Sunday, 27 July 2014

सी-सैट विवाद का सीधा और सरल समाधान

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में अभिव्यक्ति पर रोक लगा देनी चाहिए इसके निमित्त सभी प्रकार की परीक्षाएं मात्र हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही लिया जाना चाहिए। तमिलनाडु का तमिल में परीक्षा दे, कर्नाटक का कन्नड मे, गुजरात का विद्यार्थी गुजराती में बंगाली बांग्ला की तर्ज पर सभी मातृभाषी अपनी भाषा मे परीक्षा दे सकें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की परीक्षा, अंगरेजी माध्यम से परीक्षा व साक्षात्कार लेने पर सख्त प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ये व्यवस्था केजी से लेकर परास्नातक, मेडिकल, इंजीन्यरिंग, प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा (सिविल सेवा सहित) सभी स्तरों पर सख्ती से लागू कर देना चाहिए क्योंकि यदि किसी को म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं आती तो वो हीन भावना का शिकार नहीं होगा जो किसी भी स्तर पर राष्ट्र के लिए बेहद हानिकारक है दूसरे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) आवे या न आवे कम से कम मातृभाषा तो अवश्य ही सबको आती है और कायदे से आती है तो मेरे समझ से कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की परीक्षाएँ भी इसका अपवाद नहीं होनी चाहिए। शोध तो अनिवार्य रूप से मातृभाषा मे ही होने चाहिए जिससे मौलिक सोच के प्रतिभाशाली लोगों को ही अवसर मिल सके मूर्खों को नहीं जो रट्टा मार कर कुटिलयुक्ति से परीक्षा पास करने में विशवास करते हैं बजाय ज्ञान और प्रतिभा के आधार पर।

ऐसी व्यवस्था आवश्यक इसलिए है क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है और वो 2-3% से अधिक सक्रिय हो ही नहीं सकती (मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली के अनुसार) लिहाजा छात्र विषय को समझने के बजाय उसे रटने पर ज़ोर देता है जिससे उसकी सोच बिलकुल कुंद हो जाती है और जहां नवीनता और प्रवर्तन की बात आती है तो वे मूर्ख नकल मारने पर उतारू हो जाते हैं अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और न जाने क्या - क्या चिल्लाने लगते हैं और वहीं मातृभाषा मे व्यक्ति मस्तिष्क पूरे 100% सक्रिय रहता है लिहाजा नवीनता और प्रवर्तन युक्त प्रतिभा के संदर्भ में मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं है। कुछ लोग ये आपत्ति कर सकते हैं की यहाँ हर 4 कोस पर वाणी बादल जाती है तो इसका उत्तर ये है की वाणी बदलती है तो अपनी मौलिकता के आधार पर बदलती है जिसके मूल में संस्कृत है, अतः शैली वही है जो आसामी और गुजराती की है डोंगरी और मलयालम की है....आदि अतः एक भारतीय के लिए सभी स्थानीय भाषाएँ मातृभाषाएँ ही हैं और ये परिवर्तन संस्कृत-तमिल के साथ हमारे मानसिक आयाम को बढ़ा कर हमारे मस्तिष्क को विश्व मे सबसे प्रबल और शक्तिशाली बना देता हैं ठीक वैसे ही भगवान राम की चार माताएँ थीं इस कारण से भाषा मे प्राकृतिक विभिन्नता हम भारतीयों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है यही कारण है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और आध्यात्म का केन्द्र भारतवर्ष ही है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इसमे विष घोल कर उत्तरोत्तर नष्ट करती जा रही है।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उच्चारण ही मानसिक बीमारी है और शारीरिक बीमारियों का भी घर है। मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति कभी भी अपने को बीमार नहीं मानता और वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता रहता है। इसका प्रत्यक्ष भीषण लोमहर्षक उदाहरण बीपीओ (कॉल सेंटर) मे काम करने वाले कर्मचारी हैं जिनको मात्र म्लेच्छ बोलियों (अंगरेजी व अन्य यूरोपीय बोलियाँ) मे काम करना पड़ता है, पूरे के पूरे 100% कर्मचारी भयानक मानसिक बीमारियों और हार्मोनल असंतुलन की चपेट में हैं (इंडिया टुडे, 8 अगस्त 2007) जिसका कोई इलाज एलोपैथी मे है ही नहीं (cchr.org)। वर्तमान सामय मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उपयोग अपना प्रभुत्व जमाने (आम भाषा में भौकाल मारने), अज्ञानता और मूर्खता को छिपाने के लिए ही अधिक किया जाता है। हमारे एक मित्र जो यूजीसी नेट हैं  बहुत ज्ञानी हैं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे बेहद कमजोर। उन्होने नौकरी हेतु दिल्ली के बहुत से महाविद्यालयों नौकरी के लिए साक्षात्कार दिया किन्तु सफल नहीं हुए मात्र म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण। उनको लगभग सभी जगह से यही कहा गया "...आपको भले ही विषय की कामचलाऊँ जानकारी हो कोई बात नहीं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) तो फर्राटे से आनी ही चाहिए ..." उनसे बहुत कम योग्यता वाले लोग दिल्ली के महाविद्यालयों म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर लोगों को बेवकूफ़ बना कर पैसा ऐंठ रहे हैं। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर ठगई का गोरखधंधा चारो ओर व्याप्त है इसीलिए उच्चशिक्षा सहित सभी प्रकार की शिक्षा का स्तर ही लगभग समाप्त हो चुका है।

