Tuesday, 3 December 2013

कांव - कांव कजरी - भाव मारे अन्हरी

योगेंद्र यादव जी को कौआ और हंस मे अंतर ही नहीं पता। कौए को हंस की चाल चलाना चाहते हैं पता नहीं उनको क्या लगता है उनके दिमाग मे यदि कुछ चलता है तो इसका सीधा मतलब ये है समझ लीजिये कि कौआ खतरे मे है। उसे कांव - कांव करके खतरे से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश करनी पड़ती है। केजरीवाल की नरेन्द्र भाई मोदी से तुलना करना ठीक वैसा ही है। उनके इस बेहूदे और मूर्खतापूर्ण सर्वेक्षण से ये साफ लग जाता है कि सौ चूहे खा कर बिल्ली हज पर जाने को तैयार है लेकिन उसके के लिए सबसिडी नहीं मिल रही है। केजरीवाल एंड कम्पनी जिस तरह से तरह - तरह के खाल बादल रही है पहले लोमड़ी की खाल मे थी फिर कौए की खाल मे कांव-कांव करने लगी अब बिल्ली की खाल मे चूहे के शिकार मे है ताकि हज कर सके। उनकी कंपनी के इस खाल परिवर्तन से कितना असर दिल्ली की जनता पर होगा ये वो भी अच्छी तरह जानते हैं वैसे भी लोमड़ी, कौआ, बिल्ली इतने मूर्ख नहीं होते जितने वो दिखते है भले ही कितने ही मंदबुद्दि के क्यों न हों। उनके पास अपने शिकार का पूरा आंकड़ा होता है विश्वास कीजिये अन्ना जैसे शेर का भी जिसके दहाड़ने से सिंहासन हिलने लगते हैं।

अभी तो पूरे - पूरे शिकार का इंतजाम करना है हर महीने कम से कम 120 करोड़ तो चाहिए ही पार्टी के वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए यदि उनकी कंपनी दिल्ली मे ही स्थिर रहती है तो लेकिन खुदा न खास्ता यदि "आप" का विस्तार करना पड़ा तो कितनी बड़ी मुसीबत होगी इसका अंदाजा है किसी को ? क्या देश के युवकों और नौजवानो के सामने यही छिछोरई और उघटापैची करने का काम बचा है ? इससे देश की अर्थव्यवस्था का कैसे भला होगा ? सवाल ये है कि सारा रिजर्व बैंक केवल इसी काम मे जुटेगा कि जो भी हो "आम आदमी पार्टी" को जिंदा रखो ?

दिल्ली की दिलदारी का जिस प्रकार से इस केजरीवाल एंड कंपनी ने कबाड़ा किया है उससे आगे बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है यदि "आप" को समाप्त नहीं किया गया तो। अभी तो दिल्ली को काँग्रेस ने बलात्कार की राजधानी बनाया यदि "आप" खत्म नहीं हुई तो यकीन मानिए अन्ना का चंदा जब हड़प लिया गया तो "आम आदमी" का जेब और बैंक - बैलेंस हड़पने मे कितना समय लगेगा और वो भी सर्फ और सिर्फ बारह तेरह लोगों के लिए जिनके कैडर भी भाड़े के टट्टू ही हैं ? आखिर महत्वाकांक्षी तो जनता को होना चाहिए !          

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