Wednesday, 20 November 2013

अन्ना और वास्तविक "आप"

अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार अन्ना के मुद्दे पर अपना स्वरूप दिखाया है उससे उनकी "आम आदमी पार्टी" के कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी सहमत ही नहीं हैं बल्कि बहुत ज्यादा खिन्न भी हैं। जो खिन्न हैं उनका स्पष्ट मानना है कि केजरीवाल को कड़ा रुख अपनाने के बजाय के विनम्रता से पेश आना चाहिए था और अन्ना पर भद्दे प्रत्यारोपण से बचना चाहिए था। ऐसा न करके उन्होने इतना बड़ा नुकसान कर दिया जिसकी भरपाई संभव नहीं, इसके साथ - साथ उन्होने अपने सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं को भी अन्ना को आड़े हाथों लेने का आदेश दे डाला। जिसे सोशल मीडिया पर उनके कार्यकर्ताओं द्वारा अन्ना पर किए जा रहे भद्दी से भद्दी  टिप्पणिया आसानी से देखी जा सकती हैं। वैसे अब तो ये तय माना जा रहा है दिल्ली मे "आम आदमी पार्टी" का खाता भी खुल जाए तो बड़ी बात होगी।

अरविंद केजरीवाल के रूख से जो "आप" के पदाधिकारी सहमत नहीं हैं वो दरअसल बहुत ज्यादा केजरीवाल से डरे और सहमे भी हुए हैं कोई भी बहुत ज्यादा खुल कर बोलने को तैयार नहीं है सिवाय केजरीवाल के आदेशों का आँख बंद करके पालन करने के। केजरीवाल का ये तानाशाही स्वरूप "आम आदमी पार्टी" के बहुत से बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं को कहीं से भी रास नहीं आ रहा है। उसमे से बहुत सारे तो केजरीवाल के इस रूप से परिचित ही नहीं थे वो पहली बार इस स्वरूप के देख कर न सिर्फ अचंभित हैं बल्कि बहुत कुछ सोचने पर भी विवश हैं। आगे वो इस विषय पर या असहमति के किसी अन्य मुद्दे पर क्या स्टैंड लेते हैं देखने वाली बात होगी।

एक बात तो अकाट्य रूप से सत्य है कि अरविंद केजरीवाल के जो भी सामाजिक और राजनीतिक स्वरूप है वो सिर्फ और सिर्फ अन्ना हज़ारे के कारण से है लिहाजा अन्ना हज़ारे का सन्दर्भ केजरीवाल और "आप" के लिए किसी प्राधिकरण (Authority) से कम नहीं। अतः यदि अन्ना हज़ारे कोई स्पष्टीकरण चाहते हैं तो उल्टे उनपर प्रत्यारोपण करना किसी घृष्टता से कम नहीं है। वैसे भी केजरीवाल ने वो सारे हथकंडे चुनाव जीतने के निमित्त अपनाए जो उन्हे किसी भी कीमत पर नहीं अपनाने चाहिए थे चाहे वो फर्जी ओपिनियन पोल का मामला हो जिसे उनके ही पदाधिकारी योगेन्द्र यादव ने कराया, कामिटमेंट के बावजूद अन्ना के नाम का दुरपयोग करना, जनलोकपाल के संदर्भ मे दिल्ली की जनता से झूठे वादे करना, सुरक्षा और बंगला न लेने का हथकंडा अपनाना (दिल्ली के विधायकों को सुरक्षा और बंगला नहीं मिलता), भ्रष्ट लोगों को बड़े पैमाने पर पार्टी का उम्मेदवार बनाना या फिर वोट बैंक गंदी राजनीति करने के निमित्त तौकीर रजा से मुलाक़ात करना। केजरीवाल हर उस हथकंडे को अपनाया जिसके कारण राजनीति मे गंदगी बढ़ती ही है और बढ़ती गई। वैसे कुमार विश्वास ये स्वीकार कर चुके है आंदोलन मे जमा हुए 2 करोड़ रुपए थे जिसे दिल्ली विधान सभा चुनाव मे खर्च कर दिया गया है फिर केजरीवाल किस मुंह से ये सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं सारा पैसा आंदोलन मे ही खर्च हो गया था ?

केजरीवाल और उनके कुछ सहयोगियों द्वारा अन्ना पर ये दोषारोपण करना कि उनको बहकाया गया है फुसलाया गया है केजरीवाल एंड कंपनी की बेहद ओछी मानसिकता को ही दर्शाता है। जो आदमी पिछले लगभग 35 साल से निरंतर समाजसेवा कर रहा है, समाज को बादल रहा है, ईमानदारी कि ऐसी प्रतिमूर्ति कि उसके स्टैंड से सरकारें तक हिल जाएँ उस व्यक्ति को कोई बहका सकता है, फुसला सकता है, गलत सूचना दे सकता है ? 

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