आंदोलनो को शुद्धता बहुत जरूरी
देश का इतिहास रहा है कि प्रत्यक्ष, कोलाहली और एकल विषय केन्द्रित सामाजिक आंदोलनो से उत्पन्न हुई राजनीतिक पार्टियां न सिर्फ आला नौटंकीबाज रही हैं बल्कि परमभ्रष्ट भी रही हैं। जैसे स्वतन्त्रता आंदोलन से उत्पन्न हुई "काँग्रेस", दक्षिण मे द्रविण आंदोलन से उत्पन्न हुई "डीएमके और एआईडीएमके" और अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार के एकल विषय केन्द्रित आंदोलन से उत्पन्न हुई "आम आदमी पार्टी"। जनता को लुभाने के लिए ऐसी - ऐसी नौटंकी इन पार्टियों ने किए कि वास्तव मे ऐसा लगाने ही लगा कि सचमुच बदलाव आ ही गया लेकिन ये नौटंकी का दिखावा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि इन्हें अपने अपने असली रूप को किसी भी स्तर पर जा के छिपाना होता है। यही सब देखने के कारण महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी मिलने के बाद काँग्रेस को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। जावहर लाल नेहरू की नौटंकी जग जाहिर है कुछ कुछ हरकतें तो ऐसी हैं उनका जिक्र भी करना सामाजिक शिष्टाचार के खिलाफ लगता है। 70 के दाशक मे जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति से उत्पन्न हुए लालू प्रसाद, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव आदि। जिस प्रकार महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कॉंग्रेस को खत्म करने की जबरदस्त वकालत की थी कहीं उससे भी कड़ा विरोध अन्ना हज़ारे ने केजरीवाल का किया था। अन्ना हज़ारे राजनीतिक पार्टी बनाने के सख्त विरोधी थे क्योंकि वो सच्चाई जानते थे।
याद कीजिये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जब पहली बार शपथ ग्रहण करने गए थे तो काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ही तीनपहिया देसी मेट्रो मे बैठ कर गए थे। फिर भी लालू प्रसाद जी केजरीवाल से कहीं ईमानदार साबित हुए उन्होने न तो किसी को धोखा दिया, न चंदा हड़पा और न ही किसी की झूठी कसमे खाईं रही बात चारा घोटाला की तो लालू प्रसाद जी का भी आंतरिक लोकपाल वही बात बोल रहा है जो काँग्रेस कुमार केजरीवाल का आन्तरिक लोकपाल उनके अपने विधायकों धर्मेन्द्र कोली, राजेश गर्ग, देशराज राघव और स्टिंग सीडी के मामले मे बोल रहा है लिहाजा काँग्रेस कुमार केजरीवाल उनते ही ईमानदार हैं जितने मायावती, मुलायम सिंह यादव, डीएम के, आईडीएमके, कलमाड़ी सहित पूरी की पूरी कॉंग्रेस। वैसे कल जब श्री केजरीवाल से शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूछा गया तो उनका सीधा-सीधा उत्तर था कि डॉ हर्षवर्धन शीला दीक्षित के खिलाफ सुबूत लाकर दिखाएँ और अगर वो सही हुए तो कार्यवाही करेंगे। आज काँग्रेस कुमार केजरीवाल की दृष्टि मे शीला जी बिलकुल ईमानदार हो गईं उनके खिलाफ श्री केजरीवाल को कोई भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं है। कमाल फ़रूकी साहब को सपा ने दूध से मरी मक्खी की तरह निकाल का फेंक दिया तो "आपा" मे उनका शुद्धिकरण हुआ और ईमानदारी से जिंदा हो गये। वैसे भी केजरीवाल और "आपा" चंदे के मामले मे वैसी ही है जैसे कोयला घोटाले मे काँग्रेस।
आज की तारीख मे वो सभी लोग "आपा" जुड़ रहे हैं जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी है, कहीं फिट नहीं हो पा रहे हैं, अपने बेहूदे हरकतों के कारण पार्टियों से निकाले गए हैं और गली - मुहल्ले के वो नकारा लोग जो किसी काम के नहीं हैं। सुनने मे तो ये भी आ रहा है जहां काँग्रेस का वज़ूद लगभग खत्म हो गया है वहाँ पूरा का पूरा कोंग्रेसी कैडर "आपा" मे स्थानांतरित (ट्रांसफर) हो रहा है जैसे गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान आदि राज्यों मे।
