Friday, 15 August 2014

जय हो .....

आज लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी का ओजस्वी, तेजस्वी और उत्साहपूर्ण सम्बोधन सुन के ऐसा लगा जैसे माँ भारती साक्षात अपने वीर पुत्रों का आह्वान करते हुए विश्वविजय के लिए प्रेरित करने लगी हो। जीवंतता ऐसा प्रस्फुटन स्वतत्न्त्र भारत में कभी देखने को नहीं मिला। युवा पूरे उत्साह से भरपूर दिख रहे थे ऐसा उत्साह का संचार इसके पहले कभी किसी ने नहीं किया जवाहर लाल नेहरू या इन्दिरा गांधी ने भी ने नहीं। कैसे कर कर पाते वो ऐसा जब मन में सिर्फ सेवा भाव के बजाय केवल शासन करने की इच्छा हो तो ! अब देखिये खाँटी भाई कोंग्रेसियों तक को जोश आ गया मोदी जी का ओजस्वी सम्बोधन सुन के ऐसे एक जोश से भरे हुए खाँटी भाई से जब मैंने पूछा तो कहने लगे "...मोदी जी को चुनावी मोड से बाहर निकालना चाहिए ..." इसपर मैंने उनसे पूछा "...भाषण सुन के आपका उत्साह इतना बढ़ गया कि फिर से चुनाव की बात कर रहे हैं अभी बहुत दिन बाकी है ..." खाँटी भाई बोले "...मोदी तो हमेशा वन स्टेप फॉरवर्ड क्यों चलते हैं... ?" मैंने कहा "..यही तो गनीमत है खाँटी भाई लोगों की कि कभी मनमोहन सिंह भाषण देते हुए गश खा कर लाल किले प्राचीर से गिरे नहीं ..." खाँटी भाई को कुछ समझ मे नहीं आया तो पूछा "...आपके कहने का मतलब क्या है ..." मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "...यही तो इतिहास रहा है कॉंग्रेस का कि हमेशा वन स्टेप फॉरवर्ड के चक्कर में खाँटी भाई लोग गश खा के गिर जाते रहे हैं ..." खाँटी भाई थोड़ा अपसेट हो गए बोले "...ऐसा कभी नहीं हुआ ..." मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "...इसीलिए तो खाँटी भाई लोगों को भ्रष्टाचार की चर्बी पीने की आदत पड़ी है कि गश खा कर गिरे नहीं ...ईमानदारी की ताकत तो है नहीं ..." खाँटी भाई उखड़ गए और गुस्से में बोले "... आपके कहने का मतलब है कि कॉंग्रेस केवल भ्रष्टाचार की ताकत पर खड़ी है ...?" मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "...हाँ बिल्कुल आज तो ये साबित भी हो गया ..." खाँटी भाई बोले "...क्या साबित हो गया ...?" मैंने कहा "...क्यों उत्तर अपने बकलोल बबुआ से पूछिए कि कितनी बार उसने अपने अपने प्रधानमंत्री का लिखा भाषण फाड़ -फाड़ के उसमे अपनी मनमानी की है और मनमानी भी ऐसी कि मनमोहन सिंह हमेशा 15 अगस्त के बाद पूरे साल भर बेचारे चुप ही रहते थे ..." खाँटी भाई अब रहा नहीं जा रहा था तो गुस्से मे उन्होने पूछा "...आपके कहने का मतलब उनका भाषण भी राहुल गांधी ही लिखते थे ...?" मैंने बड़े आराम से उत्तर देते हुए कहा "...लिखते ही नहीं थे भ्रष्टाचार की रोटी भी वो अपने हाथ से ही खिलते थे लेकिन खिलाने से पहले वो रोटी को भी फाड़-फाड़ के टुकड़े-टुकड़े कर देते थे ..." खाँटी भाई हताशा में बोले "...खैर जो भी मोदी जी को चुनावी मोड से बाहर निकाल ही जाना चाहिए ..." मैंने कहा "...अरे काहें घबरा रहे हैं अभी पूरे पाँच साल बाकी हैं इतना उत्साह भी ठीक नहीं ...रोज ब रोज महंगाई घटती जा रही है तो सांप्रदायिकता को भाड़े पर ले लिए उस पर भी वन स्टेप फॉरवर्ड के बजाय वापस बैक टू चूहे वाला बिल ..."   खाँटी भाई का उत्साह इतना बढ़ गया था कि अब शायद उनको अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगी थी ...लिहाजा वो चुप हो गए ...         

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