Monday, 31 March 2014

शहजादे शाने भूत, सोखा गावे गान...

ओसामा 'जी' की हत्या पर ओबामा को तो बेनी बाबू कबका उनके ही हवाई जहाज से उनको ढकेल दिये होते और ओबामा की कहानी खतम हो गई होती। वो तो बेनी बाबू की महानता है, उदारता है आज ओबामा इन्हीं बेनी बाबू की बदौलत जिंदा है। अरे पूरा अमेरिका अहसान मानता है इस्पात मंत्री का। जल्दी ही ये देश भी बेनी बाबू का एहसान मानेगा क्योंकि उन्होने इसका कारण बता दिया कि वो 'नरेन्द्र भाई मोदी' को मरने नहीं देंगे। कभी 'मुलाम सीं आदो' के बड़े खास रहे बेनी बाबू थोड़े परेशान दिख रहे थे लेकिन उनकी पार्टी के शहजादे यानी "बकलोल बबुआ" जब सहारनपुर पहुंच गए तो बेनी बाबू खुश हो गए और उनकी खुशी देख कर एक खाँटी भाई कोंग्रेसी बोले "...देखिये कुछ भी गलत नहीं है ..." मैंने कहा "...ये लत बहुत बुरी है कहीं लात पद गया तो..." इस पर खाँटी भाई बोले "...6 महीने पुराना विडियो है तब वो काँग्रेस में नहीं थे...!" मैंने टिप्पणी करते हुए कहा "... छः महीने पुराना कोई सनकी सांड काँग्रेस मे आकर तो दूधारू गाय बन गया...!" खाँटी भाई कांग्रेसी मंद - मंद मुस्कुराते हुए बोले "...यही तो हमारी खासियत है ..." मैंने पलट कर पूछा "...ये टेकनोंलाजी इटली की है ...?" खाँटी भाई ने तुनक कर मुझसे पूछा "...आप लोगों को हर चीज में इटली क्यों दिखाई देता है ...?" मैंने कहा "...आप नाराज क्यों होते हैं ... वैसे गिरगिट लाख अपना रंग बदल ले अपने जाति का ढंग नहीं बदल सकता..." खाँटी भाई बोले "...राहुल जी स्थिति ने स्पष्ट कर दी है ...!" इसपर मैंने पूछा "...तो आपके शहजादे बेनी बाबू का गुबार लेकर उड़ेंगे  ...?" खाँटी भाई बोले "...देखिये जो बात पुरानी हो गई उसपर ..." मैंने बीच में ही बात काटते हुए पूछा  "...दादी मर गई, पापा मर गए, नाना भी ...ये सब बिलकुल नई बात है क्या ...?" खाँटी भाई थोड़ा असहज हो गए बोले "...मौत तो है जी ..." मैंने पूछा "...बेनी बाबू ने सेकुलरिज़्म की सोखईती सीख ली तो फिर  ...?" खाँटी भाई ने मुझे डांटते हुए पूछा "...तो का क्या मतलब ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...तो का मतलब इमरान मसूद जैसे शैतान का भूत उतारने के लिए बेनी बाबू जैसे सोखा को भेजना चाहिए था ...!" खाँटी भाई अभी भी असहज थे, बोले "...देखिये ये मामला दूसरा है तब वो काँग्रेस में नहीं थे ..." मैंने कहा " ...तो भी सांपिया का शैतानी भूत उतारने के लिए मजे हुए सजातीय सोखा की जरूरत थी ..." खाँटी भाई ने असहजता छिपाते हुए कहा "...हमारे उपाध्यक्ष बहुत योग्य हैं ..." मैंने कहा "...लेकिन उनकी मम्मी कहती हैं सरकार चलाना बच्चों का खेल नहीं ..." खाँटी भाई बोले "...सही कहा है सहारनपुर में सरकार थोड़े न चलानी थी..." मैंने कहा "...हाँ हाँ वहाँ तो मसूद का शैतानी सांपिया भूत दौड़ाना था ..." खाँटी भाई अपना बचाव करते हुए बोले "...वैसे कानून अपना काम कर रहा है ..." मैंने पूछा "...तो बेनी बाबू किसका काम कर रहे हैं ...?" खाँटी भाई अपना पक्ष रखते हुए बोले "...वो तो कानून के दायरे में हैं ..." मैंने कहा "...लेकिन ओसामा जी के वध पर बेनी बाबू ओबामा पर इतने दयावान क्यों हैं ...?" खाँटी भाई कुछ बोल नहीं रहे थे तो मैंने उनको नमस्कार करके विदा लिया ...   

Thursday, 20 March 2014

आपे हाथ-आपे हंता, हंता-हंता देख मैं महन्ता....

