नरेन्द्र भाई मोदी के डर का आलम ये है कि बकलोल बबुआ यानी शहजादे अपने ही बिछौना पर उछल - कूद मचाए हुए है।
आनंद का जुगाड़ मने Pleasure Technology जैसे Talking Crows Sitting on Buffalo's Back
Thursday, 30 January 2014
Tuesday, 28 January 2014
हाथी की दुम पर "आपा" की धुन
आपाई बन्नों ने बिन्नी को खदेड़ कर थपरी पीट रहे हैं ये ठीक वैसा ही है जैसे हाथी की पुंछ पकड़ कर लटके थे और हाथी ने जब गोबर कर दिया तो उल्टे हाथी को ही गरियाने लगे। बड़े दिनो तक पूंछ पकड़ कर लटक रहे थे ये तो हाथी की मेहरबानी ही समझिए कि उसने आपाई बन्नों का जलाभिषेक नहीं किया वरना इस ठंड उन आपाईयों की क्या हालत होती भगवान ही जाने। भैंस के बजाय हाथी पालने के शौकीन आपाई यादव जी से मैंने इस बारे मे पूछा तो वो आपा खो बैठे और कहने लगे "...हमारी हाथी किसी और के हुकुम की गुलाम हो गई थी ..." मैंने फिर उनसे पूछा "... भैंस पालने मे क्या बुराई थी ..." आपाई यादव जी बोले "... हम लोग सबसे अलग किस्म के लोग हैं ..." मैंने कहा "... ये दावा तो लालू यादव भी कर रहे थे ..." आपाई यादव जी ने इस पर नाराज होते हुए कहा "...आप लालू यादव से हमारी तुलना न करें ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...बिलकुल तुलना नहीं हो सकती वो तो 15 साल बिहार मे राज किए और आपका डेढ़ महीना भी नहीं बीता और हाथी ने आप पर गोबर कर दिया ..." आपाई यादव जी और भड़क गए बोले "...आपको क्या पता है राजनीति बदल रही है ..." मैंने कहा "...लालू यादव ने भी राजनीति को बहुत हद तक बदला था और 15 साल तक राज किया ..." आपाई यादव जी और गुस्से मे आ गए बोले "...लालू यादव एक भ्रष्ट नेता है आपको पता है ..." मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "... उनकी भ्रष्टता के बावजूद किसी भैंस की इतनी हिम्मत नहीं पड़ी गोबर कर सके ..." अपाई बोले "... ये हमारा लोकतन्त्र है ..." मैंने कड़ाई से पूछा "...लोकतन्त्र का मतलब ये हैं आपके बन्ने हर जगह गंदगी फैलते फिरेंगे ...?" आपाई यादव जी गुस्से मे मुझसे पूछा "...कौन गंदगी फैला रहा है ...?" मैंने कहा "...भारती जैसे लोग सभी को अपने जैसा समझते हैं सबको अपनी तरह भरी सड़क पर सरे आम गंदगी फैलाने को मजबूर करते हैं ये भी नहीं देखते कि गंदगी स्वदेशी है या विदेशी, नर की है या नारी की ..." आपाई यादव जी बोले "...देखिये आपको सच्चाई पता नहीं है ..." मैंने कहा "... यही दावा तो लालू यादव भी करते हैं कि लोगों को सच्चाई का नहीं पता ..." यादव जी रहा नहीं गया बोले "... लालू यादव ईमानदार नहीं है ..." मैंने कहा "...लेकिन लोगों का स्पष्ट मानना हैं लालू यादव आप लोगों से फिर भी कहीं ज्यादा ईमानदार हैं ..." आपाई यादव जी आँखों मे चमक आ गई और आँखें चमकाते हुए उन्होने मुझसे पूछा "...वो कैसे ...?" मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...उनका आंतरिक लोकपाल कभी भी उनको दोषी नहीं माना ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "... बावजूद इसके उन्होने बिहार मे 15 साल तक राज किया ..." आपाई यादव जी बोले '...लेकिन चारा घोटाला...?" मैंने उनकी बात बीच मे ही काटते हुए कहा "...उससे भी बड़े - बड़े घोटाले तो आपके नाम हैं इसीलिए आपके बन्नों ने बिन्नी को खदेड़ डाला ..." आपाई यादव जी को कहीं से फोन आ गया और फोन मे व्यस्त हो गए ... थोड़ी ही देर वो अपने बीसहजारी कर्मचारियों को बुलाने लगे तो मुझे वहाँ से भागने के सिवा कोई और चारा ही नहीं था ...
आपाई बन्नों ने बिन्नी को खदेड़ कर थपरी पीट रहे हैं ये ठीक वैसा ही है जैसे हाथी की पुंछ पकड़ कर लटके थे और हाथी ने जब गोबर कर दिया तो उल्टे हाथी को ही गरियाने लगे। बड़े दिनो तक पूंछ पकड़ कर लटक रहे थे ये तो हाथी की मेहरबानी ही समझिए कि उसने आपाई बन्नों का जलाभिषेक नहीं किया वरना इस ठंड उन आपाईयों की क्या हालत होती भगवान ही जाने। भैंस के बजाय हाथी पालने के शौकीन आपाई यादव जी से मैंने इस बारे मे पूछा तो वो आपा खो बैठे और कहने लगे "...हमारी हाथी किसी और के हुकुम की गुलाम हो गई थी ..." मैंने फिर उनसे पूछा "... भैंस पालने मे क्या बुराई थी ..." आपाई यादव जी बोले "... हम लोग सबसे अलग किस्म के लोग हैं ..." मैंने कहा "... ये दावा तो लालू यादव भी कर रहे थे ..." आपाई यादव जी ने इस पर नाराज होते हुए कहा "...आप लालू यादव से हमारी तुलना न करें ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...बिलकुल तुलना नहीं हो सकती वो तो 15 साल बिहार मे राज किए और आपका डेढ़ महीना भी नहीं बीता और हाथी ने आप पर गोबर कर दिया ..." आपाई यादव जी और भड़क गए बोले "...आपको क्या पता है राजनीति बदल रही है ..." मैंने कहा "...लालू यादव ने भी राजनीति को बहुत हद तक बदला था और 15 साल तक राज किया ..." आपाई यादव जी और गुस्से मे आ गए बोले "...लालू यादव एक भ्रष्ट नेता है आपको पता है ..." मैंने उनका उत्तर देते हुए कहा "... उनकी भ्रष्टता के बावजूद किसी भैंस की इतनी हिम्मत नहीं पड़ी गोबर कर सके ..." अपाई बोले "... ये हमारा लोकतन्त्र है ..." मैंने कड़ाई से पूछा "...लोकतन्त्र का मतलब ये हैं आपके बन्ने हर जगह गंदगी फैलते फिरेंगे ...?" आपाई यादव जी गुस्से मे मुझसे पूछा "...कौन गंदगी फैला रहा है ...?" मैंने कहा "...भारती जैसे लोग सभी को अपने जैसा समझते हैं सबको अपनी तरह भरी सड़क पर सरे आम गंदगी फैलाने को मजबूर करते हैं ये भी नहीं देखते कि गंदगी स्वदेशी है या विदेशी, नर की है या नारी की ..." आपाई यादव जी बोले "...देखिये आपको सच्चाई पता नहीं है ..." मैंने कहा "... यही दावा तो लालू यादव भी करते हैं कि लोगों को सच्चाई का नहीं पता ..." यादव जी रहा नहीं गया बोले "... लालू यादव ईमानदार नहीं है ..." मैंने कहा "...लेकिन लोगों का स्पष्ट मानना हैं लालू यादव आप लोगों से फिर भी कहीं ज्यादा ईमानदार हैं ..." आपाई यादव जी आँखों मे चमक आ गई और आँखें चमकाते हुए उन्होने मुझसे पूछा "...वो कैसे ...?" मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...उनका आंतरिक लोकपाल कभी भी उनको दोषी नहीं माना ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "... बावजूद इसके उन्होने बिहार मे 15 साल तक राज किया ..." आपाई यादव जी बोले '...लेकिन चारा घोटाला...?" मैंने उनकी बात बीच मे ही काटते हुए कहा "...उससे भी बड़े - बड़े घोटाले तो आपके नाम हैं इसीलिए आपके बन्नों ने बिन्नी को खदेड़ डाला ..." आपाई यादव जी को कहीं से फोन आ गया और फोन मे व्यस्त हो गए ... थोड़ी ही देर वो अपने बीसहजारी कर्मचारियों को बुलाने लगे तो मुझे वहाँ से भागने के सिवा कोई और चारा ही नहीं था ...
