सी-सैट विवाद का सीधा और सरल समाधान
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में अभिव्यक्ति पर रोक लगा देनी चाहिए इसके निमित्त सभी प्रकार की परीक्षाएं मात्र हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही लिया जाना चाहिए। तमिलनाडु का तमिल में परीक्षा दे, कर्नाटक का कन्नड मे, गुजरात का विद्यार्थी गुजराती में बंगाली बांग्ला की तर्ज पर सभी मातृभाषी अपनी भाषा मे परीक्षा दे सकें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की परीक्षा, अंगरेजी माध्यम से परीक्षा व साक्षात्कार लेने पर सख्त प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ये व्यवस्था केजी से लेकर परास्नातक, मेडिकल, इंजीन्यरिंग, प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा (सिविल सेवा सहित) सभी स्तरों पर सख्ती से लागू कर देना चाहिए क्योंकि यदि किसी को म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं आती तो वो हीन भावना का शिकार नहीं होगा जो किसी भी स्तर पर राष्ट्र के लिए बेहद हानिकारक है दूसरे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) आवे या न आवे कम से कम मातृभाषा तो अवश्य ही सबको आती है और कायदे से आती है तो मेरे समझ से कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की परीक्षाएँ भी इसका अपवाद नहीं होनी चाहिए। शोध तो अनिवार्य रूप से मातृभाषा मे ही होने चाहिए जिससे मौलिक सोच के प्रतिभाशाली लोगों को ही अवसर मिल सके मूर्खों को नहीं जो रट्टा मार कर कुटिलयुक्ति से परीक्षा पास करने में विशवास करते हैं बजाय ज्ञान और प्रतिभा के आधार पर।
ऐसी व्यवस्था आवश्यक इसलिए है क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है और वो 2-3% से अधिक सक्रिय हो ही नहीं सकती (मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली के अनुसार) लिहाजा छात्र विषय को समझने के बजाय उसे रटने पर ज़ोर देता है जिससे उसकी सोच बिलकुल कुंद हो जाती है और जहां नवीनता और प्रवर्तन की बात आती है तो वे मूर्ख नकल मारने पर उतारू हो जाते हैं अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और न जाने क्या - क्या चिल्लाने लगते हैं और वहीं मातृभाषा मे व्यक्ति मस्तिष्क पूरे 100% सक्रिय रहता है लिहाजा नवीनता और प्रवर्तन युक्त प्रतिभा के संदर्भ में मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं है। कुछ लोग ये आपत्ति कर सकते हैं की यहाँ हर 4 कोस पर वाणी बादल जाती है तो इसका उत्तर ये है की वाणी बदलती है तो अपनी मौलिकता के आधार पर बदलती है जिसके मूल में संस्कृत है, अतः शैली वही है जो आसामी और गुजराती की है डोंगरी और मलयालम की है....आदि अतः एक भारतीय के लिए सभी स्थानीय भाषाएँ मातृभाषाएँ ही हैं और ये परिवर्तन संस्कृत-तमिल के साथ हमारे मानसिक आयाम को बढ़ा कर हमारे मस्तिष्क को विश्व मे सबसे प्रबल और शक्तिशाली बना देता हैं ठीक वैसे ही भगवान राम की चार माताएँ थीं इस कारण से भाषा मे प्राकृतिक विभिन्नता हम भारतीयों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है यही कारण है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और आध्यात्म का केन्द्र भारतवर्ष ही है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इसमे विष घोल कर उत्तरोत्तर नष्ट करती जा रही है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उच्चारण ही मानसिक बीमारी है और शारीरिक बीमारियों का भी घर है। मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति कभी भी अपने को बीमार नहीं मानता और वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता रहता है। इसका प्रत्यक्ष भीषण लोमहर्षक उदाहरण बीपीओ (कॉल सेंटर) मे काम करने वाले कर्मचारी हैं जिनको मात्र म्लेच्छ बोलियों (अंगरेजी व अन्य यूरोपीय बोलियाँ) मे काम करना पड़ता है, पूरे के पूरे 100% कर्मचारी भयानक मानसिक बीमारियों और हार्मोनल असंतुलन की चपेट में हैं (इंडिया टुडे, 8 अगस्त 2007) जिसका कोई इलाज एलोपैथी मे है ही नहीं (cchr.org)। वर्तमान सामय मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उपयोग अपना प्रभुत्व जमाने (आम भाषा में भौकाल मारने), अज्ञानता और मूर्खता को छिपाने के लिए ही अधिक किया जाता है। हमारे एक मित्र जो यूजीसी नेट हैं बहुत ज्ञानी हैं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे बेहद कमजोर। उन्होने नौकरी हेतु दिल्ली के बहुत से महाविद्यालयों नौकरी के लिए साक्षात्कार दिया किन्तु सफल नहीं हुए मात्र म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण। उनको लगभग सभी जगह से यही कहा गया "...