पैसे के लिए कत्लेआम आम पाकिस्तान में ....
क्या महज एक संयोग ही है कि मई 2011 में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अचानक पाकिस्तान में अच्छे और बुरे दोनों तालिबान बहुत अधिक सक्रिय हो गए और पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई। वैसे सामान्यतः लादेन के मारे जाने के बाद आतंकवादियों के हौसले कमजोर पड़ने चाहिए थे लेकिन हो बिलकुल उल्टा रहा है। पाकिस्तान की आतंकवादी घटनाएं फिलिस्तीन की आतंकवादी घटानाओं से काफी हद तक समान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि फिलिस्तीन को जब पैसे की जरूरत होती है तब उसके आतंकवादी इस्राईल पर हमला करते हैं और अरब पैसे की बरसात शुरू हो जाती है और कुछ निर्दोष नागरिक हलाल होने के बाद हमले रुक जाते हैं। पाकिस्तान जब भारत में बड़ी वारदात को अंजाम देने में नकबयाब या कामयाब रहता है तो भी अपने ही देश में अपने ही नागरिकों को मरने में उसे कोई झिझक नहीं होती। वस्तुतः जब तक लादेन जिंदा था और पाकिस्तान में था उसे इस्लाम के विस्तार के नाम पर अरब देशों से मिलने वाले धन की कोई कमी नहीं थी यही कारण है लाहौर में हाफ़िज़ सईद के जलसे को सफल बनाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई थी यहाँ तक कि ट्रेनों तक की व्यवस्था कर दी गई। ये सब अरब देशों से पैसा उगाहने के लिए किया गया था। लेकिन लादेन के मारे जाने के बाद अब उसमे दिक्कत हो रही है एक सभी लादेन की तरह दिलेर नहीं नहीं है जो अमेरिका के खिलाफ बगावत कर सकें और इतने जीवट भी नहीं हैं कि तोरबोरा की पहाड़ियों और मिस्र के रेगिस्तान में वर्षों गुजार दें वो सिर्फ इस्लाम के नाम पर और फिर इस बीच आई एस भी उभर गया है लिहाजा पाकिस्तान पहले कहीं ज्यादा अब अमेरिकी अनुदान पर निर्भर है लेकिन अमेरिका ने लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान को मिलने वाला 800 मिलियन डालर के अनुदान विचार करते हुए रोक लगा दी। तभी से पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर ये लगातार ये जताने में लगा हुआ है कि वो आतंकवाद से बुरी तरह ग्रस्त है और से फंड की जरूरत है। इधर 26 जनवरी के अतिथि के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा पर आने वाले हैं उसके पीछे सीधे-सीधे अमेरिका का अपना हित है उनको अधिक बिज़नेस की सख्त जरूरत है और इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अमेरिका के लिए सोना नहीं हीरा उगलने वाली लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसे कंपनिया सीधे उच्च तकनीक के साथ भारत में निवेश के लिए आतुर हैं अब इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान अमरीका से कितनी कौड़ी मिल रही होगी। चीन और पाकिस्तान में एक बात समान है कि वहाँ की राजनीति में नागरिक भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। सत्ता के निमित्त वो अपने लोगों को भी मार डालने में कोई संकोच नहीं करते। पेशावर के आर्मी स्कूल में आतंकवादी हमले का एक बेहद तार्किक और मजबूत पक्ष ये भी है।
क्या महज एक संयोग ही है कि मई 2011 में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अचानक पाकिस्तान में अच्छे और बुरे दोनों तालिबान बहुत अधिक सक्रिय हो गए और पाकिस्तान में आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ सी आ गई। वैसे सामान्यतः लादेन के मारे जाने के बाद आतंकवादियों के हौसले कमजोर पड़ने चाहिए थे लेकिन हो बिलकुल उल्टा रहा है। पाकिस्तान की आतंकवादी घटनाएं फिलिस्तीन की आतंकवादी घटानाओं से काफी हद तक समान हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि फिलिस्तीन को जब पैसे की जरूरत होती है तब उसके आतंकवादी इस्राईल पर हमला करते हैं और अरब पैसे की बरसात शुरू हो जाती है और कुछ निर्दोष नागरिक हलाल होने के बाद हमले रुक जाते हैं। पाकिस्तान जब भारत में बड़ी वारदात को अंजाम देने में नकबयाब या कामयाब रहता है तो भी अपने ही देश में अपने ही नागरिकों को मरने में उसे कोई झिझक नहीं होती। वस्तुतः जब तक लादेन जिंदा था और पाकिस्तान में था उसे इस्लाम के विस्तार के नाम पर अरब देशों से मिलने वाले धन की कोई कमी नहीं थी यही कारण है लाहौर में हाफ़िज़ सईद के जलसे को सफल बनाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गई थी यहाँ तक कि ट्रेनों तक की व्यवस्था कर दी गई। ये सब अरब देशों से पैसा उगाहने के लिए किया गया था। लेकिन लादेन के मारे जाने के बाद अब उसमे दिक्कत हो रही है एक सभी लादेन की तरह दिलेर नहीं नहीं है जो अमेरिका के खिलाफ बगावत कर सकें और इतने जीवट भी नहीं हैं कि तोरबोरा की पहाड़ियों और मिस्र के रेगिस्तान में वर्षों गुजार दें वो सिर्फ इस्लाम के नाम पर और फिर इस बीच आई एस भी उभर गया है लिहाजा पाकिस्तान पहले कहीं ज्यादा अब अमेरिकी अनुदान पर निर्भर है लेकिन अमेरिका ने लादेन के मारे जाने के बाद पाकिस्तान को मिलने वाला 800 मिलियन डालर के अनुदान विचार करते हुए रोक लगा दी। तभी से पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर ये लगातार ये जताने में लगा हुआ है कि वो आतंकवाद से बुरी तरह ग्रस्त है और से फंड की जरूरत है। इधर 26 जनवरी के अतिथि के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा पर आने वाले हैं उसके पीछे सीधे-सीधे अमेरिका का अपना हित है उनको अधिक बिज़नेस की सख्त जरूरत है और इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि अमेरिका के लिए सोना नहीं हीरा उगलने वाली लॉकहीड मार्टिन और बोइंग जैसे कंपनिया सीधे उच्च तकनीक के साथ भारत में निवेश के लिए आतुर हैं अब इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान अमरीका से कितनी कौड़ी मिल रही होगी। चीन और पाकिस्तान में एक बात समान है कि वहाँ की राजनीति में नागरिक भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। सत्ता के निमित्त वो अपने लोगों को भी मार डालने में कोई संकोच नहीं करते। पेशावर के आर्मी स्कूल में आतंकवादी हमले का एक बेहद तार्किक और मजबूत पक्ष ये भी है।
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