"आप" के वजूद का मतलब
दिल्ली विधान सभा चुनाव मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए मुझे आश्चर्य होगा। जिस प्रकार से "आप" की पोल खुली है वो न सिर्फ अपने आप मे अनोखा है बल्कि भारतीय राजनीति का एक दुखदायी पक्ष इसलिए भी है कुछ अतिमहत्वाकांक्षी लोगों का समूह ईमानदारी के नाम पर बड़ी आसानी से लोगों की आँखों मे सारे आम धूल झोंकता हुआ चला जाता है और फिर फिर धीरे - धीरे जब उनकी पोल - पट्टी खुलती है तो लोग न सिर्फ सन्न रह जाते हैं बल्कि खुद को बेबस भी पाते हैं। क्योंकि एक ऐसी पार्टी जो चुनाव लड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर लोगों को न सिर्फ लोगों को धोखे मे रखने मे सफल रहती है बल्कि उसका किसी भी मुद्दे पर कोई विजन भी जनता के समक्ष नहीं आता। इतने आरोप तो चुनाव से पहले किसी भी भ्रष्ट पार्टी पर भी कभी नहीं लगे जितने आप पर अभी लग चुके हैं।
अस्सी के दशक के बेहद ईमानदार वी॰ पी॰ सिंह के दौर को याद कीजिये जिसकी उपज लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा आदि जैसे लोग हैं जिनका वास्तविक भ्रष्ट स्वरूप सबके सामने है। विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी भी प्रकार से और किसी भी प्रकार से अरविंद केजरीवाल से कम ईमानदार नहीं थे लेकिन जनता दल बनने से पहले और बाद मे भी उस व्यक्ति पर किसी भी भ्रष्टाचार, अनाचार या किसी हेर-फेर के आरोप कभी नहीं लगे। उस व्यक्ति ने पार्टी का टूटना स्वीकार किया लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी विश्वनाथ प्रताप सिंह की ईमादारी के आगे कहाँ खड़ी होती है जिसके खिलाफ सारे आम झूठ तक बोलने का आरोप है। विश्वनाथ प्रताप सिंह पर उनके गुरु राजीव गांधी ने भी कभी भी उनके उनपर कोई आरोप नहीं लगा पाए उल्टे केजरीवाल के गुरु "अन्ना" ने ही केजरीवाल को "लालची" तक कह डाला है। विश्वनाथ प्रताप सिंह की बेहद ईमानदार राजनीति ने देश की क्या दुर्गति की सभी लोगों के पता है उसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है।
जिस प्रकार से लोगों ने प्रयोग के तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को आजमाया था उसी तर्ज पर केजरीवाल भी लोगों से खुद को आजमाने की अपील कर रहे हैं। याद कीजिये किस प्रकार मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने कश्मीर के आतंकवादियों से मिलकर खुद अपनी बेटी महबूबा मुफ़्ती के अपहरण का नाटक खेला और बदले मे दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ा गया, बेहद ईमानदार विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार दिल्ली के जमा मस्जिद के ईमाम की गोडधरिया करते थे ईमानदार केजरीवाल उससे भी आगे बढ़ कर तौकीर रजा तक की गोडधरिया तक करते हैं, बटाला हाउस इनकाउंटर, मुस्लिम आरक्षण की वकालत आदि तो है ही दिल्ली के जनमानस मे। आतंकवादियों, नक्सलियों और कश्मीर पर ईमानदार केजरीवाल एंड कंपनी का स्टैंड किसी से छिपा नहीं है।
एक बहुत बड़ा और अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि दुर्भाग्य से यदि केजरीवाल दिल्ली का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाते है तो क्या "आम आदमी पार्टी" को वो खत्म कर देंगे ? यदि नहीं तो उनके वेबसाइट के अनुसार 10,000 कर्मचारियों का 20,000 रुपये मासिक के हिसाब से हर महीने वेतन के लिए 20 करोड़ रुपये मासिक कम से कम कहाँ से लाकर देंगे ? इसके लिए वो कौन सा रास्ता अपनाएँगे जो ईमानदारी का ही होगा? ये प्रश्न दिल्ली के लोगों के सामने तो है ही साथ ही "आप" के कर्मचारियों को सोचना चाहिए कि "आप" का होना ही अपने आपमे बहुत बड़ा भ्रष्टाचार नहीं है ?
