योगेंद्र यादव का यौगिक युग्म "आप" का आपा गुम ?
दो दिन पहले "आम आदमी पार्टी" के योगेंद्र यादव ने कोंग्रेसी संसद के गुमनाम कम्पनी के सहयोग से अपने पक्ष मे जिसमे उन्होने "आप" को 35 से 50 सीटें जीतने की संभावना जताई। अजीब सा चुनाव सर्वेक्षण जारी करके अपने ही पैरों पर जबर्दस्त कुल्हाड़ी मारी है। योगेंद्र यादव ने सन 1983 का हवाला देते हुए एन॰ टी॰ रामाराव के तेलुगुदेशम पार्टी का उद्धहरण देते हुए खुद के सर्वेक्षण का अजीब सा और घटिया बचाव करने की कोशिश की। उनका तर्क या कुतर्क ये था कि नई पार्टी के लहर को समान्य तौर पर पहचाना नहीं जा सकता लेकिन यादव जी ये नहीं बता पाए कि उनके और कोंग्रेसी संसद के पास ऐसी कौन सी मशीन है केवल वे ही इस लहर को देख पाए बाकी नहीं। वैसे भी वो पिछले दो बार से गुजरात मे नरेन्द्र भाई मोदी को बुरी तरह हाराते रहे हैं। पीछे कई बार उनके सर्वेक्षण बुरी तरह उल्टे साबित हुए हैं।
इसकी उम्मीद एक सामान्य समझ रखने वाले व्यक्ति से भी नहीं की जाती। पता नहीं कैसे "आप" ने ऐसा कैसे कर लिया? "आप" का ये स्टैंड न सिर्फ लोगों को बहुत अजीब सा लग रहा है बल्कि ऐसा लगता है कि को कोई जघन्य अपराधी किसी भी तरह ये मनवाने पर उतारू है कि उससे बड़ा कोई महात्मा या धर्मात्मा है ही नहीं।
उन्नत (एडवांस) मनोविज्ञान की दृष्टि से खुद को बचाने का निहायत ही घटिया, बेहूदा और मूर्खतापूर्ण हरकत है। ऐसा कैसे है इसकी चर्चा मे आगे करूंगा।
दो दिन पहले "आम आदमी पार्टी" के योगेंद्र यादव ने कोंग्रेसी संसद के गुमनाम कम्पनी के सहयोग से अपने पक्ष मे जिसमे उन्होने "आप" को 35 से 50 सीटें जीतने की संभावना जताई। अजीब सा चुनाव सर्वेक्षण जारी करके अपने ही पैरों पर जबर्दस्त कुल्हाड़ी मारी है। योगेंद्र यादव ने सन 1983 का हवाला देते हुए एन॰ टी॰ रामाराव के तेलुगुदेशम पार्टी का उद्धहरण देते हुए खुद के सर्वेक्षण का अजीब सा और घटिया बचाव करने की कोशिश की। उनका तर्क या कुतर्क ये था कि नई पार्टी के लहर को समान्य तौर पर पहचाना नहीं जा सकता लेकिन यादव जी ये नहीं बता पाए कि उनके और कोंग्रेसी संसद के पास ऐसी कौन सी मशीन है केवल वे ही इस लहर को देख पाए बाकी नहीं। वैसे भी वो पिछले दो बार से गुजरात मे नरेन्द्र भाई मोदी को बुरी तरह हाराते रहे हैं। पीछे कई बार उनके सर्वेक्षण बुरी तरह उल्टे साबित हुए हैं।
इसकी उम्मीद एक सामान्य समझ रखने वाले व्यक्ति से भी नहीं की जाती। पता नहीं कैसे "आप" ने ऐसा कैसे कर लिया? "आप" का ये स्टैंड न सिर्फ लोगों को बहुत अजीब सा लग रहा है बल्कि ऐसा लगता है कि को कोई जघन्य अपराधी किसी भी तरह ये मनवाने पर उतारू है कि उससे बड़ा कोई महात्मा या धर्मात्मा है ही नहीं।
उन्नत (एडवांस) मनोविज्ञान की दृष्टि से खुद को बचाने का निहायत ही घटिया, बेहूदा और मूर्खतापूर्ण हरकत है। ऐसा कैसे है इसकी चर्चा मे आगे करूंगा।
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