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इस शोध कार्यों की स्थिति और भी बुरी है क्रोनिकल पत्रिका के आंकड़े के अनुसार भारत मे 01% शोध भी किसी काम का नहीं है। कारण म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) जो सोचने ही नहीं देती समझने की तो बात ही भूल जाईए यही कारण है कि अभी तक भारत में एक भी नोबल पुरस्कार विज्ञान मे नहीं आ सका है। अतः भारत सरकार को चाहिए कि सी-सैट ही समाप्त न करे बल्कि हर स्तर (निजी व सरकारी दोनों) परीक्षा का माध्यम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पर भी तत्काल प्रतिबंध लगाए यदि भारत को स्वस्थ, प्रतिभा सम्पन्न, सर्वशक्तिमान और विकसित होना है तो। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही शक्तिशाली मस्तिष्क रह सकता है।

Friday, 25 July 2014

लुआठी दुन्नों पूंछ मे ...सवार बकलोल बजावे बीन

बिहार की स्थिति ऐसी हो गई है कि दो बहरे गदहे आपस मे पूंछ बांध उसमे लुआठी फंसा के राजनीति मे नया रास्ता खोजने निकल वाले हैं। मजे की बात ये है ये दोनों गदहे अभी हाल तक एक दूसरे को खूब दुलत्ती मारते थे। दोनों जानी दुश्मन अब जानी दोस्त बनने जा रहे हैं। एक वैज्ञानिक बिहारी बता रहे थे अब दोनों मिलके फिर से बिहार मे आग लगाएंगे। तो मैंने उनके वक्तव्य पर टिप्पणी की थी कि पूंछ तो मोदी की आग मे कबकी जल चुकी है फिर ये नकली पूंछ मे लुआठी कब तक टिकेगी ये पूंछ भी जल जाएगी। तो वैज्ञानिक ने कहा था कि शायद इसीलिए एक और बकलोल गदहा का इन दोनो गदहों जिनके दोनों आगे वाले पैर मोदी-बेड़ी बंधे हुए है, की सवारी करने को आतुर दिख रहा है सवारी की सवारी, पूंछ की देखभाल भी। खैर एक बकलोल गदहे द्वारा दो गदहों की सवारी करते देखना कितना सुखद अनुभव होगा ये कल्पना ही अपने आप मे ही अद्भुत है। वैसे सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि वो बकलोल गदहा अपने आप को बकलोल समझता ही नहीं और तो और ये दोनों जानी नवीन दोस्त गदहे उसे अपना युवराज भी मानते हैं। सवाल उठता है जिस गधों के पुंछ मे लुआठी बंधी है और दोनों गदहों की सवारी एक तीसरा बकलोल कर रहा है तो रास्ता कैसे दिखेगा?  इस सवाल जवाब देते हुए जदयू नेता बोल रहे थे "...बिहार मे सेकुलरिज़्म का उजाला हमेशा रहा है और रहेगा ..." मैंने पूछा "...तो पूंछ मे लुआठी क्यों बांध रहे हैं ..." जदयू नेता उत्तर देते हुए प्रतिप्रश्न मे बोले "...दिन मे टेल लाइट नहीं जलती है क्या ..." मुझे अच्छा लगा उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर सुन के विश्वास कीजिये जिंदगी मे पहली बार किसी जदयू नेता ने बुद्धिमानी वाली बात की, खैर मैंने कहा "..लुआठी तो आपने साथ-साथ अपने विरोधी के पूंछ मे भी बांधने की तैयारी कर रहे हैं ..." जदयू नेता उत्तर देते हुए बोले "...वो विरोधी नहीं रहे अब ..." मैंने कटाक्ष करते हुए उनसे पूछा '..