिक पटेल को हिन्दी मे भाषण देना पड़ा। एक स्थानीय नागरिक बता रहे थे कि भीड़ काफी हद तक तक अपरिचितों का समूह लग रहा था हालांकि ऐसे लोगों की भी कुछ संख्या थी जो जिज्ञासा वश रैली मे आए थे उनको आरक्षण से कोई लेना देना नहीं।

कुछ लोगो का मत है कि स्थानीय पटेल समुदाय अहमद पटेल, अरविंद केजरीवाल और उसके चेले हार्दिक पटेल का साथ देने को तैयार ही नहीं है लिहाजा उनको जबरदस्ती जोड़ने के लिए आज ही रैली के ठीक दूसरे दिन गुजरात बंद का आयोजन करना पड़ा। भाड़े की भीड़ से तोडफोड कारवाई गई जिससे पुलिस को स्थानीय लोगों पर कार्यवाही करनी पड़े और स्थानीय जनता मे सरकार के खिलाफ आक्रोश पैदा हो जिससे साथनीय पटेल समुदाय जबरदस्ती ही सही आंदोलन से जुड़े। पटेल समुदाय को भली भांति पता है कि उसे आरक्षण संभव नहीं लिहाजा उनके आंदोलन जुडने का सवाल ही नहीं उठता । जो कुछ भी अचानक हुआ वो निश्चित रूप से गहरी साजिश की ओर इशारा करती हैं।

नेपाल की हिंसात्मक अशांति, गुजरात नकली आरक्षण के मांग पर मे हिंसक आंदोलन,  तिब्बत मे चीन की सक्रियता, जम्मू-कश्मीर पाकिस्तानी घुसपैठ के प्रयासों मे अचानक तेजी, पाकिस्तान की ओर से एलओसी पर युद्ध विराम का उल्लंघन, यूएई से 31 मामलों पर सहयोग और सहमति पर हस्ताक्षर के बाद अचानक ये सब। ये सब अचानक उस समय जब भारत तेजी से आर्थिक विकास की विकास की ओर अग्रसर है।

Monday, 24 August 2015

नेनुआं पूजे बीन-बीन, कोआ हई मोटाय ...

बिहारी बाबू घर के चौखटवे पर नेनुआं पूजने से बाज नहीं आ रहे...सदी के महा-नाई भी किसी जमाने मे नेनुआं का टेम्पू हाई करने उतरे थे लेकिन जल्दी उनको औकात का पता चल गया और लग गया कि नचनियों-गवनियों की मानसिक हैसियत नेनुआं पर तेल चुआने से अधिक नहीं होती और ऐसे लोगों को प्रतिभाशाली मान कर जो लोग पूजते है उनकी बुद्धि तो दऊरी मे नेनुआं से अधिक नहीं। बिहारी बाबू जब अपने चौखट पर नेनुआं पूज रहे थे तभी किसी ने पीछे से कोई बहुत बड़ा सा कोआ फेक कर भाग गया। बिहारी बाबू के पीठ पर गद्द से लगा भी लेकिन वो ऐसे हैं कि इसे बुरा नहीं माना, भाई बड़े दिल वाले हैं। मैंने बिहारी बाबू से पूछा तो चीखते हुए बोले "...ओए! मैं बड़े दिल का नहीं, बहुत छोटे दिल का हूँ ..." वहीं एक जाफना से लौटा आदमी भी था उनकी आवाज का कायल रजनीकान्त इस्टाईल मे टिप्पणी करते हुए पूछा "...आईयो ! आपका दिल कबसे चोट्टा जी ...?" बिहारी बाबू चौंक गए असलियत सामने आ गई अनजाने ही सही "...ओए ! ...." अभी वो आगे कुछ कहते तभी मैंने एक डायलाग दाग दिया अपने इस्टाईल मे "...जली को बत्ती कहते हैं बुझी को लिट्टी कहते हैं ..." तभी जाफना बाबू बोल पड़े "...आईयो ! जिसका पेट उल्टा उसको कट्टी करते जी ..." बिहारी बाबू खऊरा कर चिल्लाए "...ओए ! हमारी पीठ पर कोआ गद्द से लगा फिर भी कोआ नहीं फूटा ..." मैंने बिहारी बाबू से पूछा "...तो..." बिहारी बाबू चिघ्घाड़ते हुए बोले "...ओए ! तो किसकी इतनी मजाल कोआ फूटा नहीं और हमको गद्दार कह दे ..." मैंने टांट कसते हुए कहा "...वो आपकी पीठ पर गद्द से लगा था न इसलिए ..." बिहारी बाबू चिल्लाए "...ओए ! कोआ पीठ पर गद्द से लगा जरूर लेकिन मैंने कोआ खाया तो नहीं..." मैंने कहा "...तो आप कोआ फेकने वाले पर खऊराए क्यों नहीं ..." तभी जाफना बाबू बोले "..आईयो ! कोआ खा के गद्दा पर नई सोना जी ..." बिहारी बाबू बोले "...ओए! तो क्या गद्दा पर सोना भी गद्दारी ...." जाफना बाबू बोले "...आईयो ! वो गद्द-गद्द करता इसलिए जी ...कोआ खा के गद्दा पर नई सोना जी ...पेट उल्टा जी ..." तभी जफना बाबू जयललिता के फिल्म का गाना गुनगुनाते हुए नेनुआं पूजने की प्रक्रिया शुरू करने लगे और बिहारी बाऊ पता नहीं किसको फोन लगाने लगे सबसे छिप कर ...मैंने जफना बाबू से कहा "...बिहारी जयललिता को पसंदे नहीं करते बेकार मे बिहारी बाऊ कोआ खाने के पीछे पड़े हैं ..." जफना बाबू जयललिता के फिल्म का गाना गुंनगुनाते रहे ....

Sunday, 23 August 2015

DNA झक चमाचम, RNA चमन घुमाय ...