अभी बहुत दिन नहीं बीते जब नरेन्द्र भाई मोदी ने कहा था कि उनकी कार के नीचे कोई पिल्ला भी आ कर दाब जाए तो उनको बहुत दुख होगा। पता नहीं क्यों कमीडिया अंदाज मे मीडिया वालों उस वक्तव्य का जो निष्कर्ष निकाला था जिससे उनकी ही पूंछ उनके नाक मे जा घुसी थी और मजा देखिये छींक भी इतनी कमीनी हो गई थी कि ससुरी आने का नाम ही नहीं ले रही थी। खैर आज आलम ये है उनकी कार के आगे आत्महत्या करने वाले पिल्लों की कुछ लाईन लगी है। एक पिल्ले जिसकी हमेशा तबियत ही खराब रहती है कहने लगा "...मुझे तो आत्महत्या करने के लिए उकसाया गया है ..." तो फिर एक बुद्धिमान पिल्ले ने पूछा "...तो आप उकस क्यों गए...?" आत्महत्या करने वाले पिल्ले ने जवाब दिया "...उसी उकसने को जास्टीफाई करने के लिए कुत्तागर्दी करना जरूरी है ..." बुद्धिमान पिल्ले ने फिर जिज्ञासावश पूछा "...ये क्या होता है...?" आत्महत्या वाले पिल्ले ने जवाब दिया "... मजमागिरी कर के सियार की तरह भौकेंगे..." बुद्धिमान पिल्ले ने कहा "...वो तो रोने की आवाज होती है ..." आत्महत्या वाला पिल्ला बोला "...ये नाटक बहुत जरूरी है इसमे कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि उसमे केवल हमारे लोग रहेंगे जो दूर-दूर से आएंगे ..." खैर, यही पिल्ला कुछ दिन पहले आत्महत्या के इरादे से जबरदस्ती गुजरात पहुँच गया था लेकिन वो तो मोदी जी की महानता थी कि उसे ऐसा नहीं करने दिया गया। जब ऐसा नहीं हुआ यही पिल्ला गुस्से मे आ कर खंडहर मे घुसकर भौकने लगा, फिर किसी विद्यालय मे घुस गया वहाँ से भौकने लगा वो तो गनीमत थी कि विद्यालय की छुट्टी हो चुकी थी, न जाने कितनी जगहों पर वो घुसा और भौंका गिनती नहीं। दरअसल आत्महत्या करने से पहले इस पिल्ले को बहुत भूख लग गई थी लेकिन मजबूरी ये थी इसे बढ़िया भोजन पसंद ही नहीं है हमेशा कूड़े मे ही कुछ न कुछ खाने के लिए ही खोजता है लिहाजा गुजरात मे उसे भूखा ही रहना पड़ा क्योंकि वहाँ कूड़ा उसे मिला ही नहीं। इसीलिए ये पिल्ला अब ठान चुका है कि अब तो आत्महत्या कर के ही दम लेगा वैसे भी ये पिल्ला अपने दम फूलने से परेशान हो चुका है।

अभी कल की खबर है एक मोटा-तगड़ा पिल्ला मोदी जी के कार के नीचे आकार आत्महत्या करने की तैयारी कर रहा है। लेकिन आलम ये है कि उसके समूह बहुत से बुद्धिमान पिल्ले मोदी जी के डर से सड़क पर उतरने से ही मना कर रहे हैं। भाई आराम से सुकून की जिंदगी जीने का अधिकार सभी को है लेकिन घोटाले के लिए जगह - जगह मुंह मरने वाले पिल्ले पता नहीं क्या सोचते हैं और आत्महत्या करने पर उतारू हो जाते हैं। उसके समूह का कोई बता रहा था कि ये मोटा-तगड़ा पिल्ला बहुत बड़ा सन्यासी छाप छिछोर भी है दस साल का आत्मघोषित सन्यास भुगत चुका लिहाजा इसके लिए तो आत्महत्या बहुत जरूरी लगता है। किसी को दुखी होने की कोई जरूरत नहीं ... धरती माता का बोझ कम हो जाएगा ...             

Tuesday, 18 March 2014

आन धोखईती शान धोखईती, जहर धोखईती उगले जान ....

"आपिया रोडवेज़" के "चार्टर्ड प्लेन" का बहुत नाम है बड़े-बड़े क्रांतिकारी सूरमा बहुते क्रांति के नाम पर उस प्लेन मे बैठ कर क्रांति मचा चुके हैं वो अलग बात है कि उससे उनका क्या काला-पीला-लाल हुआ। "आपिया रोडवेज़" के लोग भरसक इस बात का प्रयास करते हैं कि उन्हें भरे समुंदर मे तैरती हुई चींटी दिख जाए यकीन मानिए आपियों को दिखती भी है, पूरा का पूरा खंडहर उनको अस्पताल दिखता है जिसे "आपिया गुरु" ताल से ताल मिलाने चल देते हैं। भूकंप के बाद का पार्यटन का मजा लेने वाले "आपिए" हाथी भी पालने का जबरदस्त शौक भी रखते हैं। इस पर एक आपिया कह रहे थे "...भूकंप बाद के पर्यटन मे नीचे उतरने से इनफेक्शन का खतरा है सो हाथी पालना जरूरी है ..." मैंने पूछा "...ये बहुत खर्चीला नहीं है क्या ...?" "आपिया" बोले "...नीचा दिखने के लिए ऊपर बैठना बहुत जरूरी है ..." "लेकिन कहते तो आप रोडवेज़ हैं ...?" मैंने स्पष्टीकरण के लिए पूछा तो "आपिया" बोले "...हाथी के दांत दिखने के और खाने के और होते हैं जी ..." खैर एक बार "आपिया गुरु" अपने रोडवेज़ के "चार्टर्ड प्लेन" से इस्लामाबाद से वाशिंगटन वाया दुबई जा रहे थे तो रास्ते मे जूलियन भाई मिले उन्होने प्लेन को हाथ दिया लेकिन "आपिया रोडवेज़" के गुरु ने प्लेन रोकने से माना कर दिया। जूलियन भाई अभी भी "आपिया गुरु " से खफा ही हैं। वैसे ये वाकया 2011 की ही है जब जूलियन भाई मोदी जी तारीफ करते नहीं अघाते थे। सो भाई "आपिया गुरु" का गुस्सा तो वाजिब है लेकिन समय ने भी "आपिया गुरु" की तरह पलटा खाया बेचारे जूलियन भाई का खराब समय आ गया और वहीं "आपिया गुरु" के पास रोडवेज़ के नाम पर न जाने कितने प्लेन हैं उसमे से बहुत कम भाड़े पर दिये जाते हैं सब के सब निजी उपयोग के लिए 'कृषि कार्य हेतु" ही हैं। ये सब देखकर जूलियन भाई के दिल पर साँप न लोटे ये कैसे हो सकता है ? सो जूलियन भाई ने भी वही सब करने की ठान ली जिसमे "आपिया गुरु" को महारत है। लेकिन कहाँ धोखईती का जन्मजात स्किल जिसमे "आपिया गुरु" माहिर है और कहाँ एडाप्टेड स्किल फर्क तो पड़ेगा ही। सो बेचारे जूलियन बाबू पकड़ गए अरे ईमानदारी है तो कितनी भी झूठ से छिपाओ छिप नहीं सकती। वहीं अगर बेईमानी रग-रग मे दौड़ रहा हो तो कितनी भी ईमानदारी का मुलम्मा चढ़ाओ बहुत क्रांतिकारी तरीके से बहुत जल्दी उतर जाती है। लेकिन "आपिया गुरु" हाथी पर बैठ कर थपरी पीटते इससे पहले ही पुराने "आपिया रोडवेज़" वाले नानवेज़ लेकर पहुँच गए तो "आपिया गुरु" के ईमानदारी का मुलम्मा चढ़ाते हुए "अमेरिकन मुर्गी, पाकिस्तानी भैंसा और अरबी ऊंट-घोड़े को चट करते समय नहीं लगा। चट करते ही अपने प्लेन से जहर उगलने उड़ गए...        

