केजरी का जायका-रा - कौआ बोले कांव
कोग्रेसी युवराज यानी बकलोल बबुआ केजरीवाल को अपना गुरु मानते हैं तो जाहिर है कुछ न कुछ तो होगा ही। एक कहावत है जितनी जरूरत चेला को गुरु की नहीं होती उससे ज्यादा कहीं जरूरत गुरु को योग्य चेले की होती है। कमाल देखिये बकलोल बबुआ काँग्रेस के लिए सरदर्द बना हुआ है ठीक वैसे ही केजरीवाल भी अपिया पार्टी के सरदर्द बन गए है। आपिया पार्टी के स्वनामधान्य विश्व के सबसे बुद्धिमान प्रोफेसर, चिंतक और विचारक भी ये मानते हैं कि वास्तव में केजरीवाल की विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है लोकप्रियता घटना उतना बुरा नहीं है लेकिन विश्वसनीयता का घटना बेहद खतरनाक है। लेकिन बकलोल बबुआ की तर्ज पर कोई ये बात कहने को तैयार नहीं था लिहाजा केजरीवाल औकात दिखाने के लिए पिछली बार की तर्ज पर धन-भोज का आयोजन कर डाला केजरीवाल धन-भोज से पहले कहते फिर रहे थे कि कम से कम 5 करोड़ तो उगाह ही लेंगे लेकिन मिले सिर्फ 50 लाख वो भी फीस 20 हजार रखने बाद जबकि पिछली बार सिर्फ एक ही धन-भीज में 90 लाख मिल गए थे और फीस भी केवल 10 हजार थी। बेंकेट हाल में आने वाले लोग जब पर्याप्त संख्या में नहीं आ पाए तो आपियों से भरी संख्या दिखाने की कोशिश की गई फिर भी हाल भरा हुआ नहीं था तो वेटरों को टोपी ओढ़ाकर कुर्सी पर बैठाया दिया गया और फोटो खीचा गया । सवाल ये उठता है कि जब संख्या पूरी थी और हाल भरा हुआ था तो धन उगाही भी 5 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए थी। इस दुर्घटना ने आपिया पार्टी की कार्यकारिणी को सकते में डाल दिया है। आपिया पार्टी के सलीम चचा के बहुत करीबी बता रहे थे कि उनके साथ बहुत से लोगों ने केजरीवाल से कई बार आपिया पार्टी छोडने की इच्छा जाहिर की लेकिन केजरीवाल हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं। पहले कई बार इस बात की चर्चा थी कि केजरीवाल को सीएम पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहिए लेकिन केजरीवाल को किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी चाहिए लिहाजा तानाशाही वाले अंदाज में केजरीवाल इस आवाज को बेरहमी से दबा दिया लेकिन कल के धन-भोज दुर्घटना के बाद फिर इस हवा को ज़ोर मिल गया कि दिल्ली का मुख्यमंत्री केजरीवाल के अलावा किसी और को घोषित करना चाहिए यदि आप पार्टी का वजूद बचाना है तो ...देखते हैं केजरीवाल किसी और को CM पद का उम्मीदवार घोषित करते हैं या तानाशाही से इस आवाज को दबा देते हैं ...वैसे आपिया पार्टी के एक अदना कार्यकर्ता से लेकर चोटी के आपिया नेता भी ये खुल कर ये मानने लगे हैं कि केजरीवाल आप पार्टी के लिए बकलोल बबुआ की तर्ज पर बोझ बनते जा रहे हैं बड़ी ईमानदारी से ...विश्वसनीयता घटने की रफ्तार यही रही तो 10-12 सीट भी मिलना मुश्किल है ...
कोग्रेसी युवराज यानी बकलोल बबुआ केजरीवाल को अपना गुरु मानते हैं तो जाहिर है कुछ न कुछ तो होगा ही। एक कहावत है जितनी जरूरत चेला को गुरु की नहीं होती उससे ज्यादा कहीं जरूरत गुरु को योग्य चेले की होती है। कमाल देखिये बकलोल बबुआ काँग्रेस के लिए सरदर्द बना हुआ है ठीक वैसे ही केजरीवाल भी अपिया पार्टी के सरदर्द बन गए है। आपिया पार्टी के स्वनामधान्य विश्व के सबसे बुद्धिमान प्रोफेसर, चिंतक और विचारक भी ये मानते हैं कि वास्तव में केजरीवाल की विश्वसनीयता लगातार घटती जा रही है लोकप्रियता घटना उतना बुरा नहीं है लेकिन विश्वसनीयता का घटना बेहद खतरनाक है। लेकिन बकलोल बबुआ की तर्ज पर कोई ये बात कहने को तैयार नहीं था लिहाजा केजरीवाल औकात दिखाने के लिए पिछली बार की तर्ज पर धन-भोज का आयोजन कर डाला केजरीवाल धन-भोज से पहले कहते फिर रहे थे कि कम से कम 5 करोड़ तो उगाह ही लेंगे लेकिन मिले सिर्फ 50 लाख वो भी फीस 20 हजार रखने बाद जबकि पिछली बार सिर्फ एक ही धन-भीज में 90 लाख मिल गए थे और फीस भी केवल 10 हजार थी। बेंकेट हाल में आने वाले लोग जब पर्याप्त संख्या में नहीं आ पाए तो आपियों से भरी संख्या दिखाने की कोशिश की गई फिर भी हाल भरा हुआ नहीं था तो वेटरों को टोपी ओढ़ाकर कुर्सी पर बैठाया दिया गया और फोटो खीचा गया । सवाल ये उठता है कि जब संख्या पूरी थी और हाल भरा हुआ था तो धन उगाही भी 5 करोड़ से ज्यादा होनी चाहिए थी। इस दुर्घटना ने आपिया पार्टी की कार्यकारिणी को सकते में डाल दिया है। आपिया पार्टी के सलीम चचा के बहुत करीबी बता रहे थे कि उनके साथ बहुत से लोगों ने केजरीवाल से कई बार आपिया पार्टी छोडने की इच्छा जाहिर की लेकिन केजरीवाल हैं कि मानने को तैयार नहीं हैं। पहले कई बार इस बात की चर्चा थी कि केजरीवाल को सीएम पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहिए लेकिन केजरीवाल को किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी चाहिए लिहाजा तानाशाही वाले अंदाज में केजरीवाल इस आवाज को बेरहमी से दबा दिया लेकिन कल के धन-भोज दुर्घटना के बाद फिर इस हवा को ज़ोर मिल गया कि दिल्ली का मुख्यमंत्री केजरीवाल के अलावा किसी और को घोषित करना चाहिए यदि आप पार्टी का वजूद बचाना है तो ...देखते हैं केजरीवाल किसी और को CM पद का उम्मीदवार घोषित करते हैं या तानाशाही से इस आवाज को दबा देते हैं ...वैसे आपिया पार्टी के एक अदना कार्यकर्ता से लेकर चोटी के आपिया नेता भी ये खुल कर ये मानने लगे हैं कि केजरीवाल आप पार्टी के लिए बकलोल बबुआ की तर्ज पर बोझ बनते जा रहे हैं बड़ी ईमानदारी से ...विश्वसनीयता घटने की रफ्तार यही रही तो 10-12 सीट भी मिलना मुश्किल है ...
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