अपना घर जिंदगी...दूसरों का गंदगी
घर वापसी पसंद नहीं ...खाँटी भाई कोंग्रेसी सहित सभी सिकउल्लूर शोषनिष्टों ने आज कल आसमान सर पे उठा रखा है ...एक वामपंथी सिकउल्लूर जिनको और दूसरे कोंग्रेसी और शोषनिस्टों की तरह दूसरों का घर, दूसरों का धन, दूसरों की लुगाई, दूसरों की मलाई बहुत पसंद है इसीलिए अभिषेक मनु जैसे खाँटी भाई शोषनिस्ट कम्युनिष्ट रात-बिरात अपने घर के बजाय दूसरों के घर पहुँच जाते हैं। एक बार तो हद ही हो गई एक खाँटी भाई शोषनिस्ट-कम्युनिस्ट-सिकउल्लू बहुत दिनो तक घर वापसी नहीं किए तो उनकी श्रीमती जी पहुँच गई तो जबरन उनको भी दूसरो के घर का सदस्य बना दिया गया फिर क्या था विदेशों के उनको दौरे पड़ने लगे दूसरों की लुगाईयां मार-मलाईयां लेकर इनके पास आने लगीं ...अरे इनकी भी लुगाई मय परिवार दूसरों के घर मलाई लेकर जाने लगी। पैसे का तो अंबार लग गया ...माहौल ऐसा बना दिया इन सिकउल्लरों ने कि कोई अपने घर वापस जाना भी चाहे तो न जा सके आज बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपने घर वापस जाना चाहते हैं जमनादास अख्तर, नज़म सेठी, तसलीमा, आदि संख्या बहुत बड़ी है लेकिन ये सिकउल्लू अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आएंगे क्योकि इससे ....एक तो वोट बैंक का खतरा दूसरे इसी बहाने गोरा-गोरा-काला-काला धन भी इनको मिलता है। ये नाजायज ताल्लुकात इतना तगड़ा है कि ए॰ एस॰ दिलीप कुमार उर्फ ए आर रहमान दूसरों के घर का सदस्य बनते ही दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में इनको दनादन काम मिलने लगा , दनादन ग्रॅमी अवार्ड से नवाज दिया गया और भी बहुत कुछ हुआ दूसरों के घर का सदस्य बनते ही जबकि उस घर में संगीत गुनाह है तब किसी सिकउल्लू र की आवाज नहीं उठी थी ... मैडम टेरेसा को सिर्फ इसलिए नोबल पुरस्कार दिया गया क्योंकि वो सेवा के बहाने इन किसी सिकउल्लूरों के इशारे पर दूसरों का घर बसा रही थी ...इसके लिए गोरा-गोरा-काला-काला धन अकूत मात्रा में आता था। जबकि टेरेसा की अम्मा इस भारत माता की गोद में हजारों माता अमृतमयी, माता ऋतंभरा जैसी हैं जिनको किसी पुरस्कार की लालसा नहीं निस्वार्थ भाव की ममता है जो जिनकी सेवा के आगे मैडम टेरेसा कुछ भी नहीं ...म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) थोप कर थोक के भाव से न सिर्फ लोगों को गुलाम बनाया जा रहा है बल्कि मानसिक रूप से कुंद करके मूर्ख भी बनाया जा रहा है (इसकी पुष्टि के लिए गुड़गाँव स्थित मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र से संपर्क किया जा सकता है ) ऊपर ये इतना खतरनाक है कि जिसे म्लेच्छ बोली नहीं आती वो हींन भावना का शिकार हो कर कुंठित हो चुका है। बहुत आवशयक है स्वाभिमान जागरण की और उसके साथ-साथ घर वापसी की ...
घर वापसी पसंद नहीं ...खाँटी भाई कोंग्रेसी सहित सभी सिकउल्लूर शोषनिष्टों ने आज कल आसमान सर पे उठा रखा है ...एक वामपंथी सिकउल्लूर जिनको और दूसरे कोंग्रेसी और शोषनिस्टों की तरह दूसरों का घर, दूसरों का धन, दूसरों की लुगाई, दूसरों की मलाई बहुत पसंद है इसीलिए अभिषेक मनु जैसे खाँटी भाई शोषनिस्ट कम्युनिष्ट रात-बिरात अपने घर के बजाय दूसरों के घर पहुँच जाते हैं। एक बार तो हद ही हो गई एक खाँटी भाई शोषनिस्ट-कम्युनिस्ट-सिकउल्लू बहुत दिनो तक घर वापसी नहीं किए तो उनकी श्रीमती जी पहुँच गई तो जबरन उनको भी दूसरो के घर का सदस्य बना दिया गया फिर क्या था विदेशों के उनको दौरे पड़ने लगे दूसरों की लुगाईयां मार-मलाईयां लेकर इनके पास आने लगीं ...अरे इनकी भी लुगाई मय परिवार दूसरों के घर मलाई लेकर जाने लगी। पैसे का तो अंबार लग गया ...माहौल ऐसा बना दिया इन सिकउल्लरों ने कि कोई अपने घर वापस जाना भी चाहे तो न जा सके आज बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपने घर वापस जाना चाहते हैं जमनादास अख्तर, नज़म सेठी, तसलीमा, आदि संख्या बहुत बड़ी है लेकिन ये सिकउल्लू अपना उल्लू सीधा करने से बाज नहीं आएंगे क्योकि इससे ....एक तो वोट बैंक का खतरा दूसरे इसी बहाने गोरा-गोरा-काला-काला धन भी इनको मिलता है। ये नाजायज ताल्लुकात इतना तगड़ा है कि ए॰ एस॰ दिलीप कुमार उर्फ ए आर रहमान दूसरों के घर का सदस्य बनते ही दाऊद के इशारे पर बॉलीवुड में इनको दनादन काम मिलने लगा , दनादन ग्रॅमी अवार्ड से नवाज दिया गया और भी बहुत कुछ हुआ दूसरों के घर का सदस्य बनते ही जबकि उस घर में संगीत गुनाह है तब किसी सिकउल्लू र की आवाज नहीं उठी थी ... मैडम टेरेसा को सिर्फ इसलिए नोबल पुरस्कार दिया गया क्योंकि वो सेवा के बहाने इन किसी सिकउल्लूरों के इशारे पर दूसरों का घर बसा रही थी ...इसके लिए गोरा-गोरा-काला-काला धन अकूत मात्रा में आता था। जबकि टेरेसा की अम्मा इस भारत माता की गोद में हजारों माता अमृतमयी, माता ऋतंभरा जैसी हैं जिनको किसी पुरस्कार की लालसा नहीं निस्वार्थ भाव की ममता है जो जिनकी सेवा के आगे मैडम टेरेसा कुछ भी नहीं ...म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) थोप कर थोक के भाव से न सिर्फ लोगों को गुलाम बनाया जा रहा है बल्कि मानसिक रूप से कुंद करके मूर्ख भी बनाया जा रहा है (इसकी पुष्टि के लिए गुड़गाँव स्थित मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र से संपर्क किया जा सकता है ) ऊपर ये इतना खतरनाक है कि जिसे म्लेच्छ बोली नहीं आती वो हींन भावना का शिकार हो कर कुंठित हो चुका है। बहुत आवशयक है स्वाभिमान जागरण की और उसके साथ-साथ घर वापसी की ...
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