Friday, 14 March 2014

मार दुलत्ती उल्टा तान, देख पुछिन्डा मैं महान ...

कुक्कुर की पूंछ पकड़ कर गधे को दुलत्ती मरने की कला मे काँग्रेस कुमार केजरीवाल कितने माहिर हैं इसका अंदाजा उन्हें उसी समय लग गया जब गधे ने उनको कायदे से "रिवर्स दुलत्ती" लगा डाली और केजरीवाल कुक्कुर सहित चारो खाने चित हो गए और नाक से मवाद निकलने लगा। मजा देखिये तब भी केजरीवाल ने तब भी कुक्कुर की पूंछ छोडने का नाम नहीं ले रहे थे। हालांकि वो बेचारा कुक्कुर अभी भी ये पूरा प्रयास कर रहा है कि केजरीवाल उसकी पूंछ को ससम्मान छोड़ दें लेकिन 'केजरीवाल एंड कमपानी' पूंछ छोडने के बजाय उसे और ऐंठने पर उतारू है। मैंने एक आपिया दाढ़ीवाल से इस बारे मे पूछा तो कहने लगा "...ऐसा करना बहुत जरूरी है ..." मैंने पूछा "...पूंछ ज्यादा ऐंठने पर कहीं कुक्कुर ने पलट कर काट लिया तो ...?" आपिया दाढ़ीवाल बोला "...जनता के सामने सच्छाई रखना बहुत जरूरी है ..." इसपर मैंने कहा "... फिलहाल तो गधे की सच्चाई के ताकत का केजरीवाल सामना कर ही रहे हैं थोड़ी देर हो सकता कुक्कुर की सच्चाई के ताकत का भी सामना करेंगे ..." आपिया दाढ़ीवाल अपनी ही तारीफ करते हुए बोला "...यही तो हमारी काबलियत है ..." मैंने कहा "...हाँ सही बात है कुक्कुर की पूंछ को हाथी की सूंड समझना और सबको बताना आपकी वाकई काबलियत है ..." आपिया दाढ़ीवाल अपना आपा खोने लगा था बोला "...देखिये आपकी अपनी सीमा है ..." मैंने भी तैश दिखते हुए पूछा '...नहीं तो ...!" आपिया दाढ़ीवाल बोला "...आपको जेल मे डाल देंगे ..." इसपर मैंने तंज़ कसते हुए कहा "...पहले कुक्कुर की पूंछ तो छोड़िए ..." मूर्ख आपिया मेरी ही बात को दोहराते बोला "...नहीं छोड़ेंगे ..." मैंने हँसते हुए कहा "...नही तो कुक्कुर बहुत कटहा है ..." आपिया अपना आपा बहुत खो चुका था बोला "...अगर कुक्कुर हमको काटेगा तो हम भी कुक्कुर को काटना जानते हैं ..." मेरी जिज्ञासा बढ़ गई मैंने आपिया से पूछा "...क्या मतलब ...?" आपिया दाढ़ीवाल बोला "...हाँ हाँ ! हम कुक्कुर को काट लेंगे अगर वो हमको कटेगा तो ..." मैंने हंसी रुक नहीं रही थी, पूछा "...लेकिन केजरीवाल कुक्कुर की पूंछ नहीं छोड़ेंगे ..." दाढ़ीवाल उसी बेआपा मे बोला "...अजी सवाल ही नहीं उठता...!" तभी कुछ और मीडिया वाले पहुँच गए और उन्होने झटपट कैमरा ऑन करके माइक सामने रख दिया। लेकिन जैसे ही किसी ने सवाल पूछना शुरू ही किया आपिया दाढ़ीवाल ने शांत रहने का क्रूर इशारा किया और SMS करके अपने और सहयोगियों को बुलाने लगा तो मैंने फिर पूछा "...क्या आप इनके सवालों का जवाब नहीं दे सकते ..." आपिया कुछ नहीं बोला तो मैंने फिर पूछा "...अरे महराज ! कुक्कुर का पूंछ छोड़िए और इन पत्रकारों के सवालों का जवाब दीजिये ..." आपिया उसी गुस्से मे बोला "...नहीं देंगे तो क्या कर लेंगे ये सब ..." मैंने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा "...आप सभी लोग कैमरा माइक समेटिए और चलते बनिए यहाँ का माहौल ठीक नहीं है ..." एक पत्रकार ने पूछा "...क्यों क्या हो गया ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...इन्होने अपने सहयोगियों से साथ मे ढेर सारा पत्थर भी ले की आने को कहा है ..." सभी लोग तेजी से वहाँ से सटक लिए ....     

