Monday, 30 December 2013

बानर चान्स और बनाना जर्नलिज़्म 

म्लेच्छ बोली (अंगरेजी) मे एक लोकोक्ति है Once is chance, Twice is coincident, Third time is Pattern मीडिया वाले जिस तरह काँग्रेस कुमार केजरीवाल के "चांस" पर  डोमकच "डांस" करते फिर रहे हैं उससे तो यही लगता है केजरीवाल को समाप्त करने के लिए मोदी जी समर्थकों को ज्यादा मेहनत शायद ही करनी पड़े। बड़े - बड़े "नाई - खलनाई" फिल्म के ट्रेलर चलाए जा रहे न्यूज़ चैनलों पर ... मैंने एक "सुपारी पत्रकार" से इस बारे मे पूछा तो कहने लगे "...हम नायक को दिखा रहे हैं ..." मैंने पलट कर पूछा " ... वो नायक है या नाई ...?" पत्रकार खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी दर्शाते हुए कहा "...आपको शायद नायक का अर्थ नहीं पता ..." मैंने कहा "... जिसे खलनाई को आप नाई के रूप मे दिखाना चाहते हैं वो दरअसल नाई भी नहीं है ..." ज्ञानी पत्रकार भड़क कर पूछे " ... आपके कहने का मतलब क्या है ..." मैंने आराम से उत्तर देते हुए कहा "...मेरे कहने का मतलब है जैसे आप अपने चैनल मे हैं वैसे काँग्रेस कुमार केजरीवाल राजनीति मे हैं ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार को फिर भी समझ मे नहीं आया पूछा "... मैं अभी भी समझा नहीं ..." मैंने उन्हें समझाते हुए कहा "...जैसे  आप किसी काम के नहीं हुए तो पत्रकार बन गए ... ठीक वैसे भी नहीं उससे भी गए गुजरे ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार को गुस्सा आने लगा था बोले "...आप सपष्ट कीजिये ..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "...मैंने शुरू मे कहा जिसे आप खलनाई को नाई के रूप मे दिखा रहे हैं वो नाई भी नहीं है ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार गुस्से मे बोले "... आगे बोलिए ...क्या है वो ...?" मैंने उत्तर देते हुए कहा "...निरा बंदर है वो जिसके हाथ मे उस्तारा है ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार का गुस्सा कम नहीं हुआ था "....देखिये उसने राजनीति बादल दी ..." मैंने कहा "...उससे ज्यादा और बेहतर बदलाव गोरखपुर मे आशा देवी, जबलपुर मे शबनम मौसी, सागर मे शबनम बुआ और भोपाल मे भी ऐसे बदलाव हो चुके हैं ...इस बार दिल्ली की बारी थी ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार बोले "...ये उनसे बेहतर है ..." मैंने सहमति जताते हुए कहा "... हाँ वो तो है कम से कम बंदर के हाथ मे उस्तरा है..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार बोले "...आपको राजनीति के बारे मे बहुत कुछ नहीं पता... " मैंने कहा "...हो सकता है लेकिन इतना जरूर पता है कि एक ही सन्दर्भ मे दो बार शपथ ग्रहण नहीं होता ..." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार फिर कन्फ्युज हो गए और पूछा "...क्या मतलब ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... एक बार बच्चों की शपथ दूसरी बार रामलीला मैदान ईश्वर की कसम दोनों का सन्दर्भ एक ही है ..." मैंने आगे जोड़ते हुए कहा "...अच्छा बदलाव है राजनीति मे ...वैसे भी भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार हुआ है ...." ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार सफाई देते हुए बोले "...रजनीति मे ये सब चलता है ..." मैंने आश्चर्य से कहा "...लेकिन वो तो सिखाने आए थे ...सफाई करने आए थे ?" ज्ञानी छाप सुपारी पत्रकार कुछ बोल नहीं रहे थे ... मैंने कहा "...बंदर कभी भी खुद को साबित नहीं करता हमेशा चान्स पर हाथ मारता है ठीक आपके खलनाई काँग्रेस कुमार केजरीवाल की तरह ..." ये कह कर मैंने सुपारी पत्रकार को नमस्कार कहा....     