Saturday, 25 January 2014
गोरखपुर ने तो इतिहास ही रच डाला ...
आदरणीय नेरेन्द्र भाई मोदी की 23 जनवरी की "विजय शंखनाद रैली", गोरखपुर भारत के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी रैली है जिसमे 9 से 10 लाख लोग तो केवल मैदान मे ही थे ऐसा अनुमान है कि लगभग 3 से 4 लाख लोग तो उस जाम मे फंस गए थे जो रैली मे पहुँचना चाह रहे थे। ...अद्भुत नजारा था। इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी रैली पटना की "हुंकार' रैली थी जिसने 1974 के लोकनायक जयप्रकाश नारयण के "सम्पूर्ण क्रांति" की रैली को भी बहुत पीछे छोड़ दिया था। स्वतंत्र भारत मे अबतक के पूर्वाञ्चल की इस सबसे बड़ी रैली का प्रभाव इतना जबर्दस्त है कि सभी विरोधियों के बिलकुल नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। रैली के ठीक एक दिन बाद ही मुलायम सिंह यादव को अपने सभी विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों की अचानक आपात बैठक बुलानी पड़ी और उत्तर प्रदेश की वस्तुस्थिति पर गंभीर मंत्रणा की वैसे समाजवादी पार्टी के लोग भी मंत्रणा कर सकते हैं लिखते हुए भी बड़ा अजीब लगता हैं, आप समझ सकते हैं। गोरखपुर की विजय शंखनाद रैली ने पूरे पूर्वाञ्चल की राजनीतिक समीकरण पर जबर्दस्त प्रभाव डाला है जिसका असर केवल पूर्वाञ्चल मे ही नहीं बल्कि दिल्ली सहित पूरे देश मे देखा और महसूस किया जा रहा है। इस रैली के बाद से ये पहली बार कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता केवल मतदान ही नहीं करेंगे बल्कि शुद्ध राजनीति भी करेंगे। आलम ये है कि यहाँ से 23 लोकसभा सीट मे से 17 से अधिक सीटें भाजपा की झोली मे जाने संभावना जताई जा रही है। अगर यही रफ्तार रही और कार्यकर्ताओं ने पूरी मेहनत कर दी तो पूरे उत्तर पदेश मे भाजपा 55 से 65 सीटें जीत सकती है। इसका असर पूरे देश विभिन्न रूपों मे दिखना शुरू हो चुका है।
मैंने पिछले 31 मई 2013 को ही अपने एक लेख मे अपना आकलन व्यक्त किया था कि जिस प्रकार मोदी जी का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा है उससे ऐसा लगता ही नहीं है बल्कि ये सुनिश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आने वाले चुनाव मे भाजपा को अपने बूते 280 से 330 सीटें मिल सकतीं हैं थोड़ा मेहनत कर दिया गया तो ये आंकड़ा 350 के पार भी जा सकता है। मेरा ये आंकलन 7 महीने पहले का है जिसे मैंने "सोशिओ डाइनामिक्स ऑफ ओपीनियन" के आधार पर था जिसे देश के दकियानूस बड़े - बड़े मीडिया घारने के लोग अभी नाम भी नहीं सुने होंगे। इसमे "एडवांस साइकॉलजी के साथ व्यक्ति के परिवर्तनशील सामाजिक मनोविज्ञान" का भी अध्ययन किया जाता है। सीटों के संदर्भ मे अपने पूर्वर्ती आकलन पर भी भी कायम हूँ। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं को परिश्रम तो बढ़ाना ही होगा।
आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी, एवं पूर्वाञ्चल की जनता को कोटि-कोटि धन्यवाद आदरणीय नरेन्द्र भाई मोदी को विश्वनेता के रूप मे स्थापित करने के निमित्त सहयोग करने के लिए।
आदरणीय नेरेन्द्र भाई मोदी की 23 जनवरी की "विजय शंखनाद रैली", गोरखपुर भारत के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी रैली है जिसमे 9 से 10 लाख लोग तो केवल मैदान मे ही थे ऐसा अनुमान है कि लगभग 3 से 4 लाख लोग तो उस जाम मे फंस गए थे जो रैली मे पहुँचना चाह रहे थे। ...अद्भुत नजारा था। इसके बाद दूसरी सबसे बड़ी रैली पटना की "हुंकार' रैली थी जिसने 1974 के लोकनायक जयप्रकाश नारयण के "सम्पूर्ण क्रांति" की रैली को भी बहुत पीछे छोड़ दिया था। स्वतंत्र भारत मे अबतक के पूर्वाञ्चल की इस सबसे बड़ी रैली का प्रभाव इतना जबर्दस्त है कि सभी विरोधियों के बिलकुल नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। रैली के ठीक एक दिन बाद ही मुलायम सिंह यादव को अपने सभी विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों की अचानक आपात बैठक बुलानी पड़ी और उत्तर प्रदेश की वस्तुस्थिति पर गंभीर मंत्रणा की वैसे समाजवादी पार्टी के लोग भी मंत्रणा कर सकते हैं लिखते हुए भी बड़ा अजीब लगता हैं, आप समझ सकते हैं। गोरखपुर की विजय शंखनाद रैली ने पूरे पूर्वाञ्चल की राजनीतिक समीकरण पर जबर्दस्त प्रभाव डाला है जिसका असर केवल पूर्वाञ्चल मे ही नहीं बल्कि दिल्ली सहित पूरे देश मे देखा और महसूस किया जा रहा है। इस रैली के बाद से ये पहली बार कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के मतदाता केवल मतदान ही नहीं करेंगे बल्कि शुद्ध राजनीति भी करेंगे। आलम ये है कि यहाँ से 23 लोकसभा सीट मे से 17 से अधिक सीटें भाजपा की झोली मे जाने संभावना जताई जा रही है। अगर यही रफ्तार रही और कार्यकर्ताओं ने पूरी मेहनत कर दी तो पूरे उत्तर पदेश मे भाजपा 55 से 65 सीटें जीत सकती है। इसका असर पूरे देश विभिन्न रूपों मे दिखना शुरू हो चुका है।
मैंने पिछले 31 मई 2013 को ही अपने एक लेख मे अपना आकलन व्यक्त किया था कि जिस प्रकार मोदी जी का जादू लोगों के सर चढ़ कर बोल रहा है उससे ऐसा लगता ही नहीं है बल्कि ये सुनिश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आने वाले चुनाव मे भाजपा को अपने बूते 280 से 330 सीटें मिल सकतीं हैं थोड़ा मेहनत कर दिया गया तो ये आंकड़ा 350 के पार भी जा सकता है। मेरा ये आंकलन 7 महीने पहले का है जिसे मैंने "सोशिओ डाइनामिक्स ऑफ ओपीनियन" के आधार पर था जिसे देश के दकियानूस बड़े - बड़े मीडिया घारने के लोग अभी नाम भी नहीं सुने होंगे। इसमे "एडवांस साइकॉलजी के साथ व्यक्ति के परिवर्तनशील सामाजिक मनोविज्ञान" का भी अध्ययन किया जाता है। सीटों के संदर्भ मे अपने पूर्वर्ती आकलन पर भी भी कायम हूँ। लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं को परिश्रम तो बढ़ाना ही होगा।
आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी, एवं पूर्वाञ्चल की जनता को कोटि-कोटि धन्यवाद आदरणीय नरेन्द्र भाई मोदी को विश्वनेता के रूप मे स्थापित करने के निमित्त सहयोग करने के लिए।
Tuesday, 21 January 2014
देखा है पहली बार ...नमस्कार
उधार की लंगोटी से पहलवानी का काम चलाने वाले आपाई केजरीवाल ने जब रेल भवन से अपनी लंगोटी हवा मे लहराई और लोगों का आह्वान किया तो ऊपर आसमान मे चील-कौओं की आवाज़े सुनाई देने लगीं। इसलिए नहीं कि उन्हें भोजन की उम्मीद थी बल्कि इसलिए कि उस क्षेत्र का नाम ही "लोटियन्स ज़ोन" है जहां आज तक किसी ने लोटा नहीं बड़े भाग्य से तो कोई लोटने जा रहा है और बहुत से लोगों को लोटने के लिए बुला भी रहा है बड़ा अद्भुत नजारा होगा शायद यही सोच कर चील - कौवों की आवाज सुनाई दे रही थी। लेकिन एक आली छाप पशु-पक्षी विशेषज्ञ तो कुछ और ही दावा कर रहे थे वो बता रहे थे कि ये "लोटियन्स ज़ोन" नहीं बल्कि "लुटियन्स ज़ोन" है जहां लूटने के मकसद से अंग्रेज़ यहाँ आए थे तो उन्होने अपना ठिकाना यहीं बनाया था चूंकि लूट-खसोट उनका काम था और बनाने वाला उसी लुटेरा अंग्रेज़ बिरदारी का था इसलिए उसका नाम भी लुटियन्स ही था इसीलिए इस क्षेत्र को "लुटियन्स ज़ोन" कहते हैं आगे वो बताते हैं कि दरअसल मामला ये है कि आज तक कभी सड़क पर कोई लूट-पाट की वारदात हुई नहीं थी क्यों कि अंग्रेज़ लुटेरों के जाने के बाद ये वीआईपी ज़ोन भी घोषित हो जाने के कारण बहुत हाइ स्क्यूरिटी रहती है इसलिए किसी लूट-खसोट की वारदात अभी तक नहीं हुई थी लेकिन चील-कौवों की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती थी उस अद्भुत नजारे को देखने की। पशु - पक्षी विशेषज्ञ आगे बताते हैं कि उनकी पक्षियों को घोटालों और घपलों की आवाजें सुनाई देती थीं लेकिन वो सब लुटियन्स ज़ोन के पत्थरों के पीछे ही दब के रह जाती थीं ये पहली बार था कि कोई संवैधानिक डकैती, कानून का घोटाला और लोकतान्त्रिक लूट-खसोट की सारी वारदात सरे आम "लुटियन्स ज़ोन" मे होने जा रही थी जिसे देखने के लिए पूरे आसमान मे चील - कौवों की भरमार हो गई। इसी मे किसी लालची चील को बहुत भूख लगी तो चालबाजी दिखाने लगा और मौके की तलाश मे छिप गया लेकिन पता चला कि थोड़ी देर बाद केजरीवाल सोने के लिए अपने कार मे चले गए और अपना शीशा बंद कर लिया फिर सबेरे अपने लूट-खसोट वाली जगह पर आकर सबको गुड मार्निंग कहने लगे। उस चालबाज चील ने कहा "...ये तो हमसे भी बड़ा चालबाज और धूर्त निकाला ...!" खैर उसके अरमान तो पूरे नहीं हुए लेकिन लूट-खसोट अद्भुत नजारा देखने वाले चील-कौवों की कुछ समय तक चाँदी जरूर रही। पानी का बरसाना थोड़ी बाधा पहुंचाया लेकिन बहुत ज्यादा नहीं क्योंकि "लुटियन्स ज़ोन" मे तो गिद्धों के भी छिपने की पर्याप्त जगह है यही नहीं उस छिपने की जगह से बड़े आराम से उधार की लंगोटी से लूट-खसोट के अद्भुत नजारे का आनंद लिया जा सकता है। उधार की लंगोटी के पाहलवानी पर झूठ जब एक कौवे से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने आत्महत्या करने की ही कोशिश करने लगा लेकिन सुसाईड नोट टाइप करने के लिए कोई खाली नहीं था सब अद्भुत नजारे को देखने मे व्यस्त थे बेचारे को आत्महत्या ख्याल ही टालना पड़ा। चील-कौवों की ख़्वाहिश थी नजारा कुछ दिन और चले लेकिन बढ़िया दृश्य देर तक सामने कहाँ रहता है। बेचारे चील-कौवे मन मसोस कर अपने-अपने घर चले गए।
उधार की लंगोटी से पहलवानी का काम चलाने वाले आपाई केजरीवाल ने जब रेल भवन से अपनी लंगोटी हवा मे लहराई और लोगों का आह्वान किया तो ऊपर आसमान मे चील-कौओं की आवाज़े सुनाई देने लगीं। इसलिए नहीं कि उन्हें भोजन की उम्मीद थी बल्कि इसलिए कि उस क्षेत्र का नाम ही "लोटियन्स ज़ोन" है जहां आज तक किसी ने लोटा नहीं बड़े भाग्य से तो कोई लोटने जा रहा है और बहुत से लोगों को लोटने के लिए बुला भी रहा है बड़ा अद्भुत नजारा होगा शायद यही सोच कर चील - कौवों की आवाज सुनाई दे रही थी। लेकिन एक आली छाप पशु-पक्षी विशेषज्ञ तो कुछ और ही दावा कर रहे थे वो बता रहे थे कि ये "लोटियन्स ज़ोन" नहीं बल्कि "लुटियन्स ज़ोन" है जहां लूटने के मकसद से अंग्रेज़ यहाँ आए थे तो उन्होने अपना ठिकाना यहीं बनाया था चूंकि लूट-खसोट उनका काम था और बनाने वाला उसी लुटेरा अंग्रेज़ बिरदारी का था इसलिए उसका नाम भी लुटियन्स ही था इसीलिए इस क्षेत्र को "लुटियन्स ज़ोन" कहते हैं आगे वो बताते हैं कि दरअसल मामला ये है कि आज तक कभी सड़क पर कोई लूट-पाट की वारदात हुई नहीं थी क्यों कि अंग्रेज़ लुटेरों के जाने के बाद ये वीआईपी ज़ोन भी घोषित हो जाने के कारण बहुत हाइ स्क्यूरिटी रहती है इसलिए किसी लूट-खसोट की वारदात अभी तक नहीं हुई थी लेकिन चील-कौवों की जिज्ञासा हमेशा बनी रहती थी उस अद्भुत नजारे को देखने की। पशु - पक्षी विशेषज्ञ आगे बताते हैं कि उनकी पक्षियों को घोटालों और घपलों की आवाजें सुनाई देती थीं लेकिन वो सब लुटियन्स ज़ोन के पत्थरों के पीछे ही दब के रह जाती थीं ये पहली बार था कि कोई संवैधानिक डकैती, कानून का घोटाला और लोकतान्त्रिक लूट-खसोट की सारी वारदात सरे आम "लुटियन्स ज़ोन" मे होने जा रही थी जिसे देखने के लिए पूरे आसमान मे चील - कौवों की भरमार हो गई। इसी मे किसी लालची चील को बहुत भूख लगी तो चालबाजी दिखाने लगा और मौके की तलाश मे छिप गया लेकिन पता चला कि थोड़ी देर बाद केजरीवाल सोने के लिए अपने कार मे चले गए और अपना शीशा बंद कर लिया फिर सबेरे अपने लूट-खसोट वाली जगह पर आकर सबको गुड मार्निंग कहने लगे। उस चालबाज चील ने कहा "...