ठीक है लेकिन लुआठी वाली हेड लाइट पूंछ में...?" उनको कुछ समझ मे नहीं आया तो स्पष्टीकरण के पूछा "...मैं समझा नहीं ..." मैंने उनको समझाते हुए कहा "...भाई हेड लाइट पूंछ आप दोनों पर तीसरा गदहा सवर ...रास्ता कैसे दिखेगा ...?" जदयू नेता उखाड़ गए थोड़ा गुस्से मे बोले "...देखिये आप वो हमारी सवारी नहीं कर रहे हैं ..." मैंने भी उसी टोन मे जवाब देते हुए कहा "...बकलोल गदहा तो सवारी का ही बहाना खोज रहा है ...मय खाँटी कग्रेसिए जोकर और पता नहीं क्या - क्या बोल रहे हैं ..." जदयू नेता थोड़ा अनमने मन से बोले "...देखिये हम लोगो को सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के लिए जो करना पड़े करेंगे ..." मैंने कहा "...लेकिन आप लोगों को तो मोदी जी ने बिलकुल ताकत विहीन कर दिया और खुद इतने ताकतवर हो गए कि आप लोग ताकते रह गए ..." जदयू नेता बोले "...हम ताकतहीन बिलकुल नहीं हुए है ..." मैंने कटाक्ष करते हुए कहा "...मैंने कब कहा अब ताक नहीं सकते ...ताकिये चरो ओर ताकिए ...मोदी ने आप लोगों का अस हाल किया है कि अब पूंछ मे लुआठी बांध के रास्ता खोजना पड़ रहा है...ऊपर से बकलोल का खाज अलग से ..." जदयू नेता कुछ बोल नहीं रहे थे ...  

Tuesday, 22 July 2014

MH-17 मामले मे जांच के बजाय कुटिल रवैया....

MH 17 हादसे के मामले मे आज फिर अमेरिका ने बेबुनियाद और बे सिर पैर का आरोप लगाया कि यूक्रेन के विद्रोही जांच मे सहयोग नहीं कर रहे हैं। आखिर वो जांच एजेंसियां ऐसा क्या खोज रही हैं जो उनको मिलेगा तभी वो मानेंगी कि जांच मे सहयोग हुआ अन्यथा नहीं। कितना बेहूदा तर्क और उम्मीद है कि जांच भी चल रही है और वो भी इस उम्मीद में कि कुछ ऐसा मिले कि जानबूझ कर रूस को बदनाम किया जा सके। तो क्या इन जांच एजेंसियों के अधिकारियों को खुश करने के लिए विद्रोही जानबूझ कर बुक मिसाईल का मलबा कहीं से लाकर वहाँ रख दें ? जबकि अबतक के जांच मे ऐसा कुछ भी नहीं मिला है जिससे ये साबित होता हो कि इस हादसे मे रूस का हाथ है।

तो प्रश्न ये है कि आखिर अचानक अनेरिका चीन का बचाव क्यों कर रहा है ? जबकि सारे तथ्य स्पष्ट रूप से इस हादसे मे चीन का हाथ होने का इशारा कर रहे हैं। इसका पहला कारण है ये है कि अमेरिका मे लोकप्रिय सरकार के बजाय कारपोरेट सरकार का महत्व है मतलब ये वहाँ जो भी सरकार होती है उसका पहली प्राथमिकता कॉर्पोरेट हित होती है क्यों 96% अमेरिकी जनता सीधे-सीधे कार्पोरेट पर निर्भर है और चीन ने अपने यहाँ 1 करोड़ 15 लाख 17 हजार 858 बिज़नस वेब साईटों को ब्लॉक कर रखा है जिसमे गूगल, याहू, अमेजान और अनेकों अमेरिकी कंसल्टेंसी कंपनियों की साईटें हैं। मतलब ये कम्पनियाँ चीन मे बिज़नस नहीं कर सकतीं और चीन अमेरिका के लिए भारत के बाद सबसे बड़ा बाजार है इसीलिए अमेरिका की मजबूरी है कि वो चीन का साथ दे।

