लिये लुआठी बगावत वीर, हड़कावे आला कमान
काँग्रेस में आलाकमान के विरुद्ध बगावत अब सतह पर आ गया है और ज़ोर से सा गया है। घोर खाँटी कोंग्रेसी मिलिंद देवड़ा ने राहुल गांधी और उनकी टीम के खिलाफ खुल के बोला है। आज से करीब 9 महीने पहले ही मैंने 18 जुलाई 2013 को अपने एक "काँग्रेस बगावत के बारूद पर" लेख मे कारण सहित साफ-साफ कह दिया था काँग्रेस बगावत के मुहाने पर खड़ी है जो कभी भी फट सकता है मैंने उसी समय ये कहा था काँग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी है जो पार्टी को सोनिया-राहुल-प्रियंका और उस परिवार से मुक्त करना चाहता है। उस समय से लेकर काँग्रेस के शर्मनाक पराजय तक किसी भी प्रिंट मीडिया या चैनल चाहे वो राष्ट्रीय हो स्थानीय में इस तरह की कोई खबर नहीं चली। उसके बाद से ही जगदंबिका पाल सहित करीब दो दर्जन सांसदों ने काँग्रेस छोड कर भाजपा में आने का प्रयास शुरू कर दिया था जो चुनाव की अधिसूचना के बाद तक भाजपा मे शामिल हो चुके थे। मेरे उस लेख को मेरे टाइमलाइन पर उक्त तिथि की पोस्ट में देखा जा सकता है। मेरे इस लेख पर एक राष्ट्रीय स्तर बहुत बड़े अखबार के संपादक ने खिल्ली भी उड़ाई थी और मेरा मज़ाक भी बनाया था। क्या मीडिया कोई ऐसा है ही नहीं जो जन मनोभावों (Public Attitude) को पढ़ने की थोड़ी भी क्षमता रखता हो ? वैसे उन संपादक की प्रोफ़ाइल और पोस्टिंग से ऐसा बिलकुल नहीं लगता को काँग्रेस समर्थक हैं फिर भी पता नहीं क्यों मेरे आलेख पर उनको विश्वास ही नहीं हो रहा था। मेरे हिसाब से यदि भारत की पत्रकारिता निर्भीक और जीवंत है तो ऐसे लेख और इससे संबन्धित समाचार साल भर पहले ही मीडिया में प्रमुखता से चलने चाहिए थे। आज की तारीख में भी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे पत्रकार भी हैं जिनको इस चुनाव परिणाम से बहुत दुख है और वे अपनी पीड़ा छिपा नहीं पा रहे हैं। इसी से पता चलता है मीडिया में पत्रकारों का स्तर क्या है ऐसे लोग पत्रकारिता के नाम पर जो कर रहे हैं वो किसी से छिपा नहीं है। इसीलिए ज़्यादातर विश्लेषण और उनके निष्कर्ष सिरे से गलत साबित होते हैं और वे निरंतर अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। पुष्टि के लिए मेरे टाइमलाइन पर 18 जुलाई 2013 की मेरी "काँग्रेस बगावत के बारूद पर" शीर्षक की पोस्ट देखें ....
काँग्रेस में आलाकमान के विरुद्ध बगावत अब सतह पर आ गया है और ज़ोर से सा गया है। घोर खाँटी कोंग्रेसी मिलिंद देवड़ा ने राहुल गांधी और उनकी टीम के खिलाफ खुल के बोला है। आज से करीब 9 महीने पहले ही मैंने 18 जुलाई 2013 को अपने एक "काँग्रेस बगावत के बारूद पर" लेख मे कारण सहित साफ-साफ कह दिया था काँग्रेस बगावत के मुहाने पर खड़ी है जो कभी भी फट सकता है मैंने उसी समय ये कहा था काँग्रेस में एक वर्ग ऐसा भी है जो पार्टी को सोनिया-राहुल-प्रियंका और उस परिवार से मुक्त करना चाहता है। उस समय से लेकर काँग्रेस के शर्मनाक पराजय तक किसी भी प्रिंट मीडिया या चैनल चाहे वो राष्ट्रीय हो स्थानीय में इस तरह की कोई खबर नहीं चली। उसके बाद से ही जगदंबिका पाल सहित करीब दो दर्जन सांसदों ने काँग्रेस छोड कर भाजपा में आने का प्रयास शुरू कर दिया था जो चुनाव की अधिसूचना के बाद तक भाजपा मे शामिल हो चुके थे। मेरे उस लेख को मेरे टाइमलाइन पर उक्त तिथि की पोस्ट में देखा जा सकता है। मेरे इस लेख पर एक राष्ट्रीय स्तर बहुत बड़े अखबार के संपादक ने खिल्ली भी उड़ाई थी और मेरा मज़ाक भी बनाया था। क्या मीडिया कोई ऐसा है ही नहीं जो जन मनोभावों (Public Attitude) को पढ़ने की थोड़ी भी क्षमता रखता हो ? वैसे उन संपादक की प्रोफ़ाइल और पोस्टिंग से ऐसा बिलकुल नहीं लगता को काँग्रेस समर्थक हैं फिर भी पता नहीं क्यों मेरे आलेख पर उनको विश्वास ही नहीं हो रहा था। मेरे हिसाब से यदि भारत की पत्रकारिता निर्भीक और जीवंत है तो ऐसे लेख और इससे संबन्धित समाचार साल भर पहले ही मीडिया में प्रमुखता से चलने चाहिए थे। आज की तारीख में भी राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से ऐसे पत्रकार भी हैं जिनको इस चुनाव परिणाम से बहुत दुख है और वे अपनी पीड़ा छिपा नहीं पा रहे हैं। इसी से पता चलता है मीडिया में पत्रकारों का स्तर क्या है ऐसे लोग पत्रकारिता के नाम पर जो कर रहे हैं वो किसी से छिपा नहीं है। इसीलिए ज़्यादातर विश्लेषण और उनके निष्कर्ष सिरे से गलत साबित होते हैं और वे निरंतर अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। पुष्टि के लिए मेरे टाइमलाइन पर 18 जुलाई 2013 की मेरी "काँग्रेस बगावत के बारूद पर" शीर्षक की पोस्ट देखें ....
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