संसद का मानसून सत्र कांग्रेसी आतंकवाद का शिकार हो गया। खाँटी भाई कांग्रेसी बता रहे थे कि उनके नकली अध्यक्ष यानी उपाध्यक्ष जब से विपष्णा से लौटे हैं तभी से आतंकवाद को सीने चिपकाए लोट रहे हैं। लेकिन कमाल देखिये किसी भी सिक-उल्लूरिस्ट आतंकवादी ने अभी तक मानहानि का दावा नहीं ठोका बकलोल बबुआ के खिलाफ । वैसे भी बकलोल बबुआ इस्केप वेलोसिटी से लेकर इण्डिया के जेनेटिक इंजीनियरिंग पर लंबा चौड़ा लेक्चर झाड़ चुके है कुछ लोग जो कॉंग्रेस मे दिलचस्पी रखते हैं, बताते हैं कि वो अभी भी झाड रहे हैं। वैसे तो कॉंग्रेस का आतंकवादियों से DNA मैचिंग का खुलासा तो 26.11 के समय ही हो गया था जब अजमल कसाब चंपाया था  लेकिन उसकी पुष्टि तब हुई जब नावेद पकड़ मे आया। ये DNA मैचिंग बिहार होता हुआ केजरीवाल तक पहुंच चुका है इसी रिश्तेदारी के कारण आतंकवादियों ने बकलोल बबुआ के खिलाफ मुक़द्दमा नहीं ठोंका। मैंने एक खाँटी भाई कोंग्रेसी से इस बारे मे पूछा तो चिल्लाते हुए कहने लगे "...नावेद से हमारी कोई रिश्तेदारी नहीं है ..." मैंने पलट कर पूछा "...लेकिन नावेद की हरकतें तो काँग्रेस सहित सभी सिक-उल्लूरिष्टों से पूरी तरह क्यों मिलती हैं ...? खाँटी भाई काँग्रेसी ये सुनते ही तिलमिला गए फिर उन्होने पलट कर मुझसे पूछा "...आपका ये निष्कर्ष किस आधार पर है ...?" मैंने कहा "...वो भी काँग्रेस सहित सभी सिक-उल्लूरिस्टों की तरह ही बहुत डरपोंक है ..." खाँटी भाई ने फिर मुझसे पूछा "...ये आपको कैसे पता ...?" मैंने उनको संतुष्ट करते हुए कहा "...चर्चा ऐसी है कि पुलिस के अधिकारी बाल ठीक करने करने के लिए भी हाथ उठाते हैं तो नावेद चिल्लाने लगता है मुझे मत मारो-मुझे मत मारो मैं सबकुछ सच-सच बताता हूँ ठीक वैसे ही जैसे मोदी जी को देखकर काँग्रेस सहित सभी सिक-उल्लूरिस्टवे चिल्लाने लगते हैं ..." खाँटी भाई ये सुनकर और तिलमिला गए बोले "...हम सब सेकुलरिस्ट एक है वो चाहे नितीश हों, लालू हों, केजरीवाल हों या फिर कम्युनिस्टवे..." इसपर मैंने तपाक से कहा "...सिक-उल्लूरिस्ट आतंकवादियों को क्यों छोड़ रहे हैं? वैसे भी संसद सरकार एक कागज भी उठाती थी काँग्रेस सहित सभी सिक-उल्लूरिस्टों को लगता था कि कोई खतरनाक बिल है और वो चिल्लाना शुरू कर देते थे ...राजमा-ता तो आत्महत्या करने के इरादे से कुएं मे कूद गईं थीं..." खाँटी भाई दार्शनिक अंदाज मे बोले "...आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता ..." मैंने कहा "...वही तो मेरा कहना है आतंकवादी भी सिक-उल्लूरिस्ट ही होते हैं ..." खाँटी भाई खऊरा कर बोले "...आपको इंडिया का DNA नहीं पता ..." मैंने उस पर कहा "...भारत का DNA तो बहुत शानदार और जानदार है लेकिन सारे सिक-उल्लूरिस्टों  ने मिलकर RNA ही गड़बड़ कर दिया है लिहाजा बकलोल बबुआ को जेनेटिक इंजीनियरिंग सहित इस्केप वेलोसिटी पर ऊंघटापैन्ची करना पड़ रहा है संसद मे आतंक मचा कर..." इसके बाद खाँटी भाई कुछ बोले नहीं ....

Friday, 21 August 2015

लीलै धोति गज़ब नूरानी, मारहिं लात पावहि अनजानी....?

लालू नितीश सहित भ्रष्टाचार का झण्डा बुलंद करने वाले जनता परिवार का DNA केजरीवाल मे इतनी सहजता से मिलेगा इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। मिलेगा ये तो सबको पता था लेकिन इतनी सहजता से, इसकी उम्मीद सिवाय मेरे किसी और को उम्मीद नहीं थी। इसीलिए मैंने 13 फरवरी 2015 को ही कह दिया था "...केजरीवाल स्वभाविक रूप से भ्रष्टाचारियों और भ्रष्टाचार का नेतृत्व करेंगे..."। इसके साथ-साथ सभी अपनी स्वभाविक वृत्ति के प्रदर्शन के लिए स्वभाविक हरकत भी करेंगे। केजरीवाल लोगों के पिछवाड़ा खोज कर बड़े आराम से और बिल्कुल सही जगह पर लात इतना ज़ोर से और कायदे से लात मारते हैं कि लात खाने वाला लतख़ोर के पास पलटवार करने का कोई उपाय नहीं होता और साथ ही जिंदगी भर केजरीवाल के लात को याद भी रखता है । पिछवाड़ा खोजने मे केजरीवाल माहिर हो चुके हैं जिसका प्रदर्शन अभी कुछ दिन पहले प्रशांत भूषण, योगेंदर यादव किसी जमाने मे बड़े ही अनन्य रहे प्रोफेसर साहब और भी बहुत से बेहद करीबी लोगों पर आजमाया और सफलतापूर्वक आजमाया। एक आपिया बहुतबुद्धिमान बता रहे थे "...करीबी लोगों का पिछवाड़ा हमेशा अपने पास रखना चाहिए..." मैंने उनसे आश्चर्य से स्पष्टीकरण लिया"...आप उसके अपवाद नहीं तो नहीं न "...आपिया बहुतबुद्धिमान ने उत्तर दिया "...जी हम और आपिया सुप्रीमो ठीक बराबर लेन-देन पर काम करते हैं..." मैंने कहा "...लेकिन कभी मुन्ना हज़ारे तो केजरीवाल को उनके पिछवाड़े लात मार पाए ..." आपिया बहुतबुद्धिमान हँसते हुए बोले "...लात मारने मे केजरीवाल माहिर हैं हज़ारे -खुजारे नहीं..." मैंने उनसे पूछा "..लेकिन इसके बावजूद आप-ने हज़ारे जी की टोपी झटक ली...?" आपिया बहुतबुद्धिमान बोले "...ये उनकी टोपी नहीं है ..." मैंने कहा "...अगर टोपी का क्लोन नहीं है तो निश्चित रूप से धोती फाड़ के ये आपिया टोपी बनी है ...?" मेरी बात सुन कर आपिया बहुतबुद्धिमान बिना असहज हुए बड़ी निर्लज्जता से बोले "...वो धोती ऐसी है कि उसके फटने इज्जत पर कोई असर नहीं होता ..." मैंने कहा "...मुन्ना हज़ारे को केजरीवाल जब लतियाए थे तब उतने एक्सपर्ट नहीं थे लेकिन ..." आपिया बहुतबुद्धिमान बीच मे बात काटते हुए बोले "...लेकिन क्या ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...लेकिन मुन्ना हज़ारे लात खाने मे माहिर निकले धोती फट कर टोपी बनने के बावजूद  ..." आपिया बहुतबुद्धिमान से रहा नहीं गया "...बहुत जल्द आप युक्त भारत होगा ..." मैंने टांट कसते हुए कहा "...केजरीवाल ने मुन्ना हज़ारे, योगेंदरादि, जन लोकपालादि को लात मार कर ठिकाने लगा दिया है उसके बाद नीतीश लालू की बारी है ..उसके बाद बिहार की जनता की बारी आएगी लात खाने की ...दिल्ली की जनता तो लात खा ही रही है ...." आपिया बहुतबुद्धिमान मुझे घूरने लगे तो मैंने वहाँ से भाग लेना बेहतर समझा ...   