Friday, 27 December 2013

काँग्रेस कुमार केजरीवाल
कल यानी 28 दिसम्बर को काँग्रेस कुमार केजरीवाल रामलीला मैदान मे कसम खाने वाले हैं वैसे भी काँग्रेस कुमार केजरीवाल अभी कुछ दिन पहले ही बच्चों की "शपथ" लेते हुए कहा था कि सरकार बनाने के लिए वो न तो किसी का समर्थन लेंगे और न ही किसी को समर्थन देंगे। खैर एक "आपाई" मुझे बता रहे थे कि वो उनके अपने ही बच्चे थे तो मेरे भी सामने कॉंग्रेस कुमार केजरीवाल के "शपथ ग्रहण" पर विश्वास करने के अलावा कोई चारा नहीं था। "आपाई" बड़ा ही अपने गुमान मे थे बता रहे थे "...भारत के इतिहास मे ऐसा पहली बार हो रहा है..." मैंने कहा "... हाँ वो तो है कोई बच्चों की शपथ लेने के बाद कसम खाने रामलीला मैदान मे आने वाले हैं ..." आपाई थोड़ा गुस्से मे बोले "...देखिये आप हर बात मे नुक्ता चीनी न करें ..." मैंने उल्टे सवाल दागते हुए कहा "... भले ही आप भूँकता - भेली करते फिरें ...!!!" आपाई बोले "...आपको मालूम हमने राजनीति को बदल कर रख दिया..." मैंने पलट कर पूछा " ... फिलहाल तो शपथ मे ही अदला - बदली हो रही हैं लोग बाग समझ ही नहीं पा रहे हैं टूट क्या रहा है..." आपाई बोले "... पहली बार किसी ने सरकारी सुरक्षा और बंगला लेने से इंकार किया है ..." मैंने पलट कर पूछा "...तो इसके लिए इतना भूँकता-भेली करने क्या जरूरत है ..." आपाई बोले " ...क्यों नहीं आखिर हम लोग यहाँ लोगों को राजनीति सीखाने आए हैं ..." मैंने पलट कर पूछा " ... तो इसके लिए चीखने की क्या जरूरत है ...?" आपाई बोले "... डेमोक्रेसी है ..." मैंने कहा "... आप लोगो ने तो डेमोक्रेसी को बिलकुल डोमोक्रेसी बना के रख दिया है ..." आपाई अपना आपा खोने लगे और पूछा "...आपके कहने का मतलब क्या है ..." मैंने शांति से उत्तर देते हुए कहा "... मेरे कहने का मतलब वही है जो आपके समझ आ रहा है ... चारो ओर डेमोक्रेसी के नाम पर डोमकच मचा रखा है...." आपाई का गुस्सा बढ़ने लगा बोले "... आपको ऐसा कहने का कोई हक नहीं..." मैंने उसी गुस्से मे पूछा "... क्यों भाई ..." आपाई बोले "... आपके खिलाफ भी जांच करवा सकते हैं ..." मैंने पलट कर पूछा "...डी॰ कोली जी भी कसम खाने वाले थे क्या ..." आपाई बोले " ... मैं समझा नहीं ..." मैंने कहा "...जैसे बिन्नी का शपथ टूटा डी॰ कोली का भी शपथ टूटना चाहिए ..." आपाई ने आश्चर्य जताते हुए पूछा "... वो क्यों भला ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "... भाई डोमोक्रेसी मचा रही है आपने ... पूरी आपा डोमकच करने मे व्यस्त है ..." आपाई ने आपा खोते हुए मुझसे निवेदन किया "...आप साफ - साफ कहिए ..." मैंने स्पष्ट करते हुए कहा "... भाई साधारण सी बात है काँग्रेस के इशारे पर वही लोग बढ़िया डोमकच करते हैं जो शपथ - कसम को तोड़-मरोड़ कर वादाखिलाफी करने मे माहिर होते हैं ..." आपाई का दिमाग फिर भी आपे मे नहीं था बोले "... मैं अभी भी समझा नहीं ..." मैंने उत्तर देते हुए कहा "...डी॰ कोली ही कायदे का आम आदमी है ... कसम तो उसे लेना चाहिए है रामलीला मैदान मे ...!!!" आपाई को फिर भी शायद कुछ समझ मे नहीं आ रहा था ...वो धीरे-धीरे खिसकने लगे थे ....        

Wednesday, 11 December 2013

पता नहीं केजरीवाल को मीडिया वाले केजरीवाल को किस आधार पर इतना ज्यादा प्रोजेक्ट कर रहे हैं जबकि वास्तविकता सबके सामने है केजरीवाल भाजपा से पीछे हैं  