दूसरा कारण ये है पहले ही चीन अमेरिका का प्रतिद्वंदी हो गया है अगर कहीं रूस भी हो गया तो अमेरिका के लिए बहुत बड़ी मुसीबत हो जाएगी साथ ही भारत मे मोदी जैसा बेहद मजबूत इरादों वाले व्यक्ति का प्रधानमंत्री बनना अपने आप मे अमेरिका के लिए बहुत बड़ी मुसीबत है। इधर रूस और भारत के बीच सामरिक-तकनीकी सहयोग की संभावना बनने के कारण भी अमेरिका बहुत ज्यादा चिंतित है क्योंकि उसका मुख्य और बहुत बड़ा खरीदार हाथ से निकलता दिख रहा है। ध्यान देने वाला तथ्य ये है कि चीन भारत के लिए हमेशा से मुसीबत खड़ी करता रहा है कभी सीमा विवाद से, पूर्वोत्तर मे आतंकवादियों को सहयोग के माध्यम से और पाकिस्तान के सहयोग के माध्यम से भी। लिहाजा अमेरिका तो चाहेगा ही भारत-रूस कभी एक साथ न हों पाएँ। इसीलिए वो किसी भी तरह रूस को बदनाम करने पर उतारू है भले ही इसमे चीन का हित सधता हो।

इस हादसे मे कैसे-कैसे बेहूदे  बे सिर-पैर के तर्क गढ़े जा रहे कि गले से नीचे उतरता ही नहीं। कहा जा रहा है बुक मिसाईल को दागने के लिए बहुत उच्चस्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है तो अभी ये विद्रोह इसी वर्ष मार्च से ही शुरू हुआ तो क्या यूक्रेन के विद्रोही रूसी सैनिक हैं या फिर यूक्रेन की सेना ने ही इस दुखद घटना को अंजाम दिया ? स्पष्ट है ये दोनों संभनाएँ लगभग नही हो सकतीं तो फिर ये काम तो सेना के स्तर की विशेषज्ञता का है तो वहाँ सेना तो चीन की है और फिर ये बुक मिसाईल अनेक बालक्तिक राज्यों आसानी से उपलब्ध है लिहाजा रूसी मिसाईल का मलबा खोजना वो भी सिर्फ रूस को बदनाम करने के लिए अपने आप मे बहुत बड़ी बेवकूफी तो है ही एक बाहर बहत गंभीर और कुटिल चाल की ओर इशारा करती है जिससे भारत को सावधान रहने की सख्त जरूरत है ...भारत को रूस के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए    

Sunday, 20 July 2014

MH-17 हादसा चीन की चाल ....

हमारे खाँटी भाई कोंग्रेसी और नौटंकीबाज आपिए गाजा पर संसद मे बहस करवाना चाहते हैं पता नहीं सेकुलरिज़्म के गाँजा का नशा कब उतरेगा उनपर से। इधर मलेशियाई विमान को निशाना बनाया गया इस पर उन लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी जबकि वास्तविकता ये है हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा जुड़ा ये सीधा मामला है। आखिर मूर्खता और पागलपन की भी हद होती है।

आप जरा ध्यान दीजिये जब MH 17 को यूक्रेन के दमेतस्क मे दो दिन पहले मार गिराया गया था तभी भारत के प्रधानमंत्री भी इसी रूट से 90 मिनट पहले लौटे थे और फिर जिस समय ये हादसा हुआ उसके ठीक 90 मिनट की दूरी पर एक एयरइंडिया का विमान भी उड़ रहा था। जब ये हादसा हुआ उसके कुछ घंटों के बाद ही विरोधियों ने जांच मे सहयोग का वादा किया लेकिन अब ये कहा जा रहा है कि विरोधियों ने सुबूत नष्ट कर दिये है जो समझ से परे है आखिर ब्लैक-बॉक्स तो मिल ही गया जो सबसे बड़ा सुबूत होता है। तो कहीं ये एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश तो नहीं थी भारत के भी खिलाफ मतलब एक तीर से कई निशाने ? वैसे जिस प्रकार ब्रिक्स सम्मेलन में बिक्स बैंक के मुद्दे पर चीन से भारत का जो भी विवाद हुआ और उसमे पहले अध्यक्ष के तौर पर चीन को भारत के आगे झुकना पड़ा, संदेह उत्पन्न करता है। आखिर क्या कारण है कि उधर चीन के राष्ट्रपति जी जीनपिंग भारत के प्रधानमंत्री से हाथ मिला रहे थे और इधर चीनी सेना भारत मे घुसपैठ करने की कोशिश कर रही थी ?