देश का इतिहास रहा है कि प्रत्यक्ष, कोलाहली और एकल विषय केन्द्रित सामाजिक आंदोलनो से उत्पन्न हुई राजनीतिक पार्टियां न सिर्फ आला नौटंकीबाज रही हैं बल्कि परमभ्रष्ट भी रही हैं। जैसे स्वतन्त्रता आंदोलन से उत्पन्न हुई "काँग्रेस", दक्षिण मे द्रविण आंदोलन से उत्पन्न हुई "डीएमके और एआईडीएमके" और अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार के एकल विषय केन्द्रित आंदोलन से उत्पन्न हुई "आम आदमी पार्टी"। जनता को लुभाने के लिए ऐसी - ऐसी नौटंकी इन पार्टियों ने किए कि वास्तव मे ऐसा लगाने ही लगा कि सचमुच बदलाव आ ही गया लेकिन ये नौटंकी का दिखावा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि इन्हें अपने अपने असली रूप को किसी भी स्तर पर जा के छिपाना होता है। यही सब देखने के कारण महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी मिलने के बाद काँग्रेस को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। जावहर लाल नेहरू की नौटंकी जग जाहिर है कुछ कुछ हरकतें तो ऐसी हैं उनका जिक्र भी करना सामाजिक शिष्टाचार के खिलाफ लगता है। 70 के दाशक मे जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति से उत्पन्न हुए लालू प्रसाद, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव आदि। जिस प्रकार महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कॉंग्रेस को खत्म करने की जबरदस्त वकालत की थी कहीं उससे भी कड़ा विरोध अन्ना हज़ारे ने केजरीवाल का किया था। अन्ना हज़ारे राजनीतिक पार्टी बनाने के सख्त विरोधी थे क्योंकि वो सच्चाई जानते थे।
याद कीजिये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जब पहली बार शपथ ग्रहण करने गए थे तो काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ही तीनपहिया देसी मेट्रो मे बैठ कर गए थे। फिर भी लालू प्रसाद जी केजरीवाल से कहीं ईमानदार साबित हुए उन्होने न तो किसी को धोखा दिया, न चंदा हड़पा और न ही किसी की झूठी कसमे खाईं रही बात चारा घोटाला की तो लालू प्रसाद जी का भी आंतरिक लोकपाल वही बात बोल रहा है जो काँग्रेस कुमार केजरीवाल का आन्तरिक लोकपाल उनके अपने विधायकों धर्मेन्द्र कोली, राजेश गर्ग, देशराज राघव और स्टिंग सीडी के मामले मे बोल रहा है लिहाजा काँग्रेस कुमार केजरीवाल उनते ही ईमानदार हैं जितने मायावती, मुलायम सिंह यादव, डीएम के, आईडीएमके, कलमाड़ी सहित पूरी की पूरी कॉंग्रेस। वैसे कल जब श्री केजरीवाल से शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूछा गया तो उनका सीधा-सीधा उत्तर था कि डॉ हर्षवर्धन शीला दीक्षित के खिलाफ सुबूत लाकर दिखाएँ और अगर वो सही हुए तो कार्यवाही करेंगे। आज काँग्रेस कुमार केजरीवाल की दृष्टि मे शीला जी बिलकुल ईमानदार हो गईं उनके खिलाफ श्री केजरीवाल को कोई भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं है। कमाल फ़रूकी साहब को सपा ने दूध से मरी मक्खी की तरह निकाल का फेंक दिया तो "आपा" मे उनका शुद्धिकरण हुआ और ईमानदारी से जिंदा हो गये। वैसे भी केजरीवाल और "आपा" चंदे के मामले मे वैसी ही है जैसे कोयला घोटाले मे काँग्रेस।
आज की तारीख मे वो सभी लोग "आपा" जुड़ रहे हैं जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी है, कहीं फिट नहीं हो पा रहे हैं, अपने बेहूदे हरकतों के कारण पार्टियों से निकाले गए हैं और गली - मुहल्ले के वो नकारा लोग जो किसी काम के नहीं हैं। सुनने मे तो ये भी आ रहा है जहां काँग्रेस का वज़ूद लगभग खत्म हो गया है वहाँ पूरा का पूरा कोंग्रेसी कैडर "आपा" मे स्थानांतरित (ट्रांसफर) हो रहा है जैसे गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान आदि राज्यों मे।
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