Tuesday, 3 December 2013

कांव - कांव कजरी - भाव मारे अन्हरी

योगेंद्र यादव जी को कौआ और हंस मे अंतर ही नहीं पता। कौए को हंस की चाल चलाना चाहते हैं पता नहीं उनको क्या लगता है उनके दिमाग मे यदि कुछ चलता है तो इसका सीधा मतलब ये है समझ लीजिये कि कौआ खतरे मे है। उसे कांव - कांव करके खतरे से लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश करनी पड़ती है। केजरीवाल की नरेन्द्र भाई मोदी से तुलना करना ठीक वैसा ही है। उनके इस बेहूदे और मूर्खतापूर्ण सर्वेक्षण से ये साफ लग जाता है कि सौ चूहे खा कर बिल्ली हज पर जाने को तैयार है लेकिन उसके के लिए सबसिडी नहीं मिल रही है। केजरीवाल एंड कम्पनी जिस तरह से तरह - तरह के खाल बादल रही है पहले लोमड़ी की खाल मे थी फिर कौए की खाल मे कांव-कांव करने लगी अब बिल्ली की खाल मे चूहे के शिकार मे है ताकि हज कर सके। उनकी कंपनी के इस खाल परिवर्तन से कितना असर दिल्ली की जनता पर होगा ये वो भी अच्छी तरह जानते हैं वैसे भी लोमड़ी, कौआ, बिल्ली इतने मूर्ख नहीं होते जितने वो दिखते है भले ही कितने ही मंदबुद्दि के क्यों न हों। उनके पास अपने शिकार का पूरा आंकड़ा होता है विश्वास कीजिये अन्ना जैसे शेर का भी जिसके दहाड़ने से सिंहासन हिलने लगते हैं।

अभी तो पूरे - पूरे शिकार का इंतजाम करना है हर महीने कम से कम 120 करोड़ तो चाहिए ही पार्टी के वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए यदि उनकी कंपनी दिल्ली मे ही स्थिर रहती है तो लेकिन खुदा न खास्ता यदि "आप" का विस्तार करना पड़ा तो कितनी बड़ी मुसीबत होगी इसका अंदाजा है किसी को ? क्या देश के युवकों और नौजवानो के सामने यही छिछोरई और उघटापैची करने का काम बचा है ? इससे देश की अर्थव्यवस्था का कैसे भला होगा ? सवाल ये है कि सारा रिजर्व बैंक केवल इसी काम मे जुटेगा कि जो भी हो "आम आदमी पार्टी" को जिंदा रखो ?

दिल्ली की दिलदारी का जिस प्रकार से इस केजरीवाल एंड कंपनी ने कबाड़ा किया है उससे आगे बहुत बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है यदि "आप" को समाप्त नहीं किया गया तो। अभी तो दिल्ली को काँग्रेस ने बलात्कार की राजधानी बनाया यदि "आप" खत्म नहीं हुई तो यकीन मानिए अन्ना का चंदा जब हड़प लिया गया तो "आम आदमी" का जेब और बैंक - बैलेंस हड़पने मे कितना समय लगेगा और वो भी सर्फ और सिर्फ बारह तेरह लोगों के लिए जिनके कैडर भी भाड़े के टट्टू ही हैं ? आखिर महत्वाकांक्षी तो जनता को होना चाहिए !          

Sunday, 1 December 2013

योगेंद्र यादव का यौगिक युग्म "आप" का आपा गुम ?

दो दिन पहले "आम आदमी पार्टी" के योगेंद्र यादव ने कोंग्रेसी संसद के गुमनाम कम्पनी के सहयोग से अपने पक्ष मे जिसमे उन्होने "आप" को 35 से 50 सीटें जीतने की संभावना जताई। अजीब सा चुनाव सर्वेक्षण जारी करके अपने ही पैरों पर जबर्दस्त कुल्हाड़ी मारी है। योगेंद्र यादव ने सन 1983 का हवाला देते हुए एन॰ टी॰ रामाराव के तेलुगुदेशम पार्टी का उद्धहरण देते हुए खुद के सर्वेक्षण का अजीब सा और घटिया बचाव करने की कोशिश की। उनका तर्क या कुतर्क ये था कि नई पार्टी के लहर को समान्य तौर पर पहचाना नहीं जा सकता लेकिन यादव जी ये नहीं बता पाए कि उनके और कोंग्रेसी संसद के पास ऐसी कौन सी मशीन है केवल वे ही इस लहर को देख पाए बाकी नहीं। वैसे भी वो पिछले दो बार से गुजरात मे नरेन्द्र भाई मोदी को बुरी तरह हाराते रहे हैं। पीछे कई बार उनके सर्वेक्षण बुरी तरह उल्टे साबित हुए हैं।

इसकी उम्मीद एक सामान्य समझ रखने वाले व्यक्ति से भी नहीं की जाती। पता नहीं कैसे "आप" ने ऐसा कैसे कर लिया? "आप" का ये स्टैंड न सिर्फ लोगों को बहुत अजीब सा लग रहा है बल्कि ऐसा लगता है कि को कोई जघन्य अपराधी किसी भी तरह ये मनवाने पर उतारू है  कि उससे बड़ा कोई महात्मा या धर्मात्मा है ही नहीं।

उन्नत (एडवांस) मनोविज्ञान की दृष्टि से खुद को बचाने का निहायत ही घटिया, बेहूदा और मूर्खतापूर्ण हरकत है। ऐसा कैसे है इसकी चर्चा मे आगे करूंगा।