Sunday, 24 November 2013

"आप" का कल्पना से भी परे का खर्च

कल "आम आदमी पार्टी" के एक कर्मचारी संतोष कोहली ने आत्महत्या कर लिया। पुलिस को कोई आत्महंता-पत्रावली नहीं मिली इसलिए लगता है कि अपने निजी कारणों से उसने ऐसा किया होगा। उधर कोई आत्महत्या कर रहा है और इधर जंतर - मंतर पर नाच गाना चल रहा है वैसे नाचने - गाने मे कोई बुराई नहीं है खास कर उस समय जब पिछले महीने 21 अक्टूबर की तारीख जब डॉ राघवेंद्र कुमार ने केजरीवाल से 5 प्रश्न पूछे थे और तब केजरीवाल जवाब देने से भागने लगे थे उसके बाद अन्ना का खुलासा और फिर स्टिंग ऑपरेशन ने पूरी की पूरी पोल खोल के रख दी हो। इस स्थिति मे मतदाताओं को लुभाने के लिए नाच - गाना करना एक अच्छा उपाय हो सकता है ऐसा निष्कर्ष डॉ कुमार विश्वास और फर्जी ओपेनियन रखने वाले योगेन्द्र यादव जैसे लोग जिस समूह मे हों उसी समूह का का हो सकता है। हालांकि जिस प्रकार की भीड़ जंतर - मंतर पर दिख रही थी वो अपने आप मे प्रशंसनीय है सभी "आप" के कर्मचारी (नकली कार्यकर्ता) अपने गणवेश मे थे सभी अन्ना की नकल करते हुए टोपी ओढ़े हुए थे। किसी की आत्महत्या के समय ऐसे समारोह का आयोजन काफी हिम्मत का काम है। वैसे भीड़ को देखते हुए मुझे ये समझ मे नहीं आ रहा था कि इतने कर्मचारियों को 20,000/- प्रति माह (कम से कम) के हिसाब से वेतन कैसे दिया जाता होगा ? मेरे हिसाब से कल जंतर - मंतर पर कम से कम 5000 लोग तो रहे ही होंगे तो सवाल ये उठता है कि इतने लोगों को का वेतन एक महीने का हुआ 100000000/- रुपया हर महीने कम से कम। वैसे मैंने कल "आप" के पूरे कर्मचारियों को एक साथ देखा यदि सब के सब रहे हों तो।

ये आंकड़ा पूरी तरह ठोस, अपरिहार्य न्यूनतम है जो खर्च करना ही करना है बाकी विज्ञापन का खर्च, गाड़ी, तेल, खाना-पीना और भी बहुत से खर्चे अलग से। सारे खर्चे अगर जोड़ लिए जाएँ तो इतना खर्च तो सपा-बसपा-काँग्रेस भी नहीं करतीं।  "आप" की वैबसाइट पर केवल 20 करोड़ का आंकड़ा है इतने मे तो "आप" के कर्मचारियों का वेतन भी नहीं हो पाएगा। स्टिंग ऑपरेशन मे एक बात खुल कर आई है कि टीवी और अन्य माध्यमों का विज्ञापन बहुत महंगा है। "आप" के कुछ लोगों के माध्यम से ये पता चला कि मुख्यधारा के तीन टीवी चैनल "आप" के पक्ष मे हैं उनमे से दो तो आंशिक रूप से हैं किन्तु एक तो पूरी तरह से "आप" के पक्ष मे है। उस मीडिया हाऊस के "आप" के पक्ष मे होने का आलम ये है कि उसके पत्रकार सारे आम "आम आदमी पार्टी" का प्रचार करते हैं। उनके लेख तो केजरीवाल और "आप" के पक्ष मे तो होते ही हैं उनका फ़ेसबुक अकाउंट भी ऐसा है कि लगता है कि वो भी "आप" के कर्मचारी हैं। अब मुख्य धारा की तीन - तीन चैनलो को मैनेज करने का भरी-भरकम खर्च ? ये खर्च इतना बड़ा है कि इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि रात मे 12 बजे से सुबह 6 बजे तक प्रति 10 सेकंड के विज्ञापन का खर्च कम से कम 1000/- रुपया है अधिकतम 22000/- रुपया प्रति 10 सेकंड है। अरबों - खरबों का हिसाब - किताब है सिर्फ विज्ञापन का खर्च। यहाँ तो मामला प्रत्यक्ष विज्ञापन का नहीं बल्कि उससे से भी बढ़ कर है पूरी की पूरी मीडिया हाउस ही "आप" के प्रचार मे अपने हिसाब से लगी हुई है। खर्चे का अनुमान लगा लीजिये।

बहुत बड़ा सवाल ये है कि आखिर इतना खर्च जिसमे कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन ही 10 करोड़ रूपाया प्रति माह है, विज्ञापन का खर्च भी करोड़ों मे है ही, पूरी की पूरी मीडिया हाउस केजरीवाल और "आप" के प्रचार मे लगी हुई है साथ मे दो मीडिया हाउस भी सहयोग कर रहे हैं अरबों - खरबों का खेल है ये ? आखिर इतना फ़ंड आ कहाँ से रहा है ? 

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