Tuesday, 18 August 2015

भारत की जबरदस्त कूटनीतिक जीत

भारत के लोकप्रिय और हम सबके चहेते प्रधानमंत्री नरेंद्र भाई मोदी ने अपनी 16-17 अगस्त दो दिवसीय संयुक्त अरब अमीरात यात्रा कई मायनो बेहद महत्वपूर्ण रही और विश्व इतिहास में अबतक की सबसे सफल कूटनीतिक यात्रा है। ये यात्रा इस मायने मे भी बेहद महत्वपूर्ण है जब पाकिस्तान अपनी आतंकवाद नीति को न सिर्फ नए सिरे से परवान चढ़ा रहा है बल्कि इसके लिए उसे अब चीन का खुला समर्थन भी हासिल होने लगा था कारण एक तो भारत मे सबसे तेज और जबरदस्त आर्थिक विकास दूसरे चीन का कई मोर्चों पर भारत द्वारा सीधे पटखनी दे देना मसलन बांग्लादेश मे चीन का नौसेना बेस खत्म, हिन्दमहासागर में चीन का दबदबा खत्म होने के साथ दक्षिणी चीन सागर में भी भारत का सीधा और प्रभावी हस्तक्षेप सुनिश्चित और मंगोलिया को भी अपने पक्ष मे करने के कारण चीन एक तरह से भारत से बौखलाया गया था लिहाजा वो किसी भी कीमत पर पाकिस्तान के माध्यम से भारत के माध्यम से अस्थिर करने की कोशिश कर रहा था। यूएई की सफल यात्रा ने पाकिस्तान के माध्यम से चीन नापाक मंसूबों को एक झटके में ध्वस्त करके रख दिया।

यूएई कई मायानों में भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है आप तीसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझीदार की बात छोड़ दीजिये ये तो प्रत्यक्ष तथ्य है। व्यापारिक साझीदारदार होने बावजूद यूएई भारत के लिए एक समस्या भी रहा है इसीलिए भारत का कोई प्रधानमंत्री आधिकारिक तौर पर यहाँ के यात्रा करने से बचता रहा है लिहाजा अप्रत्यक्ष समस्यापरक तथ्य ये है कि भ्रष्टाचारी दुबई को काला धन संग्रह हेतु मार्ग का इस्तेमाल करते थे और हवाला का ऑपरेशन भी यहीं से होता था कहने की जरूरत नहीं कि इसमे दाऊद के कितना बड़ा योगदान था। हवाला का ऑपरेशन भी मोदी जी की यात्रा के बाद ये सब बंद हो गया। हवाला ऑपरेशन बंद होने का मतलब बेहद महत्वपूर्ण इसलिए है कि इसी के माध्यम से भारत विरोधी आतंकवादी और गैरआतंकवादी शैक्षणिक, राजनीतिक, सामाजिक गतिविधियों के संचालन के लिए भी इसी माध्यम से बहुत बड़े स्तर पर आर्थिक मदद तो होती ही थी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा यूएई से ही पूरा होता था ठीक भारत विरोधी आतंकवाद के संचालन के नाम पर। ऐसा नहीं है कि हवाला का उपयोग केवल गलत लोग ही करते थे सही लोग भी कर चोरी के लिए इस रैकेट का उपयोग करते थे जिससे राजस्व का भारी नुकसान होता था वो सब अब बंद हो गया लिहाजा भारत विरोधी काम करने वाली संस्थाएं एनजीओ, सामाजिक - राजनीतिक संगठन, शैक्षणिक संगठन, कुछ मीडिया समूह आदि के लिए अब अच्छी ख़ासी मुसीबत होने वाली है।

बहुत कम लोगों को पता है कि दुबई मे आईएसआई की तूती बोलती थी इसीलिए दाऊद पाकिस्तान से अधिक सक्रिय दुबई मे रहता था कहा ये भी जाता है कि दुबई ही दाऊद का घर हुआ करता था और वही से अपने काले कारोबार को संचालित भी करता था। जिस तरीके से कल संयुक्त घोषणा पत्र जारी हुआ उससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आईएसआई, दाऊद और पाकिस्तान के लिए कितना बड़ा झटका है। वस्तुतः ये समस्याएँ ऐसी थीं कि भारत को एक प्रकार से दीमक की तरह चाट रही थीं हर स्तर पर इस यात्रा से उस दीमक को मौत के घाट उतार दिया गया है।

यूएई मंदिर के लिए भूमि आवंटित करने को तैयार हो गया है विश्व इतिहास मे ऐसी जीत संभवतः खोजने से भी न मिले। यूएई के पश्चिम मे ISIS का नंगा नाच चल रहा है वही ISIS ने 2020 तक लक्ष्य तय किया भारत के खिलाफ। यूएई मे मंदिर का बनने का प्रस्ताव ISIS के मुंह पर जोरदार तमाचा है। ये स्पष्ट संकेत उनके लिए भी है जो भारत मे समय-समय पर भारत के खिलाफ जहर उगलते रहते है ओवैसी जैसे लोग यदि थोड़ा भी समझदार होंगे तो इशारा समझ जाएंगे।

नेपाल का हिंदूराष्ट्र की ओर बढ़ना और यूएई मे मंदिर बनना आगामी विधानसभा चुनावों पर इनका जबरदस्त असर देखने को मिलने पूरे आसार हैं। कहा तो ये भी जा रहा है कि अगर भाजपा यदि बिहार का चुनाव जीत जाती है है तो देश बहुत बड़े बदलाव की ओर अग्रसर हो जाएगा जिसे किसी भी तरीके से रोक पाना राष्ट्रविरोधी तत्वों के लिए असंभव हो जाएगा। संकेत भी पूरी तरह स्पष्ट हैं।         