दिल्ली विधान सभा चुनाव मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए मुझे आश्चर्य होगा। जिस प्रकार से "आप" की पोल खुली है वो न सिर्फ अपने आप मे अनोखा है बल्कि भारतीय राजनीति का एक दुखदायी पक्ष इसलिए भी है कुछ अतिमहत्वाकांक्षी लोगों का समूह ईमानदारी के नाम पर बड़ी आसानी से लोगों की आँखों मे सारे आम धूल झोंकता हुआ चला जाता है और फिर फिर धीरे - धीरे जब उनकी पोल - पट्टी खुलती है तो लोग न सिर्फ सन्न रह जाते हैं बल्कि खुद को बेबस भी पाते हैं। क्योंकि एक ऐसी पार्टी जो चुनाव लड़ने के बावजूद बड़े पैमाने पर लोगों को न सिर्फ लोगों को धोखे मे रखने मे सफल रहती है बल्कि उसका किसी भी मुद्दे पर कोई विजन भी जनता के समक्ष नहीं आता। इतने आरोप तो चुनाव से पहले किसी भी भ्रष्ट पार्टी पर भी कभी नहीं लगे जितने आप पर अभी लग चुके हैं।
अस्सी के दशक के बेहद ईमानदार वी॰ पी॰ सिंह के दौर को याद कीजिये जिसकी उपज लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, देवगौड़ा आदि जैसे लोग हैं जिनका वास्तविक भ्रष्ट स्वरूप सबके सामने है। विश्वनाथ प्रताप सिंह किसी भी प्रकार से और किसी भी प्रकार से अरविंद केजरीवाल से कम ईमानदार नहीं थे लेकिन जनता दल बनने से पहले और बाद मे भी उस व्यक्ति पर किसी भी भ्रष्टाचार, अनाचार या किसी हेर-फेर के आरोप कभी नहीं लगे। उस व्यक्ति ने पार्टी का टूटना स्वीकार किया लेकिन भ्रष्टाचार नहीं। अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी विश्वनाथ प्रताप सिंह की ईमादारी के आगे कहाँ खड़ी होती है जिसके खिलाफ सारे आम झूठ तक बोलने का आरोप है। विश्वनाथ प्रताप सिंह पर उनके गुरु राजीव गांधी ने भी कभी भी उनके उनपर कोई आरोप नहीं लगा पाए उल्टे केजरीवाल के गुरु "अन्ना" ने ही केजरीवाल को "लालची" तक कह डाला है। विश्वनाथ प्रताप सिंह की बेहद ईमानदार राजनीति ने देश की क्या दुर्गति की सभी लोगों के पता है उसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है।
जिस प्रकार से लोगों ने प्रयोग के तौर पर विश्वनाथ प्रताप सिंह के जनता दल को आजमाया था उसी तर्ज पर केजरीवाल भी लोगों से खुद को आजमाने की अपील कर रहे हैं। याद कीजिये किस प्रकार मुफ़्ती मुहम्मद सईद ने कश्मीर के आतंकवादियों से मिलकर खुद अपनी बेटी महबूबा मुफ़्ती के अपहरण का नाटक खेला और बदले मे दुर्दांत आतंकवादियों को छोड़ा गया, बेहद ईमानदार विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार दिल्ली के जमा मस्जिद के ईमाम की गोडधरिया करते थे ईमानदार केजरीवाल उससे भी आगे बढ़ कर तौकीर रजा तक की गोडधरिया तक करते हैं, बटाला हाउस इनकाउंटर, मुस्लिम आरक्षण की वकालत आदि तो है ही दिल्ली के जनमानस मे। आतंकवादियों, नक्सलियों और कश्मीर पर ईमानदार केजरीवाल एंड कंपनी का स्टैंड किसी से छिपा नहीं है।
एक बहुत बड़ा और अतिमहत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि दुर्भाग्य से यदि केजरीवाल दिल्ली का चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बन जाते है तो क्या "आम आदमी पार्टी" को वो खत्म कर देंगे ? यदि नहीं तो उनके वेबसाइट के अनुसार 10,000 कर्मचारियों का 20,000 रुपये मासिक के हिसाब से हर महीने वेतन के लिए 20 करोड़ रुपये मासिक कम से कम कहाँ से लाकर देंगे ? इसके लिए वो कौन सा रास्ता अपनाएँगे जो ईमानदारी का ही होगा? ये प्रश्न दिल्ली के लोगों के सामने तो है ही साथ ही "आप" के कर्मचारियों को सोचना चाहिए कि "आप" का होना ही अपने आपमे बहुत बड़ा भ्रष्टाचार नहीं है ?
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