ये तो हमसे भी बड़ा चालबाज और धूर्त निकाला ...!" खैर उसके अरमान तो पूरे नहीं हुए लेकिन लूट-खसोट अद्भुत नजारा देखने वाले चील-कौवों की कुछ समय तक चाँदी जरूर रही। पानी का बरसाना थोड़ी बाधा पहुंचाया लेकिन बहुत ज्यादा नहीं क्योंकि "लुटियन्स ज़ोन" मे तो गिद्धों के भी छिपने की पर्याप्त जगह है यही नहीं उस छिपने की जगह से बड़े आराम से उधार की लंगोटी से लूट-खसोट के अद्भुत नजारे का आनंद लिया जा सकता है। उधार की लंगोटी के पाहलवानी पर झूठ जब एक कौवे से बर्दाश्त नहीं हुआ तो उसने आत्महत्या करने की ही कोशिश करने लगा लेकिन सुसाईड नोट टाइप करने के लिए कोई खाली नहीं था सब अद्भुत नजारे को देखने मे व्यस्त थे बेचारे को आत्महत्या ख्याल ही टालना पड़ा। चील-कौवों की ख़्वाहिश थी नजारा कुछ दिन और चले लेकिन बढ़िया दृश्य देर तक सामने कहाँ रहता है। बेचारे चील-कौवे मन मसोस कर अपने-अपने घर चले गए।
Sunday, 19 January 2014
"आपाहि" पाप थूकहि लै जान
30 दिसंबर तक भ्रष्टाचार वाला नंबर मिलना था लेकिन 11 दिनो बाद वो नंबर मिला वो भी अधूरा इसी बीच स्टिंग ऑपरेशन चला तो पता चला की हर कार्यालय मे जबर्दस्त घूसखोरी चल रही है वैसे दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष भी "आपा" के मुखिया ही हैं तो फिर घूस का हिस्सा तो उनको कैसे नहीं मिला होगा ? सवाल ये है कि इसपर संदेह क्यों न किया जाए ? बिरला होता या होती तो भी क्या होता लेकिन बिडलान बिरला या बिड़ला हो जाए तो फिर कोई आपत्ति न आवे तो शक होना स्वाभाविक है ये कैसे न मान लिया जाए कि
"आपा' ने जब बुर्का ओढ़कर चवन्नी उछाला तो खाँटी भाई कोंग्रेसी लोग गड्डी के गड्डी नोट "आपा" पर लुटाने लगे तो "आपा" मारे खुशी के निहाल हो गई। "आपा" के पति केजरीवाल के आँखों से मारे खुशी के आँसू ही छलक पड़े और इतने छलके कि खाँटी भाई कोंग्रेसियों के सारे पाप धुल गए। अब लोटा ले कर कहते फिर रहे हैं कि फ़ाईलों का अध्ययन कर रहे हैं ... पता नहीं अध्ययन करने का अधिकार उनका है या जांच एजेसियों का "आपा" जाने। अगर मंशा है जांच का आदेश दीजिये नहीं तो अपने मफ़लर मे मुंह छुपा के बैठिए बिन्नी के अलावा कोई कुछ नहीं कहेगा। एक बकलोल बुद्धिमान पता नहीं क्यों "धुलना" को "घुलना" बोल रहा था। मैंने उसे कहा कि देखो पाप धुल गए हैं लेकिन वो अपनी बात पर अड़ते हुए बार-बार कहे जा रहा था " पाप घुल गए हैं" मैंने फिर कहा काँग्रेस के पाप धुलने की बात है इसपर उन बकलोल बुद्धिमान का सीधा सा वक्तव्य था "...बात एक ही है आपा वास्तव मे काँग्रेस मे घुली ही हुई है..." खैर आपा के चवन्नी उछल पर खाँटी भाई लोग बड़ा अजीब सा बुर्का वाला 'आबरा का डबरा ' छाप जादू "आपा" के पति केजरीवाल से चलवाना चाहते हैं ताकि मोदी के तेज को कम किया जा सके। इसके लिए केजरीवाल ने "बुर्का कवच" भी ओढ़ लिया ताकि मोदी के तेज से बच सकें ... बकलोल बुद्धिमान ये भी बता रहे थे कि मोदी का तेज ऐसा है कि उससे केवल सहानुभूति से थोड़ी क्या बहुत राहत मिल सकती है इसीलिए "आपा" खास लोग बार - बार ये पाकिस्तान से पैसा लेने के बाद उसी की गवनाई करते रहते हैं कि हम तो आम लोग हैं हमारी क्या औकात ! हाँ भाई औकात को प्रशांत भूषण की है कश्मीर पर बोलने की। भाई ये लोकतन्त्र है यदि आपको कुछ बोलने की आजादी है तो हर किसी को प्रतिक्रिया भी देने की आजादी है सो जूता तो पड़ना ही था। ऐसी ही प्रतिक्रिया पर 1984 मे शहजादे के अब्बा ने 404 सीटें जीत ली थीं खैर उस समय उनकी अम्मी की हत्या कर दी गई थी कोई क्या कर सकता था उसी तर्ज पर "आप" भी फिर से काँग्रेसी के नोट के सहारे चवन्नी उछाल कर खुद भी उछलने की तैयारी कर रही है पूरी मणि अय्यारी के साथ चाय पीना को कबका वो लोग छोड़ ही चुके हैं। पहले भी चवन्नी उछाल पर बड़े-बड़े अय्यार विदेशों से बुलाए गए थे लेकिन भरी सड़क पर सोमरस भारती के नेतृत्व मे सरेआम उनकी इज्जत उतार देंगे ये "आपा" ही कर सकती है। जनधोखा मे भी "आपा" का कोई जवाब नहीं धोखईती का आलम ये है कि "मुख्यमंत्री के लिए केजरीवाल और प्रधानमंत्री के लिए मोदी" कह कर वोट मांगा था लेकिन ये भस्मासुर तो मोदी जी के ही पीछे पड़ गए खैर जैसे भस्मासुर खत्म हो गया ये भी खत्म हो जाएंगे इतिहास ही नहीं सत्य भी अपने आपको दोहराता है।
30 दिसंबर तक भ्रष्टाचार वाला नंबर मिलना था लेकिन 11 दिनो बाद वो नंबर मिला वो भी अधूरा इसी बीच स्टिंग ऑपरेशन चला तो पता चला की हर कार्यालय मे जबर्दस्त घूसखोरी चल रही है वैसे दिल्ली जल बोर्ड के अध्यक्ष भी "आपा" के मुखिया ही हैं तो फिर घूस का हिस्सा तो उनको कैसे नहीं मिला होगा ? सवाल ये है कि इसपर संदेह क्यों न किया जाए ? बिरला होता या होती तो भी क्या होता लेकिन बिडलान बिरला या बिड़ला हो जाए तो फिर कोई आपत्ति न आवे तो शक होना स्वाभाविक है ये कैसे न मान लिया जाए कि