Thursday, 13 March 2014

आपिया टँगड़ी लूला, अन्हरा जबरन बारे चूल्हा ....

आपिया के खोखी पहलवान काँग्रेस कुमार केजरीवाल मुंबई मे हुड़दंग मचाने के बाद आखिरकार ये स्वीकार कर ही लिया कि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ही होंगे। दरअसल  लेकिन इस सत्य को स्वीकार करने से पहले खोखी पहलवान को कितनी मशक्कत करनी पड़ी इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है बड़ा शोध करना पड़ता है कि उनके स्वयं तथा घर से लेकर समाज मे घटित होने वाले प्रत्येक घटना और दुर्घटना के जिम्मेदार मोदी जी ही हैं। उनका पेट खराब हो, श्रीमती जी को लेकर कोई शिकायत हो चाहे बाल-बच्चों को लेकर उघटापैची सबके लिए जिम्मेदार नरेंद्र भाई मोदी। भाई ! सीधा सा सवाल है जब कोई कनपटी पर बंदूक साटाएगा तो पेट खराब होगा या वो नमो-नमो करेगा...जाहिर सी बात है आज खोखी पहलवान का जबरदस्त पेट खराब है लिहाजा उन्होने "नागपुर मे नागिन डांस" का अपना कार्यक्रम टाल दिया। एक मुंबई का टपोरी आपिया बता रहा था "...येड़ा के साथ तो येड़ा बनाना पड़ता है ..." मैंने पूछा "... फिर खोखी पहलवान इलाज क्यों नहीं करवाते ...?" टपोरी आपिया बोला "...वो बिलकुल येड़ा है इसी वास्ते तो हम आपिया है ..." मैंने आश्चर्य से पूछा '...जरा ठीक से समझाओ ..." आपिया बोला "...देखो अगर इसका दिमाग ठीक हो गया तो ठीक से सोचेगा ठीक से सोचेगा तो काम ठीक से करेगा तो फिर ठीक-ठाक लोगों को टिकट भी देगा ...मैं कहाँ फिट बैठेगा ...इसका येड़ा रहना ही अपुन के लिए ठीक है ..." मैंने पूछा "...मतलब जितने लोगों को 'आपा' मे टिकट मिल रहा है वो सब येड़ा ही हैं ...??" आपिया बोला "...आप किस दुनिया मे है ये सब उससे भी गए गुजरे हैं ..." मैंने उस आपिया को उकसाते हुए पूछा "...मुझे तो नहीं लगता ..." आपिया बोला "...सोमनाथ भारती को देखो, राखी बिड़लान को देखो, शाजिया इल्मी को देखो, आशुतोष गुप्ता को देखो ... पूरे येड़वे भाजपा कार्यालय पर पहुँच गए थे बिना बात का पत्थरबाजी करने ..." मैंने कहा "...ये तो अराजकता भी तो हो सकती है ..." आपिया बोला "...कोठे पर शौक से कितनी भी शरीफ लड़की रहे वो शरीफ नहीं हो सकती ..." मैंने आश्चर्य पूछा "...मतलब ...?"  आपिया बोला "...येड़ा के साथ शरीफ भी जुड़ेगा तो दो दिन मे ही येड़ा हो जाएगा ..." मैंने फिर उसे उकसाते हुए कहा "...मुझे नहीं लगता..." आपिया बोला "...वालण्टीयरों को छोड़ो आप केवल सपोर्टर को ही देख लो इस येड़ा के लिए जो लॉजिक गढ़ते हैं कितने घटिया और बेहूदे होते ...अगर वो जर्नलिस्ट है तो पूछो ही मत मुंह काला करते हैं इस येड़ा का सपोर्ट करके ..." मैंने उस टपोरी आपिया से पूछा "...तुमको टिकट मिला है ...?" आपिया ने उत्तर देते हुए कहा "...हाँ मिला है ..." मैंने फिर पूछा "...जीतने की उम्मीद है ...?" आपिया ने बड़े बेबाकी से उत्तर देते हुए कहा "...नहीं बिल्कुल नहीं ..." मेरी जिज्ञासा बहुत बढ़ गई सो पूछा "...फिर क्यों टिकट लिया ..." आपिया ने बड़े कोन्फ़िडेंस से कहा "...देखो अपुन का एक बिजनेस है उसको बढ़ाने का है...मैं चुनाव मे खड़ा होगा लोग जनेगे ... जानेंगे तो अपुन का बिजनेस बढ़ेगा ...बस ..." मैंने फिर पूछा "...फिर केजरीवाल अपने लोगों को टिकट क्यों नहीं दे रहा है ..." आपिया बोला "...यहा अपना कोई नहीं है अगर अपना कोई है तो उसे बिल्कुल ही टिकट नहीं मिलेगा ...क्यों मिलेगा जी ...आप बताओ उस येड़ा को क्या फायदा होगा जब किसी को जीतना ही नहीं है ..." मुझे अब समझ मे आने लगा था "आपा" मे अचानक बगावत क्यों हो गई ...जो भी मानसिक रूप से स्वस्थ है वो "आपा" छोडकर भाग क्यों रहा है ...मैंने टपोरी छाप आपिया को धन्यवाद कह के विदा लिया ।

Tuesday, 11 March 2014

नाचहिं लै लै भाव ते , सागरो होत जवान ...