Monday, 17 August 2015

हाहाकार पुतरू हुआं-हुआं...नामुमकिन हश्र नमकीन 

मैंने एक पखवाड़ा पहले ही अपने 31 जुलाई 2015 की " बिलार मारे खोईचा...सियार सीकर मंसा..." शीर्षक पोस्ट में पोस्ट मे दाऊद के हश्र का स्पष्ट उल्लेख कर दिया था। जैसे दाऊद के गुर्गे की फांसी पर जैसे सिक-उल्लूरिस्टों के सीने पर साँप लोट रहा था और मातम मना रहे थे उससे भी भयानक स्थिति अब होने वाली है सिक-उल्लूरिस्ट नेता-नूती सहित कमीडिया घरानो के पुतरूहाहाकारों का मातम तो अब देखने लायक होगा। मीडिया अब पूरे अपने फार्म मे होगी उसके पुतरूहाहाकारों का वास्तविक हाहाकार अब वास्तव मे देखने लायक होगा। एक कॉंग्रेसी दाऊद द्वारा घोषित देश के नामी कमीडिया हाऊस के पुतरूहाहाकार मुझे बता रहे थे "...मोदी ने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली ..." मैंने उनसे पलट कर पूछा "...तो हाहाकार आप इसलिए मचाए हैं...?" कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हम पुतरूहाहाकार नहीं पत्रकार हैं समझे ...!." मैंने भी उनको उसी टोन मे जवाब देते हुए प्रश्न दाग दिया "...दाऊद के हश्र का गुस्सा मेरे ऊपर क्यों उतार रहे हैं ... वैसे कुल्हाड़ी आप ही लेकर गए थे क्या वहाँ...?" कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...ये ठीक नहीं है..." मैंने चुटकी लेते हुए कहा "...अब डाऊन को पकड़ना मुश्किल नहीं नमकीन है ..." कमीडिया विशेषज्ञ असहज हो गए सुधार करते हुए बोले "...वो डाऊन नहीं डान है,  नमकीन नहीं नामुमकिन..." मैंने कहा "...प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के बाद डान डाऊन बन चुका है और नामुमकिन तो बस अब नमकीन है जब चाहो खा लो चटखारे ले कर..." सिक-उल्लूरिस्ट पुतरूहाहाकार  मुझे चेताते हुए बोले "...ये देश के लिए ठीक नहीं बिहार चुनाव के बाद ये करते तो ठीक होता ..." मैंने कहा "...इसीलिए आप पत्रकार नहीं पुतरूहाहाकार हैं वो तो अभी होना ही था क्योकि मैंने वो 31 जुलाई का लेख भी प्रधानमंत्री को भेज दिया था ..." पुतरूहाहाकार बोले "...वो हमारी बात नहीं सुनते आपकी बात क्यों सुन रहे रहे हैं ...?" मैंने सहजता से उत्तर दिया "...क्योकि मैं पुतरूहाहाकार नहीं हूँ ..." कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हर किसी को डाऊन करने से देश नहीं चलेगा ..." मैंने कहा "...कुछ लोगों को डाऊन नहीं किया गया था इसीलिए देश विकास नहीं कर रहा था ...जैसे सिक-उल्लूरिस्ट आप-कोंग्रेस-कम्युनिस्ट डान ...कमीडिया आन ...." पुतरूहाहाकार कमीडिया विशेषज्ञ ये सुन कर दहल गए कमरे मे कुर्सी से उठकर तेजी से इधर-उधर टहलने लगे ऐसे चिंतमग्न हो गए जैसे किसी का आर्थिक श्रोत बंद हो जाता है ....मैंने उनसे कहा "...अब तो हवाला कारोबार भी ख़त्म ...पैसा हजम ...कमीडिया खेल खत्म ..." कमीडिया विशेषज्ञ परेशान हो कर अंदर कमरे मे भाग गए....

Thursday, 13 August 2015

घीव जियावे गोईठा, पहलवान लंदन बाम

बकलोल बबुआ के आदेश पर खाँटी भाई कोंग्रेसीयों ने खूब गोईठा पर घी चुआया इतना चुआया कि गोईठा भी घी पी कर मस्त हो गया। ऐसा गोईठा देख कर बकलोल बबुआ और राजमा-ता दोनों फूल कर तुम्बा हो गए, ये देखकर एक खाँटी भाई ने कहा मज़ाक मे ही सही "...लगता है राहुल जी का भी सीना 56 इंच का हो गया है,,," लेकिन खाँटी भाईयों ने इसे सत्य मान कर सती होने व्रत ले लिया। लेकिन समस्या ये खड़ी हो गई थी कि सती होने के लिए विधवा होना जरूरी है लेकिन कमाल हैं खाँटी भाईयों ने इसका भी हल खोज निकाला पूरी की पूरी कॉंग्रेस को ललित मोदी को भगोड़ा घोषित कर कॉंग्रेस को विधवा बना डाला जिससे बकलोल बबुआ और राजमा-ता के इशारे पर कॉंग्रेस को सती होने का सौभाग्य मिल गया। लेकिन सती प्रथा भारत मे प्रतिबंधित है इसका पता चलते ही खाँटी भाईयों को तो मानो साँप ही सूंघ गया लिहाजा बहस के लिए तैयार हो गए। बहुत से खाँटी भाई कोंग्रेसी बेहोश होते - होते इसलिए बचे क्योकि उन्हे बताया गया "...साँप ने सूंघा ही है डँसा नहीं ..."। खाँटी भाई कोंग्रेसी लोग अब बकलोल बबुआ और राजमा-ता को घेर कर सती होने से पूर्व का कालबेलिया (म्लेच्छ बोली अंगरेजी मे नागिन डांस) करने के लिए बिलकुल तैयार थे। मैंने खाँटी भाई से पूछा "...बकलोल बबुआ और राजमा-ता को बचाने क्या तुक...?" खाँटी भाई बोले "..आखिर सती होने के बाद घी पिया गोईठा सुलगाने के लिए कोई जगह तो चाहिए ..." खाँटी भाई की बातों मे दम था आखिर मातम के दौर मे सुलगते गोईठे का धुआँ कई मायनों में बहुत बड़ा सहारा होता है जिसके आधार पर सती को वीरगति घोषित करके हमेशा लोगों को सिक-उल्लूवाद से जोड़कर उल्लू बनाया जा सके। मैंने खाँटी भाई से पूछा "...आखिर सती होने के लिए आपने पूरे सत्र का इंतजार किसलिए किया ...?" खाँटी भाई बोले "...शुरू मे सती होने पर सजा हो सकती थी हम अपराधी सिद्ध हो जाते लेकिन अंत में होने पर हमे वीरगति का दर्जा मिलने की उम्मीद थी ..." मैंने कहा "...लेकिन अंत में भी वही हुआ जिसके कारण आप शुरू में ही डर रहे थे..." खाँटी भाई उम्मीद भर कर विश्वास से बोले "... हम खुद को वीरगति साबित कर के रहेंगे ..." मैंने कहा "...लेकिन अब तो विधवा का भी खिताब कॉंग्रेस से छिनने जा रहा है ..." खाँटी भाई के पास उत्तर तैयार था बोले "...जिसको ये सरकार भारत ला रही है वो ललित मोदी नहीं उसका भूत है ..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...तो फिर कुत्तारोची, एंडरसाँड, अदिल ही काँग्रेस असली ललित मोदी थे ...?" ये सुनते खाँटी भाई सकपका गए और लगे गोईठा चमकाने मेरे बहुत कुछ पूछने पर वो कुछ नहीं बोल रहे थे ...     