आपको भले ही विषय की कामचलाऊँ जानकारी हो कोई बात नहीं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) तो फर्राटे से आनी ही चाहिए ..." उनसे बहुत कम योग्यता वाले लोग दिल्ली के महाविद्यालयों म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर लोगों को बेवकूफ़ बना कर पैसा ऐंठ रहे हैं। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर ठगई का गोरखधंधा चारो ओर व्याप्त है इसीलिए उच्चशिक्षा सहित सभी प्रकार की शिक्षा का स्तर ही लगभग समाप्त हो चुका है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इस शोध कार्यों की स्थिति और भी बुरी है क्रोनिकल पत्रिका के आंकड़े के अनुसार भारत मे 01% शोध भी किसी काम का नहीं है। कारण म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) जो सोचने ही नहीं देती समझने की तो बात ही भूल जाईए यही कारण है कि अभी तक भारत में एक भी नोबल पुरस्कार विज्ञान मे नहीं आ सका है। अतः भारत सरकार को चाहिए कि सी-सैट ही समाप्त न करे बल्कि हर स्तर (निजी व सरकारी दोनों) परीक्षा का माध्यम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पर भी तत्काल प्रतिबंध लगाए यदि भारत को स्वस्थ, प्रतिभा सम्पन्न, सर्वशक्तिमान और विकसित होना है तो। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही शक्तिशाली मस्तिष्क रह सकता है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) में अभिव्यक्ति पर रोक लगा देनी चाहिए इसके निमित्त सभी प्रकार की परीक्षाएं मात्र हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही लिया जाना चाहिए। तमिलनाडु का तमिल में परीक्षा दे, कर्नाटक का कन्नड मे, गुजरात का विद्यार्थी गुजराती में बंगाली बांग्ला की तर्ज पर सभी मातृभाषी अपनी भाषा मे परीक्षा दे सकें इसकी व्यवस्था करनी चाहिए। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) की परीक्षा, अंगरेजी माध्यम से परीक्षा व साक्षात्कार लेने पर सख्त प्रतिबंध लगा देना चाहिए। ये व्यवस्था केजी से लेकर परास्नातक, मेडिकल, इंजीन्यरिंग, प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा (सिविल सेवा सहित) सभी स्तरों पर सख्ती से लागू कर देना चाहिए क्योंकि यदि किसी को म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) नहीं आती तो वो हीन भावना का शिकार नहीं होगा जो किसी भी स्तर पर राष्ट्र के लिए बेहद हानिकारक है दूसरे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) आवे या न आवे कम से कम मातृभाषा तो अवश्य ही सबको आती है और कायदे से आती है तो मेरे समझ से कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की परीक्षाएँ भी इसका अपवाद नहीं होनी चाहिए। शोध तो अनिवार्य रूप से मातृभाषा मे ही होने चाहिए जिससे मौलिक सोच के प्रतिभाशाली लोगों को ही अवसर मिल सके मूर्खों को नहीं जो रट्टा मार कर कुटिलयुक्ति से परीक्षा पास करने में विशवास करते हैं बजाय ज्ञान और प्रतिभा के आधार पर।
