चीन तो गया काम से ...
"मेक इन इंडिया" समारोह की जबर्दस्त सफलता के बाद भारत के चोटी उद्योगपतियों में जबर्दस्त उत्साह है। इस समारोह की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन को भी अपने कर नीति में बदलाव करने की जबर्दस्त जरूरत पड़ गई। मैंने कल अपने लेख में कहा था मंगल की सफलता चीन को कोमा में जाने का रास्ता प्रशस्त करता है जिसका उपाय वो मात्र 24 घंटों के भीतर ही करना पड़ा "मेड इन चाइना" की घोषणा करके ठीक प्रधानमंत्री मोदी जी की नकल करते हुए। अब चीन कर भी क्या सकता है उसके यहाँ मजदूरी प्रतिवर्ष 10 से 15% की दर से बढ़ रही है 2010 से अबतक 30% की वृद्धि हो चुकी है जो बहुत अधिक महंगा साबित हो रहा है लिहाजा करों में रियायत ही एक रास्ता बचा है लेकिन वो भी निवेश की मात्रा पर निर्भर है जिसे अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है। ये सब उत्पाद गुणवत्ता उन्नयन के निमित्त शोध और विकास को बढ़ावा देकर किया जाएगा। लेकिन समस्या फिर वहीं जस की तस तो है ही कहीं और भी गंभीर भी होती जा रही है चीन के लिए। लोगों की आय बढ्ने के साथ - साथ कीमतों में भी जबरदस्त इजाफा हो रहा है नतीजन लागत में वृद्धि लेकिन कर रियायत से वो कैसे पूरा होगा जबकि 10 से 15% वार्षिक की दर से मजदूरी मंहगी हो रही है और जब यही मजदूरी शोध और विकास में लगती है तो कई गुना हो जाती है जिसका भार सीधे ग्राहक पर पड़ता है। चीन ने रियायत की घोषणा इसलिए नहीं की है कि उसके यहाँ कंपनियों के शेयर के दाम अचानक बहुत बढ़ सकते हैं और लोग के सीधे निवेश करने की संभावना से अर्थव्यवस्था में अचानक बहुत अधिक उछाल आ सकता है जिसकी कोई निश्चितता नहीं है। इसका सीधा परिणाम ये होगा कि निश्चित समय में यदि निवेशक को फायदा नहीं मिला तो चीन पर से निवेशकों का भरोसा सीधे डगमगा जाएगा और फिर अचानक दबाव से अर्थव्यवस्था धराशायी। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जीनियस हैं उन्होने चीन की इसी दुखती रग पर सीधा प्रहार ये कहते हुए किया कि हम निवेशकों का पैसा डूबने नहीं देंगे ...इसे कहते हैं देसी विद्वता जिसके आगे चीन की अर्थव्यवस्था का चरमराना लगभग तय है। मोदी जी की तरह चीन कभी अपने निवेशकों को ये भरोसा नहीं दे सकता कारण जनसंख्या पर कठोर नियंत्रण जिसके कारण युवा वर्ग की भारी कमी जो सीधे बाजार को प्रभावित करता है। भारत में चीन की तुलना में दोगुना युवा वर्ग है और जो प्रवीण भी है। यही कारण है चीन इस समय अपना आपा खोता जा रहा है वो किसी भी कीमत पर एशिया से अपना वर्चस्व कम नहीं होने देना चाहता। आज इंडियन मुजाहिदीन की धमकी और आईएसआईएस का भारत का लक्ष्य बनाना कोई महज संयोग नहीं है इसके पीछे सीधे-सीधे चीन का हाथ देखिये वो। वो हर कीमत पर भारत को अस्थिर करना चाहता है पाकिस्तान के माध्यम से और आतंकवाद के माध्यम से भी। अभी चुनाव से पहले भी ऐसी चर्चा थी कि केजरीवाल जैसे लोगों को भी चीन बहुत बड़े स्तर पर सहयोग कर रहा था। इसके पहले पूर्वोत्तर, नक्सलवादियों आदि के माधायम से भारत को लंबे समय से अस्थिर करने का प्रयास करता रहा है लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बात उनपर काफी हद काबू पा लिया गया है लिहाजा सीमा पर परेशानी से और आतंकवाद के माध्यम से भी भारत को परेशान करेगा ही।