जैसे कभी भैंस बूढ़ी नहीं होती वैसे ही नेताजी भी कभी बूढ़े नहीं हो सकते भले ही उनके बुढ़ौती का टिकट बहुत पहले ही कट गया हो। जैसे-जैसे नरेन्द्र भाई मोदी का रंग उत्तर प्रदेश पर गहराता जा रहा है वैसे-वैसे नेता जी भैंसो की सींग मे भैंस पूंछ बांधने की असफल कोशिश कर रहे हैं और लगातार किए जा रहे हैं । लेकिन वो तो नेताजी का व्यक्तित्व है की कोशिश मरते दम तक करेंगे। उनके बहुत निकट के सपाई जो सैफई हुए नाच से तरो-ताजा होकर लोटे हैं, बता रहे थे "...नेताजी नेताजी हैं कोई कैसे उल्टा-सीधा कह सकता है ...!" मैंने कहा "...बघेल जी ने उल्टा कहाँ कहा था ...?" सपाई बोले "...क्यों नेताजी बूढ़े हैं क्या ...?" मैंने उनका प्रतिउत्तर देते हुए कहा "...हाँ सही बात है यदि वो बूढ़े हो चुके होते तो सैफई मे नाच-गाना क्यों होता ..." सपाई बोले "...बिल्कुल सही बात है बघेल जी को ये बात समझ मे ही नहीं आई ..." मैंने कहा "...125 करोड़ का नाच-गाना देखकर तो मुर्दे भी जी उठते हैं और जवान हो जाते हैं फिर नेताजी तो नेताजी हैं लगे हाथ भैंसें भी रिफ्रेश हो गईं ..." सपाई बोले "...ये तो हमारी उदारता है ..." मैंने कटाक्ष करते हुए कहा "...हाँ इसी उदारता का फायदा जब भैंसें भी उठाने लगीं तो परेशानी खड़ी हो गई ..." सपाई ने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब मैं समझा नहीं ...?" मैंने उन्हें समझते हुए कहाँ "...इसमे न समझ मे आने वाली बात क्या है ...भाई जबतक नेताजी भैंस के सींग मे उसका पूंछ नहीं बांध लेंगे प्रधानमंत्री कैसे बन सकते हैं ...?" सपाई ने मुझसे पूछा "...हमारा लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट है ..." मैंने कहा "...मैंने ये कब घोषणा कर दी कि भैंसो के साथ आप लोग भी दिग्भ्रमित हैं ...?" सपाई थोड़ा गुस्से मे मुझसे पूछा "...आपके कहने का मतलब ये कि भैंसें दूध देना बंद कर दें ..." मैंने सपाई से आराम से कहा "...जब उनके बुढ़ौती का वीजा मिल जाएगा तो अपने आप दूध भी पानी फिर हवा हो जाएगा तीसरे मोर्चे की तरह ..." सपाई का गुस्सा कम नहीं लिहाजा उसी गुस्से मे बोले '...आपका मतलब है भैंस ..." मैंने बीच मे ही बात काटते हुए कहा "...आप ये तय मानिए नेताजी बहुत जीवट व्यक्तित्व वाले हैं ..." सपाई ने उसी गुस्से मे मुझसे पूछा "...वो तो है तो ...?" मैंने शांति से उत्तर देते हुए कहा "...मुझे पूरा यकीन है एक दिन नेताजी जरूर भैंस के सींग मे उसकी पूंछ बांध देंगे..." सपाई खुन्नस मे पूछा "...मन लिया यदि बांध दिया तो क्या होगा ...?" मैंने बड़े आराम से उत्तर देते हुए कहा "...भाई मैंने पहले ही कहा जिस दिन ऐसा हो गया उस निश्चित रूप से नेताजी देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे ..." सपाई भाईसाब का सीधा कहना था "...उनको तो प्रधानमंत्री बनना ही है ..." मैंने कहा "...तब तो भैंसें खुशी के मारे नाचने लगेंगी नेताजी का बहुत पैसा बच जाएगा ..." सपाई थोड़ा कनफ्यूज होकर पूछने लगे  "...खर्चे की बचत का हिसाब कुछ समझ मे नहीं आया थोड़ा स्पष्ट करें..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "...सारी भैंसों को जवानी लौट आएगी, वे खुशी के मारे नाचने-गाने लगेंगी फिर आपके 125 करोड़ की सीधी बचत है ..." सपाई गुस्से से मुझे नमस्कार करके चले गए ....

Sunday, 9 March 2014

आल अनार्की पार्टी ...