Sunday, 9 August 2015

एक शाश्वत परिवर्तन बिहार की अगुवाई मे
बिहार ने हमेशा से ही देश की राजनीति को नई दिशा दी है। जून 1975 को गांधी मैदान से लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने गैर काँग्रेसवाद की शुरुआत की। ये आंदोलन इतना प्रचंड था की काँग्रेस की चूले हिल गईं और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया था। नतीजा आज काँग्रेस बिलकुल हाशिये पर है। राज्यों मे उसका क्या हश्र है सबके सामने है। मण्डल आंदोलन की पहली प्रयोगशाला भी बिहार बना, आडवाणी की रथयात्रा लालू प्रसाद यादव ने ही समस्तीपुर मे रोक लिया था नतीजा सेकुलरवाद आज सिक-उल्लूवाद नाम का एक घिनौना मज़ाक बन कर रह गया है और हिन्दुत्व एवं विकास भारतीय राजनीति मे अपनी पैठ करीब-करीब बना चुके हैं। आप यकीन मानिए लालू ने यदि आडवाणी जी की रथ यात्रा नहीं रोकी होती तो भाजपा को अभी बहुत मेहनत करनी पड़ती बहुमत की सरकार बनाने के लिए और आज की तारीख में कॉंग्रेस मात्र 44 सीटों पर तो कदापि नहीं सिमटती। आज जिस तरह से विकास और हिन्दुत्व साथ साथ चल रहे हैं उसमे बिहार विधान सभा का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण भूमिका मे आ चुका है।
ये पत्थर पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि बिहार में भाजपा नीत राजग की पूर्ण बहुमत सरकार बनने जा रही है। और भाजपा की ये जीत यकीन मानैये ये तय करने वाली है कि उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल में भी भाजपा को सरकार बनाने से कोई नहीं रोक पाएगा । तो क्या ये तीन विधान सभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और नितीश-लालू राजनीति से सन्यास ले लेंगे ? यदि आप ऐसा सोचते हैं तो बिलकुल गलत हैं वास्तव मे सन्यास मे कॉंग्रेस जाएगी लेकिन जनता परिवार के लोग हिन्दुत्व की ओर मुड़ जाएंगे। मुस्लिम परस्ती को हमेशा के लिए ये लोग त्याग देंगे। काँग्रेस का कोमल हिंदुत्ववादी होना राजनीतिक सन्यास से बचने का ही एक उपक्रम है जो कहीं से भी उसे फायदा पहुंचाता नहीं दिख रहा है।
इसीलिए बिहार विधान सभा चुनाव भारतीय राजनीति के लिए एक बार फिर सबसे महत्वपूर्ण साबित होने जा रहा है। वैसे भी ममता बनर्जी, लालू-नितीश, मुलायम सिंह यादव सहित अन्य सिक-उल्लूरिस्टों के लिए मुस्लिम परस्त सेकुलरिज़्म कोई सैद्धान्तिक आधार न हो कर बस सत्ता हथियाने का एक हथकंडा मात्र है। यदि उनको इससे सत्ता मिलती दिखाई नहीं देगी तो मुस्लिम परस्त सेकुलरिज़्म का चोला एक झटके मे उतार कर कट्टर हिन्दुत्व का चोला पहनने में वो थोड़ी भी देरी नहीं करेंगे। वो इतने कट्टर हिन्दूवादी हो सकते सकते हैं कि संभवतः विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन को भी बहुत पीछे छोड़ दें।
नेपाल का पुनः हिन्दू राष्ट्र की ओर लौटना महज एक संयोग नहीं है। जरा सोचिए कितने गाजे-बाजे के साथ नेपाल ने अपने आप को सेकुलर देश घोषित किया था लेकिन अचानक क्या हो गया कि उसे पुनः हिन्दू राष्ट्र की ओर लौटना पड़ रहा है। ये भी कोई गूढ और बहुर गहरे अध्ययन का विषय नहीं बल्कि सामान्य बुद्धि के हल्के उपयोग से ही स्पष्ट होने वाला बेहद आसान सा विषय है। ऐसा विषय जिसका असर न सिर्फ बिहार विधान सभा चुनाव पड़ने वाला है बल्कि उस माध्यम से भारतीय राजनीति भी हमेशा के लिए बदलने भी जा रही है। तो स्वागत के लिए तैयार हो जाईए उस सुखद परिवर्तन का जिसकी अगुवाई बिहार करने के लिए बिलकुल तैयार है।

Friday, 31 July 2015

बिलार मारे खोईचा...सियार सीकर मंसा...

खाँटी भाई कोंग्रेसी लोग सियारपुर्सी पर उतारू हो चुके हैं। दिग्गी रज्जा और शशि थरूर तो कुछ ज्यादा ही खोईचा की उम्मीद पाले बैठे हैं। लेकिन खोईचा में पड़ चुके घुन को भी वो चटखारा ले कर चट कर जाने पर उतारू हैं। संसद ठप है गुरुदासपुर के आतंकवादी हमले पर भी दिग्गी थरूर समेत सारे खाँटी सिक-उल्लूरिस्टवे सियारपुर्सी करते हुए ठुमका लगते दिख रहे हैं। हमारे एक आत्मघोषित मीडिया विशेषज्ञ से मैंने पूछा तो वो उल्टा मुझे ही डांटते कमीडिया नाच करते हुए बोले "...बकवास करने से पहले सौ बार सोचा करो ये सियारपुर्सी नहीं ..." मैंने उनसे विनम्रता से पूछा "...तो क्या है ...?" स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...मानसून सत्र के हंगामेदार होने की पूरी आशा थी ..." मुझे बहुत आश्चर्य हुआ तो मैंने पूछा "...आपको आशा थी ऐसा क्यों...?" स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...हम तो हमेशा से इसी आशा मे रहते हैं ..." मैंने कहा "...ये तो ठीक नहीं वो सियारपुर्सी पर उतारू हैं और आप लोग श्वानपुर्सी पर ..." स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ को लगा जैसे उनकी तारीफ हो रही है तो उसी खुशी से मुसकुराते हुए उन्होने मुझे उत्तर दिया "...हाँ वो तो है..." मैंने उनको झटका देते हुए कहा "...लगता है आप खुद को श्वान टेली का मालिक समझ बैठे ..." स्वघोषित कमेडिया विशेषज्ञ बोले "...कुछ हो रहा है वो अच्छा नहीं है ..." मैंने कमेडिया विशेषज्ञ से पूछा "...क्या आतंकवादी को फांसी नहीं होनी चाहिए ..." कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हमे किसी की जान लेने का अधिकार नहीं है ..." मैंने उनपर टांट कसते हुए उनसे पूछा "...कपार पर उधार का सेकेंडहैंड जाँघिया बांध कर कबसे आप दार्शनिक हो गए...?"  कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...हम दार्शनिक नहीं विशेषज्ञ हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...तो अपनी विशेज्ञता का उपयोग सियारों को शाकाहारी बानने मे कर रहे हैं ...?" मेरा प्रश्न सुन कर कमीडिया विशेषज्ञ सकपका गए बोले "...लोगों की अपनी पसंद है ..." मैंने तपाक से पूछा "...तो फिर न्याय की अपनी पसंद पर आपको आपत्ति क्यों ...?" कमीडिया विशेषज्ञ बोले "...न्याय वो नहीं जो  मिला है न्याय वो है जो नहीं मिला ..." मैंने दुखद आश्चर्य जताते हुए कहा "...हद है महराज अब समझ मे आया कि दाऊद इतना सफल क्यों और कैसे है ..." कमीडिया विशेषज्ञ ने पूछा "...कैसे ...?" मैंने कहा "...जब उसके एक गुर्गे के न्यायिक परिणति पर इतना सियारपुर्सी मचा है तो सोचये खुद दाऊद के हश्र पर सिक-उल्लू-रिस्टवे और कमीडिया कितना मातम मचाएंगे ...जैसे उनका माई बाप ही ..." कमीडिया विशेषज्ञ कुछ बोले नहीं ...बहुत देर तक कुछ नहीं बोले ... 