शक का कारण ये भी है कि चीन ने यूक्रेन में 3 मिलियन एकड़ ( हांगकांग से भी बड़ा क्षेत्र ) जमीन खरीद रखी है। ये ख़रीदारी उसके यूक्रेन के केजीएस एग्रो के साथ सितंबर 2013 मे की थी ये चीन की विस्तारवादी नीति का ही हिस्सा है उसके बाद चीन ने उस जमीन पर अपनी सेना तैनात करना शुरू कर दिया। जिसपर रूस को आपत्ति थी। क्रीमीया का रूस मे शामिल होना भी चीन पचा नहीं पा रहा है उसे डर है कि उसके 3 मिलियन जमीन हाथ से निकल भी सकती है। अपने एक चाल से चीन किसी भी तरह रूस को पस्त करना चाहता ताकि वो इस क्षेत्र मे हस्तक्षेप बंद करे। अब सवाल उठता है कि मलेशियाई विमान ही निशाना क्यों बना ? कारण साफ है चीन पश्चिमी फिलीपीन्स सागर पर अपना दावा जताता है और इसके विरोध के निमित्त फिलीपींस के राष्ट्रपति जेजोमार बिनय और विएतनाम के राजदूत तुरुङ्ग तीयू डुओंग के बीच सार्थक बैठक 6 मार्च 2014 को चुकी थी जिसका समर्थन मलेशिया ने भी किया था। मतलब मलेशिया ने सीधा-सीधा चीन का विरोध किया था। आप ध्यान दीजिये एक मलेशियाई विमान MH-370 जो मलेशिया से बीजिंग की उड़ान पर था, का अपरण ठीक उसी समय हुआ था जिसका आजतक पता नहीं चला।

भारत सरकार को चाहिए कि चीन विस्तारवादी नीति पर रोक लगाने के लिए पूरे मनोयोग से रूस के साथ न सिर्फ खड़ा रहे बल्कि उसे सहयोग भी करे और उधर आतंकवाद पर प्रभावी मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए इसराईल के साथ खड़ा तो रहे ही फिलिस्तीन की राष्ट्र के रूप में मान्यता भी समाप्त करे। कॉंग्रेस-कम्युनिस्ट चिल्लाते हैं तो चिल्लाते रहें ।

Saturday, 19 July 2014

वाह चंद्रिका जी, इसे कहते हैं राजनीति को अपने उँगलियों पर नचाना, इधर आपने मनीष सिसोदिया की चाल का खुलासा किया नहीं कि उधर आसिफ खान को वास्तविकता बतानी पड़ी। हालाँकि वो एक दिन पहले ही ये बयान दे रहे थे कि कुछ आम आदमी पार्टी के नेता उनसे संपर्क कर किसी भी तरह सरकार के लिए कॉंग्रेस के समर्थन का जुगाड़ करने को कह रहे थे, लेकिन नाम बताने से कतरा रहे थे अगर उनको नाम बताना ही था तो उसी दिन बता दिये होते लेकिन आपने सब भंडा फोड़ दिया और आसिफ साहब ये बताने पर मजबूर होना पड़ा कि मनीष सिसोदिया खुद दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने की जुगाड़ मे हैं। ये तय है कि यदि आपने अपने इस पोस्ट से सिसोदिया की चाल का खुलासा नहीं किया होता तो आसिफ खान सिसोदिया का नाम नहीं लेते ये शकील अहमद के बयान से सिद्ध होता है। आपकी कमाल की विश्लेषण क्षमता ने दिल्ली के राजनीति की दिशा ही बदल के रख दी।

इसके पहले भी मैंने कई बार राजनीति को आपके विलक्षण उँगलियों पर नाचते हुए देखा है जिसका प्रमाण आपके टाइमलाइन वाल पर मौजूद है और आसानी से उन सभी का अवलोकन किया जा सकता है। वास्तव मे मैं तो कायल हूँ आपके अद्भुत और विलक्षण विश्लेषण क्षमता का जो पत्रकारिता जगत मे कहीं दिखती ही नहीं।      

Friday, 18 July 2014

यूं ही नहीं आपियों को मूर्ख केजरीवाल को महामूर्ख कहा जाता है ....