अफ्रीका के जंगल से पकड़ कर लाए गए महात्मा गांधी के पोते ने जब "आपा" ज्वाईन किया था तभी ये तय हो गया था कि कुछ तो होने वाला है। ऐसी आशंका से दिल्ली के दलिद्दरों के डर कर बंदर भी ऐसा भागे कि दिखने ही बंद हो गए। उन बंदरों मे गांधी जी के तीन बंदर भी थे। जब गांधी जी के पोते अपनी आपिया टीम के साथ भाजपा कार्यालय पर पत्थरबाजी करने गए तभी गांधी जी का एक बंदर जो वहीं आस-पास था एसएमएस करके बाकी अपने दोनों साथियों को बुला लिया और बोला "...देखो ये गांधी जी का पोता है ..." दूसरा बंदर बोला "...विश्वास नहीं होता ..." पहले बंदर ने कहा "...विश्वास तो करना ही पड़ेगा...आंखो देखी कभी झूठ नहीं होता ..." दूसरे ने जवाब दिया "...हाँ वो तो है ..." तभी तीसरे बंदर ने कहा "...गांधी जी के पोते अगर कहीं भारत के जंगल मे होते तो शायद ज्यादा शरीफ और ईमानदार होते ..." इस पर पहले बंदर ने कहा "...भक बुड़बक ! अगर पोता जी भारत के जंगल मे होते तो हाथ मे AK 47 होता ..." तीसरे बंदर ने कहा "...तो क्या हो जाता ...?" इस पर दूसरा बंदर बोला "...पहिला गोली तुमको ही मरते पोता जी समझे ..." इस पर पहले बंदर ने पूछा "... क्यों भाई ...?" तीसरे बंदर ने जवाब दिया "...क्योंकि तुम ही बहुत कान में ठेकी डाल कर बैठे रहते हो इसलिए ..." इस पर तीसरे बंदर पूछा "... तो क्या मैं बुराई सुनने लगूँ...?" पहले बंदर ने जवाब देते हुए कहा "...जब 'आपा' बुराई कर रही है, बुराई सुन रही है, बुराई देख रही है और पोता जी बड़े शान से उसका साथ दे रहे हैं तो कुछ न कुछ तो दम होगा ही ..." दूसरा बंदर जो बहुत देर से कुछ बोल नहीं रहा था लंबी सांस लेते हुए बोला "...जमाना बहुत बादल गया पोता जी पता नहीं बदले हैं या वैसे ही हैं ...?" इस पर तपाक से पहला बंदर बोला "...बदले कहाँ हैं वैसे ही हैं तभी तो 'आपा' ज्वाईन कर हाथ मे पत्थर लिए घूम रहे हैं ..." तभी एक पत्थर किसी अन्य बंदर को लगते - लगते बची तो पहला बंदर ने आह भरते हुए पूछा "...क्या गांधी बाबा पर किसी ने पत्थर फेंका होगा ...?" दूसरे बंदर ने जवाब देते हुए कहा "...किसी ने फेंका हो या न फेंका हो लेकिन पोताजी जरूर फेंके होंगे..." तीसरे बंदर पूछा "...गांधी बाबा को क्या ये सब अच्छा लगता यदि वे होते तो ...?" पहले बंदर ने जवाब देते हुए कहा "...उसकी चिंता यदि पोता जी किए होते तो आज इंसान होते और 'आपा' ज्वाईन नहीं किए होते ..." वैसे आपियों और पोताजी को पुलिस द्वारा पिटते देखकर गांधी जी के तीनों बंदर बहुत खुश हो रहे थे और चहचहाते बोल रहे थे "...भारत माता की जय... भारत माता की जय..." उस घटना के सभी बंदर घर चले थे। 4 दिनो के बाद चुनाव आयोग द्वारा "आपा" को चूना लगाकर मान्यता खत्म करने विचार कर रहा है तो गांधी जी तीनों बंदर आपस मे गले मिल रहे थे ...         

Wednesday, 5 March 2014

ललकारे वीर भर चौकड़ी, आपे-भैंस-बिलारे म्याऊँ...

नरेन्द्र भाई मोदी की बढ़ते धमक की चमक के आगे उत्तर प्रदेश की स्थिति करवट ले चुकी है कि हर उस नेता को अपना ठिकाना खोजने की जरूरत पड़ रही है जो करवटों को कट्टों के बल पर संचालित करना चाहते हैं। दौलत की बेटी बहन जी की कराहने वाली म्याऊँ - म्याऊँ ऐसी है कि उन्हें लगता है कि शेर की मौसी शेर को चुनौती दे रही है। वहम अच्छा है दलितों का दौलत लूट कर यदि बहन जी पहलवानी का शौक पाल सकती हैं तो नेता जी के लिए खतरे की घंटी हो सकती हैं। वैसे भी नेता जी अपने आप को पुराना और बेमौके परवान चढ़ने वाला गामा पहलवान बताते रहे हैं इसीलिए निरीह लोगों पर कट्टा चलाना, उनका पुराना शगल है चाहे वो कारसेवक रहे हों, उत्तरखंड आंदोलनकारी रहे हों या बेचारे जूनियर डाक्टर। आज की तारीख मे उत्तर प्रदेश मे साईकिल भी तेल पी के इतनी मोटी हो चुकी है कि हाथी भी उसकी सवारी करे तो ऐसा लगता है कि ठिकाने की तलाश में साईकिल खुद ही हाथी को अपनी पीठ पर बैठाए भाग रही है। नरेंद्र भाई मोदी की धमक के आगे नेता जी भी अपना आपा खो कार उस गुस्सैल हाथी की भूमिका मे आ चुके हैं जो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझता जो भी आता उठा के पटकता चला जाता है। खैर अभी अखबार मे खबर छपी थी कि अपने ही सरकार की उन्होने जमकर लताड़ लगाई है अब पता नहीं कुछ बाकी भी है या नहीं। भैंसे भी गधों की मुद्रा मे अपने आपा मे पगुरी नहीं कर पा रही हैं।

आलम ये आपिए बड़े धूम-धड़ाके के साथ दिल्ली से बाहर निकले ही थे कि उसी धूम-धड़ाके के साथ वो अपना आपा खोने लगे दरअसल यहाँ के लोगों ने दिल्ली के दलिद्दरों को घाँस डालने से मना कर दिया। उन्हीं बैंड-बाजे वाले जो उनके साथ वहीं से आए थे और विश्वासपरक गवनियों ने आपियों का बैंड बाजा दिया और वो फिर वापस दिल्ली के बिल मे घुस गए। खोखी से खोखला हो चुके आपियों का बेचारा बैंड मास्टर, उसे तो आपियों ने चारे की तरह इस्तेमाल करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी जैसे शेर के आगे मेमने को चारे की तरह फेंक दिया जाता है। मेमना बेचारा मेमियता रहता है शेर आराम से अपना भोजन कर लेता है। लोग बताते हैं कि बैंड मास्टर का मेमियाने वाला आलाप सुनने के लिए हजार लोग भी नहीं थे कानपुर मे, तो उस बेचारे को आपियों ने गुजरात खदेड़ा था वो भी एक दिन के बजाय पाँच दिनो के लिए लेकिन शिकार चुनाव आयोग वाले बब्बर शेर ने कर लिया। लगता है आपियों से भगवान बहुत खुश है लिहाजा जल्दी ही वो अपने पास बुलाने वाले हैं, इसलिए खुन्नस निकालने के लिए दिल्ली भाजपा कार्यालय पर सूरज पर थूकने पहुँच गए। सूरज पर थूकने का अंजाम क्या होता है सभी को पता है। वैसे काँग्रेस कुमार केजरीवाल के काले धन का स्विस अकाउंट नंबर  का ईमानदारी से आनंद उठाईए ये लीजिये नंबर 2383484885422134 यही नंबर केजरीवाल का असली ठिकाना है जिसे लोग बाग खोज रहे थे।

Monday, 3 March 2014

भैंस करे सियापा, मारे बखान धोखईती...