Thursday, 30 July 2015

बिरयानी हैदराबादाँ...लहसुन चोखा मीस

हैदराबाद की अजीब फितरत है मुसलमान वहाँ मुसलमीन हो जाता है। सभी लोग इससे परिचित हैं और ठीक से परिचित हैं। एक मुसलमीन हैदराबादी बता रहे थे "...फाँसा जो याक़ूब मेमनी को हुआ हीं वो अच्छा नाईं जी ..." मैंने उनसे पूछा "....क्यों...?" मुसलमीन हैदराबादी उत्तर देते हुए बोले "...सबकी फाँसा होना जरूरी जीं... नाईं तो याक़ूब मेमनी को भी छोडना जरूरी जीं ..." मैंने उनसे कहा "...सबको फांसी से आपका क्या मतलब जीं...?" मुसलमीन हैदराबादी बोले "...वो सबको जीं जो दँगी में शामिल और कुछ नेताँ के हत्या का आरोपाँ जीं ..." मैंने उनसे पूछा "... जैसे ..." मुसलमीन हैदराबादी बोले "...जैसे राजीव गांधी, इन्दिरा गांधी के कातिलां, माले गाँव मक्का मस्जिद ब्लास्ट, गुजरात और दिल्ली दंगी के आरोपाँ को फासां भी होनी चाहियाँ जी ..." मैंने प्रतिउत्तर में कहा "...आप तो ऐसे कह रहे हैं कि कुक्कुर से पूंछ हिलाने से हाथी अपना सूंढ उठा ले ..." मुसलमीन हैदराबादी मेरे ऊपर खऊरा गए और गुस्से में मुझसे पूछे "...हम आपको क्या लगतां जी ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...वही जो आपको समझ में आताँ जी ..." मुसलमीन हैदराबादी का खऊराना कम होने के बजाय और भड़क गया बोले "...बबरा मस्जिद, गुजरात सहित सभी दंगी और कातिलां के आरोपाँ को फाँसाँ देना बहुत जरूरी नई तो ...." मैंने बीच में बात काटते हुए कहा "...नई तो क्या कर लेंगा जी ...?" मुसलमीन हैदराबादी सकपका गए और बोले "...हम कुछ नई करंगा जी वो हम चाहता हईं कि सबके साथ जस्टिस होना जरूरी जी ..." मैंने कहा "...जो आप चाहता हाईं केवल वही जस्टिस कैसे जी ...?" मुसलमीन हैदराबादी बोले "...हम जनता हाई जस्टिस क्या होताँ जी ..." मैंने कहा "...फिर तो सत्र न्यायालय, उच्चन्यालाय और उच्चतम नयायालय को खत्म करके मुसलमीन हैदराबादी को जस्टिस करने का अधिकार सौंप देना चाहिए जी ..." मुसलमीन हैदराबादी अब थोड़ा ठंडा पड़ने लगे थे लेकिन उन्होने मुझसे पूछा "...खलिस याक़ूब मेमनी को फाँसा देने जस्टिस कैसे होता जी ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा ".... ठीक तो है गोधरा कांड, मदनी, इब्राहीम मेमनी, दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील सहित अबू सलेम सहित सभी आरोपियों को भी जल्दी से जल्दी फांसी हो जानी चाहिए..." मुसलमीन हैदराबादी मुसकुराते हुए बोले "...पहले सबको अरेस्टा करना जरूरी तब तो फाँसाँ होङ्गा जी ..." मैंने कहा "...तो क्या आप चाहते हाइन कि सब पकड़े नहीं जाएँ ...?" मुसलमीन हैदराबादी मुसकुराते रहे कुछ नहीं बोले ...मैंने उनका मंतव्य समझ लिया था.... 

Friday, 17 July 2015

इस्केप वेलोसिटी तान के ...चूहा सूंढ उठाय

बकलोल बबुआ को इंतजार है अगले 6 महीने का क्योकि उसे उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है 56 इंच की छाती 5.6 इंच में बदल जाएगी। बहुत दिन नहीं हुए जब चुनावों में इसने इस्केप वेलोसिटी का अद्भुत नायाब कान्सैप्ट दिया था। उसके खाँटी भाई चेले उस कान्सैप्ट को ऐसा पेश कर रहे थे जैसे मानो नासा से खुद एलियन का अवतार हुआ है और उस सिद्धान्त की बदौलत वाकई कॉंग्रेस का उसी इस्केप वेलोसिटी से चुनाव जीत जाएगी। वाकई उसका असर हुआ लेकिन क्या करें बकलोल बबुआ जब कॉंग्रेस की गाड़ी ही रिवर्स गेयर में थी 208 से घट कर 44 पर आ गए। वैसे एक खाँटी भाई कोंग्रेसी बता रहे थे "...देखियेगा ऐसा ही होगा जैसा राहुल जी कह रहे हैं ..." मैंने उनसे पूछा "...अभी तक तो वो खगोल भौतिकी के रिसर्चर बने फिर रहे थे शायद उस समय वो अपनी राजमा-ता के साथ अमेरिका के नासा में विपशना करके आए थे लेकिन अब ...?" खाँटी भाई बोले "...उसका असर उल्टा हो गया था लिहाजा अबकी बार थाईलैंड गए थे ..." मैंने कहा "...शायद इसीलिए उनकी नजर कहीं और के बजाय छाती पर अभी तक टिकी हुई है ...!" खाँटी भाई को बड़ा अजीब सा लगा असहजता को छिपाते हुए बोले "...देखिये ऐसा नहीं है ..." मैंने कहा "...ऐसा नहीं है तो फिर छती पर से नजर अब तो कम से कम हट जानी चाहिए ..." खाँटी भाई बोले "...देखिये ये नीतिगत बात है हम आकलन करके बैठे हैं और उसी आधार पर राहुल जी ने ऐसा कहा है ..." मैंने मुसकुराते हुए तारीफ करने के अंदाज में कहा "...अच्छा ! भाई वाह हम तो भूल ही गए थे कि खगोल भौतिक शास्त्री एक बहुत बढ़िया गणितज्ञ भी होता है ..." खाँटी भी खुश हो गए बोले "...हाँ वो तो है ..." मैंने कहा "...208 से घट कर 44 मतलब आपके कोंग्रेसी रिवर्स इस्केप वेलोसिटी के फार्मूले के अनुसार 8/2 = 4 और इस्केप वेलोसिटी को जोड़ दें तो डबल 4 मतलब पूरे 44 ..." खाँटी भाई मुझे आश्चर्य से देखते रह गए कुछ बोल नहीं पाए तो मैंने पूछा "...तो बताईए 56 कैसे 5.6 में बदल जाएगा 6 महीने में ...?" खाँटी भाई बोले "...देखिये ये एक आकलन है और ठोस आकलन है ऐसा हो के रहेगा ..."  मैंने उनसे कहा "...देखिये सीधा गणित है मोदी जी ने इस्केप वेलोसिटी का फार्मूला नहीं लगाया तो 56 का अर्थ हुआ 5 x 6 = 300 और 2014 में मतलब 300 का एकांक 3 तो सीधे गणित के हिसाब से हुआ डबल 3 और 3+3 = 336 ... तो अब बताईए 5.6 कैसे आएगा ? " खाँटी भाई बकलोल बबुआ खिलाफ कुछ बुदबुदाने लगे तो मैंने कहा नमस्कार ...