"आपा' ने जब बुर्का ओढ़कर चवन्नी उछाला तो खाँटी भाई कोंग्रेसी लोग गड्डी के गड्डी नोट "आपा" पर लुटाने लगे तो "आपा" मारे खुशी के निहाल हो गई। "आपा" के पति केजरीवाल के आँखों से मारे खुशी के आँसू ही छलक पड़े और इतने छलके कि खाँटी भाई कोंग्रेसियों के सारे पाप धुल गए। अब लोटा ले कर कहते फिर रहे हैं कि फ़ाईलों का अध्ययन कर रहे हैं ... पता नहीं अध्ययन करने का अधिकार उनका है या जांच एजेसियों का "आपा" जाने। अगर मंशा है जांच का आदेश दीजिये नहीं तो अपने मफ़लर मे मुंह छुपा के बैठिए बिन्नी के अलावा कोई कुछ नहीं कहेगा। एक बकलोल बुद्धिमान पता नहीं क्यों "धुलना" को "घुलना" बोल रहा था। मैंने उसे कहा कि देखो पाप धुल गए हैं लेकिन वो अपनी बात पर अड़ते हुए बार-बार कहे जा रहा था " पाप घुल गए हैं" मैंने फिर कहा काँग्रेस के पाप धुलने की बात है इसपर उन बकलोल बुद्धिमान का सीधा सा वक्तव्य था "...बात एक ही है आपा वास्तव मे काँग्रेस मे घुली ही हुई है..." खैर आपा के चवन्नी उछल पर खाँटी भाई लोग बड़ा अजीब सा बुर्का वाला 'आबरा का डबरा ' छाप जादू "आपा" के पति केजरीवाल से चलवाना चाहते हैं ताकि मोदी के तेज को कम किया जा सके। इसके लिए केजरीवाल ने "बुर्का कवच" भी ओढ़ लिया ताकि मोदी के तेज से बच सकें ... बकलोल बुद्धिमान ये भी बता रहे थे कि मोदी का तेज ऐसा है कि उससे केवल सहानुभूति से थोड़ी क्या बहुत राहत मिल सकती है इसीलिए "आपा" खास लोग बार - बार ये पाकिस्तान से पैसा लेने के बाद उसी की गवनाई करते रहते हैं कि हम तो आम लोग हैं हमारी क्या औकात ! हाँ भाई औकात को प्रशांत भूषण की है कश्मीर पर बोलने की। भाई ये लोकतन्त्र है यदि आपको कुछ बोलने की आजादी है तो हर किसी को प्रतिक्रिया भी देने की आजादी है सो जूता तो पड़ना ही था। ऐसी ही प्रतिक्रिया पर 1984 मे शहजादे के अब्बा ने 404 सीटें जीत ली थीं खैर उस समय उनकी अम्मी की हत्या कर दी गई थी कोई क्या कर सकता था उसी तर्ज पर "आप" भी फिर से काँग्रेसी के नोट के सहारे चवन्नी उछाल कर खुद भी उछलने की तैयारी कर रही है पूरी मणि अय्यारी के साथ चाय पीना को कबका वो लोग छोड़ ही चुके हैं। पहले भी चवन्नी उछाल पर बड़े-बड़े अय्यार विदेशों से बुलाए गए थे लेकिन भरी सड़क पर सोमरस भारती के नेतृत्व मे सरेआम उनकी इज्जत उतार देंगे ये "आपा" ही कर सकती है। जनधोखा मे भी "आपा" का कोई जवाब नहीं धोखईती का आलम ये है कि "मुख्यमंत्री के लिए केजरीवाल और प्रधानमंत्री के लिए मोदी" कह कर वोट मांगा था लेकिन ये भस्मासुर तो मोदी जी के ही पीछे पड़ गए खैर जैसे भस्मासुर खत्म हो गया ये भी खत्म हो जाएंगे इतिहास ही नहीं सत्य भी अपने आपको दोहराता है।
Saturday, 18 January 2014
कुक्कुर की पूंछ पर - बकलोल ताव मूंछ पर
बहुत ज्यादा सभ्य व्यक्ति को आज मंच पर चढ़ कर घोषणा करना पड़ा कि उसे भी कपड़े पहनने हैं पता नहीं पिछले दस साल उसने बिना कपड़ों के कैसे गुजार दिये? ...खैर वैसे उसे ये भी साबित करने की जरूरत पड़ी कि उसने कपड़े पहने हुए भी हैं। बेचारा बकलोल बबुआ अपने पितरों-पिता की याद से मुक्त ही नहीं हो पा रहा है ... अभी तो माँ के सट्टा का जहर पीने से भाग रहा था ... अब पिता जी की कंघी याद आ गई ... इसके पहले क्या - क्या याद आई सभी को पता है। मैंने खाँटी भाई कोंग्रेसी से पूछा तो कहने लगे "...उन्होने तो आज पार्टी मे जान डाल दी ..." मैंने खाँटी भाई से पूछा "... इसके लिए इतना देरी करने की क्या जरूरत थी ...?" खाँटी भाई ने आश्चर्य से मुझसे पूछा "...देरी से आपका क्या मतलब ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... मुर्दा तो लगभग सड़ चुका है जान कहाँ से पड़ेगी ...?" खाँटी भाई ने थोड़ा अचकचाते हुए उत्तर दिया "...देखिये कुछ तो सुधार हुआ ही है ..." मैंने कटाक्ष करते हुए पूछा "...हाथी की पूंछ और सूंढ मे काफी अंतर होता है ..." खाँटी भाई बोले "...सुधार तो दिख ही रहा है ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा "...हाँ अपने गुरु से तो आगे निकल ही रहे हैं ..." खाँटी भाई मुसकुराते हुए बोले "... जिसने अपने गुरु को धोखा दे दिया उसको भी तो उसका चेला धोखा देगा ही ..." मैंने फिर पूछा "... लेकिन इसके लिए बिन्नी ..." खाँटी भाई बीच मे ही बात काटते हुए बोले "...ये तो दस्तूर है जैसे को तैसा ..." मैंने थोड़ा आश्चर्य जताते हुए पूछा "... क्या ये बहुत जरूरी था ..." खाँटी भाई उत्तर देते हुए बोले "...मोदी तो खैर मोदी हैं लेकिन आपाई केजरीवाल भी आगे निकल जाए ये हम बर्दाश्त नहीं कर सकते ..." मैंने कहा "...हाँ मैंने देखा इस समय केजरीवाल की लोकप्रियता 5% है आपके उपाध्यक्ष की 6% ...जबकि नरेंद्र भाई मोदी 89% पर हैं ..." खाँटी भाई सीना चौड़ा करते हुए बोले "... ये अभी 2 दिन का कमाल है ... आगे - आगे देखिये होता है क्या ..." मैंने भी सहमति जताते हुए कहा "...हाँ वो देखने वाली बात होगी ..." खाँटी भाई बोले "...एक बात तय है मिट गए हमे मिटाने वाले ..." मैंने इस पर कहा "...तो इसी बात का खामियाजा केजरीवाल भुगत रहे हैं ...?" खाँटी भाई बोले "... ये ऐतिहासिक तथ्य भी है ..." मैंने तल्ख पुष्टिपरक अंदाज मे खाँटी भाई से पूछा "... महात्मा गांधी ने भी काँग्रेस को नष्ट करने की जबरदस्त वकालत की थी ...!" खाँटी भाई का चेहरा इस पर देखने लायक था वो बगलें झाँकने लगे तो मैंने फिर पूछा "... यदि आपका ये ऐतिहासिक तथ्य सही है तो फिर महात्मा गांधी की तस्वीर क्यों लगी थी मंच पर ...?" असामान्य हो चुके खाँटी भाई से रहा नहीं गया वो बोले "...महात्मा गांधी हमारे आदर्श हैं ..." मैंने फिर उनसे पूछा "... फिर मोदी को अपना आदर्श मानने मे आपको क्या दिक्कत है ..." इस पर खाँटी भाई भड़क गए बोले "...गांधी जी और मोदी की तुलना कैसे हो सकती है ...?" मैंने शांत भाव से उत्तर देते हुए कहा "... भाई दोनों काँग्रेस को नष्ट करने की जबरदस्त वकालत करते है इसलिए ..." खाँटी भाई कोंग्रेसी उत्तर देने के बजाय दिग्विजय सिंह को फोन लगाने लगे ... मैंने भी उनको नमस्कार करके विदा लिया ....