"मेक इन इंडिया" समारोह की जबर्दस्त सफलता के बाद भारत के चोटी उद्योगपतियों में जबर्दस्त उत्साह है। इस समारोह की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन को भी अपने कर नीति में बदलाव करने की जबर्दस्त जरूरत पड़ गई। मैंने कल अपने लेख में कहा था मंगल की सफलता चीन को कोमा में जाने का रास्ता प्रशस्त करता है जिसका उपाय वो मात्र 24 घंटों के भीतर ही करना पड़ा "मेड इन चाइना" की घोषणा करके ठीक प्रधानमंत्री मोदी जी की नकल करते हुए। अब चीन कर भी क्या सकता है उसके यहाँ मजदूरी प्रतिवर्ष 10 से 15% की दर से बढ़ रही है 2010 से अबतक 30% की वृद्धि हो चुकी है जो बहुत अधिक महंगा साबित हो रहा है लिहाजा करों में रियायत ही एक रास्ता बचा है लेकिन वो भी निवेश की मात्रा पर निर्भर है जिसे अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है। ये सब उत्पाद गुणवत्ता उन्नयन के निमित्त शोध और विकास को बढ़ावा देकर किया जाएगा। लेकिन समस्या फिर वहीं जस की तस तो है ही कहीं और भी गंभीर भी होती जा रही है चीन के लिए। लोगों की आय बढ्ने के साथ - साथ कीमतों में भी जबरदस्त इजाफा हो रहा है नतीजन लागत में वृद्धि लेकिन कर रियायत से वो कैसे पूरा होगा जबकि 10 से 15% वार्षिक की दर से मजदूरी मंहगी हो रही है और जब यही मजदूरी शोध और विकास में लगती है तो कई गुना हो जाती है जिसका भार सीधे ग्राहक पर पड़ता है। चीन ने रियायत की घोषणा इसलिए नहीं की है कि उसके यहाँ कंपनियों के शेयर के दाम अचानक बहुत बढ़ सकते हैं और लोग के सीधे निवेश करने की संभावना से अर्थव्यवस्था में अचानक बहुत अधिक उछाल आ सकता है जिसकी कोई निश्चितता नहीं है। इसका सीधा परिणाम ये होगा कि निश्चित समय में यदि निवेशक को फायदा नहीं मिला तो चीन पर से निवेशकों का भरोसा सीधे डगमगा जाएगा और फिर अचानक दबाव से अर्थव्यवस्था धराशायी। वास्तव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी जीनियस हैं उन्होने चीन की इसी दुखती रग पर सीधा प्रहार ये कहते हुए किया कि हम निवेशकों का पैसा डूबने नहीं देंगे ...इसे कहते हैं देसी विद्वता जिसके आगे चीन की अर्थव्यवस्था का चरमराना लगभग तय है। मोदी जी की तरह चीन कभी अपने निवेशकों को ये भरोसा नहीं दे सकता कारण जनसंख्या पर कठोर नियंत्रण जिसके कारण युवा वर्ग की भारी कमी जो सीधे बाजार को प्रभावित करता है। भारत में चीन की तुलना में दोगुना युवा वर्ग है और जो प्रवीण भी है। यही कारण है चीन इस समय अपना आपा खोता जा रहा है वो किसी भी कीमत पर एशिया से अपना वर्चस्व कम नहीं होने देना चाहता। आज इंडियन मुजाहिदीन की धमकी और आईएसआईएस का भारत का लक्ष्य बनाना कोई महज संयोग नहीं है इसके पीछे सीधे-सीधे चीन का हाथ देखिये वो। वो हर कीमत पर भारत को अस्थिर करना चाहता है पाकिस्तान के माध्यम से और आतंकवाद के माध्यम से भी। अभी चुनाव से पहले भी ऐसी चर्चा थी कि केजरीवाल जैसे लोगों को भी चीन बहुत बड़े स्तर पर सहयोग कर रहा था। इसके पहले पूर्वोत्तर, नक्सलवादियों आदि के माधायम से भारत को लंबे समय से अस्थिर करने का प्रयास करता रहा है लेकिन मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बात उनपर काफी हद काबू पा लिया गया है लिहाजा सीमा पर परेशानी से और आतंकवाद के माध्यम से भी भारत को परेशान करेगा ही।