Sunday, 5 July 2015

गतांक से आगे ....
केजरी कहाँ फिसड्डी, जब...... 

....मैंने बुद्धिमान से पूछा "...कुविष तो बिलकुल सफाचट्ट है न दाढ़ी न मूंछ...फिर भी ऐसा कैसे ..." बुद्धिमान जी ने उत्तर दिया  "....वो केजरी के मूंछों का महात्म्य है जो दिखता है वो होता नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मैंने जिज्ञासावश पूछा "...इसका मतलब ये है कि कुविष की मूंछों का उपयोग केजरी भी कर रहे हैं ...?" बुद्धिमान बड़ी सहजता से बोले "...नकली को असली, हंडा को तसली और गोईठा को मुस्ली बनाना केजरी के बाएँ हाथ खेल है तो कुविष का डंक और केजरी की कुटाई मिठास तो घोल ही सकती है ..." मैंने जिज्ञासा शांत नहीं हुई सो पूछा "...कुविष तो सफाचट्ट है ...? बुद्धिमान जी ने उत्तर दिया "...बच्चा तुम इतनी बुद्धिमान हो फिर भी छोटी सी बात तुम्हें समंझ में नहीं आ रही तो सुनो जंतर पर मंतर फूंकने 22 अप्रैल को जब सब जमा हुए थे तो गजेन्द्र की दाढ़ी मूंछ दोनों थी अर्थात वो संत प्रकृति का भोला भाला व्यक्ति था लेकिन उसने जो कुछ भी किया उसके लिए किसकी आवाज सुनाई पड़ रही थी ...?" मुझे समझ आ गया साथ ही घोर आश्चर्य भी हुआ मैंने सहमति जताते हुए कहा "...मतलब यदि कुविष की मूंछे होती तो वो संत केजरी गिरोह के झांसे में फँसता ही नहीं ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "...मनी-श सुसाइडिया, केजरी और संसि तीनों की मूंछे हैं ...इसीलिए ये सब कुविष को विष का फुहार फेंकने के लिए आगे कर देते हैं ...आपने सही कहा बुद्धिमान जी ! जो दिखता है वो होता नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मैंने उनसे आगे पूछा "...मूंछों को लोग सम्मान से जोड़ लेते हैं ऐसा क्यों ...?" बुद्धिमान बोले "...लोग मूंछों को सम्मान से नहीं अपने अहंकार से जोड़ते हैं ...जैसे कुछ मांसाहारी पालतू जानवर सम्मान में पुंछ ऊपर करके चलते हैं लेकिन ठीक किसी अन्य क्षेत्र में अहंकार की लड़ाई में जब कमजोर पड़ता है तो उसकी पूंछ नीचे होकर पेट से चिपक जाती हैं ..." बुद्धिमान जी का उत्तर लाजवाब और गज़ब का तार्किक था मैंने कहा "...अब समझ में मुझे आया कि महिलाओं की दाढ़ी और मूंछ क्यों नहीं होती क्यों कि वो अहंकार के बेहूदे चक्कर में नहीं पड़तीं ...और इसीलिए महिलाओं के नाम के आगे अभी कुछ ही दिन पहले तक देवी स्वतः लगता था ...लेकिन अब तो राक्षसी आधुनिकतावाद है ..." मैंने बुद्धिमान जी से कहा "...मतलब पूंछ और मूंछ के भाव-भंगिमा में व्यक्ति की स्थिति का पूरी तरह अंदाजा लगाया जा सकता है ..." बुद्धिमान जी बोले "...बच्चा पूरी तरह सटीक अंदाजा लगाने के लिए उसके मंडली को भी देखना पड़ेगा क्योंकि पूंछ पर तो मस्तिष्क की स्थिति का नियंत्रण होता है लेकिन मूंछ पर व्यक्तित्व-मनोभाव के स्थाईकारक का प्रभाव होता है लिहाजा व्यक्ति के संगत का भी अध्ययन जरूरी है ..." मैंने उनसे कहा "...आपका शोध लाजवाब है तो आप जरा दिल्ली और अन्ना हज़ारे की मनः स्थिति पर प्रकाश डालने की कृपा करेंगे ...?" बुद्धिमान जी बोले "...एक के तो सीने पर तो मूंग दारा जा रहा है और दूसरे ने शान से अपनी **** ऊपर करके टोयोटा इनोवा उपहार में ले रहा है ..." मुझे उनकी बातों बहुत आनंद आ रहा था लेकिन समय की पाबंदी के कारण मैंने बुद्धिमान जी को कहा "...प्रणाम ..."   

Friday, 3 July 2015

केजरी कहाँ फिसड्डी, जब मारे मूंछ मुसद्दी...