बहुत ज्यादा सभ्य व्यक्ति को आज मंच पर चढ़ कर घोषणा करना पड़ा कि उसे भी कपड़े पहनने हैं पता नहीं पिछले दस साल उसने बिना कपड़ों के कैसे गुजार दिये? ...खैर वैसे उसे ये भी साबित करने की जरूरत पड़ी कि उसने कपड़े पहने हुए भी हैं। बेचारा बकलोल बबुआ अपने पितरों-पिता की याद से मुक्त ही नहीं हो पा रहा है ... अभी तो माँ के सट्टा का जहर पीने से भाग रहा था ... अब पिता जी की कंघी याद आ गई ... इसके पहले क्या - क्या याद आई सभी को पता है। मैंने खाँटी भाई कोंग्रेसी से पूछा तो कहने लगे "...उन्होने तो आज पार्टी मे जान डाल दी ..." मैंने खाँटी भाई से पूछा "... इसके लिए इतना देरी करने की क्या जरूरत थी ...?" खाँटी भाई ने आश्चर्य से मुझसे पूछा "...देरी से आपका क्या मतलब ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... मुर्दा तो लगभग सड़ चुका है जान कहाँ से पड़ेगी ...?" खाँटी भाई ने थोड़ा अचकचाते हुए उत्तर दिया "...देखिये कुछ तो सुधार हुआ ही है ..." मैंने कटाक्ष करते हुए पूछा "...हाथी की पूंछ और सूंढ मे काफी अंतर होता है ..." खाँटी भाई बोले "...सुधार तो दिख ही रहा है ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा "...हाँ अपने गुरु से तो आगे निकल ही रहे हैं ..." खाँटी भाई मुसकुराते हुए बोले "... जिसने अपने गुरु को धोखा दे दिया उसको भी तो उसका चेला धोखा देगा ही ..." मैंने फिर पूछा "... लेकिन इसके लिए बिन्नी ..." खाँटी भाई बीच मे ही बात काटते हुए बोले "...ये तो दस्तूर है जैसे को तैसा ..." मैंने थोड़ा आश्चर्य जताते हुए पूछा "... क्या ये बहुत जरूरी था ..." खाँटी भाई उत्तर देते हुए बोले "...मोदी तो खैर मोदी हैं लेकिन आपाई केजरीवाल भी आगे निकल जाए ये हम बर्दाश्त नहीं कर सकते ..." मैंने कहा "...हाँ मैंने देखा इस समय केजरीवाल की लोकप्रियता 5% है आपके उपाध्यक्ष की 6% ...जबकि नरेंद्र भाई मोदी 89% पर हैं ..." खाँटी भाई सीना चौड़ा करते हुए बोले "... ये अभी 2 दिन का कमाल है ... आगे - आगे देखिये होता है क्या ..." मैंने भी सहमति जताते हुए कहा "...हाँ वो देखने वाली बात होगी ..." खाँटी भाई बोले "...एक बात तय है मिट गए हमे मिटाने वाले ..." मैंने इस पर कहा "...तो इसी बात का खामियाजा केजरीवाल भुगत रहे हैं ...?" खाँटी भाई बोले "... ये ऐतिहासिक तथ्य भी है ..." मैंने तल्ख पुष्टिपरक अंदाज मे खाँटी भाई से पूछा "... महात्मा गांधी ने भी काँग्रेस को नष्ट करने की जबरदस्त वकालत की थी ...!" खाँटी भाई का चेहरा इस पर देखने लायक था वो बगलें झाँकने लगे तो मैंने फिर पूछा "... यदि आपका ये ऐतिहासिक तथ्य सही है तो फिर महात्मा गांधी की तस्वीर क्यों लगी थी मंच पर ...?" असामान्य हो चुके खाँटी भाई से रहा नहीं गया वो बोले "...महात्मा गांधी हमारे आदर्श हैं ..." मैंने फिर उनसे पूछा "... फिर मोदी को अपना आदर्श मानने मे आपको क्या दिक्कत है ..." इस पर खाँटी भाई भड़क गए बोले "...गांधी जी और मोदी की तुलना कैसे हो सकती है ...?" मैंने शांत भाव से उत्तर देते हुए कहा "... भाई दोनों काँग्रेस को नष्ट करने की जबरदस्त वकालत करते है इसलिए ..." खाँटी भाई कोंग्रेसी उत्तर देने के बजाय दिग्विजय सिंह को फोन लगाने लगे ... मैंने भी उनको नमस्कार करके विदा लिया ....
Thursday, 16 January 2014
आपा गाए कजरी - भैंस करे पगुरी ...
Sunday, 5 January 2014
काँग्रेस के आउटसोर्स सेनापति केजरीवाल !!
काँग्रेस कुमार केजरीवाल से ज्यादा ईमानदार लालू प्रसाद यादव जिस भैंस की सींग पकड़ का उसकी पीठ पर बैठ कर सवारी करते थे ठीक उसी भैंस ने उनको उसी जगह पहुंचा दिया जहां से बाहर निकलने के बाद भगवान की बड़ी याद आती है। लालू यादव तो खैर आमने - सामने की लड़ाई लड़ने के लिए मशहूर रहे हैं लेकिन काँग्रेस कुमार केजरीवाल भागते तेजी से भागते घोड़े को उसका पूंछ पकड़ उसे रोकने का खवाब देख रहे हैं। बड़ा हिम्मत का काम है ऐसा ख्वाब देखना ही। "आपा" का कंठलंगोट बांधे एक खाँटी भाई कोंग्रेसी कह रहे थे "...केजरीवाल ऐसा कर सकते हैं ..." मैंने उनसे पूछा "... वो कैसे ...?" खाँटी भाई बोले "...उनको अमेरिका की शक्ति मिली हुई है ..." मैंने बीच मे ही बात काटते हुए पूछा "...जिनको अमेरिका की शक्ति मिलती है क्या उनको भागते घोड़े की दुलत्ती नहीं पड़ती क्या ...?" खाँटी भाई ने उत्तर देते कहा "... इसके लिए उन्हे पूरी - पूरी कीमत दी गई है ..." मैंने उनसे पूछा "...भागते घोड़े की पूंछ भी पकड़ने के लिए पूरी - पूरी दौड़ लगानी पड़ती है ..." खाँटी भाई बोले "...हैं तो वो मैदान मे ..." मैंने उनसे कहा "...वैसे दिल्ली के मैदान से वो भाग रहे थे तो आपको बड़ी मेहनत से जबरदस्ती उनको हांक कर कर मैदान मे लाना पड़ा ..." खाँटी भाई बोले "... आते कहे नहीं...!" मैंने उनसे पूछा "... क्या मतलब ..." खाँटी भाई बोले "...मतलब साफ है इसी दिल्ली की जनता से उनका वादा है ..." मैंने पलट कर उनसे पूछा "..लेकिन दावा आप कैसे कर सकते हैं ..." खाँटी भाई थोड़ा सकपकाए फिर उन्होने पलटकर मुझसे ही पूछा "...क्यों दावा हम क्यों नहीं कर सकते ...?" मैंने कहा "...इसके लिए आपके शाहजादे ..." खाँटी भाई ने बीच मे बात काटते हुए कहा "... देखिये उन्होने ने भी बहुत त्याग किया है ..." मैंने प्रतिऊत्तर स्वरूप कहा "...केजरीवाल साहब ने भी त्याग कर दिया अपने डुलेक्स महल का ..." खाँटी भाई बोले "... ये सब तो उनको करना ही था ..." मैंने उनसे पूछा "... तो क्या कलमाड़ी, मनमोहन सिंह, शीला जी आदि सभी अपने घोटाले का पैसा वापस करके माफी की उम्मीद करने वाले हैं जैसी उम्मीद केजरीवाल महल वापस करके कर रहे हैं ...?" खाँटी भाई बोले "... हम लोग भी किसी से कम नहीं हैं ..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब है आपके कहने का ..." खाँटी भाई मतलब समझते हुए कहा "... युद्ध मे राजा पहले कभी भी आगे नहीं रहता और हर राजा की अपनी फौज रहती है और..." मैंने फिर आश्चर्य से पूछा "...