स्टिंग सीडी का सटीक सही समय
अब तो सारी पोल-पट्टी "आम आदमी पार्टी" की सिरे से खुल ही चुकी है उनका सड़ा तंत्र सबके सामाने बजबजाती गंदी नाली की तरह सबके सामने आ चुका है तो "आप" वाले घोर आपत्ति कर रहे हैं इस सीडी के आने की सामयिकी पर, उन लोगों को घोर ऐतराज है कि चुनाव के ही समय ये सीडी क्यों आई ? इससे स्टिंग ऑपरेशन करने वाले की मंशा पर "आप" वालों को संदेह है। तार्किक आधार पर संदेह करना कहीं से भी गलत नहीं है संदेह से ही विश्वास करने का आधार बनाता है। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले अनुरंजन झा की मंशा पर ठीक संदेह के आधार पर विशवास करते हुए ये क्यों न कहा जाए कि ठीक इसी समय इस सीडी को आना बहुत जरूरी था ?
अमेरिका मे एक लोकोक्ति है "यदि आप किसी की सच्चाई जानना चाहते हैं तो उसे चुनाव मे खड़ा कर दीजिये" ठीक यही बात "आम आदमी पार्टी" पर भी अक्षरशः लागू होती है। एक स्वस्थ लोकतन्त्र और समाज के लिए ये बहुत आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों की आप कभी भी पोल खोलें या न खोलें चुनाव के समय उसकी पोल जरूर खोलनी चाहिए, उसके काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा यदि है तो ठीक उसी समय जरूर समाज के सामने लाना चाहिए ये सामान्य और जिम्मेदार नागरिक का न सिर्फ धर्म है बल्कि कर्तव्य भी है क्योंकि लोकतान्त्रिक समाज मे चुनाव का समय बेहद संक्रामण का समय होता है जिसके माध्यम से गलत और गंदे लोगों से समाज को बचाया जाना बहुत आवश्यक होता है। अतः मुझे "आम आदमी पार्टी" के खिलाफ इस स्टिंग ऑपरेशन के सामयिकी के संदर्भ मे अनुरंजन झा की प्रशंसा करने मे तनिक भी कोई संकोच नहीं है। मेरा उनसे तथा उन सभी से ये अनुरोध है कि यदि कुछ और भी सच्चाई "आप" के बारे मे है तो निश्चित रूप से समाज के समक्ष ले कर आएँ। क्योंकि वोट करते समय कुछ भी अंधेरे मे नहीं रहना चाहिए।
वैसे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के आने के बाद "आप" के कर्मचारियों (नकली कार्यकर्ता ) की हालत उस बंदरिया की भांति हो चुकी है जिसका बच्चा मर गया होता है और वो उस बच्चे की लाश को तब तक अपने सीने से चिपकाए घूमती रहती है जब तक उसके लाश से भयानक बदबू नहीं आने लगती, अब ये देखने वाली बात होगी "आप" के कर्मचारियों को "आम आदमी पार्टी" के लाश की दुर्गंध कब तक उनके नाक मे पहुँचती है। वैसे तो "आप" के बहुत से कर्मचारियों ने अपना नया रोजगार खोजने का प्रयास बहुत तेज कर दिया है लेकिन अचानक ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी बढ़ जाने के कारण पारिश्रमिक पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है।
वैसे केजरीवाल ने अपना पूरा प्रयास किया "आम आदमी पार्टी" को एक कॉर्पोरेट की तरह चलाने का, इसीलिए उन्होने चुनाव जीतने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जो कहीं भी नैतिक नहीं थे, उन्होने सारी मर्यादा को बिलकुल ताक पर रख दिया जो कहीं से भी उचित नहीं था, जो भारतीय राजनीति के इतिहास मे ये बिलकुल अपने तरह का अनूठा प्रयास है, किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को "वेतन" देने का निकृष्टतम मामला है। इसीलिए जिन्होने "आप" को चंदे के रूप मे बड़ी राशि दी है वो सकते मे हैं।
अब तो सारी पोल-पट्टी "आम आदमी पार्टी" की सिरे से खुल ही चुकी है उनका सड़ा तंत्र सबके सामाने बजबजाती गंदी नाली की तरह सबके सामने आ चुका है तो "आप" वाले घोर आपत्ति कर रहे हैं इस सीडी के आने की सामयिकी पर, उन लोगों को घोर ऐतराज है कि चुनाव के ही समय ये सीडी क्यों आई ? इससे स्टिंग ऑपरेशन करने वाले की मंशा पर "आप" वालों को संदेह है। तार्किक आधार पर संदेह करना कहीं से भी गलत नहीं है संदेह से ही विश्वास करने का आधार बनाता है। स्टिंग ऑपरेशन करने वाले अनुरंजन झा की मंशा पर ठीक संदेह के आधार पर विशवास करते हुए ये क्यों न कहा जाए कि ठीक इसी समय इस सीडी को आना बहुत जरूरी था ?
