Tuesday, 22 July 2014

MH-17 मामले मे जांच के बजाय कुटिल रवैया....

MH 17 हादसे के मामले मे आज फिर अमेरिका ने बेबुनियाद और बे सिर पैर का आरोप लगाया कि यूक्रेन के विद्रोही जांच मे सहयोग नहीं कर रहे हैं। आखिर वो जांच एजेंसियां ऐसा क्या खोज रही हैं जो उनको मिलेगा तभी वो मानेंगी कि जांच मे सहयोग हुआ अन्यथा नहीं। कितना बेहूदा तर्क और उम्मीद है कि जांच भी चल रही है और वो भी इस उम्मीद में कि कुछ ऐसा मिले कि जानबूझ कर रूस को बदनाम किया जा सके। तो क्या इन जांच एजेंसियों के अधिकारियों को खुश करने के लिए विद्रोही जानबूझ कर बुक मिसाईल का मलबा कहीं से लाकर वहाँ रख दें ? जबकि अबतक के जांच मे ऐसा कुछ भी नहीं मिला है जिससे ये साबित होता हो कि इस हादसे मे रूस का हाथ है।

तो प्रश्न ये है कि आखिर अचानक अनेरिका चीन का बचाव क्यों कर रहा है ? जबकि सारे तथ्य स्पष्ट रूप से इस हादसे मे चीन का हाथ होने का इशारा कर रहे हैं। इसका पहला कारण है ये है कि अमेरिका मे लोकप्रिय सरकार के बजाय कारपोरेट सरकार का महत्व है मतलब ये वहाँ जो भी सरकार होती है उसका पहली प्राथमिकता कॉर्पोरेट हित होती है क्यों 96% अमेरिकी जनता सीधे-सीधे कार्पोरेट पर निर्भर है और चीन ने अपने यहाँ 1 करोड़ 15 लाख 17 हजार 858 बिज़नस वेब साईटों को ब्लॉक कर रखा है जिसमे गूगल, याहू, अमेजान और अनेकों अमेरिकी कंसल्टेंसी कंपनियों की साईटें हैं। मतलब ये कम्पनियाँ चीन मे बिज़नस नहीं कर सकतीं और चीन अमेरिका के लिए भारत के बाद सबसे बड़ा बाजार है इसीलिए अमेरिका की मजबूरी है कि वो चीन का साथ दे।

दूसरा कारण ये है पहले ही चीन अमेरिका का प्रतिद्वंदी हो गया है अगर कहीं रूस भी हो गया तो अमेरिका के लिए बहुत बड़ी मुसीबत हो जाएगी साथ ही भारत मे मोदी जैसा बेहद मजबूत इरादों वाले व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना अपने आप मे अमेरिका के लिए बहुत बड़ी मुसीबत है। इधर रूस और भारत के बीच सामरिक-तकनीकी सहयोग की संभावना बनने के कारण भी अमेरिका बहुत ज्यादा चिंतित है क्योंकि उसका मुख्य और बहुत बड़ा खरीदार हाथ से निकलता दिख रहा है। ध्यान देने वाला तथ्य ये है कि चीन भारत के लिए हमेशा से मुसीबत खड़ी करता रहा है कभी सीमा विवाद से, पूर्वोत्तर मे आतंकवादियों को सहयोग के माध्यम से और पाकिस्तान के सहयोग के माध्यम से भी। लिहाजा अमेरिका तो चाहेगा ही भारत-रूस कभी एक साथ न हों पाएँ। इसीलिए वो किसी भी तरह रूस को बदनाम करने पर उतारू है भले ही इसमे चीन का हित सधता हो।

इस हादसे मे कैसे-कैसे बेहूदे  बे सिर-पैर के तर्क गढ़े जा रहे कि गले से नीचे उतरता ही नहीं। कहा जा रहा है बुक मिसाईल को दागने के लिए बहुत उच्चस्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है तो अभी ये विद्रोह इसी वर्ष मार्च से ही शुरू हुआ तो क्या यूक्रेन के विद्रोही रूसी सैनिक हैं या फिर यूक्रेन की सेना ने ही इस दुखद घटना को अंजाम दिया ? स्पष्ट है ये दोनों संभनाएँ लगभग नही हो सकतीं तो फिर ये काम तो सेना के स्तर की विशेषज्ञता का है तो वहाँ सेना तो चीन की है और फिर ये बुक मिसाईल अनेक बालक्तिक राज्यों आसानी से उपलब्ध है लिहाजा रूसी मिसाईल का मलबा खोजना वो भी सिर्फ रूस को बदनाम करने के लिए अपने आप मे बहुत बड़ी बेवकूफी तो है ही एक बाहर बहत गंभीर और कुटिल चाल की ओर इशारा करती है जिससे भारत को सावधान रहने की सख्त जरूरत है ...भारत को रूस के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए    

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