Monday, 3 March 2014

भैंस करे सियापा, मारे बखान धोखईती...

भैंसों को सानी डालने के बाद जब खान साहब यादव जी साथ कोठा पर चढ़ने लगे तो भैंसों ने शोर मचाना शुरू कर दिया तो यादव जी और खान साहब परेशान हो गए। घोड़ा-डाक्टरों को बुलाया गया तो पता चला की कुछ भैंसें भयानक डिप्रेशन में हैं और कुछ को सिवियर एंजाईटी डिसआर्डर है तो घोड़ा-डाक्टर ने हाथ खड़ा कर दिया बोला कि मैं इलाज नहीं कर सकता, क्योंकि पशु मनोचिकित्सक नहीं हूँ। खान साहब और यादव जी बहुत परेशान हो गए भैंसों की बीमारी को लेकर। कुछ दिनो बाद ही जो भैंसें डिप्रेशन मे थीं तबेले यानी घर से भाग गईं, तो खान साहब ने एड़ी-चोटी एक कर दिया उनको खोजवाने मे बहुत प्रयास के बाद मिलीं तो खान साहब ने यादव जी से बहुत विचार विमर्श किया उसके बाद तय किया की सारी भैंसों का मेक-ओवर करवाना बहुत जरूरी है जैसे बकलोल बबुआ इसके लिए 500 करोड़ मे जापानी कंपनी की सेवा ले रहे हैं। वैसे भी भैंसों के मनोरंजन के लिए सैफई मे 125 करोड़ मे नाच-गाने के लिए मुंबई से नचनियों और गवनियों को बुलाया गया था लेकिन वो भी पर्यप्त नहीं था क्योंकि कहाँ 500 करोड़ और कहाँ मात्र 125 करोड़, पेट थोड़े ही भरने वाला था भैंसों का। भैंसों के सटीक ईलज के लिए खान साहब के साथ बहुत लोगों को यूरोप की यात्रा पर निकल जाना पड़ा। वैसे खान साहब बड़े दूरदर्शी आम आदमी हैं इसीलिए नाच-गाने के समारोह के पहले ही भैंसों के मेकओवर के निमित्त विदेश यात्रा पर निकल लिए। जाने से पहले खान साहब ने कहा था कि वो किसी शैक्षणिक टूर पर नहीं जा रहे हैं। मतलब बिलकुल साफ था कि भैंसों को संदेश दे कर जाना चाहते थे कि वो उन्हीं के काम से जा रहे हैं न कि किसी और काम से। उनका ये संदेश इस लिए भी जरूरी था ताकि भैंसें फिर डिप्रेशन मे न आवें और अन्यों की एंजाईटी न बढ़े। खान साहब अमेरिका जाने से इसलिए भी कतराते हैं कि वहाँ उनके साथ भैंसों जैसा ही व्यवहार कर दिया जाता है। खैर, खान साहब यूरोप की यात्रा से लौटे तो भी भैंसों का डिप्रेशन और एंजाईटी दूर होने का नाम ही नहीं ले रहा था, पता नहीं कितने करोड़ पानी मे डूब गए। खैर, चिंता इस बात की नहीं कि कितने करोड़ डूबे बल्कि चिंता इस बात की है कि भैंसों को भी कहीं सांप्रदायिकता की लत न पड़ जाए। बकलोल शहजादे तो अपना "आपा" खोते ही गुरमुख हो लिए थे फिर गुरु के तर्ज पर लेकिन गुरु से बेहतर अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया था लेकिन भैंसों के साथ समस्या ये हैं कि खान साहब से गुरमुख होने के लिए वो बिलकुल तैयार नहीं थीं। एक घोडा-डाक्टर जो थोड़ी बहुत भैंसों की भाषा उनका हाव-भाव देख कर समझ जाते हैं, बता रहे थे कि भैंसों का स्पष्ट कहना है कि उन्होने अपना "आपा" बकलोल शहजादे की तरह नहीं खोया है लिहाजा वो किसी भी कीमत पर खान साहब से गुरमुख नहीं होंगी। खान साहब और यादव जी ये सुन कर बड़े चिंतित हुए सो उन्होने तय किया कि जिस तरह बकलोल शाहजादे आपिया संयोजक से गुरमुख हो लिए उसी तर्ज पर भैंसों को उन्हीं से गुरमुख करा दिया जाए। इसकी भनक जब भैंसों को लगी तो वे अपना तबेला छोड़ कर फिरसे  भाग गईं थीं लेकिन थोड़ी ही मशक्कत के बाद फिर से उनको खोज लिया गया था।

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