ऐसी व्यवस्था आवश्यक इसलिए है क्योंकि म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे व्यक्ति की बुद्धि नष्ट हो जाती है और वो 2-3% से अधिक सक्रिय हो ही नहीं सकती (मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली के अनुसार) लिहाजा छात्र विषय को समझने के बजाय उसे रटने पर ज़ोर देता है जिससे उसकी सोच बिलकुल कुंद हो जाती है और जहां नवीनता और प्रवर्तन की बात आती है तो वे मूर्ख नकल मारने पर उतारू हो जाते हैं अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और न जाने क्या - क्या चिल्लाने लगते हैं और वहीं मातृभाषा मे व्यक्ति मस्तिष्क पूरे 100% सक्रिय रहता है लिहाजा नवीनता और प्रवर्तन युक्त प्रतिभा के संदर्भ में मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं है। कुछ लोग ये आपत्ति कर सकते हैं की यहाँ हर 4 कोस पर वाणी बादल जाती है तो इसका उत्तर ये है की वाणी बदलती है तो अपनी मौलिकता के आधार पर बदलती है जिसके मूल में संस्कृत है, अतः शैली वही है जो आसामी और गुजराती की है डोंगरी और मलयालम की है....आदि अतः एक भारतीय के लिए सभी स्थानीय भाषाएँ मातृभाषाएँ ही हैं और ये परिवर्तन संस्कृत-तमिल के साथ हमारे मानसिक आयाम को बढ़ा कर हमारे मस्तिष्क को विश्व मे सबसे प्रबल और शक्तिशाली बना देता हैं ठीक वैसे ही भगवान राम की चार माताएँ थीं इस कारण से भाषा मे प्राकृतिक विभिन्नता हम भारतीयों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है यही कारण है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान और आध्यात्म का केन्द्र भारतवर्ष ही है। लेकिन म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इसमे विष घोल कर उत्तरोत्तर नष्ट करती जा रही है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उच्चारण ही मानसिक बीमारी है और शारीरिक बीमारियों का भी घर है। मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति कभी भी अपने को बीमार नहीं मानता और वो अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता रहता है। इसका प्रत्यक्ष भीषण लोमहर्षक उदाहरण बीपीओ (कॉल सेंटर) मे काम करने वाले कर्मचारी हैं जिनको मात्र म्लेच्छ बोलियों (अंगरेजी व अन्य यूरोपीय बोलियाँ) मे काम करना पड़ता है, पूरे के पूरे 100% कर्मचारी भयानक मानसिक बीमारियों और हार्मोनल असंतुलन की चपेट में हैं (इंडिया टुडे, 8 अगस्त 2007) जिसका कोई इलाज एलोपैथी मे है ही नहीं (cchr.org)। वर्तमान सामय मे म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) का उपयोग अपना प्रभुत्व जमाने (आम भाषा में भौकाल मारने), अज्ञानता और मूर्खता को छिपाने के लिए ही अधिक किया जाता है। हमारे एक मित्र जो यूजीसी नेट हैं बहुत ज्ञानी हैं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे बेहद कमजोर। उन्होने नौकरी हेतु दिल्ली के बहुत से महाविद्यालयों नौकरी के लिए साक्षात्कार दिया किन्तु सफल नहीं हुए मात्र म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के कारण। उनको लगभग सभी जगह से यही कहा गया "...आपको भले ही विषय की कामचलाऊँ जानकारी हो कोई बात नहीं किन्तु म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) तो फर्राटे से आनी ही चाहिए ..." उनसे बहुत कम योग्यता वाले लोग दिल्ली के महाविद्यालयों म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर लोगों को बेवकूफ़ बना कर पैसा ऐंठ रहे हैं। म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) के नाम पर ठगई का गोरखधंधा चारो ओर व्याप्त है इसीलिए उच्चशिक्षा सहित सभी प्रकार की शिक्षा का स्तर ही लगभग समाप्त हो चुका है।
म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) इस शोध कार्यों की स्थिति और भी बुरी है क्रोनिकल पत्रिका के आंकड़े के अनुसार भारत मे 01% शोध भी किसी काम का नहीं है। कारण म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) जो सोचने ही नहीं देती समझने की तो बात ही भूल जाईए यही कारण है कि अभी तक भारत में एक भी नोबल पुरस्कार विज्ञान मे नहीं आ सका है। अतः भारत सरकार को चाहिए कि सी-सैट ही समाप्त न करे बल्कि हर स्तर (निजी व सरकारी दोनों) परीक्षा का माध्यम म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) पर भी तत्काल प्रतिबंध लगाए यदि भारत को स्वस्थ, प्रतिभा सम्पन्न, सर्वशक्तिमान और विकसित होना है तो। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही शक्तिशाली मस्तिष्क रह सकता है।