और मतलब ...?" खाँटी भाई बोले "... और मतलब सेना के सेनापति कभी - कभी उधार भी लिए जाते हैं ..." मैंने संतुष्टि जताते हुए कहा "... मतलब केजरीवाल आपके आउटसोर्स सेनापति हैं ..." खाँटी भाई बोले "...दुलत्ती खाने की पूरी कीमत उनको दे दी गई है ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...अमेरिका से करोड़ों की कीमत, पाकिस्तान से फंडिंग, काँग्रेस से अरबों की वसूली ...कहीं दुलत्ती की कीमत बहुत ज्यादा तो नहीं है ...?" खाँटी भाई कुछ बोले नहीं तो मैंने उनसे फिर पूछा "...लेकिन दुलत्ती पड़ने के डर से केजरीवाल तो मैदान छोड़ कर भाग रहे हैं ..." खाँटी भाई गुस्से मे बोले "...अगर भागेंगे तो फिर काँग्रेस की लत्ती पड़ेगी ...आखिर उनको पैसा किस बात का दिया गया है " ये कहते ही गुस्से मे कहीं चले गए मुझे उनको नमस्कार करने का भी मौका नहीं मिला .....खैर
काँग्रेस कुमार केजरीवाल से ज्यादा ईमानदार लालू प्रसाद यादव जिस भैंस की सींग पकड़ का उसकी पीठ पर बैठ कर सवारी करते थे ठीक उसी भैंस ने उनको उसी जगह पहुंचा दिया जहां से बाहर निकलने के बाद भगवान की बड़ी याद आती है। लालू यादव तो खैर आमने - सामने की लड़ाई लड़ने के लिए मशहूर रहे हैं लेकिन काँग्रेस कुमार केजरीवाल भागते तेजी से भागते घोड़े को उसका पूंछ पकड़ उसे रोकने का खवाब देख रहे हैं। बड़ा हिम्मत का काम है ऐसा ख्वाब देखना ही। "आपा" का कंठलंगोट बांधे एक खाँटी भाई कोंग्रेसी कह रहे थे "...केजरीवाल ऐसा कर सकते हैं ..." मैंने उनसे पूछा "... वो कैसे ...?" खाँटी भाई बोले "...उनको अमेरिका की शक्ति मिली हुई है ..." मैंने बीच मे ही बात काटते हुए पूछा "...जिनको अमेरिका की शक्ति मिलती है क्या उनको भागते घोड़े की दुलत्ती नहीं पड़ती क्या ...?" खाँटी भाई ने उत्तर देते कहा "... इसके लिए उन्हे पूरी - पूरी कीमत दी गई है ..." मैंने उनसे पूछा "...भागते घोड़े की पूंछ भी पकड़ने के लिए पूरी - पूरी दौड़ लगानी पड़ती है ..." खाँटी भाई बोले "...हैं तो वो मैदान मे ..." मैंने उनसे कहा "...वैसे दिल्ली के मैदान से वो भाग रहे थे तो आपको बड़ी मेहनत से जबरदस्ती उनको हांक कर कर मैदान मे लाना पड़ा ..." खाँटी भाई बोले "... आते कहे नहीं...!" मैंने उनसे पूछा "... क्या मतलब ..." खाँटी भाई बोले "...मतलब साफ है इसी दिल्ली की जनता से उनका वादा है ..." मैंने पलट कर उनसे पूछा "..लेकिन दावा आप कैसे कर सकते हैं ..." खाँटी भाई थोड़ा सकपकाए फिर उन्होने पलटकर मुझसे ही पूछा "...क्यों दावा हम क्यों नहीं कर सकते ...?" मैंने कहा "...इसके लिए आपके शाहजादे ..." खाँटी भाई ने बीच मे बात काटते हुए कहा "... देखिये उन्होने ने भी बहुत त्याग किया है ..." मैंने प्रतिऊत्तर स्वरूप कहा "...केजरीवाल साहब ने भी त्याग कर दिया अपने डुलेक्स महल का ..." खाँटी भाई बोले "... ये सब तो उनको करना ही था ..." मैंने उनसे पूछा "... तो क्या कलमाड़ी, मनमोहन सिंह, शीला जी आदि सभी अपने घोटाले का पैसा वापस करके माफी की उम्मीद करने वाले हैं जैसी उम्मीद केजरीवाल महल वापस करके कर रहे हैं ...?" खाँटी भाई बोले "... हम लोग भी किसी से कम नहीं हैं ..." मैंने आश्चर्य से पूछा "...क्या मतलब है आपके कहने का ..." खाँटी भाई मतलब समझते हुए कहा "... युद्ध मे राजा पहले कभी भी आगे नहीं रहता और हर राजा की अपनी फौज रहती है और..." मैंने फिर आश्चर्य से पूछा "...और मतलब ...?" खाँटी भाई बोले "... और मतलब सेना के सेनापति कभी - कभी उधार भी लिए जाते हैं ..." मैंने संतुष्टि जताते हुए कहा "... मतलब केजरीवाल आपके आउटसोर्स सेनापति हैं ..." खाँटी भाई बोले "...दुलत्ती खाने की पूरी कीमत उनको दे दी गई है ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...अमेरिका से करोड़ों की कीमत, पाकिस्तान से फंडिंग, काँग्रेस से अरबों की वसूली ...कहीं दुलत्ती की कीमत बहुत ज्यादा तो नहीं है ...?" खाँटी भाई कुछ बोले नहीं तो मैंने उनसे फिर पूछा "...लेकिन दुलत्ती पड़ने के डर से केजरीवाल तो मैदान छोड़ कर भाग रहे हैं ..." खाँटी भाई गुस्से मे बोले "...अगर भागेंगे तो फिर काँग्रेस की लत्ती पड़ेगी ...आखिर उनको पैसा किस बात का दिया गया है " ये कहते ही गुस्से मे कहीं चले गए मुझे उनको नमस्कार करने का भी मौका नहीं मिला .....खैर
Thursday, 2 January 2014
आंदोलनो को शुद्धता बहुत जरूरी
देश का इतिहास रहा है कि प्रत्यक्ष, कोलाहली और एकल विषय केन्द्रित सामाजिक आंदोलनो से उत्पन्न हुई राजनीतिक पार्टियां न सिर्फ आला नौटंकीबाज रही हैं बल्कि परमभ्रष्ट भी रही हैं। जैसे स्वतन्त्रता आंदोलन से उत्पन्न हुई "काँग्रेस", दक्षिण मे द्रविण आंदोलन से उत्पन्न हुई "डीएमके और एआईडीएमके" और अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार के एकल विषय केन्द्रित आंदोलन से उत्पन्न हुई "आम आदमी पार्टी"। जनता को लुभाने के लिए ऐसी - ऐसी नौटंकी इन पार्टियों ने किए कि वास्तव मे ऐसा लगाने ही लगा कि सचमुच बदलाव आ ही गया लेकिन ये नौटंकी का दिखावा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि इन्हें अपने अपने असली रूप को किसी भी स्तर पर जा के छिपाना होता है। यही सब देखने के कारण महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी मिलने के बाद काँग्रेस को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। जावहर लाल नेहरू की नौटंकी जग जाहिर है कुछ कुछ हरकतें तो ऐसी हैं उनका जिक्र भी करना सामाजिक शिष्टाचार के खिलाफ लगता है। 70 के दाशक मे जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति से उत्पन्न हुए लालू प्रसाद, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव आदि। जिस प्रकार महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कॉंग्रेस को खत्म करने की जबरदस्त वकालत की थी कहीं उससे भी कड़ा विरोध अन्ना हज़ारे ने केजरीवाल का किया था। अन्ना हज़ारे राजनीतिक पार्टी बनाने के सख्त विरोधी थे क्योंकि वो सच्चाई जानते थे।