कोई गैरआपिया बता रहा थे मूछों और पूंछों का बड़ा महात्म्य है। जैसे जानवर पूंछों से पहचाने जाते हैं वैसे ही मानव मूंछों से जैसे जितने भी देवता और भगवान जी लोग हैं वो सभी या तो दाढ़ी मूंछ दोनों रखते हैं या फिर बिलकुल सफाचट्ट मर्यादा पुरुषोत्तम और परम वीर भगवान श्री राम न दाढ़ी रखते थे और न ही मूंछ, भगवान शिव से बड़ा कोई पुरुष हुआ ही नहीं उनकी बड़ी-बड़ी जटाएँ लेकिन न दाढ़ी न मूंछ लेकिन वहीं जितने राक्षसी प्रवृत्ति वाले हैं सबकी बड़ी-बड़ी मूँछें है बड़ी - बड़ी हमेशा अत्याचार करने को उद्यत मार-पीट पर उतारू। उनके इस जबरदस्त वर्गीकरण पर मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गई तो मैंने अनुरोध किया "...केजरी छाप मूंछों के महात्म्य पर कुछ प्रकाश डालिए ..." गैरआपिया बुद्धिमान बोले "...ये मूंछ ही है जो आदमी को क्या से क्या बना देती है ... केजरी छाप मूंछे तो ऐसी है कि साफ साफ बताती है जो दिखाता वो है नहीं और जो है वो दिखता नहीं ..." मेरे तो आश्चर्य का ठिकाना नहीं था मुझे और मजा आने लगा जिज्ञासा भी बढ़ गई तो मैंने पूछा "...इसके और स्वरूपों का भी महात्म्य है क्या ...?" बुद्धिमान बोले "...हाँ है क्यों नहीं ...केजरी छाप मूछें जा आकार में नीचे बढ़ कर होठ ढकने लगती हैं तो मस्तिष्क बहुत सक्रिय हो कर व्यक्ति को समूहिक-स्वसंदर्भ आग्रही बना देता है ...लेकिन वहीं केजरी छाप मूंछों का आकार दोनों ओर से घटने लगता है तो समझ लो आफत आनी शुरू हो जाती और जैसे-जैसे आकार घटता है वैसे-वैसे मुसीबत बढ़ती जाती है आपातकाल के रूप में ठीक तानाशाही के तर्ज पर...." बुद्धिमान की बातों में दम था मुझे लगा कि इस विषय पर इनका गहन शोध है मैंने आगे पूछा "...विदेशों में ज़्यादातर लोग मूंछें नहीं रखते तो क्या वो लोग देवतुल्य हो जाते हैं ..." बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...बच्चा युद्ध संस्कृति है, वैभव का आधार है, विकास की कुंजी है युद्ध धर्म है गीता भी यही कहती है किन्तु जैसे जैसे पुरुष कायर होता गया अर्थात युद्ध न करने के बहाने बनाने लगा तो तलवार भी आकार में घटने लगा और घटते घटते छूरे के आकार में आ गया जिसका उपयोग दाढ़ी मूंछ की नक्काशी में होता है ..." उनका शोध देख कर मुझे आश्चर्य हो रहा था मैंने कहा "...लेकिन लोग युद्ध को मानवता के खिलाफ बताते हैं ..." बुद्धिमान बोले "...जब भगवान युद्ध, हिंसा और मृत्यु के विरुद्ध नहीं तो हमे क्या अधिकार है अहिंसक होने का ? जो प्रकृति के विरुद्ध है वो अधर्म है अतः जो युद्ध नहीं कर सकता उसे जीने का कोई अधिकार नहीं ...गीता कहती है 'वीर भोग्या वसुंधरा' ...अर्थात कायर कभी भी धारा का उपभोग नहीं कर सकता ...अतः कोई भी युद्ध पिपासु देश विकासशील और गरीब नहीं है ...युद्ध ही विकास का मार्ग दिखाता है ..." "...लेकिन मूंछे ..." मैंने उन्हें याद दिलाया तो बुद्धिमान उत्तर देते हुए बोले "...जितने साधू महात्मा और संत प्रकृति के लोग हुए उनहोंने दाढ़ी-मूंछें दोनों रखीं कारण संतुलित व्यक्तित्व ..." मैंने उनकी प्रशंसा में कहा "...वाह मान गए लेकिन एक बात बताईए कुविष और केजरी में कैसे निभता है ...?" बुद्धिमान ने शानदार और बहुत तार्किक उत्तर दिया बोले "...बच्चा कुविष केजरी को लगातार डंस रहा है और केजरी उसकी कुटाई ...ये दोस्ती ऐसी है स्वार्थ के शत्रुता पर आधारित है जो अतिमधुर दिखती है ..वैसे केजरी छाप मूंछों की ये खासियत है मक्कारी और धूर्तता से वो चारो ओर छणिक और अस्थाई तौर पर थोड़ा बहुत बढ़ सकता है लेकिन फिर वही लौट कर लोटने लगता है..."
क्रमशः  

Tuesday, 30 June 2015

लहक लुआठी लंदन, 84 खाँटी मारे चन्दन...

जीजी ने हँड़िया-पतुकी बहुत बजाया ...लोटा से थरिया पीटा... पूरा का पूरा खाँटी भाई कोंग्रेसी मोहल्ला जीजी की हँड़िया - पतुकी - थरिया-लोटा और न जाने क्या क्या की गड़गड़ाहट से कांप उठा। "लंदन मे लुआठी" फूंका गया ये सोचा के कि कहीं न कहीं तो गोईठा सुलगेगा ही औए जीजा जी की काली करतूतें लुआठी के काले धुएँ के पीछे ढक जाएंगी। लेकिन कमाल ये हो गया कि लुआठी खुद ही जीजी के पीछे पड़ गया लगे हाथ जीजा जी को भी लुआठी का धुआँ सुंघा दिया तो जीजा जी बेहोश होते होते बचे। अब जब ये लग रहा कि "लंदन का लुआठी" खुद को भी फूंकना शुरू कर दिया तो खाँटी भाई लोग धौलपुर हवेली की हवा से आग बुझाने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने एक खाँटी भाई कोंग्रेसी जो बहुत गुस्से मे थे से पूछा तो बताने लगे "...हम इस्तीफा ले कर रहेंगे ..." मैंने कहा "...अब न तो ये भाजपाई सीताराम केसरी हैं और खाँटी भाई लोग राजमा-ता ..." खाँटी भाई और गुस्से में आ गए बोले "...ये सीताराम केसरी का नहीं राहुल जी का जमाना है ..." मैंने उनको उत्तर देते हुए कहा "... इसीलिए हँड़िया - पतुकी - थरिया-लोटा-हंडा-परात समेत सभी हथकंडे अपनाए जा रहे हैं ..." खाँटी भाई ने पलट कर मुझसे पूछा "...अपनी आवाज बुलंद करना कहाँ गलत है ...?" मैंने उनको उत्तर देने के बजाय पलट कर पूछा "... जीजा जी जीजी के नाम पर लुआठी 'लंदन मे लुआठी' फूंकना कहाँ तक सही है..." खाँटी भाई बोले "...ललित से साँठ-गांठ एक भ्रष्टाचार का मुद्दा है ..." मैंने उनसे कहा "...लेकिन लुआठी से गठबंधन तो बहुत आपका बहुत पुराना है ...." खाँटी भाई बोले "....हम तो चाहते हैं की भ्रष्टाचार उजागर हो ...उससे पहले आरोपी इस्तीफा दें..." मैंने उनसे कहा "...इससे किसको इंकार है ये तो तभी संभव है जब भ्रष्टाचारी खुद न्यायाधिकरण के क्षेत्र मे हो ..."   खाँटी भाई बोले "...ये कोई जरूरी नहीं है ..." मैंने उनसे पूछा "...क्यों ...?" खाँटी भाई बोले "....कार्यवाही से अधिक इस्तीफा जरूरी है ..." मैंने कहा "...जीजी और जीजा मय लुआठी खाँटी ...." खाँटी भाई तमतमाते हुए बीच में बात काटते हुए बोले "...हमारा मामला और है जीजी और जीजा निर्दोष हैं ..." मैंने पूछा "...आपको कैसे पता ? लगता शिमला में जीजी से सेब बहुत खिलाया है खाँटी भाईयों को ..." खाँटी भाई बोले "...नहीं नहीं ऐसा नहीं है ..लेकिन शिमला की तरह धौलपुर भी नकली है ...." मैंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा "... जैसे लंदन का लुआठी 64 नहीं तो 46 ललित कलाओं मे माहिर है ही लिहाजा खाँटी भाई लोग लुआठी को जेब में रख के घूमेंगे यकीन नहीं होता ..." खाँटी भाई धमकी देते हुए बोले  "...जीजी और जीजा को कुछ भी हुआ तो देश में अब नौ दो ग्यारह नहीं आठ चार बारह  मच जाएगा ..." मैंने पूछा "...आठ चार बारह मतलब ..." खाँटी उत्तर देते बोले "...आठ चार मतलब 84..." आश्चर्य से मेरा मुँह खुला का खुला रह गया ....