भैंसों को सानी डालने के बाद जब खान साहब यादव जी साथ कोठा पर चढ़ने लगे तो भैंसों ने शोर मचाना शुरू कर दिया तो यादव जी और खान साहब परेशान हो गए। घोड़ा-डाक्टरों को बुलाया गया तो पता चला की कुछ भैंसें भयानक डिप्रेशन में हैं और कुछ को सिवियर एंजाईटी डिसआर्डर है तो घोड़ा-डाक्टर ने हाथ खड़ा कर दिया बोला कि मैं इलाज नहीं कर सकता, क्योंकि पशु मनोचिकित्सक नहीं हूँ। खान साहब और यादव जी बहुत परेशान हो गए भैंसों की बीमारी को लेकर। कुछ दिनो बाद ही जो भैंसें डिप्रेशन मे थीं तबेले यानी घर से भाग गईं, तो खान साहब ने एड़ी-चोटी एक कर दिया उनको खोजवाने मे बहुत प्रयास के बाद मिलीं तो खान साहब ने यादव जी से बहुत विचार विमर्श किया उसके बाद तय किया की सारी भैंसों का मेक-ओवर करवाना बहुत जरूरी है जैसे बकलोल बबुआ इसके लिए 500 करोड़ मे जापानी कंपनी की सेवा ले रहे हैं। वैसे भी भैंसों के मनोरंजन के लिए सैफई मे 125 करोड़ मे नाच-गाने के लिए मुंबई से नचनियों और गवनियों को बुलाया गया था लेकिन वो भी पर्यप्त नहीं था क्योंकि कहाँ 500 करोड़ और कहाँ मात्र 125 करोड़, पेट थोड़े ही भरने वाला था भैंसों का। भैंसों के सटीक ईलज के लिए खान साहब के साथ बहुत लोगों को यूरोप की यात्रा पर निकल जाना पड़ा। वैसे खान साहब बड़े दूरदर्शी आम आदमी हैं इसीलिए नाच-गाने के समारोह के पहले ही भैंसों के मेकओवर के निमित्त विदेश यात्रा पर निकल लिए। जाने से पहले खान साहब ने कहा था कि वो किसी शैक्षणिक टूर पर नहीं जा रहे हैं। मतलब बिलकुल साफ था कि भैंसों को संदेश दे कर जाना चाहते थे कि वो उन्हीं के काम से जा रहे हैं न कि किसी और काम से। उनका ये संदेश इस लिए भी जरूरी था ताकि भैंसें फिर डिप्रेशन मे न आवें और अन्यों की एंजाईटी न बढ़े। खान साहब अमेरिका जाने से इसलिए भी कतराते हैं कि वहाँ उनके साथ भैंसों जैसा ही व्यवहार कर दिया जाता है। खैर, खान साहब यूरोप की यात्रा से लौटे तो भी भैंसों का डिप्रेशन और एंजाईटी दूर होने का नाम ही नहीं ले रहा था, पता नहीं कितने करोड़ पानी मे डूब गए। खैर, चिंता इस बात की नहीं कि कितने करोड़ डूबे बल्कि चिंता इस बात की है कि भैंसों को भी कहीं सांप्रदायिकता की लत न पड़ जाए। बकलोल शहजादे तो अपना "आपा" खोते ही गुरमुख हो लिए थे फिर गुरु के तर्ज पर लेकिन गुरु से बेहतर अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया था लेकिन भैंसों के साथ समस्या ये हैं कि खान साहब से गुरमुख होने के लिए वो बिलकुल तैयार नहीं थीं। एक घोडा-डाक्टर जो थोड़ी बहुत भैंसों की भाषा उनका हाव-भाव देख कर समझ जाते हैं, बता रहे थे कि भैंसों का स्पष्ट कहना है कि उन्होने अपना "आपा" बकलोल शहजादे की तरह नहीं खोया है लिहाजा वो किसी भी कीमत पर खान साहब से गुरमुख नहीं होंगी। खान साहब और यादव जी ये सुन कर बड़े चिंतित हुए सो उन्होने तय किया कि जिस तरह बकलोल शाहजादे आपिया संयोजक से गुरमुख हो लिए उसी तर्ज पर भैंसों को उन्हीं से गुरमुख करा दिया जाए। इसकी भनक जब भैंसों को लगी तो वे अपना तबेला छोड़ कर फिरसे  भाग गईं थीं लेकिन थोड़ी ही मशक्कत के बाद फिर से उनको खोज लिया गया था।

Saturday, 1 March 2014

कजरी के कांव पर बगुला मारे दांव ...!