अमेरिका मे एक लोकोक्ति है "यदि आप किसी की सच्चाई जानना चाहते हैं तो उसे चुनाव मे खड़ा कर दीजिये" ठीक यही बात "आम आदमी पार्टी" पर भी अक्षरशः लागू होती है। एक स्वस्थ लोकतन्त्र और समाज के लिए ये बहुत आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन के लोगों की आप कभी भी पोल खोलें या न खोलें चुनाव के समय उसकी पोल जरूर खोलनी चाहिए, उसके काले कारनामों का कच्चा चिट्ठा यदि है तो ठीक उसी समय जरूर समाज के सामने लाना चाहिए ये सामान्य और जिम्मेदार नागरिक का न सिर्फ धर्म है बल्कि कर्तव्य भी है क्योंकि लोकतान्त्रिक समाज मे चुनाव का समय बेहद संक्रामण का समय होता है जिसके माध्यम से गलत और गंदे लोगों से समाज को बचाया जाना बहुत आवश्यक होता है। अतः मुझे "आम आदमी पार्टी" के खिलाफ इस स्टिंग ऑपरेशन के सामयिकी के संदर्भ मे अनुरंजन झा की प्रशंसा करने मे तनिक भी कोई संकोच नहीं है। मेरा उनसे तथा उन सभी से ये अनुरोध है कि यदि कुछ और भी सच्चाई "आप" के बारे मे है तो निश्चित रूप से समाज के समक्ष ले कर आएँ। क्योंकि वोट करते समय कुछ भी अंधेरे मे नहीं रहना चाहिए।
वैसे स्टिंग ऑपरेशन की सीडी के आने के बाद "आप" के कर्मचारियों (नकली कार्यकर्ता ) की हालत उस बंदरिया की भांति हो चुकी है जिसका बच्चा मर गया होता है और वो उस बच्चे की लाश को तब तक अपने सीने से चिपकाए घूमती रहती है जब तक उसके लाश से भयानक बदबू नहीं आने लगती, अब ये देखने वाली बात होगी "आप" के कर्मचारियों को "आम आदमी पार्टी" के लाश की दुर्गंध कब तक उनके नाक मे पहुँचती है। वैसे तो "आप" के बहुत से कर्मचारियों ने अपना नया रोजगार खोजने का प्रयास बहुत तेज कर दिया है लेकिन अचानक ऐसे लोगों की संख्या थोड़ी बढ़ जाने के कारण पारिश्रमिक पर्याप्त नहीं मिल पा रहा है।
वैसे केजरीवाल ने अपना पूरा प्रयास किया "आम आदमी पार्टी" को एक कॉर्पोरेट की तरह चलाने का, इसीलिए उन्होने चुनाव जीतने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जो कहीं भी नैतिक नहीं थे, उन्होने सारी मर्यादा को बिलकुल ताक पर रख दिया जो कहीं से भी उचित नहीं था, जो भारतीय राजनीति के इतिहास मे ये बिलकुल अपने तरह का अनूठा प्रयास है, किसी राजनीतिक पार्टी द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को "वेतन" देने का निकृष्टतम मामला है। इसीलिए जिन्होने "आप" को चंदे के रूप मे बड़ी राशि दी है वो सकते मे हैं।
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