Wednesday, 6 August 2014

"प्राण" गए पर ...जान न जाई ...

प्राण कुमार शर्मा का आज 5 अगस्त को निधन हो गया मैंने उन्हें भावभीनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि दी मन बड़ा ही उदास था बचपन मे रंग भरने वाला वो चितेरा अब नहीं रहा। खैर ये दुनिया की रीति है कि हर कोई मरने के लिए ही पैदा हुआ है स्वीकार तो करना ही पड़ेगा लेकिन "हंस कर व्यंग मे" शायद यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी प्राण साहब को। मैंने तो मन को समझा लिया लेकिन बकलोल बबुआ जो युवराज के नाम से भी मशहूर है बेचैन हो उठा उसे इतना गुस्सा आया कि बजाय श्रद्धांजलि देने के कुएं में कूद गया और लगा ढेंचू-ढेंचू करने पीछे - पीछे सारे खाँटी भाई कोंग्रेसी भी ढेंचू-ढेंचू करने लगे। ये बहुत कम लोग जानते हैं कि प्राण कुमार शर्मा की मृत्यु 1 बजकर 44 मिनट पर हुई थी और लोग बताते हैं कि उनके जीवन के यही 44 मिनट बेहद महत्वपूर्ण थे जिसमे उनकी मृत्यु हुई। अब 44 के साथ बकलोल बबुआ यानी युवराज का क्या नाता है ये कहने की जरूरत नहीं... यकीनन युवराज भी यही चाहेगा कि ये 44 का आंकड़ा उसकी पार्टी के भी "प्राण" का जंजाल न बन जाए इसीलिए वो आज बहुत गुस्से मे था और कुएं में कूद गया। वैसे भी वो तो अभी तक प्राण कुमार शर्मा का वैसा ही फैन है जैसा 40 साल पहले हुआ करता था लेकिन आज भी वो सोचता है कि काँग्रेस पार्टी तो साबू है जैसा कि दादी जी कहानियों मे सुनाया करती थीं। लेकिन अब इसपर तो साबूदाने के पेड़ उग गए हैं जिन्हें म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में साईकस कहा जाता है और उसके आगे गाईगांटिया जोड़ दीजिये तो "वैज्ञानिक अंधविश्वास" का वो नमूना सामने आता है कि आज इसी विज्ञान के नाते मानव जाति ही खतरे में है...वैसे साबूदाने के पेड़ का फूल कभी चड्डी नहीं पहनता तो वैसे ही बहुत से खाँटी भाई लोग जोकर की उपाधि दे चुके हैं और वही जोकर आज उन खाँटी भाई कोग्रेसियों को मोगली बन के नचा रहा है ...यकीन मानिए इस नाच का जब 44 चक्कर पूरा हो जाएगा तो सभी को मुक्ति मिल जाएगी ठीक वैसे ही जैसे कपिला पशु वाले अलवी जैसे बहुत से लोगों को मिल गई। वैसे प्राण साहब की मृत्यु 01॰44 पर हुई थी लिहाजा बकलोल बबुआ का 10.44 बजे ही फार्म मे आना शुरू हो गया था और 11.44 बजे वो कुएं मे कूद चुका था ...बहुत से लोग इसे दिखावा कह रहे हैं उनको ऐसा नहीं करना चाहिए आखिर एक बच्चे की भावना की बात है जिसका ख्याल रखा जाना चाहिए ..."प्राण कुमार शर्मा" आज भी बच्चों के उतने ही चहेते हैं जितना वे 40 साल पहले थे ...ये अच्छा हुआ कि प्राण साहब ने 5 तारीख को दुनिया से विदा लिया अगर कहीं एक दिन पहले 4 तारीख को विदा लिए होते तो आपियों को का क्या हाल होता ??? सोचिए जरा कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल को तो प्राण साहब के मृत्युशैय्या पर ही जौहर करने नौबत आ जाती ...यकीनन मूर्ख आपिए और  महामूर्ख कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल सकते से बाहर निकल कर चैन की सांस ले रहे हैं...लेकिन चाणक्य ने उनकी नींद ही हराम कर दी ये बोल के कि भाजपा ही दिल्ली मे सरकार बनाएगी ...साबू के कंधे पर दुनिया देखने का शौक रफूचक्कर हो गया ...वैसे अभी भी चाचा चौधरी डांडा लिए बैठे है जिसमे अभी बहुत "प्राण" बाकी है आपियों ... 

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