नरेन्द्र भाई मोदी को पूर्ण बहुमत से प्रधानमंत्री बनने से रोकना अब मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। यह ब्रम्ह सत्य जैसे जैसे प्रबल और स्पष्ट होता जा रहा है "आप सबका" "आपा" देखने लायक है। काँग्रेस कुमार केजरीवाल एंड कमपानी सहित उनकी "आपा" के खटिया का उड़ीचन ही ढीला हो गया और "आपाई" अपने ही बनाए खटिए मे धसने और फँसने लगे तो अपने खटिए के पायों को ही धमकी और चेतावनी देने लगे। मजबूरी ये है कि यदि वे खटिया का उड़ीचन कसते हैं घुन लगे पायों के टूटने की पूरी - पूरी गारंटी है। इधर मोदी की आँधी मे आपा के खटिया के उधियाना बहुत हास्यास्पद भी नहीं लग रहा है। वैसे भी काँग्रेस कुमार केजरीवाल ने अपने खटिए ऐसे ऐसे लोगों को बैठाया जिनका वजूद सिर्फ इस मामले मे महत्वपूर्ण था कि कैसे हर काम मे उंगली किया जाये। महात्मा गांधी तो अंग्रेजों के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका मे स्वतन्त्रता और रंगभेद के खिलाफ आवाज बुलंद कर के भारत आए और उन्होने जो कुछ भी किया वो सबके सामने है लेकिन उनके पोते पता नहीं दक्षिण अफ्रीका के किस जंगल से पकड़ कर लाये गए हैं, पता नहीं वो किस रंगभेद मे डूबे हुए थे। जैसा उनका गांधीत्व है उससे तो यही लगता है आपा की टोपी के रंग और उस पर काले रंग से लिखी आयात मे फर्क ही नहीं पता, फिर आपाई काले रंगभेद का वो क्या करेंगे पता नहीं। अन्य आपियों की तरह उनका भी मुंह तो काला होना पक्का है। खोपड़ी पर से काला रंग चू कर मुंह पर आने मे अधिक से अधिक सिर्फ 49 दिन ही लगते हैं। आपा के ढीली उड़ीचन वाली खटिया मे फंस कर देश को धँसाने का उनका प्रयास पता नहीं उनके दादा जी को कैसे पसंद आएगा ? खैर इसकी चिंता उनको थोड़े ही है। पता नहीं इन एनजीओ वाले स्वनामधन्य लोगों को क्या हो गया कि बजाय मोदी को रोकने के सोमनाथ भारती बनने का चस्का पाले घूम रहे हैं। पता नहीं शास्त्री जी के पोते किसका और कहाँ किस खिड़की से कूद कर किसकी सारेआम  जांच के बहाने क्या करेंगे भगवान जाने। एक आपाई अपने ढीले उड़ीचन वाले खटिए बड़ी की बड़ी तारीफ किए जा रहा था तब बाद मे पता चला कि सारे दुष्कर्म करने के ऐसे खटिए मे धंस जाने के बाद ऐसे बकलोल अपाईयों को उम्मीद है कि कोई उनको देख नहीं पाएगा लेकिन फर्जी आईआरएस कमीशनर ने अपने आपियों को ये नहीं बातया ज्यादा लोड हो जाने पर नीचे की पथरीली जमीन बड़ी तगड़ी और दर्दनाक प्रतिक्रिया देती है। एक पत्रकार मुझे बता रहे थे काँग्रेस कुमार केजरीवाल ने बहुत पैसा खर्च करके नाती-पोतों, उघटापैची गवनियों, घोटालेबाज एनजीओ और जमीर बेच कर घी पीने वालों ने आपा से प्रमाण-पत्र लेने की लाईन मे खड़ा कर दिया है। दिल्ली से महाराष्ट्र तक आपाई खटिए के बकलोल चौपायों ने जिस तरह से अपनी ही खटिया तोडनी शुरू की है उससे तो आपाई काँग्रेस कुमार केजरीवाल एंड कमपानी सहित रिंग मास्टर उर्फ फर्जी पोल मास्टर यादव जी, आपाई मफ़लर की फंसरी लगाए असंतोष गुप्ता सोर्री असुतोष गुप्ता जैसे लोग भी सकते यानी संकटे में हैं। हालाँकि फेरहिस्ट बहुत लंबी है मनीष सिसोदिया, प्रशांत भूषण, खुद काँग्रेस कुमार केजरवाल परवीन अमानुल्लाह से लेकर मेघा पाटकर तक सभी को अपने अनाचार-भ्रष्टाचार को आपाई खटिया पर बैठ कर ईमानदारी की चट्टी से अपना मुंह ढकना बहुत जरूरी है। इस हद का एक हृदयविदारक नमूना देखिये लिपिस्टिक कुमार विश्वास का जो खुदको लोकप्रिय कवि बताते फिरते हैं जबकि वास्तविकता ये है वो बिलकुल ही लोकप्रिय नहीं, क्या कोई बताएगा कि इससे पहले किस कवि ने काव्य-पाठ करके मारुति 800 भी खरीदने की हैसियत जुटा पाया ? अरे हरवंश राय बच्चन भी अपने मधुशाला से फिएट तक नहीं खरीद पाये फिर इस छिछोर छाप कवि के पास अरबों रुपये की संपत्ति अचानक मात्र दो साल मे ही कहाँ से आ गई वो भी मात्र काव्य-पाठ करके जबकि सभी कवि कविता को शौक के तौर पर रखते हैं मुख्य काम तो उनका कुछ और ही होता है। दरअसल ये सब अन्ना का हड़पा चंदा और विदेशों से आने वाला धन है जिसे ये फर्जी तरीके से काव्य-पाठ की कमाई बता रहे हैं मुझे नहीं मालूम कि लिपिस्टिक कुमार विश्वास के अलावा कोई कवि लम्बोर्गिनी जैसी गाड़ी से चलता हो और महलनुमा बंगले रहता हो। आपा के खटिए पर ऐसे ही भ्रष्ट और गंदे लोगों का जमावड़ा है जिसका पाया आपाई ही तोड़ने पर उतारू हैं।