मैंने पहले कई बार ये सिद्ध किया है और एक लेख भी लिखा है कि जनांदोलनों से उपजी पार्टियां आला दर्जे की अनैतिक, भ्रष्ट, सत्ता की लालची और मूर्खों का जमावड़ा रही हैं। ये सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं इसी का नमूना है मनीष सिसोदिया का केजरीवाल को ठिकाने लगाते हुए दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने का प्रयास करना। मैंने 20 घंटे पहले ही इसका खुलासा कर दिया था  कि सिसोदिया केजरीवाल को ठीक उसी तरह लात मार कर मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं जैसे केजरीवाल ने अन्ना को लात मारी थी। मेरे उस खुलासे को आज ABP News के बड़ी बहस ने पुष्टि कर दी। खाँटी कोंग्रेसी आसिफ मोहम्म्द खान ने साफ-साफ कहा कि मनीष सिसोदिया खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं जिसे बाद मे संजय सिंह ने भी खान साहब से मुलाक़ात करके केजरीवाल के विकल्प की बात की थी।

इसके पहले भी मैंने कई बार इन मूर्ख और भ्रष्ट आपियों की पोल सिरे से खोली है जिसका प्रभाव है कि इनकी दुकान बिलकुल बंद होने के कगार पर है इसीलिए ये अस्तित्व बचाने के लिए किसी भी तरीके से कम से कम दिल्ली मे सत्ता हथियाना चाहते हैं। सवाल ये है कि जब मनीष और अन्य मूर्ख आपिए किसी तरह सत्ता हथियाना चाह रहे हैं तो छोटे आपिया विधायक ऐसा क्यों नहीं करेंगे ? आखिर उनको भी सत्ता सुख चाहिए ही चाहे जैसे भी हो भले ही आपिया का ठप्पा मिटा कर किसी और का ठप्पा लगाना पड़े। किस मुंह से ये मूर्ख आपिए ये कह सकते कि उनके विधायक अनैतिकता का रास्ता नहीं अपना रहे हैं। शायद महामूर्ख  केजरीवाल को ये आश्चर्य लगे लेकिन ये सत्य है कि 19 विधायक आपिया पार्टी तोड़ कर नयी पार्टी बनाने के लिए एकदम तैयार हैं और सभी बिन्नी के संपर्क में हैं।

वैसे मूर्ख आपिए ईमानदारी का चोला ओढ़ कर ईमानदारी का दिखावा भी नहीं कर पा रहे। नीति शास्त्र मे लिखा है "अतिविनयम महाधूर्तस्य लक्षणम"। ये सूक्ति मूर्ख आपियों पर अक्षरशः लागू होती है। केजरीवाल, योगेंद्र यादव और अन्य आपियों के अतिविनयशीलता से सभी परिचित हैं। अतः इन महाभ्रष्ट, लालची और हमेशा झूठ बोलने वाले नौटंकीबाज आपियों की महाधूर्तता से बचने की जरूरत है।  

Thursday, 17 July 2014

देख धुरंधर पाजी काम, पीए शिकंजी बतावे जाम ...