याद कीजिये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जब पहली बार शपथ ग्रहण करने गए थे तो काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ही तीनपहिया देसी मेट्रो मे बैठ कर गए थे। फिर भी लालू प्रसाद जी केजरीवाल से कहीं ईमानदार साबित हुए उन्होने न तो किसी को धोखा दिया, न चंदा हड़पा और न ही किसी की झूठी कसमे खाईं रही बात चारा घोटाला की तो लालू प्रसाद जी का भी आंतरिक लोकपाल वही बात बोल रहा है जो काँग्रेस कुमार केजरीवाल का आन्तरिक लोकपाल उनके अपने विधायकों धर्मेन्द्र कोली, राजेश गर्ग, देशराज राघव और स्टिंग सीडी के मामले मे बोल रहा है लिहाजा काँग्रेस कुमार केजरीवाल उनते ही ईमानदार हैं जितने मायावती, मुलायम सिंह यादव, डीएम के, आईडीएमके, कलमाड़ी सहित पूरी की पूरी कॉंग्रेस। वैसे कल जब श्री केजरीवाल से शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूछा गया तो उनका सीधा-सीधा उत्तर था कि डॉ हर्षवर्धन शीला दीक्षित के खिलाफ सुबूत लाकर दिखाएँ और अगर वो सही हुए तो कार्यवाही करेंगे। आज काँग्रेस कुमार केजरीवाल की दृष्टि मे शीला जी बिलकुल ईमानदार हो गईं उनके खिलाफ श्री केजरीवाल को कोई भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं है। कमाल फ़रूकी साहब को सपा ने दूध से मरी मक्खी की तरह निकाल का फेंक दिया तो "आपा" मे उनका शुद्धिकरण हुआ और ईमानदारी से जिंदा हो गये। वैसे भी केजरीवाल और "आपा" चंदे के मामले मे वैसी ही है जैसे कोयला घोटाले मे काँग्रेस।
आज की तारीख मे वो सभी लोग "आपा" जुड़ रहे हैं जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी है, कहीं फिट नहीं हो पा रहे हैं, अपने बेहूदे हरकतों के कारण पार्टियों से निकाले गए हैं और गली - मुहल्ले के वो नकारा लोग जो किसी काम के नहीं हैं। सुनने मे तो ये भी आ रहा है जहां काँग्रेस का वज़ूद लगभग खत्म हो गया है वहाँ पूरा का पूरा कोंग्रेसी कैडर "आपा" मे स्थानांतरित (ट्रांसफर) हो रहा है जैसे गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान आदि राज्यों मे।
देश का इतिहास रहा है कि प्रत्यक्ष, कोलाहली और एकल विषय केन्द्रित सामाजिक आंदोलनो से उत्पन्न हुई राजनीतिक पार्टियां न सिर्फ आला नौटंकीबाज रही हैं बल्कि परमभ्रष्ट भी रही हैं। जैसे स्वतन्त्रता आंदोलन से उत्पन्न हुई "काँग्रेस", दक्षिण मे द्रविण आंदोलन से उत्पन्न हुई "डीएमके और एआईडीएमके" और अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार के एकल विषय केन्द्रित आंदोलन से उत्पन्न हुई "आम आदमी पार्टी"। जनता को लुभाने के लिए ऐसी - ऐसी नौटंकी इन पार्टियों ने किए कि वास्तव मे ऐसा लगाने ही लगा कि सचमुच बदलाव आ ही गया लेकिन ये नौटंकी का दिखावा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि इन्हें अपने अपने असली रूप को किसी भी स्तर पर जा के छिपाना होता है। यही सब देखने के कारण महात्मा गांधी ने कहा था कि आजादी मिलने के बाद काँग्रेस को नष्ट कर दिया जाना चाहिए। जावहर लाल नेहरू की नौटंकी जग जाहिर है कुछ कुछ हरकतें तो ऐसी हैं उनका जिक्र भी करना सामाजिक शिष्टाचार के खिलाफ लगता है। 70 के दाशक मे जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति से उत्पन्न हुए लालू प्रसाद, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह यादव आदि। जिस प्रकार महात्मा गांधी ने आजादी के बाद कॉंग्रेस को खत्म करने की जबरदस्त वकालत की थी कहीं उससे भी कड़ा विरोध अन्ना हज़ारे ने केजरीवाल का किया था। अन्ना हज़ारे राजनीतिक पार्टी बनाने के सख्त विरोधी थे क्योंकि वो सच्चाई जानते थे।
याद कीजिये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जब पहली बार शपथ ग्रहण करने गए थे तो काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ही तीनपहिया देसी मेट्रो मे बैठ कर गए थे। फिर भी लालू प्रसाद जी केजरीवाल से कहीं ईमानदार साबित हुए उन्होने न तो किसी को धोखा दिया, न चंदा हड़पा और न ही किसी की झूठी कसमे खाईं रही बात चारा घोटाला की तो लालू प्रसाद जी का भी आंतरिक लोकपाल वही बात बोल रहा है जो काँग्रेस कुमार केजरीवाल का आन्तरिक लोकपाल उनके अपने विधायकों धर्मेन्द्र कोली, राजेश गर्ग, देशराज राघव और स्टिंग सीडी के मामले मे बोल रहा है लिहाजा काँग्रेस कुमार केजरीवाल उनते ही ईमानदार हैं जितने मायावती, मुलायम सिंह यादव, डीएम के, आईडीएमके, कलमाड़ी सहित पूरी की पूरी कॉंग्रेस। वैसे कल जब श्री केजरीवाल से शीला दीक्षित के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पूछा गया तो उनका सीधा-सीधा उत्तर था कि डॉ हर्षवर्धन शीला दीक्षित के खिलाफ सुबूत लाकर दिखाएँ और अगर वो सही हुए तो कार्यवाही करेंगे। आज काँग्रेस कुमार केजरीवाल की दृष्टि मे शीला जी बिलकुल ईमानदार हो गईं उनके खिलाफ श्री केजरीवाल को कोई भ्रष्टाचार का कोई प्रमाण नहीं है। कमाल फ़रूकी साहब को सपा ने दूध से मरी मक्खी की तरह निकाल का फेंक दिया तो "आपा" मे उनका शुद्धिकरण हुआ और ईमानदारी से जिंदा हो गये। वैसे भी केजरीवाल और "आपा" चंदे के मामले मे वैसी ही है जैसे कोयला घोटाले मे काँग्रेस।
आज की तारीख मे वो सभी लोग "आपा" जुड़ रहे हैं जिन्हें अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी है, कहीं फिट नहीं हो पा रहे हैं, अपने बेहूदे हरकतों के कारण पार्टियों से निकाले गए हैं और गली - मुहल्ले के वो नकारा लोग जो किसी काम के नहीं हैं। सुनने मे तो ये भी आ रहा है जहां काँग्रेस का वज़ूद लगभग खत्म हो गया है वहाँ पूरा का पूरा कोंग्रेसी कैडर "आपा" मे स्थानांतरित (ट्रांसफर) हो रहा है जैसे गुजरात, तमिलनाडु, राजस्थान आदि राज्यों मे।
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