भारतीय सिनेमा मे सन्नी लियॉन को सभ्य नारी का दर्जा मिलने के बाद ठीक केजरीवाल के तर्ज पर सौ चूहे खा कर भी आज बॉलीवुड मे हज करती फिर रही है ठीक वैसे ही भारतीय राजनीति के आईटम गर्ल केजरीवाल हजरात बने फिर रहे हैं और उल्टे भाजपा पर इल्जाम लगा रहे हैं कि वो इनके सड़े चूहे खा रही है। सबेरे से ही वो इसकी चूसना दे रहे थे दिल्ली वालों को...लेकिन दिल्ली वालों ने उस चूसना को लेने से इनकार कर दिया। सन्नी लियॉन तो फिर भी महिला है लेकिन केजरीवाल तो अस पुरुष हैं कि उन्हें न तो कॉंग्रेस और बीजेपी मे फर्क पता है, न गाय और भैंस मे अंतर कर पाते हैं, न अपनी पत्नी और बहन मे और न ही शीला दीक्षित और नरेन्द्र भाई मोदी में अंतर कर पाने के उनके अंदर क्षमता है। सन्नी लियॉन की तर्ज  पर अपने आईटम से सबका मनोरंजन करने वाले मूर्ख आपिया की पोल जब खाँटी भाई कोंग्रेसी आसिफ मोहम्मद खान ने खोली तभी एक मूर्ख आपिया अपना आपा खोते हुए चीखने लगा तो मैंने उससे उसी अंदाज में पूछा "...ऐ चिल्ला क्यों रहा है ...?" मूर्ख आपिया बोला "...ये सब चाल है बीजेपी - कॉंग्रेस की ..." मैंने उसे डांटते हुए कहा "...अरे मूर्ख तुम्हारा मनीष सिसोदिया गया है जोड़ - तोड़ कर सरकार बनाने के संदर्भ में बात करने के लिए इसमे बीजेपी कहाँ से आ गई ...?" मूर्ख आपिया बोला "...ये सब चाल है ...सब मिले हुए हैं ..." मैंने कहा "...पहले शांत हो जा फिर बताते हैं चाल किसकी है ..." मूर्ख आपिया शांत हो गया फिर बोला "...बताओ ..." मैंने उसे समझाते हुए कहा "..आसिफ खान से तुम्हारा केजरीवाल क्यों नहीं गया बात करने के लिए ...? मूर्ख आपिया अपना कपार खजुआने लगा खूब खजुआने के बाद भी जब उसे समझ में नहीं आया तो उसने पूछा "...बताओ क्यों ...? मैंने उसे थोड़ा झेलाने के अंदाज मे कहा "...सन्नी लियॉन को देखो उसकी कोई दोस्त या रिश्तेदार उसका बिज़नस डील करने जाती है ...?" आपिया फिर अपना आपा खोते हुए ज़ोर से बोला "...इसमे सन्नी लियॉन कहाँ से आ गई ...?" मैंने कहा "...बात वही है चेतन भगत ने बिलकुल सही कहा था महामूर्ख केजरीवाल और मूर्ख आपियों के बारे में ..." मूर्ख आपिया को संभवतः  कुछ समझ में नहीं आया इसलिए शायद वो चुप रहा तो मैंने कहा "... जैसे सन्नी लियॉन किसी दोस्त या रिश्तेदार से बिज़नस डील कराने के बजाय वो खुद ही डील करती है वैसे सिसोदिया भी अपना बिज़नस खुद ही डील कर रहे हैं ...समझ मे आया कुछ ...?"  मूर्ख आपिया फिर से अपने कपार के पश्चिमोत्तर प्रांत मे खजुआने लगा थोड़ी देर बाद बोला "...मतलब मनीष खुद ही ..." मैंने बीच मे ही बात काट कर उसकी पीठ ठोकते हुए कहा "...शाब्बास समझ मे तो आ गया तुझे बिल्कुल सही पकड़ा ...मनीष ही मूर्खाधिराज केजरीवाल को बाइपास करके दिल्ली का मुख्यमंत्री बनना चाहता है ..." मूर्ख आपिया का चेहरा अब देखने लायक था मनीष सिसोदिया के खिलाफ लगा बड़बड़ाने...उसी बड़बड़ाहट मे वो बोला "...लेकिन हमे तो केजरीवाल ही चाहिए ..." मैंने उससे कहा "...जनलोकपाल नहीं तो महामूर्ख केजरीवाल नहीं ..." मूर्ख आपिया फिर फंस गया और ज़ोर-ज़ोर से अपने दोनों हाथ से कापार खजुआने लगा ...बहुत देर तक खजुआता ही रहा .........  

Wednesday, 16 July 2014

मौजि अधेली - घंटाल खियावे कुक्कुर भिंडी....

बकलोल बबुआ के लिए हमेशा गुरु - घंटाली दिखाने वाले दिग्गी राज्जा ने जब अपनी असली रूप दिखाया तो किसी खाँटी भाई कोंग्रेसी ने चू तक नहीं की उल्टे अपनी ही मस्ती मे मगन रहे। मस्ती का आलम ये था कि बस "बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना"। अपने ही नाज-नखरों से खाँटी भाईयों ने पाकिस्तान को खड़ा किया, आतंकवाद को खड़ा किया लेकिन अब जब सदमा लगा तो दिग्गी राज्जा के हनीमून के लिए परेशानी खड़ी हो गई। तब दिग्गी राज्जा गुरु - घंटाल से अधेली - घंटाल हो गए इसलिए बेचारे कई अब्दुल्ला पाकिस्तान पंहुच गए लेकिन उन्हीं का पालतू हाफिज़ सईद कहाँ मानने वाला था सो उसे मनाने के लिए पुराने खाँटी भाई कोंग्रेसी "भेद प्रकाश भैदिक" को वहीं पाकिस्तान में रुकना पड़ा। हाफिज़ सईद तो पूरी तरह दिग्गी राज्जा की भूमिका निभाना चाह रहा था ठीक दिग्गी राज्जा के ही खिलाफ। अब पता नहीं मामला सल्टा की नहीं लेकिन ये तो तय है कि दिग्गी राज्जा बुढ़ौती मे बियाह के बाद हनीमून पाकिस्तान मे ही मनाएंगे। इस पर कोई खाँटी भाई कोंग्रेसी कुछ बोलने को तैयार नहीं था। बड़ी मुश्किल से एक खाँटी भाई तैयार हुए तो मैंने पूछा "...स्विट्ज़रलैंड मे कोई परेशानी है क्या दिग्गी राज्जा को ...?" खाँटी भाई बोले "...वैसे तो कोई खास नहीं लेकिन अब सोचना पड रहा है ..." मैंने उसी जिज्ञासा से पूछा "...क्यों...?" खाँटी भाई उत्तर देते हुए बोले "...काले धन पर SIT ..." मैंने कहा "...हाँ वो तो है मतलब तब तो चीन भी नहीं जा सकते वो ..." खाँटी भाई बोले "...चीन पंचशील का पालन नहीं करता ..." मुझे उनके इस उत्तर से थोड़ी भी संतुष्टि नहीं हुई सो मैंने पूछा "...काले धन और पंचशील मे क्या समानता है ...?" खाँटी भाई उत्तर देते हुए बोले "...ब्राज़ील मे चीन से प्रधानमंत्री की बात हो रही है ..." मेरी असंतुष्टि कायम रही तो मैंने प्रतिप्रश्न किया "...मामला उस मुलाक़ात का है या सुब्रमनियन स्वामी के खुलासे का ...?" इस पर खाँटी को थोड़ा गुस्सा आ गया बोले "...देखिये वो सब आरोप झूठे हैं ..." मैंने कहा "...लेकिन वो तो न्यायालय में हैं ..." खाँटी भाई मामले को रफा-दफा करने के अंदाज मे बोले "...छोड़िए वो सब पाकिस्तान सबसे सुरक्षित है ..." मैंने इस पर पूछा "...भैदिक जी ने हाफिज़ सईद को मना लिया क्या ...?" खाँटी भाई बोले "...हाँ लगता तो है वैसे हमारा प्रयास ये भी है वो कश्मीर मे भी परेशानी न खड़ी करे ..." मैंने कहा "...हाँ दिग्गी राज्जा हनीमून के लिए न तो स्विट्ज़रलैंड जा सकते हैं, न यूरोप जा सकते हैं, न अमेरिका जा सकते हैं, न आस्ट्रेलिया, न न्यूजीलैंड..." तभी खाँटी को कोई होश आया बोले "...अमेरिका तो जा ही सकते थे लेकिन डर ये कि कहीं अमेरिका वाले पकड़ कर उनके और उनके श्रीमती जी के गुप्त बीमारी का आपरेशन न करने लगें ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा "...हाँ वो तो है ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "...अगर हाफिज़ सईद दिग्गी राज्जा के लिए पाकिस्तान और कश्मीर परेशानी न खड़ी करने लिए तैयार हो जाता है भले ही उसकी आजादी की बात जैसी घिनौनी हरकत के नाम पर तो आप खाँटी भाई लोगों भैदिक जी का अहसानमंद होना चाहिए ..." खाँटी भाई ये सुन कर अंदर चले गए बिना नमस्कार किए ही ।